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अबे सुन बे गुलाब!

 ललिताग्रही निबंध

१५.०५.२६, शुक्रवार

अबे सुन बे गुलाब! 

      

 आज मेरे गैलरी-गार्डन में गर्मी की तपन को चुनौती देता 'बटन गुलाब'(button rose) खिला। गैलरी गार्डन में जब भी कोई फूल खिलता है तो मैं खिल उठता हूं। सभी खिल उठते हैं। मोंगरे के पौधे में रोज पांच सात फूल खिल जाते हैं। अनेक कलियां शाखाओं में नन्ही बच्चियों की तरह लटकी रहती हैं। गुलाब में खिलावट कम है। ऐन जेठ में गुलाब का खिल जाना उसकी जीवंतता है। जो अकेला, अपने दम पर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विजेता की भांति अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ प्रफुल्लित हो कर उद्ग्रीव हो, उससे कौन प्यार नहीं करेगा।

       गुलाब भारत के लिए विदेशी है। नाम से ही पता लगता है। गुलाब फ़ारसी मूल का शब्द है। इसकी सुंदरता और महक के कारण इसे फ़ारसी कवियों ने गुलाब (फूल की आभा) पुकारा होगा। इसके कुटुंब, परिवार, नस्ल या जाति के जितने भी फूल हैं लाल, रक्ताभ, पीले, काले, हरे, सब एक ही नाम से पुकारे जाते हैं- गुलाब। 

          पर गुलाब तो नाम नहीं है, विशेषण है, उपनाम है। गुलाब अर्थात पुष्पाभ, यह रूप-रंग का नाम है, वस्तु का नहीं। इसे उपनाम यानी जाति सूचक शब्द कह सकते हैं। किंतु रूप और रंग के आधार पर यह एक विशिष्ट प्रकार के पुष्प का बोध कराता है। जैसे भारत के पूर्वोत्तर के नागरिकों का रूप रंग, जैसे दक्षिण के भारतीयों का रूप रंग। जैसे कश्मीरी, पंजाबी, सिंधी, बंगाली, गुजराती आदि अपने अपने रूप रंग के कारण अलग पहचाने जा सकते हैं।
        अतः गुलाब नाम नहीं है, उपनाम है जैसे मल्होत्रा, बनर्जी,  त्रिवेदी, मेहता आदि।

             ऐसा संभव है कि लोगों को माता पिता ने कोई नाम दिया हो लेकिन साहित्य, कला, विज्ञान, धार्मिक अखाड़ों, संघ, मठ आदि ने उन्हें अलग ही नाम दे दिया।  उनकी नई पहचान बन गयी और मूल पहचान ही खो गयी। लाखों संन्यासी और साधुगण अपना नाम खोकर, अपनी पहचान मिटाकर, संबंधित संगठनों का हिस्सा बने हुए हैं। 

        गुलाब भी ऐसा ही कोई फ़क़ीर या पीर होगा, जो फ़ारस से चलकर पूरी दुनिया में चिमटा बजाकर सुगन्ध फैला रहा है।   

       एक शेर याद आ रहा है जो इस दरवेश (फ़ारसी फकीर, साधु जो द्वारे द्वारे जाए) को मोइन नज़र की जानिब से समर्पित है-
            फूल रह जायेंगे गुलदानों में यादों की 'नज़र,'
            मै तो ख़ुश-बू हूँ फिज़ाओं में बिखर जाऊँगा।
     इस शे'र में फूल का संन्यास देखिये। दरवेश की भांति ही फूल भी ख़ुश-बू उड़ाने आते हैं।

        एक और बात, यहाँ शब्द 'गुल-दान' है, 'पुष्प-पात्र'। इसमें कोई भी 'गुल' रखो। यह गुलाब के अकेले के लिए ही नहीं है।  रजनीगंधा, गेंदे, मिश्रित पुष्प आदि गुलदान में रखे जा सकते हैं। गुलाब इस पर अपना दावा नहीं कर सकते। ऐसे ही एक गुलदस्ता होता है, पुष्प-गुच्छ जिसे कहते हैं। इस गुच्छे में भी सिर्फ़ गुलाब या लाल, गुलाबी, पीले, काले, हरे, देशी विदेशी गुलाब रखो या विविध पुष्पों के प्रकार रखो, कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

    मोइन नज़र की तरह गुलाब की चर्चा भारतीय साहित्य में भी है। सीधे गुलाब को संबोधित करते हुए छायावाद के प्रमुख हस्ताक्षर निराला ने लिखा-
         एक थे नव्वाब,
         फ़ारस के मँगाए थे गुलाब।
         बड़ी बाड़ी में लगाए
         देशी पौधे भी उगाए।
        +
           आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,
           बाग़ पर उसका पड़ा था रोबोदाब। 
           वहीं गंदे में उगा देता हुआ बुत्ता
           पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता—
          “अबे, सुन बे, गुलाब!(?)
          भूल मत जो पाई ख़ुशबू, रंगोआब,
          ख़ून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
          डाल पर इतरा रहा है केपिटलिस्ट!'

