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और अंतिम रस है- वात्सल्य-रस:

बाल कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के विशेष संदर्भ में   - कभी कभी और प्रायः सोचता हूं कि मीठा अंत में क्यों परोसा जाता है? समारोह का अध्यक्ष आख़री में क्यों बोलता है? प्रथम विजेता की घोषणा अंत में ही क्यों की जाती है? सबसे ज्यादा और  प्रभावशाली कवि को बाद में ही क्यों प्रस्तुत किया जाता है? नव-रसों में श्रृंगार को पहला स्थान क्यों दिया गया तथा औचकदन कूद पड़नेवाले वात्सल्य रस को दसवें रस के रूप में क्यों दिया गया? यदि इन सब सवालों से बचकानापन टपक रहा है तो टपक रहा है। इस बचकानेपन को छोड़ पाना या इससे अलग हो पाना संभव होता तो ‘झांसी की रानी’ के गौरव का गान करनेवाली कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान का मातृत्व कभी ‘कदंब के पेड़’, कोयल, खिलौनेवाला और धूप और पानी जैसे कालजयी बाल-गीतों की तरफ़ नहीं मुड़ा होता। मेरा बचपन जिस बालगीत को ‘मां की आरती’ की तरह गाकर तृप्त होता रहा है, वह हर बच्चे की तरह मेरा अपना आत्मीय गीत बनकर दिल में रच-पच गया था। यह बहुत बाद में मुझे पता चला कि वह गीत ‘झांसी की रानी’ गानेवाली तथा ‘वीरों का कैसा हो वसंत’ सिखानेवाली स्वतंत्रता-समर की वीरांगना कवयि...

विवेकानंद के जीवन दर्शन का साहित्य पर प्रभाव

  विवेकानंद के जीवन दर्शन का साहित्य पर प्रभाव विवेकानंद भारतीय राष्ट्रीय संदर्भों में युवकों के प्रेरणा-स्रोत के रूप में प्रासंगिक रहे हैं। विवेकानंद का नाम भारत के गौरवपूर्ण धार्मिक-अध्यात्म को विश्वस्तर पर प्रशस्त करने के अर्थ में स्थापित हो चुका है। हालांकि इस तथ्य की चर्चा बहुत कम हुई है कि यह नामकरण ‘विवेकानंद’ उनके 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद में भाग लेने के लिए ही किया गया। विद्वान भोैतिकवादी पिता और अत्यंत धर्म-परायण मां की संतान वीरेश्वर या नरेद्र दत्त ने भारत को नये वैज्ञानिक अर्थ और ऊंचाइयां दी। वे वेदांत के पुरोधा के रूप में वैदिक संस्कृति के नये और प्रगतिशील मानदंडों के उद्गाता बने। इसीलिए अमेरिका की भूमि में बिल्कुल नवीन और ऊर्जवसित कण्ठ से उन्होंने विश्वबंधुत्व का नारा दिया, तथापि हिन्दुत्व की भावभूमि पर बने रहकर। उन्होंने अपने प्रथम परिचयात्मक उद्बोधन में कहा-‘‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश...

माटी के पुतले 3

स्थापना और विसर्जन पूरे देश में मूर्तियां स्थापित हो गई हैं। हम उन मूर्तियों को स्थापित होते देख सकते हैं , जिन्हें हममें से कुछ लोग बनाते हंै और बहुत से लोग स्थापित करते हैं। क्यों बनती हैं मूर्तियां , कैसे बनती हैं मूर्तियां और क्यों और किसके लिए स्थापित होती हैं मूर्तियां ? कौन मूर्तियां बनाता है ? किसके इशारे पर बनाता है और कौन स्थापित करता है इन्हें ? इन सवालों के बारे में सोचने की ना तो हमें जरूरत हैं और ना तो कोई सोचता है। मूर्तियां स्थापित हो जाएं , उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया जाए, एक लोक आयोजन हो ,नगर और अपने सहज पहुंच में पड़नेवाले स्थानों पर अगर हम जाना चाहें तो जाकर देखकर आनंदित हो लें या श्रद्धावनत होलें। सामाजिक मनुष्य से इतनी ही अपेक्षा की जाती है और इतनी ही उसकी आवश्यकता होती है। स्थापना और प्रतिष्ठा का सुख जिन्हें मिलता है , वे उसका आनंद सप्रयास ले लेते हैं। मैंने मूर्तियों के निर्माण का आनंद लिया। यह आनंद हमारे हाथ में होता हैं। हम ही निश्चित करते हैं कि किस चीज़ का हमें आनंद लेना है। थोपी गई भयंकर और भयानक ‘सुन्दर’ वस्तु का आनंद लेना किसी के वश की बात नहीं हैं।...