आज 1 जनवरी 2026, रविवार संत रविदास जयंती यानी माघी पूर्णिमा है। सुबह से सोशल मीडिया में संत रविदास जयंती की बधाइयां और शुभकामनाएं प्रकाशित हुई शुर हो गयी हैं।
संत रविदास जयंती, माघी पूर्णिमा मेरी मां की पुण्य तिथि भी है। इसलिए जब भी रविदास जयंती की सुगमुगाहट होती है, मेरी मां का जाने का हौल जाग जाता है।
6 फरवरी 1993 का शीतल बासन्ती दिन है।
महाविद्यालयीन साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधि का प्रभारी होने का नाते मैं वार्षिक स्नेह सम्मेलन की तैयारी करवा रहा हूं। धूप में गुलाबी गर्माहट आ चुकी है। युवाओं के चेहरों पर मिठास समुद्री किनारों की रेत पर जमे नमक की तरह दमक रही है। कहीं लोकनृत्य, कहीं लोकगायन, कहीं प्रहसन, कहीं आर्केस्ट्रा के साथ गायन आदि का अभ्यास चल रहा है। सभी विद्यार्थी अपनी-अपनी रुचि के अनुकूल अपनी-अपनी कला को पूरी तन्मयता, मनोयोग, उत्तरदायित्व और महत्वाकांक्षा के साथ निखारने में लगे हैं। स्नेह सम्मेलन को छः दिन रह गए हैं।
एक बजे, मेरे पास टेलीग्राम लेकर एक रेलवे कर्मचारी आता है। वह मुझे टेलीग्राफिक तार देता है और स्वाभाविक चिंता के साथ मैं टेलीग्राम पढ़ता हूं। लिखा है... मदर ऑफ लोकेश इस डेड टुडे मॉर्निंग एट सिक्स ए एम.
जिस लोकेश की मां गुज़र गई है, वह मेरे सबसे बड़े भाई होते हैं। कई सालों से मां उनके पास ही रह रही है। मँझले के पास नहीं, सँझले के पास नहीं और मैं जो सबसे छोटा हूं, उसके पास भी नहीं।
हालांकि अलग अलग परिस्थितियों में मां सबके पास रही हैं। मेरे पास भी रहीं। मेरे अस्थमा के कारण और नई नौकरी की स्थानांतरणता के कारण पांच छः सालों से मेरे पास नहीं रह पाईं। चाहती तो थीं पर अस्वस्थता की विवशता देखी थी उन्होंने। मेरा अस्थमा कई बार बिगड़ा और मेरी सांसें उखड़ते उखड़ते ठहर गईं।
अभी साल भर पहले, 1991-92 में मैं पलंग पर पड़ा हुआ हूं, मां बड़े भाई के बेटों और बहुओं के साथ आईं थी। मेरी तबीयत रात में ज़्यादा बिगड़ गई। पड़ोस में डॉक्टर थे, उन्होंने आकर इंजेक्शन दिया। डॉक्टर गए और मैं बेहोश हो गया। पता नहीं कैसे क्या उपाय हुआ, मेरी जब आँखें खुलीं तो मां मेरा सर अपनी गोद में लेकर रो रही थीं।
मेरी सांसें अब सहजता से चलने लगी हैं और मुझे अच्छा लगने लगा है। ऐसा कई बार हुआ है कि अस्वस्थता के कारण या आकस्मिक घटनाओं से जब-जब बेहोश हुआ हूं, ज़्यादातर मां की गोद में ही मेरी आँखें खुलीं हैं।
आज उसी मां की सांसें उखड़ गईं हैं। मेरी छाती भारी हो जाती है और आंखें पनीली हो जाती हैं।
मैं अपना प्रभार सौंपकर घर आ जाता हूँ और पत्नी तथा तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ सिवनी जाने की तैयारी करने लगता हूँ। सबसे छोटी बच्ची पौने तीन साल की है।
नैनपुर से सिवनी कोई अठत्तर किलोमीटर है। ढाई तीन घंटे तो लगेंगे। शायद अंत्येष्ठि के लिए इंतज़ार होगा। भाइयों की संसद में मैं अल्पमत में रहा हूं। सबसे छोटा होने से मैं कभी गृह-परिषद में नहीं रहा। मेरी सहमति से कोई नीति नहीं बनी, न कोई निर्णय प्रभावित हुआ।
