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शब्दों में शक्ति होती है, तभी तो..

शब्दों में शक्ति होती है, तभी तो... ० शब्दों में शक्ति होती है तभी तो चिड़ियों के चहचहाते ही होने लगी है पत्तों में सरसराहट जबकि नींद पीकर सोया हुआ सारा शहर धुत्त है सुविधाओं के लिहाफ़ों में। शब्दों में शक्ति होती है तभी तो भंवरों की गुनगुन से खिलने लगे हैं फूल फड़कने लगे हैं तितलियों के पर जबकि बांबियों में छुपे हुए बहरे सांप गाढ़ा करने में लगे हैं अपना ज़हर। शब्दों में शक्ति होती है तभी तो हवाओं की सनन सनन से अंकुराने लगीं हैं रबी की फसलें जबकि बिलों में घुसपैठिये चूहे रच रहे हैं जड़ें कुतरने का षड्यंत्र। शब्दों में शक्ति होती है तभी तो झूठ सर चढ़कर बोलने लगा है जबकि अपाहिज़ और गूंगा सच झुककर तस्मे बांध रहा है साहब के जूतों के।   शब्दों में शक्ति होती है तभी तो अपराधियों के माथे से पुंछ रहे हैं बर्बरता के तमाम कलंक जबकि अंधी संस्कृति के हाथों ने उठा रखे हैं अभिनंदन के हार। शब्दों में शक्ति होती है तभी तो ख़रीदे जाने लगे हैं नक्कार खाने जबकि तूतियाँ अब कहीं नहीं बोलतीं छोड़कर जा रहीं हैं अपना घर। शब्दों में शक्ति होती है तभी तो गली के उस पार
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चमीटा

  चमीटा खनन खनन खन, खनन खनन खन,खन खन बजा चमीटा। धूनी, चूल्हा, गुरसी, सिगड़ी, उकसा रहा चमीटा।                                       खनन खनन खन... तू फ़क़ीर का अल्ला-अल्ला, बाबाओं का भोले। चिलमों पर अंगारा धरकर, हर-हर बम-बम बोले। अलख जगाए, धुनी रमाये, आंगन-आंगन डोले। कथा सुनाए, आल्हा गाये, तू भड़काए शोले। खरी-खरी जो कहे कबीरा, किसको लगा न चीटा। आह कबीरा..!!                   खनन खनन खन... पंजे का ख़ुद्दार पुत्र तू, चतुर चिकोटी माई। चिमटी है चालाक बहन, फ़ौलादी संड़सा भाई। चूल्हे चौके से खेतों तक तू अपनों का साथी। जबड़ोंवाला मगर-मच्छ तू, खीसोंवाला हाथी। तूने अपनी राह बनाई, गड़बड़ रस्ता पीटा। कड़ा चमीटा..!!              खनन खनन खन... ० @रा रा कुमार, दूसरा पद दि. : ०५.१२.२२

आज की ग़ज़ल

 आज की ग़ज़ल  0 हमेशा' अपनी' ही मर्ज़ी से क्यों जिया जाए कभी हवा की दिशा में भी बह लिया जाए फटे दिलों को मुहब्बत से अब सिया जाए हुए कटार से रिश्ते हैं क्या किया जाए तबील राह हो तो ये सबक़ ज़रूरी है मुसाफ़िरों के बराबर सफ़र किया जाए हंसी ख़ुशी के ये लम्हात गर गए तो गये हज़ार जख़्म दबा मौज में जिया जाए ज़मीन पास में होगी तो नींव रख लेंगे बने मकान तो छत उठ के आलिया जाए मसर्रतों का मुहर्रम मना रही है सदी महज़ ख़याल की सड़कों पे ताज़िया जाए तमाम रिश्तों से बढ़कर वो एक है कांधा कि जिस पे रखते ही सर सोग़ शर्तिया जाए बयानबाज़ियों के सब्ज़ बाग़ रहने दो करो उपाय कि मसला ये हालिया जाए  शराब की ही लगानों से मुल्क जी पाया निजाम ये है कि घर घर में साक़िया जाए  @ हबीब अनवर  {alis डॉ. आर रामकुमार, रामकुमार रामरिया, कुमार ज़ाहिद वग़ैरह} 0 शब्दार्थ : तबील = लम्बी, दूरी की,  आलिया (अरबी)= आकाश, स्वर्ग, मसर्रत = हर्ष, उल्लास, खुशी, आनंद,  मुहर्रम = शोक काल, इमाम की शहादत का मातम,  महज़ = केवल, मात्र, निरा,  ख़याल = कल्पना, तख़य्युल, illusion, दृष्टि भ्रम, निराधार कल्पना, ताज़िया = इमाम के जनाज़े या क़ब्र की झांकी, शर्तिया =

