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अभिशप्त चंपा

 अभिशप्त चंपा 

        रवींद्रनाथ टैगोर ने जिस भारत के मानचित्र में 'पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग' को रेखांकित किया था, दो हजार चौदह तक मैं वहीं रहता था। वहीं यानी विवेकानंदनगर में।  हालांकि भारत गान में कविवर को राजपूताना, अवध, मगध, उत्तरी और पूर्वी हिमांचल को  छोड़ना पड़ा था। गीत के शिल्प में इतनी गुंजाइश नहीं थी। भारत गान में सम्मिलित उत्कल और बंग विहीन विवेकानंद नगर के हमारे आसपड़ोस में, गान के प्रारंभिक पांच प्रांतांश तो थे, लेकिन सिंधु प्रांताश का बाहुल्य था। चांवल और काष्ठ-चिरान कारखानों के गुजराती मालिक हमारे अधिक निकटस्थ पड़ोसी थे। 

        अच्छा लगता था इस छोटे से हिंदुस्तान में रहते हुए। सबके आंगन में तरह तरह के फूल, पत्ते और रिश्ते बनानेवाले पौधे और फलदार वृक्ष थे। प्रातः भ्रमण में मोहल्ले की गलियों में घूम लेने से उद्यान का सुख मिल जाता था। धार्मिक और सांप्रदायिक देवालय और सामुदायिक भवन भी छत से पास ही दिखाई पड़ते थे, यानी गुरुद्वारा, गुरुनानक मंगल भवन, गुजराती महाजन बाड़ा, निरंकारी सभा, दुर्गा और हनुमान मंदिर आदि।

       विवेकानंद नगर की अपनी गुजरात-द्रविड़ गली से निकलकर मैं सिंधु गली में आ जाता था और सीधे सरस्वती नगर चौराहे पर निकलकर या तो नर्मदा मार्ग पर चला जाता था या सरेखा मार्ग पर।   

        सरस्वती चौराहे में बाई ओर एक सिंधु गौरव भवन था। किसी प्रतिष्ठित व्यापारी, समाजसेवी और राजनैतिक महापुरुष के उस विशाल भवन था में भवन स्वामी का निजी उद्यान था। उनके पूर्व के सिंधुद्वार के बाहर प्रहरी की तरह एक चम्पे का गुल्म खड़ा था। चौराहे पर भी एक चंपा गुल्म था, जिसकी हरी, लंबी, पुष्ठ पत्तियां  यश-पताकाओं की तरह उनका गुणगान किया करती थीं। 

      इस क्षेत्र में चंपा के गुल्म कहीं भी खड़े मिल जाते हैं। चंपा गुल्म अधिकांशतः श्मशानों और मंदिरों के अंदर होते है, पर पता नहीं क्यों  घरों के बाहर ही दिखाई पड़ते हैं। लेकिन ऐसे अवधूत और संन्यासी, मान-अपमान से निरपेक्ष कि इतनी उपेक्षा और अवमानना के बावजूद सदा हरे-भरे और खिले-खिले। मानो सारी दुनिया की क्षुद्रता पर ठहाके लगाते, रंगीन फूल बिखराते। 

      भवन के बाहर चंपा के नीचे प्राय: चम्पई रंग की कमीज़ और केसरिया पतलून या सलवार पहने किसी संस्कृति-धर्मा विद्यालय की छात्राएं दिखाई दे जाती थीं। वे अपनी स्कूल बस की प्रतीक्षा करती थीं। सहमी सी, संकुचित, बिल्कुल चम्पे के फूल यानी चंपक की तरह। 

       चंपा या चम्पक भी तो उपेक्षा की चोट से अनमने से दिखाई देते हैं। कौन चम्पे के फूल को अपने शिष्टाचार, प्यार या अभ्यर्थना का साधन बनाता है? उस पर तो गुलाब का पारंपरिक आरक्षण है। चंपा ऐसे विशेषाधिकार से वंचित है। क्यों? क्या किया है इसने? सारी योग्यताएं, सारे गुण तो हैं उसके पास! मनोहर रंग हैं, श्वेत-पीत, लाल-गुलाबी, गुलाबी-श्वेत, नारंगी-गुलाबी, पीला-नारंगी। इस द्वितरंग में, उनके लुभावने रूप में कितना आकर्षण है! कैसे पांचों पंखुड़ियां एक दूसरे में समाई हुई अपनी अंतरंगता में मुग्ध, इसी अनन्य आत्मीयता की सुवास वे वातावरण में फैलाती रहती हैं।