अंत्येष्ठि मिले न मिले, हम निकले। ढाई बजे हमें बस मिल भी गयी। मैंने बस ड्राइवर से स्थिति बताई और कहा कि हो सके तो पांच बजे पहुंचाने की कोशिश करे।
बहुत अद्भुत अनुभव हुआ। ड्राइवर ने यात्रियों का लोभ छोड़कर बस को यथाशीघ्र सिवनी पहुंचाने की पूरी कोशिश की। केवलारी, लोपा, पलारी चौक, कान्हीवाड़ा, भोमा आदि यात्री बहुल स्थानकों पर भी ड्राइवर ने गाड़ी दो-तीन मिनट से अधिक नहीं रोकी।
मैं ड्राइवर को नहीं जानता था? ड्राइवर भी मुझे क्यों जानेगा? महीने दो महीने में हम एकाध बार सिवनी जाते थे। कभी पत्नी के मैके, कभी मेरी मां से मिलने। पिछले साल भर से किसी न किसी आकस्मिकताओं के चलते हम जा ही नहीं पाए। इसलिए दर्जनों बसों में से किसी एक ड्राइवर का किसी खुदरा यात्री को पहचानना कोरी कल्पना ही है। हां, एक कड़ी है जिससे हमारी पहचान बनती है। मां, मां का देहावसान और उसकी अंत्येष्टि में किसी दूरस्थ बेटे की छटपटाहट। ड्राइवर उस छटपटाहट को पहचानता होगा। क्यों नहीं पहचानेगा? मां किसके नहीं होती? मृत्यु किसे नहीं आती।
पौने पांच बजे ही बस डूंडा सिवनी के मोती नाला रेलवे क्रॉसिंग को पार कर गयी तो मैंने अंदर संतोष की एक लहर उठी और गहरी सांस बनकर निकल गयी। समय के लगभग पंद्रह मिनट पहले ही ड्राइवर ने नैनपुर-सिवनी की दूरी पार कर ली थी। मैंने रास्ते भर देखा और सुना कि ड्राइवर कंडक्टर को हिदायत दे रहा था-'सलीम, लेट हो रहे हैं बेटा! टाइम वेस्ट नहीं करना। जितने पसेंजर मिले, ले ले। इंतज़ार कोई नहीं करना। पीछे दूसरी बस है, आ जाएंगे।'
सलीम आज्ञाकारिता से -"हव भाई जान, हव भाई जान" कर रहा था। बस किसी KGN (के जी एन) की थी। यह मालिक का नाम नहीं था। इसका पूरा विस्तार था-'ख़्वाजा ग़रीब नवाज़'। अंग्रेजी में KGN.
इसलिए मुझे लगा था कि मां की अंत्येष्टि में बेटे के पहुंचने की व्याकुलता को के.जी.एन. का 'भाई जान' समझ भी पायेगा या नहीं। लेकिन मेरा भ्रम थोथा था। सिवनी में तो अनवर भाई जवारे भी रखते हैं और नैनपुर में कलीम भाई नौ रात्रि व्रत लौंग दबाकर रखते हैं।
मेरे संतोष के साथ ड्राइवर भाई जान का एतबार अब बरघाट चुंगी के तिराहे की तरफ़ बढ़ गया था।
अचानक भाई जान के मुंह से निकला - 'या अल्लाह!'
इसी के साथ बस ठिठकी और थरथराकर रुक गयी।
कंडक्टर सीट के पीछे बैठे किसी सज्जन ने घबराकर खड़े होकर पूछा : "क्या हुआ याकूब भाई!"
"जुलूस चला आ रहा है असलम भाई! देखो तो बड़ा लंबा है। लगता है केवटी तिगड्डे के भी आगे तक है। यहाँ फंसे तो घण्टे भर के लिए गये। कोई फ़ायदा नहीं होगा जल्दबाज़ी का।" ड्राइवर याक़ूब भाई ने अफ़सोस के साथ कहा।
"इधर काली चौक वाले रास्ते में डाल दो याक़ूब भाई! जैन मंदिर के आगे से अशोक टॉकीज़ और मोमिनपुरा होते हुए बस स्टैंड टच। अपने टाइम पै!" असलम भाई ने इस्लाह किया।
"शुक्रिया असलम भाई! बेहतरीन तरीक़ा सुझाया।" इतना कहकर याक़ूब भाई ने गेयर बदलकर बस का स्टेयरिंग चुंगी नाका की बाईं तरफ़ की सड़क की ओर मोड़कर एक्सीलेटर दबा दिया।
बस काली मंदिर होती हुई दिगम्बर जैन मंदिर की तरफ़ बढ़ रही थी कि असलम भाई ने पूछा- "याक़ूब भाई, ये जुलूस कहीं संत रैदास साहब की पूनम का तो नहीं?"
