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Showing posts from October, 2010

अपना मध्यप्रदेश

अपना मध्यप्रदेश !  मध्यप्रदेश का गीत: 1 नवम्बर को मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ अपने स्थापना दिवस मना रहे है। छत्तीसगढ़ 1 नव. 2000 को अस्तितव में आया जबकि 1 नवम्बर 1956 को  मध्यप्रदेश  की स्थापना हुई। इस अवसर पर मध्यप्रदेश के नाम यह गीत समर्पित है जो मेरी जन्म भूमि भी है और वर्तमान में कर्मभूमि भी। छ.ग. (पूर्व मध्यप्रदेश) में मैंने उच्च शिक्षा पाई और वहीं अपने कर्मयोग का आरंभ भी किया।  अपना मध्यप्रदेश!  विन्ध्याचल, कैमूर, सतपुड़ा, मैकल शिखर-सुवेश।  अपना मध्यप्रदेश!  हरी भरी धरती के सारे सपने हरे हरे हैं।  पूर्व और पश्चिम तक रेवा के तट भरे भरे हैं।  ताल और सुर-ताल हृदय से निकले तभी खरे हैं।  भरे हुए बहुमूल्य, अनूठे, अनुपम रत्न विशेष।   अपना मध्यप्रदेश!  नम्र निमाड़ी, बन्द्य बुंदेली, बंक बघेली बोली।  घुलमिल गोंड़ी भीली के संग करती हंसी ठिठौली।  करमा, सैला नाच मनाते सभी दिवाली होली।  तानसेन बिस्मिल्ला की धुन में डूबे परिवेश।  अपना मध्यप्रदेश!   तेंदू और तेंदुओं वाला हर वन अभयारण है।  बाघ, मयूर...

माटी के पुतले 3

स्थापना और विसर्जन पूरे देश में मूर्तियां स्थापित हो गई हैं। हम उन मूर्तियों को स्थापित होते देख सकते हैं , जिन्हें हममें से कुछ लोग बनाते हंै और बहुत से लोग स्थापित करते हैं। क्यों बनती हैं मूर्तियां , कैसे बनती हैं मूर्तियां और क्यों और किसके लिए स्थापित होती हैं मूर्तियां ? कौन मूर्तियां बनाता है ? किसके इशारे पर बनाता है और कौन स्थापित करता है इन्हें ? इन सवालों के बारे में सोचने की ना तो हमें जरूरत हैं और ना तो कोई सोचता है। मूर्तियां स्थापित हो जाएं , उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया जाए, एक लोक आयोजन हो ,नगर और अपने सहज पहुंच में पड़नेवाले स्थानों पर अगर हम जाना चाहें तो जाकर देखकर आनंदित हो लें या श्रद्धावनत होलें। सामाजिक मनुष्य से इतनी ही अपेक्षा की जाती है और इतनी ही उसकी आवश्यकता होती है। स्थापना और प्रतिष्ठा का सुख जिन्हें मिलता है , वे उसका आनंद सप्रयास ले लेते हैं। मैंने मूर्तियों के निर्माण का आनंद लिया। यह आनंद हमारे हाथ में होता हैं। हम ही निश्चित करते हैं कि किस चीज़ का हमें आनंद लेना है। थोपी गई भयंकर और भयानक ‘सुन्दर’ वस्तु का आनंद लेना किसी के वश की बात नहीं हैं।...

काग के भाग बड़े सजनी

पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी। दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया।...

माटी के पुतले -2

2. एसराम उइके पेन्टर आदिजन बहुल क्षेत्र के एक सामान्य परिवार से संबद्ध श्री एसराम उइके रेलवे मुलाजिम हैं। यद्यपि यह कलाकार रेलवे में पेन्टर के रूप में 1985 से पदस्थ है ; लेकिन अरविंद आश्रम के अनुयायी एक कांक्रीट कलाकार श्री अनादि अधिकारी के साथ संपर्क होने से कैनवास पेन्टिंग में इनकी प्रतिभा अद्भुत रंग उभारती रही है। भविष्य में इस श्रमजीवी कलाकार की कण कण में निखरी चित्रकला और रंग-रचनाओं के साथ साथ अरविन्द-आश्रम के सिद्धहस्त रंगशिल्पी और मूर्तिकार अनादि अधिकारी के शिल्प का परिचय देने का प्रयास करूंगा। बहरहाल श्री एसराम ने अपनी अक्षर पेन्टिन्ग के साथ साथ इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बाघ या टााइगर के तैल चित्रों से रेल सूचना पटलों को पूरे संभग में रंगा डाला है और अपन अभीश्ट प्रभाव छोड़ा है। एक और आदिमजन छिंदवाड़ा में पतालकोट का मूर्तिशिल्प रचने और कपड़े के थान के थान को अािदवासी संस्कृति का कैनवास बनाकर प्रस्तुत करने के लाइव प्रदर्शन कर चुके हैं। छिंदवाड़ा में उनके जीवंत मूर्तियों को आदिवासी संग्रहालय में देखा जा सकता है। श्री एसराम ने यद्यपि इस विशाल और वृहद स्तर पर अपने शिल्प को प्रस्...

माटी के पुतले 1

पूरे भारत में हिन्दू आस्था और विद्या की प्रतीक गजानन गणपति की मूर्तियों का विसर्जन किया जा चुका है। यह भाद्र मास था। अश्विन-मास के साथ ही पितृ मोक्ष पखवाड़ा प्रारंभ हुआ। पितृमोक्ष अमावस्या के देसरे दिन अष्विन शुक्ल की प्रतिपदा से शक्ति की प्रतीक देवी दुर्गा की प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और पूजन का होगा। गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं का वृहदस्तर पर निर्माण किया जाता है। जो भी मृदाशिल्प में रुचि रखता है और इसमें पारंगत है वह व्यापारिक दृष्टि से मूर्तियों का निर्माण करता है और मांग के अनुसार उनका व्यापार करता है। रक्षाबंधन और दीपावली में उत्सब के अनुकूल राखियों और पटाखों का निर्माण अधिकांशतः मुस्लिम मतावलंबी करते हैं। मूर्तियों का निर्माण भी अनेक स्थानों में विभिन्न समुदायों के लोग करते हैं ,जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी हैं। इन दिनों मंदिर मस्जिद के तथाकथित विवादों और तनावों का चर्चा गर्म है। इसलिए ऐसे समाचार चित्र सहित अखबारों में आते रहते हैं। मेरे शहर में पिछले बीस बाइस सालों से दो विविध कलाकार मूर्तियों का व्यवसाय कर रहें है। व्यावसायिक स्तर पर किये जाने के कारण और उसमें स्वरुचि का...