    निराला इलाहाबाद में थे। इलाहाबादी महादेवी ने उन्हें अपना मुंहबोला भाई बनाकर बड़ी मदद की थी। इलाहाबाद के जवाहरलाल से निराला के गहरे मैत्री सम्बन्ध थे। जवाहरलाल को गुलाब बहुत पसंद था। गुलाब उनकी शेरवानी में दिल की तरफ़ लगा रहता था। किसी बात पर फ़क्कड़ और अक्खड़ निराला जवाहरलाल नेहरू से नाराज़ हो गए । तब यह कविता लिखी। कविता लंबी है और प्रगतिशील मूल्यों की व्याख्या करती है। केवल गुलाब वाला अंश लेना ही समीचीन था, वही ले लिया।

      फक्कड़ दरवेश, साधु और फ़क़ीर की तरह गुलाब भी बादशाहों को बड़े पसंद आते रहे हैं। बाबर ने गुलाब लगाने की बात लिखी है। जहांगीर के बाग़ में यह गुलाब ख़ास मुकाम रखता था। ज़ाहिर है बेगमों को भी इससे प्यार था। सूत्रों से पता चला है कि 'असीरिया की शाहजादी पीले गुलाब से प्रेम करती थी और मुग़ल बेगम नूरजहाँ को लाल गुलाब अधिक प्रिय था। मुग़लानी जेबुन्निसा अपनी फारसी शायरी में कहती है ‘मैं इतनी सुन्दर हूँ कि मेरे सौन्दर्य को देखकर गुवाब के रंग फीके पड़ जाते हैं।‘

       सुंदरता में विश्वभर में विख्यात गुलाब पर इस कविता को सुनकर क्या बीती होगी? ओह, हां,  वह तो फ़क्कड़ दरवेश है। ज़ोर से ठहाका लगाकर हँसा होगा। आज भी हँसे जा रहा है। 

        कुछ अध्ययन से पता चलता है कि भारत आने पर विद्वानों ने इसके नामकरण को लेकर बड़ा विचार किया है।गुलाब की अनेक रंगीन पंखुड़ियों के कारण इसे पाटल या पाटलि कहा गया। बिहार की किसी राजकुमारी का नाम पाटली (गुलाबो, गुलाबवती, गुलबिया) रहा होगा।  उसके पुत्र का नाम पाटलिपुत्र हुआ होगा। वही प्रसिद्ध  शिक्षा-नगरी आज पाटलिपुत्र और पटना के नाम से विद्यमान है। जयपुर को गुलाब के रंग के कारण गुलाबी-नगर कहते हैं। गुलाबी रंग रूढ़ हो गया है, होता नहीं। रक्ताभ होता है। ख़ैर।

     कश्मीर और भूटान में पीला गुलाब जंगली गुलाब कहलाता है। सफेद गुलाब को सेवती कहते हैं। कहीं कहीं हरे और काले रंग के भी गुलाब होते हैं। लता की तरह चढ़नेवाले गुलाब भी होते हैं, जिन्हें बेला-गुलाब कहा जा सकता है।  ये बगीचों में मेहंदी की बाड़ या बांस की टाट पर चढ़ाए जाते हैं। मराठी मूल का एक गीत बहुत प्रसिद्ध है- बेला-गुलाब, जूही, चम्पा, चमेली।

      ऋतु के अनुसार गुलाब के दो भेद भारतबर्ष में माने जाते हैं सदागुलाब और चैती। सदागुलाब प्रत्येक ऋतु में फूलता और चैती गुलाब केवल बसंत ऋतु में। चैती गुलाब में विशेष सुगंध होती है और वही इत्र और दवा के काम का समझ जाता है। चैती गुलाब बसरा या दमिश्क जाति के हैं। ऐसे गुलाब की खेती गाजीपुर में इत्र और गुलाबजल के लिये बहुत होती है। भारत में गुलाब के आसवन से निकला गुलाबजल मिठाइयों में डाला जाता है। गुलाब जामुन भी एक मिठाई है, जो हल्की गुलाबी भी होती है और जामुन के रंग की भी।

