गर्मी का झोल प्रातः की ठंडक में गर्मी का झोल। कौन रहा चंदन में अंगारे घोल। पंगु लगें वातायन, खिड़की बीमार। मूक हुए हर घर के, आपद में द्वार। अंधे बहरे हैं अब, बैठक के बोल। कौन रहा... पर कुतरे पंखी से, पंखे लाचार। शायद हवा को है, लकुवे की मार। डालों से झौंके भी, कुछ दिन से गोल। कौन रहा... शर्बत के कतरे तक, कतराते आज। बंद हुए पानी सा, प्यास का समाज। बंदी से बंधे पड़े, पनघट में डोल। कौन रहा.... उमड़ घुमड़ बादल की, काग़ज़ी पुलाव। बिजली के बिगड़े हैं, सकल हाव भाव। बारिश के कोई दो, हाथ पांव खोल। एक बूंद पानी अब, लगता अनमोल। @रारा वेणु, १७.०५.२६, रविवार, प्रातः 5 बजे, नयागांव।
कोई काला कुत्ता न होना सुबह पौने छः बजे जब मैं 'कुत्तारक्षकी' (छड़ी) लेकर निकला तो अंदर ऊमस थी और बाहर ठंडी हवा चल रही थी। वातावरण ठीक मनुष्यों के मन की तरह होता है। अंदर और गहराई में घनी ऊमस और तपन होती है और जैसे जैसे ऊपर जाते जाओ ठंडक पड़ती जाती है। एक गहराई वह आती है जहां सारी ठोसता लावे में तब्दील हो जाती है। ये जो ज्वालामुखी होते हैं वह इसी लावे का फट पड़ना है। कोई कोई ही फटते हैं, सभी नहीं। इसी प्रकार जैसे जैसे ऊंचाई बढ़ती जाती है, तब एक ऊंचाई ऐसी भी आती है जहां बर्फ जमने लगती है, हिमालय बनने लगते हैं। आदमियों में भी अपवाद-स्वरूप ऐसा होने लगता है। लोग कहने लगते हैं -इसमें गहराई है, इसमें ऊंचाई है। रहे मुझे क्या। मैं तो प्रातः भ्रमण में चलूं। पिछली रात, रात के चार बजे नींद खुली। खुल जाती है। कभी ढाई बजे, कभी तीन बजे, कभी चार बजे। इसके लोग आध्यात्मिक अर्थ निकालते हैं, मगर मैं इन्हें रिलैक्स होने के अवसर मानता हूं और रिलैक्स होकर नींद की अगली किश्त पूरी करने के लिए सो जाता हूं। कभी नींद आती है, कभी नहीं आती। आज नहीं आयी। नहीं आने की वजह थी। कल शाम से बादल गरज रहे...