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रचनाकारों के लिए अनिवार्य सूक्त

किसी भी रचना, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, कविता, लेख आदि के लिए अनिवार्य नियामक सूक्त : ( *अनुरोध* : कृपया प्रथम दृष्टया पढ़कर न तो धार्मिक हो जाएं  न हंसने लगें।)  दोहा :  *स्नान, ध्यान, चिंतन, मनन, समिधा, वस्तु प्रबंध।*  *फलाहार, उपवास, व्रत, साधक के अनुबंध।*  शब्दार्थ : * स्नान * : अवगाहन, किसी विषय का डूबकर अध्ययन, स्नातक होने की दिशा में चेष्टाएँ।  * ध्यान * : एकाग्रता, अपने कर्त्तव्य के प्रति पूर्ण निष्ठा, आपने उद्देश्य की सतत स्मृति। * चिंतन * : अपनी, अपने परिवार की, अपने परिवेश, प्रान्त और देश की दशा दुर्दशा पर विचार, सतत निरीक्षण, समस्या से मुक्त होने/समाधान की तलाश। * मनन * : किसी भी समस्या की जड़ तक पहुंचने और उसके उन्मूलन का अनुसंधान, अब तक उस विषय में हुए अनुसंधानों का अनुशीलन।  * समिधा * : जिस विषय /विधा के पूरा करने का मानसिक संकल्प लिया है, उसमें सहायक समस्त सामग्रियों के चयन- संचयन  का ईमानदार प्रयास, शिल्प, भाषा,  शब्द सम्पदा, शब्द शक्ति, रस ,छंद, अलंकार, सम्बन्धित विधा या विषय में प्रसिद्ध कृतियों का सिंहावलोकन।  * वस्तु-प्रबंध * : उपयोग में आनेवाली सहायक सामग्री, तथ्यात्मक अनुभ
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अकेला चल रे उर्फ 'एकला चॅलो रे'

किसी भी  समूह में उपस्थित साहित्य  के समस्त गुणी जनों को  इस नवगीत का यह शीर्षक चौंका सकता है, क्योंकि मनुष्य समूह में रहता है और साहित्य का सरोकार भी सहित से है, जिससे यह शब्द बना साहित्य । वह अकेला चलने वाली बात कैसे कर सकता है?  फिर भी  'चल अकेला' शीर्षक का यह गीत अवश्य पढ़ें। इसलिए कि इसमें वर्तमान समय की बाह्य और आंतरिक  भयावह स्थितियों का प्रासंगिक चित्रण है। पहले गीत पढ़ें फिर आगे की बात करेंगे।  0 नवगीत : अकेला चल रे। * यदि सुनकर करुण पुकार, न आये कोई तेरे पास साहसी!  रख खुद पर विश्वास,  अकेला चल रे,  चल रे, अकेला चल रे, चल रे, अकेला चल रे  यदि कोई करे ना बात, फेरकर मुंह बैठे। जब भय की कुंडी मार, घरों में ही पैठे। सजग उठ, निज प्राणों को खोल, मुखर हो, मन की पीड़ा बोल,  उद्यमी!  गा, होकर बिंदास, अकेला चल रे,  चल रे अकेला चल रे, चल रे अकेला चल रे  यदि सब हो जाएं दूर, पथिक पथ से तेरे। यदि एकाकी पा तुझे, कठिन बाधा घेरे।  चुभें, जो कांटे, सभी निकाल,  रक्त-रंजित पग, पुनः संभाल, भुलाकर, तन मन के संत्रास, अकेला चल रे। चल रे, अकेला चल रे, चल रे, अकेला चल रे  यदि रखे न कोई दीप,

मोर संग चलव रे उर्फ संगच्छध्वम् ...

  मोर संग चलव रे उर्फ संगच्छध्वम् किसी भी शहर की सुंदरता, सुगढ़ता और जीवंतता की रीढ़ उस शहर के मजदूर हुआ करते हैं जो अनेक भेष में हमें मिल जाते हैं। कोई रिक्शा खींच रहा है, कोई हाथ ठेला पर भरे हुए बारदाने ढो रहा है। कोई गड्ढे खोद रहा है, घास खरपतवार उखाड़ रहा है, बगीचे साफ़ कर रहा है। मजदूरों को काम करते हुए देखकर ही लगता था कि शहर के फेफड़े कैसे और किनसे धड़कते हैं। एक तरह से जीवन की धड़कने सुनने मैं उस राह से गुज़रता था जहां मजदूर दिखाई पड़ते थे।  राजनांदगांव में उस समय बंगाल नागपुर कॉटन मिल (कपड़े का कारखाना) हुआ करती थी। इस कारखाने में ही जगत्प्रसिद्ध मच्छरदानियाँ बना करती थीं। शाम को साढ़े पांच - छः के आसपास कारखाने के सामने कतारों में बैठे हुए मजदूर, अपने सामने बैठी हुई अपनी पत्नियों द्वारा लाया हुआ भोजन या कलेवा करते थे। मेरे लिए यह दृश्य दुख, पीड़ा और सुख की द्वंद्वात्मक अनुभूति कराया करते थे।  फिर भी, मैं प्रायः रोज़ उसी रास्ते का उपयोग करता था, जो आगे चलकर रानी सागर के सामने से गुज़रते राष्ट्रीय राजमार्ग 7 उर्फ़ गांधी नेहरू रोड पर खुलता था। उस दिन भी मैं इसी रास्ते गुज़र रहा था। मज़दूर बैठ

झूठा है शांतिपाठ?

