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एक अनूठा फूल : 'ज़ख़्मी दिल'

 एक अनूठा फूल : 'ज़ख़्मी दिल'

 1.

       कहीं पढ़ा है कि प्राचीनकाल के गुरुकुलों में शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु अपने शिष्यों को विदाई के समय यह मंत्र देते थे: "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव!" 

       चारों को देववत अर्थात् सम्माननीय बताया गया है - प्रथम मां , द्वितीय पिता, तृतीय आचार्य( गुरु, विद्जन) और चतुर्थ वे जो आकस्मिक असामयिक हमारे घर या हमारे संपर्क में आ जाएं। स्पष्ट है कि यह कोई निश्चित संख्या नहीं है। क्या जाने कौन कब हमारे जीवन में आकर हमें ऐसा प्रभावित कर जाए कि हम खुश होकर कहें - "कहां थे तुम अब तक।" 

        सकारात्मक मनुष्यों के साथ ऐसा घटता है। अपने स्वीकारात्मक दृष्टिकोण को हमेशा खुला रखें। न जाने कब कौन अनायास आकर आपके अनुभवों को एक नई दिशा दे जाए! यही इस शिक्षा का अभिप्राय है। यह शिक्षा तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली खंड, अध्याय 1.11.2 में अंकित है। 

         यह जो अनायास, आकस्मिक, असामयिक रूप से हमारे संपर्क में आता है, जिससे हमें जीवन भर के लिए एक नया अनुभव मिलता है - वही अतिथि है। उसके आने का समय, तिथि, योजना, मुहूर्त्त आदि पहले से निश्चित नहीं होते। इसीलिए वे अतिथि हैं। मां , पिता, गुरु और अतिथि, किसी की भी कौन कहां पूर्व कार्य योजना बनाकर चलता है। ये सभी हमारे लिए वरदान हैं, जो नियति ने हमें दिए हैं। वास्तव में भाई, बंधु, मित्र, शत्रु, बहन, सखी, प्रिया, भार्या आदि एक तरह से नैसर्गिक वरदान हैं। सभी हमारे लिए सम्माननीय हैं, स्वागत योग्य हैं, देवतुल्य हैं। 

      आप भी मेरे लिए सुहृद हैं, क्योंकि आपका मेरा मन निर्विकार हैं। आप अतिथि तुल्य मेरी अभिव्यक्ति को पढ़ रहे हैं। बिना किसी आग्रह,  पूर्वाग्रह, दुराग्रह के। आपका प्रोत्साहन मेरा पारितोषिक है। उससे मुझे 'कृत्तुष्टि' (कृत-तुष्टि) प्राप्त होती है, संतोष मिलता है, बल मिलता है।

       अगर ये विचार उत्कृष्ट हैं, तो इसके लिए मैं कृतज्ञ हूं उस सुंदर पुष्प का, जिसका नाम ज़ख़्मी-दिल, रंजित-हृदय और अंग्रेजी में ब्लीडिंग हार्ट है। वनस्पति शास्त्री इसे Lamprocapnos spectabilis (लैम्परोकैप्नॉस स्पेक्टेबिलिस) कहते हैं। इस अजनबी पादप पर दो चार सफेद कलियां निकल आईं हैं। अपने सिरहाने के दरीचे की दीर्घा (गैलरी) पर किसी पादप में कलियां निकल आए तो मन बल्लियों उछलने लगता है। शरीर भले एक उम्र के बाद  संकोच करे, लेकिन मन अंदर ही अंदर जैसा नाचता है, उसे मन-वाला व्यक्ति ही समझ सकता है। 

2.

