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तेरा दिल या मेरा दिल

 पाठकीय किंवा पठनीय                 कुछ मामलों में आचार संहिताएं काम नहीं करती। जैसे मामला ए प्रेम या फिर वारदाते भोगविलास, या फिर माले मुफ्त और दिले बेरहम। सारा कुसूर दिल का है। कवि शैलेन्द्र ने स्पष्टतः कहा है- दिल जो भी कहेगा मानेंगे, दुनिया में हमारा दिल ही तो है। समकालीन युग में प्रेम और श्रृंगार के स्टार-कवि के रूप में आत्म-ख्यात कुमार विश्वास ने भी उनके स्वर में स्वर मिलाकर गया है- कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है। मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है। मैं तुझसे दूर हूं कैसा, तू मुझसे दूर है कैसी- ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है। ये पेशे से प्रोफेसर हैं। इनकी इन पंक्तियों ने इन्हें रातों रात स्टार कवि बना दिया। मंचीय कवियों के इतिहास में यह एक क्रांतिकारी के रूप में उभरे जिसने मानदेय के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। नीरज तक नीरस हो गए। इसके पीछे कारण मात्र दिल का है। लाखों युवाओं के दिल की बात इन्होंने कह दी। अब हंगामा तो होना ही था जैसा बिहार के प्रोफेसर के समय हुआ। उन्होंने ग़ालिब के प्रसिद्ध ‘प्रमेय’ ...