'कि सावन आया ' अपने छतदार ऊर्ध्वाधर छज्जे में बैठा हुआ मैं, अभी न चलनेवाली हवा और न बरसनेवाले बादलों से उम्मीदें लगाये हुए हूं। हवा चल नहीं रही, बादल बरस नहीं रहे। हालांकि ख़बर थी कि इस भूखंड में तीन चार दिनों तक भारी बारिश होगी। दो दिन बीत गए हैं, बारिश सिर्फ़ औपचारिकता निभाकर चली गई है। जैसे कोई आंगन में बाल्टीभर पानी उड़ेलकर चला जाए। झड़ी जैसी कोई घटना अभी तक नहीं घटी। उम्मीद के ही क़द घटते रहे हैं। फिलहाल मैं देख-सुन रहा हूं कि मेरे हवाई छज्जे के नीचे, कतारों में खड़े, जो कतारी-घर (राे हाउसेस) हैं, उनमें सुबह की हलचलें बाक़ायदा चल रही हैं। म्यूजिक सिस्टमों से गानों की प्रतिस्पर्द्धा के स्वर गूंज रहे हैं। इधर से कोई गाना बजता है, उधर से कोई जवाबी गाना आता है। इन्हीं गानों से पता चला कि सावन आ गया है। कोई पुकार रहा है-'सावन के झूले पड़े,तुम चले आओ', कोई कराह रहा है-'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है', कोई कोई ख़ुशी ख़ुशी बता रहा है-'रिमझिम के गीत सावन गए', कोई कोई सावन के आने से भयभीत होकर बड़बड़ा रहा है-'अबके सजन सावन में,...