     चार पाँच दिन पहले ही रंजित हृदय या ज़ख़्मी दिल की सफेद पंखुड़ियों के भीतर से लाल पंखुड़ियों का एक वृंत निकल आया है। ऐसे जैसे सफेद पड़ गए हृदय के भीतर से जमे हुए ख़ून के थक्कों का तार निकल आया हो। प्रकृति ऐसी अद्भुत कलाकृतियां प्रस्तुत करती रहती है। असंख्य, अपरिमित, अगण्य। नहीं गिनी जा सकतीं। बस हमारी सीमित और क्षुद्र आंखे देखती रह जाती हैं। उस अवर्णीय आनंद को भोगने का अवसर हमें मिला है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति की शक्ति हमें नहीं मिली। तुलसीदास जैसे महाकवि को भी असमर्थता की 'विनय पत्रिका' लिखनी पड़ी- 
               केशव! कहि न जाय का कहिए।
               देखत तव रचना विचित्र-अति, समुझि मनहिं मन रहिए। 

       मैं भी निर्वचन, अवाक और मुग्ध हूं। मैं जानता हूं कि ये नितांत अपरिचित अतिथि 'ग्रीष्म का चौमासा' करने मेरे घर चले आये हैं। दो घूंट पानी के अतिरिक्त ये कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। सूर्य इनके भोजन का प्रबंध कर देगा। मगर सज्जन अतिथियों की भांति ये जब तक रहेंगे तब तक, आंतरिक आनंद, आह्लादकारी सुगंध, स्निग्ध शीतलता आदि देते रहेंगे, और जब जाएंगे तब इन सब में भीगी हुई स्मृतियां दे जाएंगे। प्रकृति का यही तो चरित्र है। वह लेने नही, देने आती है। 

        ये एक अस्तित्व के अंदर से दूसरे अस्तित्व को उजागर करनेवाले दोवर्णी हृदयाकार पुष्प क्यों आये, क्या बताने आये? क्या यह कि अंदर की क्षमता और सृजनशीलता को शक्ति-भर बाहर उलीच दो। सृजनशील तो यही अर्थ लेंगे। 

            किंतु यह कौन सा निराश और हताश व्यक्ति है जिसने यह हिंस्र नाम 'ज़ख़्मी दिल', इसे दिया? कोई उपेक्षित कवि ही होगा, जिसे वह न मिला जो वह चाहता होगा। उसका दिल फटा तो उसने इस फूल का नामकरण कर दिया 'ज़ख़्मी दिल।' फिर इस नाम को तर्कयुक्त करने के लिए एक कहानी भी रच दी। यही एशिया की विशेषता है। अपनी कल्पना को स्थापित करने के लिए वे कहानी पर कहानी रचते जाते है। वृहदाकार ग्रंथ बनाते जाते हैं। 

           'श्वेतारुण पुष्प' पर भी  जापान में एक कहानी बनी। इस कहानी में एक युवक ने अपनी एकतरफा प्रिय युवती को आकर्षित और प्रसन्न करने के लिए दो खरगोश, एक जोड़ी जूतियां और एक जोड़ी कर्णफूल (कर्णाभूषण, बालियां, झुमके) दिए। 

        अब ऐसा तो होता नहीं है कि एक ने पसन्द किया तो दूसरा भी पसंद ही कर ले। उस लड़की ने उसके तोहफ़े और उसका प्रणय सब अस्वीकार कर दिये। 

      वह युवक इस आघात को सम्हाल न पाया। होते हैं अधिकांश कमज़ोर कलेजे के प्रेमजीवी युवक, जो प्रेम नहीं मिलता तो जी नहीं पाते। जापानी कहानी के असफल प्रेमी  

ने भी अपने सीने में कटार घोंप ली और उसके दिल से टपकते हुए लहू के साथ उस नवयुवक के प्राण भी अंततः टपक गए। गल्पांध (गपोड़ी) कथाकारों ने यह गप फैलाई कि यह पुष्प उसी मरणोड़े प्रेमी का पुनर्जन्म है। 

