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सूरज की रोशनी में मौजूद हो तुम तुम में मौजूद है सूरज की रोशनी

 कविता : 3 ० सूरज की रोशनी में मौजूद हो तुम तुम में मौजूद है सूरज की रोशनी ० तुम्हारे पास से गुजरते ही मन भर जाता है अनदेखी उजास से ऊर्जा की एक अकथनीय सिहरन से निकलने लगती है अकूत ऊष्मा। दिखाई नहीं देता तुम्हारा हाथ पर कलाइयों में महसूस होता है मज़बूत और ताक़तवर पकड़ का अहसास सांसों में छातियों को फुलाने का साहस  उछाल मारने लगता है। तुम पिता तो नहीं हो  जिसके अभाव में ढूंढता रहा हूँ मैं  पिता जैसा लगनेवाला कोई कद्दावर किरदार किसी सूरत या शक्ल की तरह नहीं अपनेपन के सिंकाव की तरह जो मेरे भाग भागकर थके मन को दे सकता एक स्थायी राहत  नहीं, उस मरे हुए पिता की  अनाथ यादें भी तुम नहीं हो उनमें इतनी ऊर्जा और ऊष्मा कहां? तुम कौन हो जिसकी नज़र पड़ते ही फूलों में ताज़गी भरी मुस्कानें आ गयी खिल उठा ज़मीन का ज़र्रा ज़र्रा नदियों की कलकल जगमगा उठी लहलहा उठी खेतों की असंख्य उम्मीदें जाग उठे झंझावातों से लड़ने के जंगल के सारे मनसूबे तुम्हारी नज़र पड़ते ही  ख़ून में रवानी आ गयी मिठास बढ़ गयी, जवानी आ गयी तुम्हारी नज़र पड़ते ही  पत्ते पत्ते की सांसें लौट आयी उदास, हताश और अवसाद-ग्रस्त लम्हों को मिल गए जी उठने के अपरिभाष
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कूट-युद्ध के ढोल

  नवगीत :  * आगे मौन है, पीछे उसके दुनिया भर के झोल। लपझप के  अनगिन झांसों में सांसें फंसी हुई हैं। ज़रूरतों के  जंगल में सब गैलें गंसी हुई हैं।  खरपतवार, मकड़जालों के पथ ने पहने चोल। बाज़ारों में  सजा-सजा रख बिकनेवाली चीज़।  लोगों का दिल लुभा सके जो लकदक, गर्म, लज़ीज़। दो कौड़ी की  बकवासों को कह अद्भुत, अनमोल। टोली, दल, जत्था, समूह हैं गठबन्धन के नाम। हामीवाला- दक्ष, कुशल है; अकुशल वो जो वाम। विश्व समूचा  बजा रहा है कूट-युद्ध के ढोल। @कुमार, १ दिसम्बर २१

दो अपेक्षित कविताएं

 दो अपेक्षित कविताएं कविता : 1 -------- उठो देवता! उठो देवता! विषधर सहसफनों के नीचे रहकर सुखी न समझो, छोड़ो यह विश्राम कोलाहल है बहुत समुद्री इन लहरों में लहरें, यही इकाई हैं सागर के विस्तृत फैलावों की देख रही हैं रोज़ अंदर अंदर क्या चलता है मधुआरे का जाल बड़ा होता जाता है बड़ी मछलियां जैसे उसकी हैं बिचौलिया जो मछली जालों से बचकर दूर निकलती बड़ी मछलियां जो दलाल हैं मछुआरे की उस पर हमला कर देती हैं उठो देवता! सागर का कोलाहल भुगतो अपना भी अब पक्ष बताओ बोलो किसके साथ खड़े हो दुष्टों के, मध्यस्थों के या कुटनीतियाँ झेल रहे साधारण जन के? उठो देवता! कहा था तुमने सज्जन जब जब पीर सहेगा उल्टे सीधे मनमाने नियमों के आगे सर न झुकेगा समझदार भुक्तभोगी का उसका आकर त्रास हरोगे उठो देवता! कहा था तुमने खलजन का तुम शमन करोगे नीतिवान को मुक्त करोगे सारे दुख से वचन निभाओ फिर पवित्र तुलसी को ब्याहो उठो देवता! कोलाहल को शांति बनाओ! (१५.११.२०२१, ११.११ प्रातः) ००० 0 कविता : 2 कुछ कर दिखाओ ! * साहस का जुआ खेलो, जान की बाज़ी लगाओ, देखो मत किनारे पर खड़े रहकर तेज़ धार में बहते

