Skip to main content

परजीवी-प्रतिलिपियों के देश में

परजीवी-प्रतिलिपियों के देश में

            संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध और सिद्ध कवि एवं नाटककार कालिदास की तुलना अंग्रेजी और लैटिन के नाटककार शेक्सपीअर से की जाती है। कालिदास को संस्कृत का शेक्सपीअर और शेक्सपीअर को इंग्लिश का कालिदास बतानेवाले विद्वानों के दोनों भाषाओं के ज्ञान का पता चलता है। लोकप्रियता और स्थानन की दृष्टि से यह तुलना एक सीमा तक ठीक है लेकिन कथ्य या विषयवस्तु, शिल्प, भाषा, शैली, चरित्र-चित्रण और उद्देश्य के भारोत्तोलन में दोनों में बहुत भिन्नता है। शेक्सपीअर ने ऐतिहासिक पात्रों को अपने नाटकों का कथ्य बनाया और कालिदास ने पौराणिक कथाओं को आधार बनाया। शेक्सपीअर में लैटिन और अंग्रेजी कविता की ऊंचाइयां देखने मिलती हैं तो कालिदास में संस्कृत काव्य के सौंदर्य की पराकाष्ठा दिखाई देती है।  शायद काव्य सौंदर्य की ऊंचाइयों की दृष्टि से दोनों को अपने अपने देश की चरम विभूतियां निरूपित किया जाता है। 

             किंतु भारत का कोई कवि अपने आपको बिहार या गुजरात का कालिदास कहे या कोई अंग्रेजी कवि अपने को इंग्लैंड या स्कॉटलैंड का शेक्सपीअर कहे तो पहली ही दृष्टि में ही यह बात ग्राह्य नहीं होती। मेरी अपनी समझ या दृष्टिकोण से किसी क्षेत्र में कोई भी प्रतिभा किसी पूर्ववर्ती की तरह क्यों होगी या होना चाहिए। यह बात व्यापारिक विश्व में चलती है कि किसी प्रसिद्ध और लोकप्रिय कम्पनी के उत्पाद की पहली या दूसरी प्रतिलिपि बाज़ार में आती है और क्रेताओं की क्रय सीमा के अनुकूल होने से बहुत बिकती हैं। मोबाइल, चश्मा, टी शर्ट, जीन्स, जैकेट्स आदि का क्रेज छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत देखने को  मिलता है। महिलाओं के ज़ेवरों के इमीटेशन्स पर युवतियां और गृहणियां फ़िदा हैं। 

           प्रतिभा-व्यापार के क्षेत्र में भी अनेक प्रसिद्ध और लोकप्रिय सितारों की शक्लोसूरत के मिलान और संवाद अदायगी के बल पर अनेक प्रतिभावान कलाकार मिमिक्री के ज़रिए अपनी दाल रोटी चला रहे हैं। आई एस जौहर ने राजेश खन्ना, शशिकपूर, शत्रुघ्न सिन्हा आदि के मिलते जुलते चेहरों वाले मिमिक्री आर्टिस्टों के साथ फ़िल्म बनाई थी। आजकल मनोरंजन जगत के टी वी शोज में हास्य के अनेक कार्यक्रम इसी मिमिक्री पर चल रहे हैं। 

             साहित्य में भी ऐसी परजीविता दिखाई देती है। अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने प्रेमचंद, रेणु बनने का संकल्प लेकर अपना साहित्यिक सफ़र आरम्भ किया और अपनी रणनीति एवं पी.आर. टिप्पणीकारों के माध्यम से समय समय पर अपने को प्रेमचंद, अज्ञेय, रेणु, कमलेश्वर, अशोक बाजपेयी, श्रीकांत वर्मा आदि कहलवाया। 

            किंतु यह कैसा लेखन है? किसी का नाम लेकर या किसी की छाप लेकर अपने लेखन को महिमामंडित करवाना कैसे साहित्यिक प्रतिष्ठा के अंतर्गत आ सकता है। 

       मैंने देखा है कि यह वितण्डा बहुत दूर नहीं जाता। आपके प्रायोजित अनुयायी कितनी दूर तक आपका पोषण कर पाएँगे? परजीवी कीटाणु और वनस्पतियां पोषक-जीवों (host animal) या पोषक-पौधों (host plant) की सुरक्षा की दृष्टि से नष्ट कर दिए जाते हैं। चाहे उसका नाम 'अमरबेल' (cuscuta reflexa) ही क्यों न हो।

