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मेल-जोल का खाना

         मेल-जोल का खाना


(बालगीत)

भूरे गोलू आलू से झुक बोला कालू बैंगन।
'भाई! आओ, आज बनाएं, मिलकर कोई व्यंजन।
तरकारी, तेउन, सब्ज़ी, भाजी, जो लोग समझ लें,
मिर्ची, धनिया, प्याज़, टमाटर, साथ हैं सारे परिजन।

        कहो आग से -'पेट नहीं, चूल्हे में आग लगाए।
        भूखे प्यासे लोगों के मन में उम्मीद जगाए।'
        इस्पाती गंजी से बोलो-  'आए तैयारी से,
       ताप सहनकर,छौंक झेलकर,साग लज़ीज़ पकाए।'

मीठी नामक हरी नीम को, सर्वप्रथम तड़काओ।
राई, जीरा, अदरक, लहसुन,  भूनो, घर महकाओ।
हींग ज़रा सा डाल स्वाद का जादू-मंतर फूंको, 
मुख्य विशिष्ट अतिथि आलू बैंगन को मंच चढ़ाओ।

       जल-भुन जाने के पहले, बघरों पर पानी डालें।
       सब आपस में घुल-मिल जाएं, ऐसा उन्हें खंगालें।
       नमक स्वाद अनुसार डालकर सब पर ढक्कन डालो, 
      घर की बात न बाहर जाए, भीतर बात बना लें।

चुगलखोर है हवा, मुहल्ले भर को बतलाएगी।
'क्या राँधा है बहू?' -पूछने,  मौसी आ जाएगी।
उनके पीछे काकी, फूफी, मामी आ धमकेंगी,
पलक झपकते घर में पंगत की नौबत आएगी।

      यही जिंदगी की सुंदरता, 'मेल-जोल का खाना।'
      ढूंढ लिया करते हैं हम सब, कोई नया बहाना।
     शांत-सुरक्षित रहें पीढियां, कौन नहीं चाहेगा,
     गले लगाने का मन लेकर, आना, जब भी आना।            

      @ राम भैया, 

२५.०२.२६, रविवार, महाशिवरात्रि, प्रातः ९.००.

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