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Showing posts with the label सामयिक सत्य

तोता उड़ गया

और आखिर अपनी आदत के मुताबिक मेरे पड़ौसी का तोता उड़ गया। उसके उड़ जाने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। वह दिन भर खुले हुए दरवाजों के भीतर एक चाौखट पर बैठा रहता था। दोनों तरफ खुले हुए दरवाजे के बाहर जाने की उसने कभी कोशिश नहीं की। एक बार हाथों से जरूर उड़ा था। पड़ौसी की लड़की के हाथों में उसके नाखून गड़ गए थे। वह घबराई तो घबराहट में तोते ने उड़ान भर ली। वह उड़ान अनभ्यस्त थी। थोडी दूर पर ही खत्म हो गई। तोता स्वेच्छा से पकड़ में आ गया। तोते या पक्षी की उड़ान या तो घबराने पर होती है या बहुत खुश होने पर। जानवरों के पास दौड़ पड़ने का हुनर होता है , पक्षियों के पास उड़ने का। पशुओं के पिल्ले या शावक खुशियों में कुलांचे भरते हैं। आनंद में जोर से चीखते हैं और भारी दुख पड़ने पर भी चीखते हैं। पक्षी भी कूकते हैं या उड़ते हैं। इस बार भी तोता किसी बात से घबराया होगा। पड़ौसी की पत्नी शासकीय प्रवास पर है। एक कारण यह भी हो सकता है। हो सकता है घर में सबसे ज्यादा वह उन्हें ही चाहता रहा हो। जैसा कि प्रायः होता है कि स्त्री ही घरेलू मामलों में चाहत और लगाव का प्रतीक होती है। दूसरा बड़ा जगजाहिर कारण यह है कि लाख पिजरों के सुख के ब...

प्रेम की पत्रकारिता

मेरे एक मित्र के ब्लाग में एक पत्रकार मित्र ने बड़े दुख और क्षोभ के साथ लिखा है कि देखो प्रोफेसर मटुकनाथ भी पत्रकारिता के अखाड़े में उतर रहे हैं। हिन्दी के प्राफेसरों से उन्हंे खास शिकायत है। ये प्रोफेसर वो साम्राज्यवादी सामन्त लोग हैं जो हर मामले में टांग अड़ाते हैं, कही भी उतर जाते है। देखा कि कोई बाजार है तो ये अपनी दूकान खोलकर बैठ जाते हैं। इनसे स्वरोजगार से जुड़े हुए लोग बेरोजगार होते हैं। प्रोफेसर डॉ. मनमोहन प्रधानमंत्री बन गए। प्रो. दंडवते, प्रो. जोशी वगैरह कितने ही लोग हैं जो राजनीति के रास्ते से संसदमें घुस गए। मैं झल्लाए हुए मित्र के पक्ष में हूं। एक उच्च शिक्षा मंत्री हुई महिला प्रोफेसर की हालत को देखकर मैं चिंतित हूं। मैंे अपने विद्यार्थीकाल से ही प्रोफेसरों की आलोचना और उनकी मूर्खताओं के किस्से सुनते आया हूं। एक बीए पास राजनैतिक कार्यकर्ता और एजेन्ट और लेखक को मैंने ज्ञान का ठेका करते देखा है। वे प्रोफेसरों के शंत रवैये से नाखुश थे। जो किताबें वे चाहते थे उन्हें न पढ़नेवाले प्रोफेसर को वे वज्र मूर्ख कहकर नकार देते थे। सैकड़ों लोगों की तरह वे भी यह मानते थे कि जो कहीं कुछ नहीं क...