           नक़ल या प्रथम-द्वितीय प्रतिलिपियों (first or second copies) का प्रलोभन इतना मूल्यवान होता तो प्रेमचंद खत्री के रास्ते निकल जाते। मुक्तिबोध की नई शैली दिखाई न देती। दुष्यंत और अदम गोंडवी का अंदाज़ विकसित न होता। अगर हर प्रतिभा अज्ञेय के रास्ते चल पड़ती तो विनोदकुमार शुक्ल की नितांत मौलिक भाषा और शैली कैसे दिखाई देती। 

            कुछ जीवित कवियों और लेखकों का नाम लेना चाहता हूं पर कहां मेरा मुंह और कहां उनका व्यक्तित्व। अतः देहलीज़ से ही लौटता हूं। अपेक्षित मार्गदर्शन की आस लिये। 

@ डॉ. रा. रामकुमार,  30.01.26, प्रातः 5.41.
(गूँगालय, नवेगांव, तहसील परसवाड़ा, ज़िला बालाघाट म.प्र)

Comments

रविंद्र सोनवाने रजकण said…
This comment has been removed by a blog administrator.

Popular posts from this blog

काग के भाग बड़े सजनी

पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’ कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’ सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’ कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’ खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी। दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया।...

चुहिया बनाम छछूंदर

डायरी 24.7.10 कल रात एक मोटे चूहे का एनकाउंटर किया। मारा नहीं ,बदहवास करके बाहर का रास्ता खोल दिया ताकि वह सुरक्षित जा सके। हमारी यही परम्परा है। हम मानवीयता की दृष्टि से दुश्मनों को या अपराधियों को लानत मलामत करके बाहर जाने का सुरक्षित रास्ता दिखा देते हैं। बहुत ही शातिर हुआ तो देश निकाला दे देते हैं। आतंकवादियों तक को हम कहते हैं कि जाओ , अब दुबारा मत आना। इस तरह की शैली को आजकल ‘समझौता एक्सप्रेस’ कहा जाता है। मैंने चूहे को इसी एक्सप्रेस में बाहर भेज दिया और कहा कि नापाक ! अब दुबारा मेरे घर में मत घुसना। क्या करें , इतनी कठोरता भी हम नहीं बरतते यानी उसे घर से नहीं निकालते अगर वह केवल मटर गस्ती करता और हमारा मनोरंजन करता रहता। अगर वह सब्जियों के उतारे हुए छिलके कुतरता या उसके लिए डाले गए रोटी के टुकड़े खाकर संतुष्ट हो जाता। मगर वह तो कपड़े तक कुतरने लगा था जिसमें कोई स्वाद नहीं होता ना ही कोई विटामिन या प्रोटीन ही होता। अब ये तो कोई शराफत नहीं थी! जिस घर में रह रहे हो उसी में छेद कर रहे हो!? आखि़र तुम चूहे हो ,कोई आदमी थोड़े ही हो। चूहे को ऐसा करना शोभा नहीं देता। हालांकि शुरू शुरू ...

बह्र पर बहस -१

बहर दी गयी... बहरेरजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला√ मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ऊलुन 1212 212 122 / /1212 212 122  0 एक साहब ने इस पर प्रतिवाद किया .. ०  ये बह्र रजज़ नहीं है । बहरे रजज़ की मूल अरकान  मुसतफ़इलुन (2212) चार बार हर मिसरे में आती है # ये बहरे मुतक़ारिब है √ बहरे मुतक़ारिब मक़बूज़ असलम सौलह रुकनी  अरकान 121,22,121,22121,22,121,22√ फ़ऊल -फ़ेलुन -फ़ऊल-फ़ेलुन -फ़ऊल-फ़ेलुन -फ़ऊल-फ़ेलुन । हर मिसरे में 8 बार  दोनों मिसरों में 16 बार ।  (अशोक गोयल)} ० ये नाम पढ़ा मैंने इस बहर का बहर-ए-रजज़ मुसम्मन मख़्बून मुरफ़्फ़ल  मफ़ाइलातुन----मफ़ाइलातुन---मफ़ाइलातुन---मफ़ाइलातुन  12122---------12122-------12122---------12122 (मीरा मनजीत) 0 (अशोक गोयल) मोहतरमा बहरे वाफ़िर ये है  अरकान  मुफ़ा इल तुन ,मुफ़ाइलतुन ,मुफ़ाइलतुन, मुफ़ाइलतुन  12112-12112-12112-12112  इस बह्र में उर्दू में शायद ही किसी ने ग़ज़ल कही हों । #### तमाम उर्दू शायरी में सिवा एक शेर के कहीं कुछ नहीं मिलता । ####### वो शेर हस्बे ज़ैल है ।ये शेर  जनाब तालिब लखनवी मरहूम का है । ****** ...