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Showing posts from May, 2026

काले कुत्ते का न होना

काले कुत्ते का न होना सुबह पौने छः बजे जब मैं 'कुत्तारक्षकी' (छड़ी) लेकर निकला तो अंदर ऊमस थी और बाहर ठंडी हवा चल रही थी। वातावरण ठीक मनुष्यों के मन की तरह होता है। अंदर और गहराई में घनी ऊमस और तपन होती है और जैसे जैसे ऊपर जाते जाओ ठंडक पड़ती जाती है।  एक गहराई वह आती है जहां सारी ठोसता लावे में तब्दील हो जाती है। ये जो ज्वालामुखी होते हैं वह इसी लावे का फट पड़ना है। कोई कोई ही फटते हैं, सभी  नहीं।  इसी प्रकार जैसे जैसे ऊंचाई बढ़ती जाती है, तब एक ऊंचाई ऐसी भी आती है जहां बर्फ जमने लगती है, हिमालय बनने लगते हैं।  आदमियों में भी अपवाद-स्वरूप ऐसा होने लगता है। लोग कहने लगते हैं -इसमें गहराई है, इसमें ऊंचाई है। रहे मुझे क्या। मैं तो प्रातः भ्रमण में चलूं। पिछली रात, रात के चार बजे नींद खुली। खुल जाती है। कभी ढाई बजे, कभी तीन बजे, कभी चार बजे। इसके लोग आध्यात्मिक अर्थ निकालते हैं, मगर मैं इन्हें रिलैक्स होने के अवसर मानता हूं और रिलैक्स होकर नींद की अगली किश्त पूरी करने के लिए सो जाता हूं। कभी नींद आती है, कभी नहीं आती। आज नहीं आयी। नहीं आने की वजह थी। कल शाम से बादल गरज रहे ...