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Showing posts with the label व्यंग्य

विष-रस और मीरां की हंसी

रस काव्य की आत्मा है। छंद उसका शरीर है और अलंकार उसके आभूषण हैं। काव्यांग विश्लेषण और व्याख्यान में इसी दृष्टांत को वर्षों से परोसा जाता रहा है। व्यंजनों के रसास्वादन के लिए। उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए। रस आत्मा की भांति दिखाई न देने वाला मनोभाव है। शरीर की भांति छंद के नाटे लम्बे, मोटे दुबले होने का प्रत्यक्ष हो जाता है। कुरूप और सुरूप होने का बोध भी होता है। नई लहर ने कविता आंदोलन के साथ यद्यपि कायाकल्प कर लिया है और बिल्कुल छरहरी होकर लुभाने की मुद्रा में स्थान स्थान पर खड़ी मिल जाती है। अलंकार भी रूप के अनुकूल उसने बदल लिये हैं। बिल्कुल त्यागे नहीं हैं। गद्य तक में भी अलंकरण के आधुनिक स्पर्श दिखाई दे जाते हैं। छंद की तरह अलंकार भी दिखाई देनेवाले स्थूल रूप हैं। दिखाई देने वाले के स्थान पर दिखाए जाने लायक शब्द रख देने से भी उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। हमारी प्रगति में बंधन मुक्त होने की लालसा दिखाई देती है। यह और बात है कि बंध हम फिर भी जाते हैं। यहां रूसो का कथन उदाहरण बन सकता है कि हम पैदा तो स्वतंत्र हुए हैं लेकिन सामाजिक होने से सर्वत्र जंजीरों में बंधे...

बुरा न मिल्या कोय

खोजी पत्रकारिता के इस युग में केवल कबीर ही प्रासंगिक हैं। क्योंकि कबीर में भी वही आदत थी जो आज के खोजी पत्रकारों में है। बहुत खोजने के बाद कबीर कहते हैं,‘बुरा जो खोजन मैं गया’। आज के खोजी पत्रकार भी हमारे देश में बुराई को ही खोज रहे हैं। यहां कहां मिलेगी भैया ! बुराई और इस देश में। हमारे देश की एकमात्र अवधारणा है कि बुराई तो केवल विदेश में है। अब इस अवधारणा को तुम बुराई मानते हो तो मानते रहो। पर बुराई यहां कहां? यह तो ऊंची संस्कृति और नैतिकतावाला देश है। आगे जाओ और कोई दूसरा देश देखो। यहां न बुराई थी , न है , न रहेगी। तुम्हें क्या पता नहीं कि तुम्हारी तरह पहले एक कबीर आए। खूब इधर उधर खोजते रहे। पर बुराई उन्हें भी कहां मिली ? हार कर उन्होंने कहना पड़ा -‘‘ बुरा जो देखन मैं गया , बुरा न मिल्या कोय।’’ नई मिलता न, क्या करोगे ? हमारे देश की यही बुराई है कि यहां खोजने पर भी कोई बुरा नहीं मिलता। खोजनेवाला बुरा हो सकता है, मिलनेवाला बुरा हो ही नहीं पाता। वह ले देकर अच्छा ही होता है। हमारे देश में बुरा कोई है ही नहीं । सब अच्छे हैं। वैसे सारी दुनिया में एक हमारा ही तो देश अच्छा है। हमारे देश क...