एक अनूठा फूल : 'ज़ख़्मी दिल' 1. कहीं पढ़ा है कि प्राचीनकाल के गुरुकुलों में शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु अपने शिष्यों को विदाई के समय यह मंत्र देते थे: "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव!" चारों को देववत अर्थात् सम्माननीय बताया गया है - प्रथम मां , द्वितीय पिता, तृतीय आचार्य( गुरु, विद्जन) और चतुर्थ वे जो आकस्मिक असामयिक हमारे घर या हमारे संपर्क में आ जाएं। स्पष्ट है कि यह कोई निश्चित संख्या नहीं है। क्या जाने कौन कब हमारे जीवन में आकर हमें ऐसा प्रभावित कर जाए कि हम खुश होकर कहें - "कहां थे तुम अब तक।" सकारात्मक मनुष्यों के साथ ऐसा घटता है। अपने स्वीकारात्मक दृष्टिकोण को हमेशा खुला रखें। न जाने कब कौन अनायास आकर आपके अनुभवों को एक नई दिशा दे जाए! यही इस शिक्षा का अभिप्राय है। यह शिक्षा तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली खंड, अध्याय 1.11.2 में अंकित है। यह जो अनायास, आकस्मिक, असामयिक रूप से हमारे संपर्क में आता है, जिससे हमें जीवन भ...
ललिताग्रही निबंध १५.०५.२६, शुक्रवार पुष्पराज ‘गुलाब जू’ आज मेरे गैलरी-गार्डन में गर्मी की तपन को चुनौती देता 'बटन गुलाब'(button rose) खिला। गैलरी गार्डन में जब भी कोई फूल खिलता है तो मैं खिल उठता हूं। सभी खिल उठते हैं। मोंगरे के पौधे में रोज पांच सात फूल खिल जाते हैं। अनेक कलियां शाखाओं में नन्ही बच्चियों की तरह लटकी रहती हैं। गुलाब में खिलावट कम है। ऐन जेठ में गुलाब का खिल जाना उसकी जीवंतता है। जो अकेला, अपने दम पर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विजेता की भांति अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ प्रफुल्लित हो कर उद्ग्रीव हो, उससे कौन प्यार नहीं करेगा। गुलाब भारत के लिए विदेशी है। नाम से ही पता लगता है। गुलाब फ़ारसी मूल का शब्द है। इसकी सुंदरता और महक के कारण इसे फ़ारसी कवियों ने गुलाब (फूल की आभा) पुकारा होगा। इसके कुटुंब, परिवार, नस्ल या जाति के जितने भी फूल हैं लाल, रक्ताभ, पीले, काले, हरे, सब एक ही नाम से पुकारे जाते हैं- गुलाब। पर गुलाब तो नाम नहीं है, विशेषण है, उपनाम है। गुलाब ...