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अप्रैल फूल दिवस है एक मूर्ख बनाओ दिवस

 1अप्रैल 2025, मंगलवार अप्रैल फूल दिवस है एक मूर्ख बनाओ दिवस



मि. अल्वर्ड विकी ने बड़ी शालीन भाषा में इस दिवस, अप्रैल फूल, मूर्ख दिवस,सकल मूर्ख दिवस को महिमामण्डित करते हुए लिखा है :'अप्रैल फूल दिवस' पश्चिमी देशों में प्रत्येक वर्ष पहली अप्रैल को मनाया जाता है। कभी-कभी इसे ऑल फ़ूल्स डे (सकल मूर्ख दिवस)के नाम से भी जाना जाता हैं।  अप्रैल आधिकारिक छुट्टी का दिन नहीं है परन्तु इसे व्यापक रूप से एक ऐसे दिन के रूप में जाना और मनाया जाता है जब एक दूसरे के साथ व्यावाहारिक परिहास और सामान्य तौर पर मूर्खतापूर्ण हरकतें की जाती हैं। इस दिन मित्रों, परिजनों, शिक्षकों, पड़ोसियों, सहकर्मियों आदि के साथ अनेक प्रकार की नटखट हरकतें और अन्य व्यावहारिक परिहास किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य होता है, बेवकूफ और अनाड़ी लोगों को शर्मिंदा करना।"

वैसे देखा जाए तो आज जिसको प्रैंक कहते हैं वह बहुत पुराना खेल है। कुछ ऐसा कहना, करना या दिखाना जिसे  सामनेवाला व्यक्ति सच मन जाए। इसका उद्देश्य धोखा देकर नुकसान पहुंचाना नहीं है, बस लोकरंजन है, मज़े लेना है। 

परम्परा बन गई है कि एक अप्रैल को लोग मूर्ख बनाने का कोई न कोई बहाना अवश्य ढूंढ लेते हैं। मनुष्य की अत्यंत कल्पनाशीलता में अनन्त बहानों की संभावना भरी हुई है। एक तरह से मनुष्य महा बहानेबाज़ प्राणी है।  सिर्फ़ अप्रैल ही क्यों, साल के हर दिन, हर क्षण, कहीं न कहीं, कोई न कोई, किसी न किसी को डॉज दे रहा, प्ले कर रहा है, मूर्ख बना रहा है, जोक कर रहा है, मज़ाक बना रहा है। 'मैं तो मज़ाक कर रहा था,'  पकड़े जाने पर या सामनेवाले के नाराज़ होने पर यह कहते हुए अजीज़ों को देखा ही होगा।

            कभी कभी मन में आता है कि जानें कहीं से, कब से हुई इस 'मूर्ख-मनोरंजन' की शुरुआत? 

खोजो तो पता चलता है कि कहानियां तो बहुत हैं। एक तो

यही लोग बताते हैं कि 1831 में स्कॉट लैंडी राजकुमार और बोहेमियन राजकुमारी ने अपनी सगाई की छद्म घोषणा कर मित्रों को चौंकाने (प्रैंक करने का) का फैसला किया। उन्होंने मित्रों को संदेश पहुंचाया कि हम दोनों आगामी 32 मार्च को सगाई करने जा रहे हैं। अमुक स्थान पर सब मिलें। मित्र समझे कि तारीख बताने में संदेशवाहक से भूल हुई होगी। बहरहाल वे नियत स्थान पर पहुंचे तो वाग्दत्ता राजकुमार और राजकुमारी ने उनका स्वागत भी किया और शाही स्वल्पाहार भी कराया। रही सगाई की बात, वह तो 32 मार्च को होनी थी।  ठहाकों के बीच लोगों ने इस शाही मज़ाक का ख़ूब लुत्फ़ लिया। 

तब ही से यह परम्परा चली और अंग्रेजों इसे अपने साथ लेकर इस देश में भी आये और मज़ाक मजाक में पूरी दुनिया को बांट आये।  

      पर किसे पता, यह कथा भी अप्रैल फूल हो?

भारत में बड़े गर्व से महामूर्ख सम्मेलन लोग करते हैं। लोकरंजन, हंसी मज़ाक, हास्य कविताएं और चुटकिले सुनाकर लोगों को हंसाना मात्र उद्देश्य होता है। पैसा तो जबरदस्ती आयोजक दे देते हैं तो लक्ष्मी का अपमान न हो जाये ऐसा सोचकर काव्य विदूषक रख लेते हैं, वरना उनका पावन उद्देश्य तो हंसी बांटना है। हास्य सम्राट ही आज के वास्तविक सम्राट हैं। 

      साहित्य में भी एक अलग विधा है यह और पत्रकारिता में भी। हज़ारों होली अंक लोगों को हंसाने में खप गए। 

       यह परम्परा बहुत चली थी समाचार पत्रों में। एक अप्रैल को ऐसे समाचार छापे जाते थे जिसकी जनता मांग करती थी, किंतु वे अप्रैल फूल होते थे, यह बात कोष्ठक में लिखी जाती थी। ऐसा ही एक मोनालिसाई समाचार 1975-76 में छपा और चर्चित हो गया था। 

        इन आँखों से पढ़ा हुआ क़िस्सा यह है कि तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पर विपक्ष किसी बात का दवाब बनाए हुए था और वे अपने निर्णय पर अडिग थीं। इसी बीच वे हिमाचल गईं और अख़बारों मेें हेड लाइन छपी 'इंदिरा जी मना ली गईं।' दरअसल यह शब्द मनाली था जो 'मना ली' छप गया था। प्रिंटिंग मिस्टेक। नहीं, यह एक अप्रैल नहीं था, न कोई मज़ाक। वास्तव में टंकण त्रुटि थी। 1976 पर शक़ किया जा सकता था, पर वास्तव में यह 1976 का कोई दोष सचमुच नहीं था। 

ओह 1976!

