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संदेश की खोज (The da vinci code)

संदेश की खोज   नयागांव,  बालाघाट,  १३.०९.२०२६, रविवार।        आज सुबह सुबह फिर सपना देखा। मैं सपने देखता हूं, बचपन से देखता हूं। मैं ही देखता हूं, सपनों ने मुझे कभी नहीं देखा। शायद सपनों की आंख नहीं होती। हमारी होती है। सपनों के पास दिमाग भी नहीं होता, बुद्धि और विवेक भी नहीं होता। भारतीय फिल्मों की तरह वे, कुछ भी अतार्किक, बेसिरपैर की घटनाएं देखते रहते हैं।                     जैसे एक सपना साइकिल पर बैठा और चल पड़ा। रस्ते में पहाड़ आया तो वह हेलीकॉप्टर चलाने लगा। हेलीकॉप्टर अचानक सैटेलाइट बन गया गया और पृथ्वी के चक्कर लगाने लगा। सपना पूरे मध्यप्रदेश में घूमने लगा। सतपुड़ा की चोटियां, जंगलों का सौंदर्य, नदियों के घुमावदार बहाव। फिर समुद्र आ गया। सैटेलाइट जंगी जहाज बन गया। अचानक एक टॉरनेडो आकर टकराया और ब्लास्ट। जहाज के परखचे उड़ गए। सपना किनारे की रेत पर उठकर कपड़े झाड़ने लगा।          यह मैं था क्योंकि सपने में मैं ही था। इसलिये जहाज के ब्लास्ट होते ही मैं पलंग से गिर पड़ा ...
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कैरम्बोला के फूल

कैरम्बोला के फूल      एक          आज मेरी गैलरी में पीले गुड़हल में एक अधखुली बोंड़ी यानी कली और एक सुप्त बोंड़ी देखकर मैं खिल उठा। लाल और गुलाबी गुड़हल यानी जासौन की अपेक्षा पीला गुड़हल एक अलग ही अनुभूति देता है।  उसके बगल में लगे पौधे पर मेरा बाग़बान पुत्र काम कर रहा था। काम यानी वही कटिंग-सटिंग, खाद-मिट्टी, तराई-गुड़ाई।         गुड़हल में कलियां देखकर मेरे मुंह से निकला -'वाह! जासौन में कलियां निकल आईं।'      'स्टार फ्रूट में भी कलियाँ निकल आयी है।' उसने मेरी ख़ुशी के गुलदस्ते में एक फूल और खोंप दिया। मैं सचमुच चकराया - 'हें! यह स्टार फ्रूट का पौधा है। मैं तो शो प्लांट समझ रहा था।' 'आपको बताया तो था, जब लेकर आए थे।' लड़का थोड़ा खिन्न होकर बोला।         'अरे अब इतना कहां याद रहता है। सामने है तो साक्षात, वरना सब प्रच्छन्न।' कहकर मैं हंस पड़ा। फिर विषयगत प्रसन्नता की तरफ लौटकर मैंने कल्पना के पांव पसारे -'इसका मतलब यह हुआ कि जब फूल आ ही रहे हैं तो फल भी आयेंगे।'     ...

करार गोंदा फूल उर्फ़ त्योहारी गेंदा

  एक सांस्कृतिक स्मृति लेख   करार गोंदा फूल उर्फ़ त्योहारी गेंदा एक : गोबरधन का धन है गेंदा     एक समय था जब दीपोत्सव और गेंदा का सम्बन्ध हम अभिन्न मानते थे। हालांकि बरसात के शुरू होते ही शालाओं के द्वार भी खुल जाते थे और तीज त्योहारों के भी। तीजा-पोला, नागपंचमी, रक्षाबन्धन, हलषष्टि, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा आदि यादाबाद त्योहार बरसाती उत्सव ही थे। बरसाती यानी बरसात के मौसम में होनेवाले त्योहार।        दुर्गापूजा समाप्त होते ही दीपोत्सव की तैयारियां आरम्भ हो जाती थी। जो कच्चे-पक्के घर, आंगन, दीवारें महाकवि वाल्मीकि के शब्दों में ‘अभीक्ष्ण-वर्षोदक-विक्षत’ यानी लगातार बरसात का पानी पड़ने से क्षत-विक्षत हो गईं थीं, उनकी छपाई, लिपाई, पुताई, जहां जो लागू हो, प्रारम्भ हो जाया करती थी।        रेलवे भूमि पर साधिकृत हमारे कच्चे घर-बाड़ बने थे। दशहरा बीतते ही उनके उधड़े हुए आंगन-पार, घर के भीतर फर्श-दीवार नए ढंग से सँवारे जाने लगते। खेत-खंती की मिट्टी, इंजन के कोयले की जलन और भूसे की रांध से सांधकर छपाई और चिकनाई की कार्यवाहियां च...