ग़ज़ल

 एक ग़ज़ल  रश्क़ दुश्मन को हो    असबाब हैं मेरे अंदर जान से क़ीमती    अहबाब हैं मेरे अंदर रतजगे जश्न तमाशे सभी का मरकज़ हूं अलहदा क़िस्म के   अरबाब हैं मेरे अंदर हाल बीमार का   आंखों से पकड़ लेता हूँ आइना हूँ   कई सीमाब हैं मेरे अंदर मैं कि किरदार को ज़रदार बना देता हूँ गो नगीने नए नायाब हैं मेरे अंदर रोज़ इंसान की सीरत को नई सूरत दूं आसमां हूं   कई महताब हैं मेरे अंदर @डॉ. रा.रामकुमार, (प्रतिच्छाया : @ कुमार जाहिद, @हबीब अनवर, 19.10.22) शब्दार्थ : असबाब > सबब का बहुवचन, अहबाब > हबीब( मित्र) का बहुवचन अरबाब > रब (ईश्वर, अनेक धर्मों के अनेकशः) सीमाब > पारा, पारद, अनेक आलों में अलग अलग इस्तेमाल होनेवाली तरल धातु, {सीमाब के साथ कई लफ़्ज़ तब अखरनेवाला है जब उसे एक ही अर्थ में लिया जाए। सीमाब का अर्थ (१) आईने के लेप और (२) पारे से बनी दवा , चिकित्सक (३) बुखार नापने और (४) बीपी नापने के दो अलग अलग आले में इसका इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावे (५)एटमोस्फियरिक प्रेशर के लिए बैरोमीटर में भी सीमाब का इस्तेमाल होना सभी जानते हैं। (६) लैक्टोमीटर,  इसलिए जहां जैसी ज़रूरत हो या जो जै

नाख़ून कब कटेंगे?

 नाख़ून कब कटेंगे?                            @डॉ. आर. रामकुमार ० हमारे बाल और नाख़ून रोज़ बढ़ते हैं. यह प्राकृतिक-शारीरिक क्रिया है. बाल, हड्डी और नाख़ून एक ही प्रजाति के प्रत्यंग हैं. हड्डी काटने और तोड़ने का कोई दिन या मुहूर्त नहीं होता, उसके लिए 'भाव' की भूमिका महत्वपूर्ण है. घृणा या क्रोध जैसे ख़राब समझे जानेवाले 'भाव' आने से, लोग दिन या मुहूर्त का विचार किये बिना ही, किसी भी क्षण हड्डी तोड़ या काट सकते हैं. कभी-कभी ख़राब ही नहीं, अच्छे या ऊंचे 'भाव' होने पर भी हड्डियां काटी या तोड़ी जाती हैं. ऊंचे और अच्छे 'भाव' के कारण ही इस देश में गायों, बकरियों और मुर्ग़ियों की हड्डियां काटी और तोड़ी जा रही हैं. गाय की हड्डियों ने तो राजनीति पर भी बड़ा हल्ला मचाया है. चूंकि इस देश में गाय की तुलना स्त्री से की जाती है, इसलिए देश के धर्मप्राण प्रान्तों में स्त्री और गाय की हड्डियां समान रूप से तोड़ी और काटी जा रही हैं. अब हम बाल पर आते हैं. बालों की महिमा बहुत है. बाल शरीर पर हड्डियों और नाख़ूनों के साथ आते हैं. एक समय तक बाल बढ़ाने का चलन था. सर और दाढ़ी मूंछें बढ़ाने पर लोग ऋषि

