भुवनगिरि दुर्ग भुवनगिरि क़िला, फोर्ट या दुर्ग (भोंगिर फोर्ट) तेलंगाना के यदाद्री (यादवाद्रि)-भुवनगिरी ज़िले में एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। 1000 साल पुराना यह ऐतिहासिक क़िला एक विशाल एकल (single)अंडाकार चट्टान पर बना हुआ है। दक्षिण से यह कछुए जैसा और पश्चिम से सोते हुए हाथी जैसा दिखाई देता है। इसे 1076 ईसवी में पश्चिमी चालुक्य राजा त्रिभुवनमल्ला विक्रमादित्य षष्ठम ने बनवाया था, जिसके नाम पर इसका नाम 'त्रिभुवनगिरी' और बाद में 'भोंगिर' पड़ा। इस पर चालुक्य, काकतीय रानी रुद्रमादेवी, बहमनी सुल्तान, कुतुब शाही और निजाम राजवंशों का क्रमशः शासन रहा। किंवदंति है कि भुवनगिरि क़िले में ऐसी भूमिगत सुरंगें थीं जो गोलकुंडा क़िले से जुड़ी थीं। दुर्ग तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को चट्टानों और सीढ़ियों पर करीब 500 फीट की रोमांचक चढ़ाई करनी पड़ती है।
नागपंचमी : चंदन चाचा के बाड़े में। नागपंचमी त्यौहार हमारी ‘सांस्कृतिक विरासतों में एक’ प्रतिनिधि-त्यौहार है। विदेशों में भारत ‘संपेरों के देश’ के रूप में जाना जाता है। ऐनाकोंडा और कोब्रा जैसे ख़तरनाक सांपों को विदेशी महत्व का समझा जाता है लेकिन ‘नागलोक’ को भारत का ही पर्याय माना जाता है। मैं कैसे भूल सकता हूं कि हमारी पाठशालाओं में पहला महत्वपूर्ण आयोजन ‘नागपंचमी’ का ही होता था। हम अपनी पत्थर की स्लेटों पर खड़िया की शलाकाओं से ‘नाग-देवता’ यानी ‘किंग-कोबरा’ की आकृति बनाते थे, जिसमें हमारे अभिभावक योगदान करते थे और फिर उसे हम स्कूलों में ले जाते थे। वहां सारे स्लेटी नागों की सामूहिक पूजा होती थी और हमारे पैसों को इकट्ठा करके बुलवाए गए पानीवाले नारियलों की बलि देकर मीठी चिरौंजी के साथ उसका प्रसाद वितरित किया जाता था। मैंने हमेशा सोचा है और हमेशा सोचता रहूंगा कि नागों की पूजा क्यों? इतने बचपन में क्यों? जबकि विद्या की देवी सरस्वती बतायी जाती है और महाविद्यालयों में उसे तब मनाया जाता है, जब वैसी विद्या की आवश्यकता...