1976 के एक अप्रैल की एक और मीठी सी याद आ गयी मित्रों!

बात राजनांदगांव की है। 

स्नातक का अंतिम वर्ष था। परीक्षा के लिए तैयारी करने का अवकाश चल रहा था। छात्र-छात्राओं में पिछले तीन सालों के साथियों का साथ छूट जाने की व्याकुलता बढ़ रही थी। सब आगे साथ साथ स्नातकोत्तर की पढ़ाई थोड़ी करेंगे। इन्हीं में एक विशिष्ट मित्र मण्डल था यानी कुछ मित्र थे, जो एक साथ रहते थे, साथ साथ पढ़ते थे, साथ घूमते थे।

और... 

निस्सन्देह वह 31 मार्च की दोपहर थी। कुछ पांचेक मित्र एक मित्र के घर रोज़ सहपाठ करते थे। दो सुदर्शन और सक्रिय मित्र लीडर थे। हर युग में जोड़ी का करिश्मा होता है। हुआ। उन दोनों के मन में कुछ कोमलताएं थीं जिनके मुरझाने की आशंका थी। जो चुप्पे और नम्र थे, उनके अंदर भी तो छुपे हुए झरने हो सकते हैं, उनके सूखने की चिंता थी। नायक मित्रों हितेश्वर और बलभद्र में से किसी के तो प्रस्ताव पर अप्रैल फूल बनाने की योजना बनी। सामूहिक उत्सव की शैली में सामूहिक तौर पर चयनित साथियों को, लिंगभेद से ऊपर उठकर, एक समय पर ही,  अप्रैल फूल बनाने की योजना सूझी।  योजना बनाने का काम सौंपा गया एक सीधे-सादे पढ़ाकू मित्र को जो लेखक, निर्देशक, अभिनेता आदि था। मगर साधारण और शांत था। उस पर साथी छात्र छात्राएं ही नहीं, शिक्षक भी भरोसा करते थे। फैसला हुआ कि तीन अलग अलग विषय के लिए जाली सूचनाएं टाइप की जाएंगी, विशेष एक्स्ट्रा क्लास के लिए, अलग-अलग शिक्षकों के हस्ताक्षरों के साथ। नाटककार मासूम मित्र वह नोटिस चयनित छात्र छात्राओं (ख़ासकर) में घुमाएगा। परीक्षा का समय है, गंभीरता से कौन नहीं लेगा। सब सामूहिक उपस्थिति देंगे। एक अप्रैल का तो हमको पता है, सब तो परीक्षा के टाइम टेबल में उलझे होंगे। 

नाटककार छात्र ने क्या नाटक किए, कैसी मासूमियत दिखाई वो जाने, किंतु जिनके आने के लिए जाल बना गया था, वे सब आए। 

मगर, लड़कियां तो लड़कियां होती हैं।  यह जानने के बाद कि यह अप्रैल फूल था, हर लड़की ने  यही कहा कि नोड्यूज़ कराना था, किताबें जमा करनी थी, नोट्स एक्सचेंज करना था। यह सारे बहाने रिटर्न अप्रैल फूल ही थे। लड़कों में जिन्होंने ने अप्रैल फूल बनना स्वीकार किया, उन्हें नाश्ता कराया गया। नाश्ता तो प्लानिंग में था, पर तब ऐसा नहीं था कि लड़कियां इसे स्वीकार कर पाती। लड़कियों की यही खूबसूरती है कि वे कुछ स्वीकार नहीं करतीं, और लड़कों का यही पौरुष है कि उनकी न में भी हां देख लेते है।


इस ऐतिहासिक अप्रैल फूल का मैं भी प्रमुख 'आई-विटनेस' था, इसलिए यह इस दिन हमेशा याद आता है। और मजाल है कि फिर किसी भी मित्र ने दोबारा ऐसा दिन देखा हो। क्योंकि इसके बाद सब अपने अपने कारणों से तितर बितर हो गए थे। बिछड़ना तय था लेकिन अप्रैल फूल बनाकर हमने उसे यादों में संजोकर रख लिया। 


@ हेलो अप्रैल (आनंद अपढ़)


परिशिष्ट :

भारत में अप्रैल फूल किसी पौराणिक कथा से कम नहीं लगते। समुद्र मंथन में वासुकी के मुंह की तरफ़ दानवों को करना, दानवों से छुपाकर अमृत पी जाना, स्वयम्बर में नारद का मुंह बंदर का कर देना, शूर्पणखा का सुंदरी बनकर राम और लक्ष्मण के पास जाना, शिव के मना करने पर भी विरही राम के पास पार्वती का सीता बन कर जाना, जस जस सुरसा बदन बढ़ावा, तासु दून कपि रूप दिखावा; मसक समान रूप कपि धरहिं। आदि आदि।  

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