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फिर बसंत आया

इस बार बसंत जल्दी आ गया। जल्दी आनेवाले को बेमौसम कहते हैं। देर से आनेवाले को भी बेमौसम कहते हैं। इसका मतलब है कि सबका अपना एक समय होता है ,जिसे मौसम कहते हैं। आम का मौसम ,जाम का मौसम, शाम का मौसम , फिर एक और जाम का मौसम , काम का मौसम , अंततः राम का मौसम। पतझर का भी मौसम होता है। वह बसंत के पहले भी आता है और बाद में भी आता है। पहले आकर वह जासूसी करके चला जाता है कि रास्ता साफ है, अब बसंत आ सकता है। यानी बसंत उस खूसट और खुर्राट आब्जर्वर की तरह होता जो पहले क्षेत्र का मुआयना करने आता है तथा जिसे कार्यकत्र्ता घास तक नहीं डालते। कार्यकत्र्ता हरे हरे पत्ते लेकर आनेवाले बसंतनुमा उम्मीदवार को हरी हरी घास डालते हैं।सौदा इस हाथ दे ,उस हाथ ले का होना चाहिए। वोट चाहिए तो नोट बांटने की व्यवस्था करो। व्यवस्था करनी हो तो नोट बांटो। कहा जा सकता है कि गड़बड़ी की आशंका से बसंत हड़बड़ी में जल्दी आ गया है। लोग समझ ही नहीं पाए और वह आ गया। न खांसा ,न खकारा। लोगों की हालत गफ़लत में सोये हुए उस जोड़े की तरह हो गई जो यह समझ रहा था कि बच्चे स्कूल में हैं। बुढ़उ बाजार गए हैं। पड़े रहो आराम से। क्या प...