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काले कुत्ते का न होना

काले कुत्ते का न होना

सुबह पौने छः बजे जब मैं 'कुत्तारक्षकी' (छड़ी) लेकर निकला तो अंदर ऊमस थी और बाहर ठंडी हवा चल रही थी। वातावरण ठीक मनुष्यों के मन की तरह होता है। अंदर और गहराई में घनी ऊमस और तपन होती है और जैसे जैसे ऊपर जाते जाओ ठंडक पड़ती जाती है। 

एक गहराई वह आती है जहां सारी ठोसता लावे में तब्दील हो जाती है। ये जो ज्वालामुखी होते हैं वह इसी लावे का फट पड़ना है। कोई कोई ही फटते हैं, सभी  नहीं। 

इसी प्रकार जैसे जैसे ऊंचाई बढ़ती जाती है, तब एक ऊंचाई ऐसी भी आती है जहां बर्फ जमने लगती है, हिमालय बनने लगते हैं। 

आदमियों में भी अपवाद-स्वरूप ऐसा होने लगता है। लोग कहने लगते हैं -इसमें गहराई है, इसमें ऊंचाई है। रहे मुझे क्या। मैं तो प्रातः भ्रमण में चलूं।

पिछली रात, रात के चार बजे नींद खुली। खुल जाती है। कभी ढाई बजे, कभी तीन बजे, कभी चार बजे। इसके लोग आध्यात्मिक अर्थ निकालते हैं, मगर मैं इन्हें रिलैक्स होने के अवसर मानता हूं और रिलैक्स होकर नींद की अगली किश्त पूरी करने के लिए सो जाता हूं। कभी नींद आती है, कभी नहीं आती। आज नहीं आयी। नहीं आने की वजह थी। कल शाम से बादल गरज रहे थे, बिजली चमक रही थी। जेठ महीने की असमय बदलियों के असमय बरसने के लक्षण थे, तो बदली रात में असमय ही लगभग तीन बजे बरसी। मैं चार बजे उठा तब भी बरस ही रहे थे। सुबह पत्नी ने बताया कि तीन बजे से बरसे थे एकाध घंटा। ठीक मध्यावधी चुनावी लुहावनी घोषणाओं की तरह। फिर चुनाव जीतने के बाद गैस, पेट्रोल, खाने पीने के सामानों पर ऊमस की तरह पसर गए थे, घर भर को संयम और देशभक्ति के ललकारते। 

महामारी के कड़कड़ाते उपदेशों से मन हटाकर मैंने बाहर खुशनुमा हवा को चलते-बहते देखा। 

  पूरे अस्तित्व में, हवा में घुली आनंददायी ठंडक महसूस करता हुआ मैं घर से निकल पड़ा। घर से निकल पड़ने को देशभक्ति और संन्यास भी लोग कहते हैं। मैं घर से निकलने को भ्रमण कहता हूं, घूमना। अब इसको भी सोनेवाले दिग्भ्रांति कह देते हैं तो कहते रहें।

मैं आँगलाष्ट-आकृति (8) बनाता हुआ बड़े बगीचे की तरफ चला। बड़ा बगीचा यानी सुपारी बाग़। सुपारी बाग़ में कुछ समय से स्वास्थ्य चिंतक लोग योग करते हैं। एक प्रशिक्षक पुरुष और तीन चार प्रौढ़ता-प्राप्त थुलथुली महिलाएं। 

सुबह सुबह बारिश हुई थी इसलिए मुझे उम्मीद थी कि आज बगीचे में काला कुत्ता नहीं होगा। वैसा ही हुआ कोई काला कुत्ता सचमुच नहीं था। एक भूरा कुत्ता एक सफेद कुत्ते को दबोचे हुए था। यह मैत्री-पूर्ण धींगा मस्ती मैं रोज़ ही देखता हूँ।

बहुत कुत्ते हैं हमारे आम्र-नगर में। पालतू हाई ब्रीड कम हैं, आवारा ज़्यादा हैं। हाई ब्रीड भौंकते हैं तो दिल दहल जाता है और पूरे शरीर के सौ प्रतिशत रोंगटे या रोएं खड़े हो जाते हैं।आवारा कुत्ते ज़्यादातर आपस में ही भौंकते और जूझते रहते हैं। मनुष्यों से नहीं उलझते फिर भी मन में धुकधुकी बनी रहती है कि कोई या कई कुत्ते दौड़ा न दें।  अभी कल हुआ ब्यहि था। एक लगभग पूरी श्वानी पीछे से आकर अचानक भौंकने लगी। मेरे तमाम रोंगटे खड़े हो गए। वो तो मेरे हाथ में चील की चोंच-आकृत पीतल की मूंठ-वाली छड़ी थी जो मेरा मनोबल बनकर हिलने लगी। 

ये जो अचानक कुत्ते या कुत्तिकाएं मनुष्यों पर भौंकने लगते य्या लगती हैं, उसके पीछे भी मनोविज्ञान है। श्वान विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि सड़क पर कोई कुत्ता या पिल्ला किसी कार के नीचे आकर मर जाता है तो कुत्ते हर कार पर आक्रामक होकर भौंकने लगते हैं। 

