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Showing posts with the label सामाजिक सरोकार( निबंध)

मंथरा का दर्शनशास्त्र

रामचरित मानस में कथित तौर पर कैकैयी की दासी मंथरा कहती है: ‘कोइ नृप हो हमहुं का हानी’। यही है मंथरा का दर्शनशास्त्र ? हम देखते है अनुसचिवीय या सचिवीय संततियों का भी यही दर्शनशास्त्र है। या यूं कहें कि मंथरा का जो दर्शनशास्त्र था वह उसके पुत्रों का भी दर्शनशास्त्र है। कहीं लिखा नहीं है कि मंथरा के भी पुत्र हुए और आगे उन्होंने मंथरा-नीति का विधिवत एवं सुदृढ़ संचालन किया। यह लिखने की जरूरत भी नहीं थी और ना है। लिखी हुई चीज़ें अक्सर बेकार हो जाती हैं। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है और लिखा हुआ है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा नीतिविशेषज्ञ और सदाचार का विश्वगुरू है। इसके पास जितना लिखित वांग्मय है उतना दुनिया के किसी देश के पास नहीं है। हम इस सब लिखे हुए को कितना मानते हैं? ब्रिटिश संविधान लिखा हुआ नहीं है। परम्परा और मान्यताओं के पहिओं पर चल रहा है और आज भी गतिमय है। सारी दुनिया यह बात मानती है। बात मानने की है। लिखने-पढ़ने की नहीं है। दासीपुत्र विदुर कोई बूकर शूकर को नहीं जानता था। उसने कोई बेस्टसेलर नहीं दिया मगर उसकी नीतियों को द्वापर से अब तक मान्यता प्राप्त है। मंथरा ...

फूल हरसिंगार के

फूल हरसिंगार के राचौ ऋषिकेश और हरिद्वार से लौट आए हैं। वहां की हवा तो शायद नहीं न ला पाए मगर वहां के फूलों और वनस्पतियों के बीज जरूर ले आए हैं। जी हां, हरिद्वार और ऋषिकेश का अर्थ अब केवल धार्मिक कर्मकाण्ड और साधना नहीं रह गया है। पर्यटन तो था वह पहले से; अभी कुछ वर्ष पहले राजनैतिक समीकरण और बंटवारे का भी वह प्रतीक बन गया है। योग के शारीरिक-संस्थान और आयुर्वेद के विश्व-बाजारवाद की हवा भी इन पर्वतीय नगरों को लग गई है। शुक्र है मेरे मित्र राजनीति और योग का बाजारवाद लेकर नहीं आए। वे कश्मीरी तुलसी, दार्जिलिंग की मिर्ची और हिमाचल के फूूलों के बीज लेकर आए हैं। पहले उन्हें गमलों में अंकुरित किया और एक के बाद एक उन्हें मेरे बागीचे में रोपते गए। पहले उन्होंने कश्मीरी तुलसी लगाई और कई बार आकर उसकी पत्तियों की इल्लियां निकालते और गमले की मिट्टी संवारते रहे। मेरे उपवन में उन्हें इतनी रुचि क्यों? दो कारण हैं.. एक वे और दूसरे हम। हम अपने बगीचे को चाहनेवालों की चाहतों से दूर नहीं करते। चाहे फूल हों, चाहे सब्जियां हों या चाहे अमरूद और आम के फल हों। जो मांग सकते हैं, वे मांग ले जाते हैं। ज्यादा हो तो ...