युद्धोत्प्रेरक सप्तशती है गीता

युद्धोत्प्रेरक सप्तशती है गीता  *  वास्तव में प्रतिपक्ष के प्रतिकार का पूर्व-प्रबंधन है गीता। सामना की तैयारी है। सान पर शस्त्रों को पैना करना है। शस्त्रों को धार देने का प्राम्भिक सत्र है गीता। संघर्ष का प्राक्कथन है। प्रायः पक्ष का प्रबंधन, अहंकार और अहमन्यता पर आधारित स्थापनाओं और उनकी प्रतिरक्षा तक सीमित हो जाता है। उसकी हठधर्मिता का सारा ध्यान निर्माण की अपेक्षा विध्वंस में लिप्त रहता है। इसलिए प्रतिपक्ष वाम-मार्गी होता है। वह विरोध में, असहमति में उठा हुआ हाथ होता है। उसकी वह न्याय के पक्ष में होता है और पक्ष में भांड होते हैं, ताली बजानेवाले किन्नर होते हैं, चारण होते हैं, विचार-विहीन उच्छ्रंखल होते हैं। जैसा कि महाभारत की कथावस्तु में देखते हैं। महाभारत में दो पक्षों अर्थात पक्ष और प्रतिपक्ष के आपसी अंतिम टकराव, आर-पार की लड़ाई का प्राम्भिक प्रबंधन अर्जुन-कृष्ण संवाद के रूप में महाभारत का सप्तशती-खंडकाव्य गीता है, जो अर्जुन के हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाने के बाद हथियार डालने के बाद, कृष्ण के प्रेरणास्प्रद उद्बोधन अथवा समकालीन शब्दों में मोटिवेशनल-स्पीच (motivational speech

देश भक्ति गीत

   देश भक्ति गीत ० सत्ता को वरदान मिला है, नंगा नाचो, ऐश करो। मारो, काटो, लूट मचाओ, दो कौड़ी का देश करो।। आशा और आस्थाओं का, मैं भी भूखा-प्यासा हूं। सक्रिय सकारात्मकता की, व्याकुल तीव्र पिपासा हूं। पूरे सृजनाकुल सपने हों, वाचित वह सन्देश करो।। राष्ट्र-संपदा, लोक-वित्त को, नहीं सुरक्षा दे सकते। गिद्ध-चील के मुंह से जनधन, वापस छीन न ले सकते। तब तो व्यर्थ राष्ट्र-पालक का, मत पहना गणवेश करो। भव्य, भयानक भूत-भवन हैं, मंदिर मूक मूर्तियों के। समता, ममता रहित लेख ये, पौरुष-हीन कीर्तियों के। वंचित, शोषित, दमित, दलित के, उनमें प्राण-प्रवेश करो। सारा भारत बेच रहे हो, धान, धरा, धन, धरोहरें। खान, विमानन, कोष, सुरक्षा, सड़कें, सब संस्रोत भरे। मां की कोख लजानेवालों, लज्जा तो लवलेश करो। कथनी-करनी एक रखो फिर, जनहित में अनुदेश करो। अपने दोष सुधारो पहले, फिर जन को उपदेश करो। तब यह देश सहर्ष कहेगा-"माननीय आदेश करो।।" ० @कुमार, २४.०८.२२ , ०८.३०-१.५४ , बुधवार,