दो नवगीत : १. मन की भोर, २. आडम्बर के इंद्रप्रस्थ मन की भोर - मन की भोर सुहानी हरदम । नव-अंकुर को देती रहती, उचित समय पर पानी हरदम। सघन रात के गहन अँधेरे। युगत-भुगतकर हुए सबेरे। नव-उत्साह उमंग नयी भर, ज़ारी रखे रवानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... जोड़-घटाना छोड़ चुका है। लेन-देन कुछ नहीं रुका है। खाली हाथ चला है हँसता, ना याचक ना दानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... प्रेम क्षेम सब नैसर्गिक हैं। भावाभाव सभी स्वर्गिक हैं। यत्न-प्रयत्न व्यर्थ हैं सारे, समय करे मनमानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... 15.06.26, सोमवार 0 आडम्बर के इंद्रप्रस्थ ऐसा ...
एक अनूठा फूल : 'ज़ख़्मी दिल' 1. कहीं पढ़ा है कि प्राचीनकाल के गुरुकुलों में शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु अपने शिष्यों को विदाई के समय यह मंत्र देते थे: "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव!" चारों को देववत अर्थात् सम्माननीय बताया गया है - प्रथम मां , द्वितीय पिता, तृतीय आचार्य( गुरु, विद्जन) और चतुर्थ वे जो आकस्मिक असामयिक हमारे घर या हमारे संपर्क में आ जाएं। स्पष्ट है कि यह कोई निश्चित संख्या नहीं है। क्या जाने कौन कब हमारे जीवन में आकर हमें ऐसा प्रभावित कर जाए कि हम खुश होकर कहें - "कहां थे तुम अब तक।" सकारात्मक मनुष्यों के साथ ऐसा घटता है। अपने स्वीकारात्मक दृष्टिकोण को हमेशा खुला रखें। न जाने कब कौन अनायास आकर आपके अनुभवों को एक नई दिशा दे जाए! यही इस शिक्षा का अभिप्राय है। यह शिक्षा तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली खंड, अध्याय 1.11.2 में अंकित है। यह जो अनायास, आकस्मिक, असामयिक रूप से हमारे संपर्क में आता है, जिससे हमें जीवन भ...