मगहरी कबीरा अगम है आशा, सुगम निराशा, सुलभ है सत्यानाश। बारूदों से भरा हुआ है, यह शाश्वत आकाश। अक्षर अंतरिक्ष भी करता, मृत्युंजय का जाप। सारे ग्रह नक्षत्र सूर्य की, रहे हैं गर्दन नाप। समय की बलिहारी है, प्रलय की तैयारी है। तेल खनिज तकनीक लड़ रहे, अपनी धूर्त्त लड़ाई। पर्यावरण विषाक्त कर रहे, मिल मौसेरे भाई। दुनिया के भूगोली गोलों से खगोल थर्राया। महाशक्ति के समीकरण का अब त्रिकोण चकराया। चतुर्भुज चौथी दुनिया, उखाड़े खूंटा थुनिया। बिन ईंधन के समय का पहिया, यहां वहां ठहरा है। तेलकूप का जल, थल, नभ पर, उपग्रह से पहरा है। छुटभइए भी बने चौधरी, हैं कट्टे लहराते। चीख रहे हैं चील बने सब, मुर्दों पर मंडराते। शरीफों मगहर आओ। कबीरा मिलकर गाओ। @ रा.रामार्य वेणु, १४.०३.२६, शनिवार
मेल-जोल का खाना (बालगीत) भूरे गोलू आलू से झुक बोला कालू बैंगन। 'भाई! आओ, आज बनाएं, मिलकर कोई व्यंजन। तरकारी, तेउन, सब्ज़ी, भाजी, जो लोग समझ लें, मिर्ची, धनिया, प्याज़, टमाटर, साथ हैं सारे परिजन। कहो आग से -'पेट नहीं, चूल्हे में आग लगाए। भूखे प्यासे लोगों के मन में उम्मीद जगाए।' इस्पाती गंजी से बोलो- 'आए तैयारी से, ताप सहनकर,छौंक झेलकर,साग लज़ीज़ पकाए।' मीठी नामक हरी नीम को, सर्वप्रथम तड़काओ। राई, जीरा, अदरक, लहसुन, भूनो, घर महकाओ। हींग ज़रा सा डाल स्वाद का जादू-मंतर फूंको, मुख्य विशिष्ट अतिथि आलू बैंगन को मंच चढ़ाओ। जल-भुन जाने के पहले, बघरों पर पानी डालें। सब आपस में घुल-मिल जाएं, ऐसा उन्हें खंगालें। नमक स्वाद अनुसार डालकर सब पर ढक्कन डालो, घर की बात न बाहर जाए, भीतर बात बना लें। चुगलखोर है हवा, मुहल्ले भर को बतलाएगी। 'क...