       भारत में गुलाब खां भी होते हैं और गुलाब सिंह भी। मेरी मौसेरी बहन के चचेरे भाई का नाम दादू गुलाब दास था। आजन्म कुंआरे और लंबे-गोरे गुलाब भैया के चेहरे पर वृद्धावस्था में भी गुलाब खिले रहते थे। हालांकि श्यामल सलोनी लड़कियों के नाम भी गुलाबवती, गुलाबो, गुलाबन आदि मैंने अपने सदा जिज्ञासु और उत्सुक कानों से सुने हैं। गुलाब अब किसी देश, जाति, लिंग भाषा का नहीं रहा। साधु संतों की भांति वह सार्वजनीन है। सदा बहार और चिर युवा।

        अरे हां, गुलाब को सदारुण (सदा अरुण) भी कहते हैं, क्योंकि इसका लावण्य सदा बना रहता है, टूट कर गिरने तक। कुछ इसे शत-पत्रों (दलों) के कारण यह ‘शतपत्री’ या 'शतदल' भी कहते हैं। कानों की आकृति के कारण यह ‘कर्णिका’है, सुन्दर केशर युक्त होने से ‘चारुकेशर’, लालिमा रंग के कारण ‘लाक्षा’ और गन्ध पूर्ण होने से 'गन्धाढ्य' कहलाया। 

          फ़ारसी  गुलाब अंगरेज़ी में रोज, बंगाली में  गोलप, तामिल में इराशा और तेलुगु में गुलाबी पव्वु कहते हैं। अरबी में गुलाब ‘वर्दे अहमर' (सुर्ख़ गुलाब) है। सभी भाषाओं में यह लावण्य और रस का प्रतीक है।  श्रृंगारी कवियों ने गुलाब को 'रसिक पुष्प' कहा और यह दुआ की कि ‘फूल्यौ रहे गंवई गाँव में गुलाब’(छोटे बड़े गॉंवों में फूले रहो)।

       पुराण अर्थात पुरानी कथाओं में गुलाब को 'देव-पुष्प' कहा गया है। 

       रीतिकालीन कवि देव ने अपनी कविता में कामदेव के बालक बसन्त को जगाने के काम में गुलाब की नियुक्ति प्रतिहारी/ सेवक के रूप में की है। और परिवर्त्तन की मार देखिये मान्यवर कि फूलों के महाराजा गुलाब सिंह 'आया' की भांति शिशु 'बसंत बाबा' को पुचकार कर,चुटकी बजाकर जगाने की 'चाकरी' में लगे हैं।  देव कवि लिखते हैं-
            मदन-महीप जू को बालक बसंत, ताहि-
            प्रातहिं जगावत 'गुलाब' चटकारी दै।। 
      अर्थात धरती के राजा मदन उर्फ़ कामदेव के बेटे बसन्त को 'गुलाब' चटकारी (चुटकी) बजाकर प्रातः जगाता है। 


               भारतेतर साहित्य में भी गुलाब की बड़ी चर्चा है। प्रणय-निवेदन का जैसे एकमात्र आश्रय यही है। रोज़ या रेड रोज़ की महत्ता से किस प्रणयी की असहमति हो सकती है?

अरबी का 'वर्दे अहमर'  यानी 'सुर्ख़ लाल गुलाब' ही है जिसने मोहब्बत के प्रतीक के रूप में दुनिया भर में साम्राज्य स्थापित कर लिया है। यद्यपि भारत में हंगामा मचा हुआ है, तथापि भारतीय साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी इसे संस्कृति का संवाहक मानते हैं। 

        विश्व साहित्य में भी गुलाब को विशिष्ट फूल की मान्यता प्राप्त है। 'रोम के प्राचीन कवि वर्जिल ने  सीरिया देश के वासन्ती गुलाब की चर्चा की है। अंगरेज़ी साहित्य के कवि टामस हूड ने गुलाब को समय का प्रतिमान  कहा तो कवि मैथ्यू आरनाल्ड ने गुलाब को प्रकृति का अनोखा वरदान कहा। टेनिसन ने 'नारी को गुलाब का अवतार कहा है।' 

        तो गुलाब! तुम भी अवतार या पैगम्बर या मैसेंजर (मसीहा) हो क्या? 
          हे ख्यातिनाम!  जोहार,  सलाम, प्रणाम, सैलूट! तुम्हारे सम्मान में एक शेर पेश है-
              दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे।
              उस ने भेजा है इक गुलाब मुझे।                          
                                            इफ़्तिख़ार राग़िब

     

@डॉ. रा. रामकुमार, १६.०५.२६


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