मेल-जोल का खाना (बालगीत) भूरे गोलू आलू से झुक बोला कालू बैंगन। 'भाई! आओ, आज बनाएं, मिलकर कोई व्यंजन। तरकारी, तेउन, सब्ज़ी, भाजी, जो लोग समझ लें, मिर्ची, धनिया, प्याज़, टमाटर, साथ हैं सारे परिजन। कहो आग से -'पेट नहीं, चूल्हे में आग लगाए। भूखे प्यासे लोगों के मन में उम्मीद जगाए।' इस्पाती गंजी से बोलो- 'आए तैयारी से, ताप सहनकर,छौंक झेलकर,साग लज़ीज़ पकाए।' मीठी नामक हरी नीम को, सर्वप्रथम तड़काओ। राई, जीरा, अदरक, लहसुन, भूनो, घर महकाओ। हींग ज़रा सा डाल स्वाद का जादू-मंतर फूंको, मुख्य विशिष्ट अतिथि आलू बैंगन को मंच चढ़ाओ। जल-भुन जाने के पहले, बघरों पर पानी डालें। सब आपस में घुल-मिल जाएं, ऐसा उन्हें खंगालें। नमक स्वाद अनुसार डालकर सब पर ढक्कन डालो, घर की बात न बाहर जाए, भीतर बात बना लें। चुगलखोर है हवा, मुहल्ले भर को बतलाएगी। 'क...
बीस दोहे धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जल, जंगल, भू नष्ट। भारत-मां निज कोख का, स्वयं समझती कष्ट।। 1.१२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०९.३१ ० बनी हड़प्पा साधना, द्वंद्व, विभाजन लक्ष्य। वर्तमान को भूनकर, खाना प्रियतम-भक्ष्य।। 2. १२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०८.१६. ० सम-मत, सम-रुचि, दृष्टि-सम, सह-जीवन, सम-रूप। कोलाहल में ढूंढ मत, ठंडी छाया धूप।। 3. १२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०९.००. ० अध्ययन-चिंतन-मनन बहु, अतिशय कम अभिव्यक्ति।, शब्द-चयन, सीमित कथन, मत की अन्तर्शक्ति।। 4. ११.०२.२६, बुधवार, प्रातः ०८.३०. ० दो पद में ही नापिए, धरा गगन परिमाप। धरकर इनको शीश पर, मुग्ध रहें चुपचाप।। 5. ११.०२.२६, बुधवार, प्रातः ०८.१०. ० 'कटुक क्रोंच, कुचला, कनक, केर, किमाच, कनेर।' कोदो, कुटकी से सदा, इनको रहता वैर।। 6. १०.०२.२६, सोमवार, अपरान्ह १२.१०. ० वक्ष करें दृढ़तर सदा, दुर्दिन से कर प्रेम। सूर्य-नमन साष्टांग कर, यही योग यह क्षेम।। ...