झूठा है शांतिपाठ? सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।।                               ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः।। यह मंत्र तैत्तिरीय उपनिषद् से लिया गया है, जो आज भी शांतिपाठ के रूप में प्रचलित है। कुछ लोग इसकी विषयवस्तु के आधार पर मृत्यु के समय पाठ किये जानेवाले गरुण-पुराण से इसे उद्धृत  मानते हैं। इस श्लोक का अर्थ है  कि सभी (प्राणि-मात्र) सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सब लोग सभी में भद्रता (सज्जनता) देखें, जिससे कोई दुःख के भागी न बन सके।" मंत्र श्रुति और परम्परा से वेद, उपनिषद और पुराणों का आधार रहे हैं। मंत्र या श्लोक स्मृतियों की वो नींव हैं जिस पर हमारे विचारों और आचरणों के भवन खड़े हैं। आश्चर्य की बात है कि ये समस्त श्लोक, ऋषि-मुनियों द्वारा समाज छोड़कर वनों में जाकर, तपस्या और ध्यान से मस्तिष्क को एकाग्र करके सृजित किये गए हैं। मौखिक-वाचिक परम्परा से इनको शिष्य या जिज्ञासु समुदाय ने सुना (श्रुति) और याद रखा (स्मृति) ताकि इनको, 'मानवीय राग-विराग, द्वेष-ईर्ष्या, अहंकार-उन्माद, आवेश-प्रमाद से संपृक्त समाज' के बीच जाक

सहज, सरल, सहृदय भाई रामेश्वर वैष्णव

सहज_सरल_सहृदय_भाई_रामेश्वर_वैष्णव  राजनांदगांव की स्वर्णमयी यादों में, फुर्सत में भी लगाव के वो क्षण याद हैं, जब कंपनी विशेष के ट्रांज़िस्टर में विविध-भारती और आकाशवाणी के विविध कार्यक्रम सुनते थे, उनमें भाग लेते थे। कविता, आलेख, परिचर्चा, गीत आदि प्रस्तुत करते थे।  आकाशवाणी भोपाल के लिए भी तब राजनांदगांव के रचनाकारों की रेकॉर्डिंग रायपुर में होती। रायपुर में मेरी पहली कहानी की रिकॉर्डिंग के लिए रायपुर जब गया तो सायकल रिक्शावाला मुझे शहर से बाहर ले गया। वहीं भाई मिर्ज़ा मसूद से पहली मुलाकात हुई जो मुझे काली चौक के पास रिकॉर्डिंग स्टूडियो ले आये और रिकॉर्डिंग करवाई। फिर तो बाद के 15-20 साल विविध कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग का सिलसिला वहीं चलता रहा। बहरहाल, उन्हीं दिनों में किसी दिन, एक शाम को, रायपुर आकाशवाणी से प्रसारित एक गीत सुना तो उसकी प्रस्तुति, लय, भाषा, विषय, शिल्प आदि मन को लुभा ले गए। गीतकार का नाम सुनने की जिज्ञासा स्वाभाविक थी। गीत समाप्त होने के बाद गीतकार का नाम उद्घोषित हुआ.. "अभी आप रामेश्वर वैष्णव से उनका गीत सुन रहे थे.." गीतकार का नाम स्मृति में अंकित हो गया। गी

बिना शीर्षक

 छील रहे कंधे दीवारों के अंदर का खालीपन छैनी हथोड़ा है।  सुब्ह फिर दराती सी आयी है हैं उसके हाथों में अंकुड़े सवालों के। खींच रही है सबकी पीठों से भरे हुए बोरे सब पिछले उजालों के।  भगदड़ में दहशत धकेली है राहत के हर पल को छेड़ा, झंझोड़ा है।  पढ़े लिखे होने के दम्भों को, खुलेआम नोंच रही नथुने के बालों सा।  खुजलाती घूम रही औरों को, अपनी ही कुंठा के टीस रहे छालों सा।  क्रांति-भ्रांत अधकचरी पगलट ने अपने ही फोड़ों को खुलकर नकोड़ा है।  सपनीली आंखें अपराधी हैं, बाज़ों ने चिड़ियों पर बंदिश लगाई है।  घोंसलों के अंदर उड़ानें हों सांपों ने पंखों पर उंगली उठाई है।  चौकड़ियाँ वर्जित हैं जंगल में शेरों की नज़रों में हर हिरण भगोड़ा है। @कुमार, 

कोई रचना मौलिक नहीं (?)

अरस्तू ने अपने अनुकरण के सिद्धांत   में कहा है कि कोई भी काव्य या कलाकृति, रचना या चित्र, गीत या ग़ज़ल कभी मौलिक रचना नहीं होती, उसमें कहीं न कहीं अनुकरण ही होता है।   कुछ दार्शनिक कहते हैं कि प्रकृति में समस्त कृतियां पूर्वात्य हैं। कलाकार जब भी कोई शिल्प गढ़ता है तो वह मात्र धूल अलग करता है। भारत में भी जिन्हें सांस्कृतिक कवि या कलाकार कहा जाता है उनकी काव्य-कृति या चित्र या शिल्प भारतीय पुराणों में वर्णित है। गीता को ऐसा ग्रंथ माना जाता है जो मनोवैज्ञानिक प्रेरणाओं का मूल स्रोत है। इसी प्रसंग में कालिदास उज्जयिनी के जिस राजदरबार के नवरत्न थे वह राजा भर्तृहरि का ही दरबार था। भर्तृहरि के छोटे भाई  विक्रमादित्य  के  राजबार के कालिदास सहित अन्य नौ रत्न थे। स्वयं भर्तृहरि संस्कृत के समर्थ कवि थे। उन्होंने शतक त्रय के ‘नीतिशतक’  में नीचे लिखा प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मुक्तक रचा जो प्रकारांतर से पश्चातवर्ती कवियों की प्रेरणा बनता रहा। वह श्लोक यह रहा... यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता, साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिदन्या, धिक्तां च तं च मदनं च इमां च मां