लोभ सृजन का मूल तत्व है। ‘एको अहं बहुस्यामि’ महावाक्य में एक से बहुत होने का लोभ छुपा हुआ है। लीपापोती करनेवाले औदात्त्य-लोभी इस ब्रह्म-सत्य को झुठला नहीं सकते। लोभ में गहन आकर्षण का ‘सेब’ होता है जो न्यूटन जैसों के सामने ही पेड़ से टपकता है। ‘सत्य क्या है’ इस जिज्ञासा का लोभ उसे गुरुत्वाकर्षण की क्रेन्द्र-भूमि तक ले जाता है। मेरी लार जिस सुन्दर वस्तु को देखकर टपकती है , उसे पाने के लिए मैं उतावला हो पड़ता हूं ,टूट पड़ता हूं। गिरता भी हूं और जिसे हम किस्मत कहते हैं उस ‘असफलता की राजकुमारी’ ने हमारी तरफ़ यदि ध्यान नहीं दिया तो पड़ा भी रह जाता हूं। मानलें कि यह एक से दो होने का प्राथमिक-लोभ अगर फलीभूत हो गया तो दूसरा लोभ सताने लगता है , जिससे तीन होने का लोभ जागृत होता है। कभी-कभी दो और दो चार हो जाने के गणित से दो से चार हो जाते हैं। यही सृजन-धर्मिता है। इससे संगठन बनते हैं। अनुयायी 'बंधते' हैं और 'उन्माद की बंधुआगिरी' में लिप्त हो जाते हैं। संन्यासी लोग प्रतिक्रियावादी हैं जो प्रकृति की सृजन-शक्ति को अपनी उदासीनता से नष्ट कर रहें हैं, ऐसा कहना सत्य को एक तरफ से जानना है।...