भुवनगिरि दुर्ग

 भुवनगिरि दुर्ग भुवनगिरि क़िला, फोर्ट या दुर्ग (भोंगिर फोर्ट) तेलंगाना के यदाद्री (यादवाद्रि)-भुवनगिरी ज़िले में एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। 1000 साल पुराना यह ऐतिहासिक क़िला एक विशाल एकल (single)अंडाकार चट्टान पर बना हुआ है। दक्षिण से यह कछुए जैसा और पश्चिम से सोते हुए हाथी जैसा दिखाई देता है।         इसे 1076 ईसवी में पश्चिमी चालुक्य राजा त्रिभुवनमल्ला विक्रमादित्य षष्ठम ने बनवाया था, जिसके नाम पर इसका नाम 'त्रिभुवनगिरी' और बाद में 'भोंगिर' पड़ा।        इस पर चालुक्य, काकतीय रानी रुद्रमादेवी, बहमनी सुल्तान, कुतुब शाही और निजाम राजवंशों का क्रमशः शासन रहा।         किंवदंति है कि भुवनगिरि क़िले में ऐसी भूमिगत सुरंगें  थीं जो गोलकुंडा क़िले से जुड़ी थीं। दुर्ग तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को चट्टानों और सीढ़ियों पर करीब 500 फीट की रोमांचक चढ़ाई करनी पड़ती है। 

नागपंचमी : चंदन चाचा के बाड़े में।

 नागपंचमी : चंदन चाचा के बाड़े में।  नागपंचमी त्यौहार हमारी ‘सांस्कृतिक विरासतों में एक’ प्रतिनिधि-त्यौहार है। विदेशों में भारत ‘संपेरों के देश’ के रूप में जाना जाता है। ऐनाकोंडा और कोब्रा जैसे ख़तरनाक सांपों को विदेशी महत्व का समझा जाता है लेकिन ‘नागलोक’ को भारत का ही पर्याय माना जाता है।          मैं कैसे भूल सकता हूं कि हमारी पाठशालाओं में पहला महत्वपूर्ण आयोजन ‘नागपंचमी’ का ही होता था। हम अपनी पत्थर की स्लेटों पर खड़िया की शलाकाओं से ‘नाग-देवता’ यानी ‘किंग-कोबरा’ की आकृति बनाते थे, जिसमें हमारे अभिभावक योगदान करते थे और फिर उसे हम स्कूलों में ले जाते थे। वहां सारे स्लेटी नागों की सामूहिक पूजा होती थी और हमारे पैसों को इकट्ठा करके बुलवाए गए पानीवाले नारियलों की बलि देकर मीठी चिरौंजी के साथ उसका प्रसाद वितरित किया जाता था।          मैंने हमेशा सोचा है और हमेशा सोचता रहूंगा कि नागों की पूजा क्यों? इतने बचपन में क्यों? जबकि विद्या की देवी सरस्वती बतायी जाती है और महाविद्यालयों में उसे तब मनाया जाता है, जब वैसी विद्या की आवश्यकता...

कि सावन आया..

'कि सावन आया '           अपने छतदार ऊर्ध्वाधर छज्जे में बैठा हुआ मैं, अभी  न चलनेवाली हवा और न बरसनेवाले बादलों से उम्मीदें लगाये हुए हूं। हवा चल नहीं रही, बादल बरस नहीं रहे। हालांकि ख़बर थी कि इस भूखंड में तीन चार दिनों तक भारी बारिश होगी। दो दिन बीत गए हैं, बारिश सिर्फ़ औपचारिकता निभाकर चली गई है। जैसे कोई आंगन में बाल्टीभर पानी उड़ेलकर चला जाए। झड़ी जैसी कोई घटना अभी तक नहीं घटी। उम्मीद के ही क़द घटते रहे हैं।          फिलहाल मैं देख-सुन रहा हूं कि मेरे हवाई छज्जे के नीचे, कतारों में खड़े, जो कतारी-घर (राे हाउसेस) हैं, उनमें सुबह की हलचलें बाक़ायदा चल रही हैं। म्यूजिक सिस्टमों से गानों की प्रतिस्पर्द्धा के स्वर गूंज रहे हैं। इधर से कोई गाना बजता है, उधर से कोई जवाबी गाना आता है। इन्हीं गानों से पता चला कि सावन आ गया है। कोई पुकार रहा है-'सावन के झूले पड़े,तुम चले आओ', कोई कराह रहा है-'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है', कोई कोई ख़ुशी ख़ुशी बता रहा है-'रिमझिम के गीत सावन गए', कोई कोई सावन के आने से भयभीत होकर बड़बड़ा रहा है-'अबके सजन सावन में,...

अभिशप्त चंपा

 अभिशप्त चंपा          रवींद्रनाथ टैगोर ने जिस भारत के मानचित्र में 'पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल, बंग' को रेखांकित किया था, दो हजार चौदह तक मैं वहीं रहता था। वहीं यानी विवेकानंदनगर में।  हालांकि भारत गान में कविवर को राजपूताना, अवध, मगध, उत्तरी और पूर्वी हिमांचल को  छोड़ना पड़ा था। गीत के शिल्प में इतनी गुंजाइश नहीं थी। भारत गान में सम्मिलित उत्कल और बंग विहीन विवेकानंद नगर के हमारे आसपड़ोस में, गान के प्रारंभिक पांच प्रांतांश तो थे, लेकिन सिंधु प्रांताश का बाहुल्य था। चांवल और काष्ठ-चिरान कारखानों के गुजराती मालिक हमारे अधिक निकटस्थ पड़ोसी थे।          अच्छा लगता था इस छोटे से हिंदुस्तान में रहते हुए। सबके आंगन में तरह तरह के फूल, पत्ते और रिश्ते बनानेवाले पौधे और फलदार वृक्ष थे। प्रातः भ्रमण में मोहल्ले की गलियों में घूम लेने से उद्यान का सुख मिल जाता था। धार्मिक और सांप्रदायिक देवालय और सामुदायिक भवन भी छत से पास ही दिखाई पड़ते थे, यानी गुरुद्वारा, गुरुनानक मंगल भवन, गुजराती महाजन बाड़ा, निरंकारी सभा, दु...