संदेश की खोज नयागांव, बालाघाट, १३.०९.२०२६, रविवार। आज सुबह सुबह फिर सपना देखा। मैं सपने देखता हूं, बचपन से देखता हूं। मैं ही देखता हूं, सपनों ने मुझे कभी नहीं देखा। शायद सपनों की आंख नहीं होती। हमारी होती है। सपनों के पास दिमाग भी नहीं होता, बुद्धि और विवेक भी नहीं होता। भारतीय फिल्मों की तरह वे, कुछ भी अतार्किक, बेसिरपैर की घटनाएं देखते रहते हैं। जैसे एक सपना साइकिल पर बैठा और चल पड़ा। रस्ते में पहाड़ आया तो वह हेलीकॉप्टर चलाने लगा। हेलीकॉप्टर अचानक सैटेलाइट बन गया गया और पृथ्वी के चक्कर लगाने लगा। सपना पूरे मध्यप्रदेश में घूमने लगा। सतपुड़ा की चोटियां, जंगलों का सौंदर्य, नदियों के घुमावदार बहाव। फिर समुद्र आ गया। सैटेलाइट जंगी जहाज बन गया। अचानक एक टॉरनेडो आकर टकराया और ब्लास्ट। जहाज के परखचे उड़ गए। सपना किनारे की रेत पर उठकर कपड़े झाड़ने लगा। यह मैं था क्योंकि सपने में मैं ही था। इसलिये जहाज के ब्लास्ट होते ही मैं पलंग से गिर पड़ा ...