         नहीं, इस कहानी को हम नहीं मानते।  इस भयानक भूल को हम सुधारेंगे। इस पुष्प को द्विवर्णी 'श्वेतारुण सुमन'  कहकर। इसे 'ब्लीडिंग हार्ट'(Bleeding Heart) के स्थान पर अब हम 'क्रिएटिव आर्ट' (creative Art) कहेंगे। प्रकृति का  हर कृतित्व, हर कृत्य (creation, creature) सुकृत, सकारात्मक (creative) कृति ही तो है।   

         ओह! आज का दिन कितना सकारात्मक, कितना सार्थक है। आज हम सकारात्मक सृजनशील 'श्वेतारुण सुमन से मिले। 

         किंतु ये मिलन अधूरा है।  इस द्विवर्णी प्रोत्पादक (twice born, द्विज) पुष्प के विभिन्न बंधु बांधव हैं जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। भारत में  कुछ यायावर ही चीन, कोरिया और जापान से आये हैं। हां, हैं तो एशियायी, हमारी भू बिरादरी के हैं। एक ही महाद्वीप के अलग-अलग मोहल्ले के हैं। रँग रूप भी भिन्न हैं, नाम भी भिन्न हैं। 

          हम जिस अतिथि पुष्प श्वेतारुण से उत्प्रेत हुए, उसका नाम जैसा कि हमें पता है लैम्प्रोकैप्नॉस स्पेक्टाबिलिस, निक नेम कहें तो ब्लीडिंग हार्ट, नवीनीकृत नाम 'क्रिएटिव आर्ट' है।  पहले इसे डिसेंड्रा स्पेक्टाबिलिस कहते थे। सुंदर आकर्षक और निरंतर पुष्पित होनेवाले चीनी, कोरियन और जापानी मूल के इस फूल में सफ़ेद पंखुड़ियों के बीच से लाल पंखुड़ियों का एक द्वितीय गुच्छा निकलता है जो रक्तिम होता है जैसे ख़ून टपक रहा हो। इसलिए इनका नाम प्रताहम दृष्टया रंजीत हृदय यानी ब्लीडिंग हार्ट कह दिया। यही मेरी पुहप दीर्घा में है। 

        इससे उलट भी होते हैं। ऊपरी पंखुड़ियां लाल होती हैं और अंदर से सफेद पुष्प गुच्छ निकलता है। नाम वही  रक्त रंजित हृदय।  

      इसके बहुत से प्रकार हैं जिन्हें अधिकाँशतः दुनिया में लोकप्रियता प्राप्त नहीं है। इसके अनेक नाम भी हैं। जैसे चीनी पतलून (Chinese Pants), लेडीज़ लॉकेट, लायर फ्लावर्स,  लेडी इन अ बोट। 'ब्लीडिंग हार्ट' का एक सगा भाई भी है- टियरिंग हार्ट Tearing Heart (आंसू बहाता दिल)।

       यही नही ब्लीडिंग हार्ट के अनेक चचेरे मौसेरे भाई हैं-  अल्बा, गोल्ड हार्ट, वेलेंटाइन आदि।

       हालांकि पुष्प-पादप के अतिरिक्त एक पत्र-पादप भी मेरे कॉरिडोर में है जिनको 'ब्रोकन हार्ट' कहते हैं।  केवल शो प्लांट नहीं है वह, नाम भले ही 'ब्रोकन हार्ट'  (टूटा  हुआ दिल) हो, बनाता वह दिल और फेफड़े को मजबूत ही है। सांसों का श्रेष्ठ साथी है। पर वह सब फिर कभी। 

       समय बहुत हो रहा है। अंधेरा मेरे सूने घर की तरफ़ दौड़ रहा है। मैं भी लपकूं ताकि घर में रोशनी की सरकार न गिरे। 

                                              0 डॉ. रा. रामकुमार वेणु, 
                              05.06.26, शुक्रवार , शाम 6.33 .
                               (आरम्भन १८.०५.२६, प्रातः ५ बजे,)

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