मैनपाट में बहता है उल्टा पानी

मैनपाट में बहता है उल्टा पानी : दृष्टिभ्रम या चमत्कार । जानिए पर्यटन स्थल की सच्चाई। 0 चमत्कार, जादू या करामात को वैज्ञानिक सोच के समझदार लोग आंख का धोखा या दृष्टिभ्रम, हाथ की सफाई, आदि कहा करते हैं। कई ऐसे प्राकृतिक स्थल हैं जो अनेक विचित्रताओं से भरे हुए हैं। कहीं गर्म पानी और ठंडे पानी के अगल बगल बने कुंड, कहीं पहाड़ी में बने कुएं के अंदर से आती हवाएं, कहीं कोई अद्भुत दलदल जो बरसात के बाद सुख जाता है लेकिन दीपावली के आसपास उसमें पानी निकलता है और ज़मीन दलदल की तरह धंसने और हिलने लगती है। इनके पीछे बहु गर्भीय कारण हो सकते हैं जिस पर भू-गर्भ शास्त्रियों के अतिरिक्त कौन सरदर्द मोल ले? ऐसा ही एक स्थान है छत्तीसगढ़ का पर्यटन स्थल कहलानेवाला मैनपाट। यह स्थल खूबसूरत वादियों के साथ आश्चर्य से भर देनेवाले 'उल्टा बहने वाले पानी' के लिए विख्यात है। यह ऐसा स्थान है जहाँ पानी का बहाव ऊँचाई की ओर है। इसे देखने लोग दूर दूर से आते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में 'मैनपाट' विसरपानी गाँव में स्थित है। यह स्थान पिछले कुछ वर्षों से लोगों के बीच 'उल्टा पानी' काफी ज्यादा चर्चित

छंद असंबाधा

 3. असम्बाधा : असम्बाधा को प्रो. मौला बक्श ने  छंदोमंजरी में 41 वें छंद क्रम में लिया है। 14 वर्ण या अक्षरों या गण मर्यादा में 22 मात्राओं के इस छंद को वे निम्नानुसार व्यक्त करते हैं - अक्षर 14, गण म त न स गा गा, मात्रा स्वरूप 222, 221,111,112, 22, कुल मात्रा 22, छंद के उदाहरण संस्कृत, हिंदी, मराठी, गुजराती में प्रस्तुत करने के पूर्व  प्रो. बख्श उदाहरण माला के ऊपर ही असंबाधा छंद के गायन के लिए राग, जाति, ताल और गति का विवरण इस रूप में दे देते हैं... राग: आरभी, ताल : चतुश्र, जाति: भानुमति, मात्रा 11 विलंबकाल. ० उदाहरणमाला 1. संस्कृत : वीर्य्याग्नौ येन ज्वलति रण वशात क्षिप्ते। दैत्येन्द्रेजाता धरणि रियमसम्बाधा।। धर्मस्थित्यर्थं प्रकटित तनु संबंध:। साधूनां बाधां प्रशनमयतु स कंसारी:।। { यही  संस्कृत उदाहरण छंदोर्णव पिङ्गल (1929) के रचयिता भिखारीदास पद १८०, पृ. ४६ में यथावत प्रकाशित करते हैं।) 2. हिंदी : रात्यो द्यो वा नाम जपत अति वै तापे। तू ताही को नाम कहति मत ले मौ पे।। पापी पीड़ावंत जग तज सुनू राधा। ज्या के ध्याये हॉट अकलुष असंबाधा।। 3. मराठी मोठे दाते ते तनुधनसह गेले कीं ॥ स्वर्गा त्यां

