कामियों के प्रिय, प्रिये! घनश्याम* आए । एक. पक्का चिट्ठा एक होता है कच्चा चिट्ठा। इसका 'अर्थ' नहीं होता; आशय, अभिप्राय अथवा लक्षणार्थ होता है। कच्चा चिट्ठा का लक्षणार्थ होता है - पोल, दबी हुई सच्चाई, छुपाकर रखा गया भेद। लोग कहते हैं - 'अंदर की बात बताऊं, ये पक्की बात है। मेरे पास उसका पूरा कच्चा चिट्ठा है।' अब यहां कच्चा चिट्ठा अंदर की पक्की बात हो गया। जब बात पक्की है तो वह कच्चा चिट्ठा कैसे हुआ? पक्का चिट्ठा हुआ। ठोक बजाकर, नक्खी की गई, लिखी गई कच्ची लिखत है, रफ़ नोट्स है अभी। जब सार्वजनिक होगी, तब 'पक्की बात' होगी। तब से तब देखा जाएगा। बात जब पक्की है, तब चिट्ठा भी पक्का ही हुआ। राजा, मंत्री, कलेक्टर, महापुरुष, मान्यवर का बेटा गर्भ में आते ही युवराज हो जाता है। उसी तर्ज़ पर पक्की बात भी प्रकटीकरण के पूर्व पक्की बात, 'पक्का चिट्ठा' ही हुआ। पुर...
दो नवगीत : १. मन की भोर, २. आडम्बर के इंद्रप्रस्थ मन की भोर - मन की भोर सुहानी हरदम । नव-अंकुर को देती रहती, उचित समय पर पानी हरदम। सघन रात के गहन अँधेरे। युगत-भुगतकर हुए सबेरे। नव-उत्साह उमंग नयी भर, ज़ारी रखे रवानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... जोड़-घटाना छोड़ चुका है। लेन-देन कुछ नहीं रुका है। खाली हाथ चला है हँसता, ना याचक ना दानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... प्रेम क्षेम सब नैसर्गिक हैं। भावाभाव सभी स्वर्गिक हैं। यत्न-प्रयत्न व्यर्थ हैं सारे, समय करे मनमानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... 15.06.26, सोमवार 0 आडम्बर के इंद्रप्रस्थ ऐसा ...