         फिर क्या कमी है उनमें? किसी पूजन-प्रार्थना, प्रणय निवेदन,  पुष्प-समर्पण अथवा अन्यतम अंतरंग संबंधों का हिस्सा, ये प्रियदर्शन कोमलांग फूल क्यों नहीं बन पाते? यह आदिम उपेक्षा, यह तिक्त तिरस्कार, यह धृष्ट-बहिष्कार आख़िर क्यों? किसी संवेदनशील करुणार्द्र कवि ने इस विडंबना पर इसे ही संबोधित करते हुए लिखा है-    
       चंपा तुझमें तीन गुण, रंग, रूप, प्रिय वास।
       अवगुण केवल एक है, भ्रमर न आवे पास।।

    यह संवेदना से अधिक सूचना का दोहा है। एक तटस्थ विश्लेषक की भांति एक अहृदय कवि केवल जले पर नमक छिड़क रहा है कि के तेरे पास सब कुछ है चंपा! रंग, रूप, सुगंध। लेकिन जनाधार कुछ भी नहीं है। जैसे किसी संचित समाज का दंभी व्यक्ति किसी वंचित वनवासी या दरिद्र समाज के व्यक्ति को नीचा दिखा रहा हो।  

      चंपा या चम्पक! तुम लोग कौन सी गलत फ़हमी पालकर सभ्य नागरी समाज में आ गाए? ये लोग ऐसे ही हैं। इनकी परंपरा 'जो सबल, वही प्रबल' की अवधारणा पर आधारित है। किसी पिटते हुए व्यक्ति को चलते चलते दो झापड मार कर चल देने में अपने को सभ्य, संभ्रांत और कुलीन होने का मानदंड मान लेते हैं। यहां तुम्हें उपेक्षा के अतिरिक्त क्या मिलेगा?

     क्यों खड़े हो यहां, इस नगर में, इस प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर के आगे? ऐसे निरुद्देश्य कहीं भी खड़े होने से मान नहीं मिलता, उल्टे घट जाता है। किसी किसी देश में तो यह परम्परा है कि डंडे मार मार कर, दास बनाकर पीड़ितों को कहीं भी खड़े रखकर स्वयं को स्वयंभू समझकर गर्वित होने का सुख उठाया जाता हैं। 

      श्मशान में, मंदिरों में, पाठशालाओं के मैदान में, चौराहे और चौपालों में, भव्य भवनों की सीमांकित भित्ती के किनारे तुम्हे खड़े देखकर उन्हीं पीड़ित दासों की याद आती है। 

           अब कुछ है चंपा के पास...लाल, गुलाबी, पीले, सफेद मिश्रित द्विवर्णी सुंदर रूप आकर्षण और मनमोहक सुगंध के त्रिगुण-समर्थ होने के बावजूद एक अवगुण, एक कलंक की सूचना देनेवाले किसी कवि ने 'भ्रमर न आवै पास' का कार्य कारण सिद्ध करने का सांप्रदायिक प्रयास किया। राधा-कृष्ण संप्रदाय के कवि ने भ्रमर को कृष्ण भक्त बताया और राधा को श्वेत अथवा स्वर्ण वर्णी चंपा बताकर यह न्याय किया कि राधा रूपी चंपा तो स्वामिनी हैं, कृष्णवल्लभा हैं, उनके रस का पान भ्रमर कैसे करे, धृष्टता होगी। इसलिए भ्रमर पास नहीं आता। कवि के शब्दों में -

               चम्पक-वर्णी राधिका, मधुकर केशव-दास।
                स्वामिनी के संकोचवश, भ्रमर न आवहिं पास
।।

         यह बात लीपा पोती लगती है। चंपा को राधा कहा ठीक है, भ्रमर को कृष्ण कहने में क्या बुराई है। कृष्ण राजकाज करने मथुरा चले गए थे, महाकवि सूरदास ने बहुत विस्तार से कृष्ण के राधा के पास न आने की बात का दुःख गया है। कृष्ण को राधा की सहेलियां  भ्रमर कहती हैं, कृष्ण के संदेशवाहक काले उद्धव का भी वे मजाक   उड़ाती हैं। भंवरा जब उनके लिए कृष्ण है तो चंपा (राधा)के पास उसका न आना राजनीतिक विवशता है। यह कहते तो बात सार्थक और समसामयिक लगती। 

    ओ निर्दोष अभिशप्त चंपा! तुम्हारे दुःख को समझते समझाते मैं दु:खी हो रहा हूं। इसलिए विदा। मैं तो आता रहूंगा तुम्हारे पास। मेरी कोई राजनैतिक सामाजिक सांस्कृतिक सांप्रदायिक विवशता नहीं है। तुम अपने निर्लिप्त, निरपेक्ष, आत्मबल के साथ यूँ ही खिली रहना। हम फिर मिलते हैं, अतिशीघ्र।                               15.07.2026_१८.०७.२६

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