अमृतध्वनि छंद या वृत्त

 2. अमृतध्वनि छंद या वृत्त  पिछले अंक में संस्कृत वृत्त या छंद 'अनुष्टुप' के सौंदर्य और रस का आनंद लेने के बाद हिंदी वर्णमाला के स्वरक्रम में आनेवाला छंद 'अमृतध्वनि' है। हालांकि 'छंदोमंजरी' के रचयिता संगीताचार्य मौला बख़्श घीसा खान ने अपनी अनुक्रमणिका में इसे 53 वां स्थान दिया है, किन्तु हम वर्णमाला के अनुक्रम का पालन करते हुए हम (राम-छंद-शाला के रसज्ञ जन) इसे दूसरे स्थान पर ले रहे हैं।   सर्वप्रथम छंदोमंजरी में 'अमृतध्वनि' के बारे में दी गयी निम्न जानकारियों से अवगत कराना चाहूंगा और इसी के साथ हम आगे बढ़ते जाएंगे।  ० ग्रंथ : संगीतानुसार छंदोमंजरी, ५३. अमृतध्वनि चरण अक्षर २२, त भ य ज स र न गा, मात्रा स्वरूप २२१ २११ १२२ १२१ ११२ २१२ १११ २ = ३२, राग : भैरव, ताल: खंड चौताल, मात्रा : विलंबकाळ.  (भैरव थाट/ राग भैरव - सम्पूर्ण सम्पूर्ण :   रि ध  कोमल, शेष शुद्ध)  ० स्वरलिपि:  ध-प-मग-रिगरि.म-ग-रिस-रिनिस. स-ग-मप-धमप. गम। ग-म-पध-पधनि.नि-स-रिस-रिनिस.ग-म-गरि-रिसनि.स-। रि-ग-रिस-रिसनि.ध-स-निध-पमग.स-नि-धप-पमग.गम। ध-प-मग-रिगरि.म-ग-रिस-रिनिस. स-ग-मपध-मप. गम। ० १.संस्कृत : 

संस्कृत छंद अनुष्टुप का हिंदी-उर्दू में प्रयोग

1. संस्कृत छंद अनुष्टुप का हिंदी-उर्दू में प्रयोग अनुष्टुप छन्द  संस्कृत काव्य में सर्वाधिक प्रयुक्त छन्द है। वेदों सहित रामायण, महाभारत तथा गीता के अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छन्द में निबद्ध हैं।संस्कृत में अनुष्टुप वृत्त की लोकप्रियता और सरलता की तुल्य दृष्टि से हिन्दी में दोहा को समतुल्य कहा जा सकता है। आदिकवि बाल्मिकी द्वारा उच्चरित प्रथम श्लोक अनुष्टुप छन्द में ही है।  इसी प्रकार उज्जयिनी के राजा भर्तृहरि (विक्रमादित्य के अग्रज) के 'शतक-त्रयं' में कुल 37 अनुष्टुप वृत्त या छंद हैं। 'शतक-त्रयम्' के पहले शतक "नीतिशतक" का पहला मंगलाचरण श्लोक ही अनुष्टुप छंद/वृत्त में है। देखें- दिक्कलाद्य नवच्छिन्नानंतचिन्मात्रमूर्तये। स्वानुभूत्येक साराय नमः शान्ताय तेजसे। ।      ।।नी. श. भ. मंगलाचरण: प्रथम श्लोक।। 'शतक-त्रयम्' के भाष्यकार डॉ. ददन उपाध्याय ने 'नीति शतक' के मंगलाचरण की टीका करते हुए छंद या वृत्त की चर्चा भी की है और इसमें निबद्ध 'अनुष्टुप छंद' का लक्षणवृत्त भी प्रस्तुत किया है। अस्तु, अनुष्टुप वृत्त का गण-सूत्र या लक्षण-श्लोक इस प्