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Showing posts from July, 2026

कि सावन आया..

'कि सावन आया '           अपने छतदार ऊर्ध्वाधर छज्जे में बैठा हुआ मैं, अभी  न चलनेवाली हवा और न बरसनेवाले बादलों से उम्मीदें लगाये हुए हूं। हवा चल नहीं रही, बादल बरस नहीं रहे। हालांकि ख़बर थी कि इस भूखंड में तीन चार दिनों तक भारी बारिश होगी। दो दिन बीत गए हैं, बारिश सिर्फ़ औपचारिकता निभाकर चली गई है। जैसे कोई आंगन में बाल्टीभर पानी उड़ेलकर चला जाए। झड़ी जैसी कोई घटना अभी तक नहीं घटी। उम्मीद के ही क़द घटते रहे हैं।          फिलहाल मैं देख-सुन रहा हूं कि मेरे हवाई छज्जे के नीचे, कतारों में खड़े, जो कतारी-घर (राे हाउसेस) हैं, उनमें सुबह की हलचलें बाक़ायदा चल रही हैं। म्यूजिक सिस्टमों से गानों की प्रतिस्पर्द्धा के स्वर गूंज रहे हैं। इधर से कोई गाना बजता है, उधर से कोई जवाबी गाना आता है। इन्हीं गानों से पता चला कि सावन आ गया है। कोई पुकार रहा है-'सावन के झूले पड़े,तुम चले आओ', कोई कराह रहा है-'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है', कोई कोई ख़ुशी ख़ुशी बता रहा है-'रिमझिम के गीत सावन गए', कोई कोई सावन के आने से भयभीत होकर बड़बड़ा रहा है-'अबके सजन सावन में,...

अभिशप्त चंपा

 अभिशप्त चंपा          रवींद्रनाथ टैगोर ने जिस भारत के मानचित्र में 'पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग' को रेखांकित किया था, दो हजार चौदह तक मैं वहीं रहता था। वहीं यानी विवेकानंदनगर में।  हालांकि भारत गान में कविवर को राजपूताना, अवध, मगध, उत्तरी और पूर्वी हिमांचल को  छोड़ना पड़ा था। गीत के शिल्प में इतनी गुंजाइश नहीं थी। भारत गान में सम्मिलित उत्कल और बंग विहीन विवेकानंद नगर के हमारे आसपड़ोस में, गान के प्रारंभिक पांच प्रांतांश तो थे, लेकिन सिंधु प्रांताश का बाहुल्य था। चांवल और काष्ठ-चिरान कारखानों के गुजराती मालिक हमारे अधिक निकटस्थ पड़ोसी थे।          अच्छा लगता था इस छोटे से हिंदुस्तान में रहते हुए। सबके आंगन में तरह तरह के फूल, पत्ते और रिश्ते बनानेवाले पौधे और फलदार वृक्ष थे। प्रातः भ्रमण में मोहल्ले की गलियों में घूम लेने से उद्यान का सुख मिल जाता था। धार्मिक और सांप्रदायिक देवालय और सामुदायिक भवन भी छत से पास ही दिखाई पड़ते थे, यानी गुरुद्वारा, गुरुनानक मंगल भवन, गुजराती महाजन बाड़ा, निरंकारी सभा, दु...

कामियों के प्रिय, प्रिये! घनश्याम आए।

कामियों के प्रिय, प्रिये! घनश्याम* आए ।                     एक.   पक्का चिट्ठा          एक होता है कच्चा चिट्ठा। इसका 'अर्थ' नहीं होता; आशय, अभिप्राय अथवा लक्षणार्थ होता है। कच्चा चिट्ठा का लक्षणार्थ होता है - पोल, दबी हुई सच्चाई, छुपाकर रखा गया भेद। लोग कहते हैं - 'अंदर की बात बताऊं, ये पक्की बात है। मेरे पास उसका पूरा कच्चा चिट्ठा है।'            अब यहां कच्चा चिट्ठा 'अंदर की पक्की बात' हो गया। जब बात पक्की है तो वह कच्चा चिट्ठा कैसे हुआ? पक्का चिट्ठा हुआ।  ठोक बजाकर, नक्खी की गई, लिखी गई कच्ची लिखत है, रफ़ नोट्स है अभी। जब सार्वजनिक होगी, तब 'पक्की बात' होगी।            तब से तब देखा जाएगा। बात जब पक्की है, तब चिट्ठा भी पक्का ही हुआ। राजा, मंत्री, कलेक्टर, महापुरुष, मान्यवर का बेटा गर्भ में आते ही युवराज हो जाता है। उसी तर्ज़ पर पक्की बात भी प्रकटीकरण के पूर्व पक्की बात, 'पक्का चिट्ठा' ही हुआ।         ...