रामचरित मानस में कथित तौर पर कैकैयी की दासी मंथरा कहती है: ‘कोइ नृप हो हमहुं का हानी’। यही है मंथरा का दर्शनशास्त्र ? हम देखते है अनुसचिवीय या सचिवीय संततियों का भी यही दर्शनशास्त्र है। या यूं कहें कि मंथरा का जो दर्शनशास्त्र था वह उसके पुत्रों का भी दर्शनशास्त्र है। कहीं लिखा नहीं है कि मंथरा के भी पुत्र हुए और आगे उन्होंने मंथरा-नीति का विधिवत एवं सुदृढ़ संचालन किया। यह लिखने की जरूरत भी नहीं थी और ना है। लिखी हुई चीज़ें अक्सर बेकार हो जाती हैं। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है और लिखा हुआ है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा नीतिविशेषज्ञ और सदाचार का विश्वगुरू है। इसके पास जितना लिखित वांग्मय है उतना दुनिया के किसी देश के पास नहीं है। हम इस सब लिखे हुए को कितना मानते हैं? ब्रिटिश संविधान लिखा हुआ नहीं है। परम्परा और मान्यताओं के पहिओं पर चल रहा है और आज भी गतिमय है। सारी दुनिया यह बात मानती है। बात मानने की है। लिखने-पढ़ने की नहीं है। दासीपुत्र विदुर कोई बूकर शूकर को नहीं जानता था। उसने कोई बेस्टसेलर नहीं दिया मगर उसकी नीतियों को द्वापर से अब तक मान्यता प्राप्त है। मंथरा ...