दो नवगीत : १. मन की भोर, २. आडम्बर के इंद्रप्रस्थ मन की भोर - मन की भोर सुहानी हरदम । नव-अंकुर को देती रहती, उचित समय पर पानी हरदम। सघन रात के गहन अँधेरे। युगत-भुगतकर हुए सबेरे। नव-उत्साह उमंग नयी भर, ज़ारी रखे रवानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... जोड़-घटाना छोड़ चुका है। लेन-देन कुछ नहीं रुका है। खाली हाथ चला है हँसता, ना याचक ना दानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... प्रेम क्षेम सब नैसर्गिक हैं। भावाभाव सभी स्वर्गिक हैं। यत्न-प्रयत्न व्यर्थ हैं सारे, समय करे मनमानी हरदम। मन की भोर सुहानी .... 15.06.26, सोमवार 0 आडम्बर के इंद्रप्रस्थ ऐसा ...