मुझ पर जो श्वानी आक्रामक हुई तो शायद उसका कोई एक या अनेक पिल्ले कोई लड़की या लड़कियां उठा ले गईं होंगी। कुछ दिन पहले दो तेरह पंद्रह साल की लड़कियां एक एक पिल्ला उठाये पुचकारती हुई चली जा रहीं थी। उन्होंने ने ही ख़ाली समय में खेलने के लिए रख लिया होगा। लड़कियों को प्राणियों से खेलने का बड़ा शौक़ होता है। शायद उसी पीड़ा के कारण यह श्वानी मुझ पर आक्रामक हो रही थी। इसी को कहते हैं करे कोई, भरे कोई। ऐसे ही प्रकरणों में कई सीधे सादे भले मनुष्य किसी तरह आदमी की ज़िंदगी जीना चाहते हैं, मगर कुत्ते की मौत मर जाते हैं। ख़ैर,  श्वानी के क्षेत्र से बाहर आकर मैं सुरक्षित हो गया था।

बगीचे में कुत्तों की धींगा मस्ती अभी भी चल रही थी। वे कभी एक दूसरे के पीछे दौड़ते कभी एक दूसरे से उलझ जाते।

बारिश से गीली ज़मीन पर योग की दरी और चटाइयां नहीं बिछ सकती थीं, पर कुत्तों को चटाई की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनका स्वाभाविक और प्राकृतिक योगासन और प्राणायाम कौन रोक सकता है। 

बगीचा गीला था तो जनशून्य था। यह जनशून्य बगीचा मेरे लिए लाभकारी होता है। मैं खुली हवा में कुछ खड़े व्यायाम और बेंच पर बैठे प्राणायाम कर लेता हूँ। 

जब मैं उस योगासनी जन-शून्य वातावरण में योग तो करने लगा, मगर दिमाग़ में मुहावरे का काला कुत्ता हांफ रहा था। हालांकि इस  आम्र-नगर में काला कुत्ता नहीं है। भूरे कुत्ते हैं, सफेद कुत्ते भी हैं, किंतु दुर्लभ काली गाय की तरह काला कुत्ता नहीं है। इस दुर्लभ कुत्ते पर ही 'काला कुत्ता न होना' मुहावरा बना होगा। गधे के सिर पर सींग और काला कुत्ता न होना एक ही अर्थ देते हैं। काला कुत्ता नहीं था कहो या लोग गधे के सर पर सींग की तरह थे, यानी नहीं थे कहो, लोग अभिप्राय निकाल लेते हैं। 

मुहावरों में इन दोनों प्राणियों की उपस्थिति से हैरान हूं। 'धोबी का कुत्ता, घर का न घाट का' लोकोक्ति  भी प्रसिद्ध है, हालांकि कुछ कुत्ता प्रेमी इसे धोबी का कूता यानी कपड़ा पछीटने वाली लकड़ी का पिटना कहकर कुत्ते को अलग खींच ले जाते हैं। पर लोगों के मुंह  कौन बंद कर एकता है। वहां तो धोबी का कुत्ता ही बसा हुआ है। 

पर मेरा अभिप्राय कुछ और  है। मेरा मन पूछ रहा है कि जो कुत्ता घर का न घाट का है उसका रंग क्या है? वह भी काला है क्या?

चलिए धोबी के कुत्ते को छोड़ते हैं। कबीर के कुत्ते को पकड़ते हैं। कबीर ने सगर्व कहा था कि-

           हौं तो कुतड़ा राम कर, मुतिया मोरा नाऊँ। 
           गरे राम करि लेंहड़ी, जित खींचै तित जाऊँ।।

  मेरा मन पूछता है, यह कुत्ता किस रंग का रहा होगा? सूफ़ियाना सफेद, साधकी या संन्यासियानी भूरा या फ़क़ीराना काला?

     मगर रंग और जाति के धुर विरोधी कबीर से यह वर्णवादी मसला हल न होगा। व्यास से पूछते हैं कि उन्होंने जिस कुत्ते को युधिष्ठिर के पीछे लगाया था, उसका क्या रंग था? वानप्रस्थी सफेद बाना धारते हैं या संन्यासी बाना ओढ़ते हैं? उन्हीं के अनुरूप सफेद या भूरा उसे होना चाहिए।

      जाने दीजिए, उस जनशून्य बगीचे में मेरे प्रश्नों का उत्तर कौन देता। मैंने मन के मुंह पर पत्थर रख दिया और घर की तरफ़ चल पड़ा। बगीचे के दूसरे हिस्से से पांच छः भूरे सफेद कुत्ते अचानक भौंकते हुए भागे। कुत्ते किस पर भौंकते हैं और क्यों?

         मैंने जबरन इस बात से अपना मन हटाया वर्ना  बात निकलेगी तो बहुत दूर जाएगी।  फिर कभी। 
                                                      15 मई 26, शुक्रवार                  




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