"उसी का है भाई जान! आज माघी पूनम है न?" याक़ूब ड्राइवर ने बड़ी चौकन्नी नज़र से बस बढ़ाते हुए कहा।
पांच बजने में अभी पांच मिनट थे कि हमारी बस, दलसागर-बस स्टैंड की बाईं तरफ़ के म्युनिस्पल स्कूल ग्राउंड की तरफ़ फुटपाथ पर खड़ी हो गई। हम ड्राइवर की सीट के पीछेवाली विधायक सीट पर बैठे थे। (विधायक सीट कहलाती भर है, वर्ना विधायकों के पास अपनी निजी कारें होती है।)
मैंने छोटे हथ-बैग कंधे पर डालकर उतरने के पहले सींकचों से अपना मशकूर पंजा बढ़ाकर याक़ूब भाई का कंधा दबाकर कहा -"धन्यवाद भाई!"
याक़ूब ने मुस्कुराकर कहा -"शर्मिंदा न करें सर, इंसान ही इंसान के काम आता है।" बाक़ी की बात हमारी आंखों ने पलक झपकते कर ली।
मैंने पत्नी तथा बच्चों को नीचे उतारा। हाथ रिक्शावाला बस इंतज़ार में ही था- "कहां चलना है साब!"
"छिंदवाड़ा चौक, बढ़ई मोहल्ला।" मैंने कहा और उसने लपककर एकमात्र सूटकेस रिक्शा पर चढ़ा लिया।
आज शनिवार था। आगे नगरपालिका चौक से लगे बुधवारी बाज़ार में भीड़ नहीं थी। अगर आज इतवार होता तो बुधवारी तालाब के किनारे दुकानों की भीड़ से सड़क भरी होती। बुधवारी बाज़ार और बुधवारी तालाब के बीच से रिक्शा बिना असुविधा के दादूसाहब के धर्मशाला से आगे निकलकर महावीर-मढ़िया पारकर छिंदवाड़ा चौक पहुंच गया। इसके बाद नागपुर रोड पर पचास गज चलकर बाईं तरफ जो सड़क उतरती है, वहीं चार घर के बाद हमारा घर था।
रिक्शा रोड पर मुड़ने के लिए रुका ही था कि पत्नी की फुफेरी बहनों के साथ अन्य स्त्रियां वहीँ खड़ी मिल गयीं।
फुफेरी बहन ने कहा- "कुमार बाबू! अभी थोड़ी देर पहले ही मां को ललमटिया ले गए है। साइकल से चले जाओ। शायद मुंह देखने मिल जाए। बच्चों की चिंता मत करो। हम लोग हैं।"
चार घर के बाद पड़नेवाले घर से मैंने साइकल उठायी और मंगलीपेठ के उस पार ललमटिया श्मशान घाट की तरफ़ चल पड़ा।
पत्नी की फुफेरी बहन ने कह तो दिया कि मुंह देखने मिल जाएगा। मगर धड़कनें कुछ और कह रहीं थीं। कैसे देखूंगा मैं मां का मुंह। कैसी दिखेगी चिर-निद्रा में सोई हुई मां। मां को मैंने हमेशा गहन शांत मुद्रा में देखा है। उसके होंठों पर एक स्थायी मृदुल मुस्कान रहती थी। मुझे ख़ुश देखते ही उसके चेहरे पर सुबह का केसर बिखर जाता था। उसकी आँखों में अनंत एकांत और नीरव खामोशी थी। बोलती तो उसकी आवाज़ बहुत दूर से आती लगती थी। उस अथाह नीरवता में लिपटे मुंह को मैं कैसे देख पाऊंगा?
और फिर देख पाऊंगा भी या नहीं? इसकी उम्मीद क्षीण पड़ते उजाले की तरह क्षीण हो रही थी। सूर्यास्त हो रहा था। अंत्येष्टि सूर्यास्त के बाद निषिद्ध है। नहीं, मेरी प्रतीक्षा का कोई औचित्य नहीं है।
इसी उधेड़-बुन में अपनी धड़कनें, अपनी भाव-धारा और अपना संयम सम्हालते हुए मैं ललमटिया श्मशान पहुंच गया। रिश्तेदारों, गायत्री परिवार के परिजनों और अन्य परिचितों के जमघट में घिरी लाल-पीली लपटें ऊपर उठ रहीं थीं। मां का अग्नि संस्कार सूर्यास्त के पहले हो चुका था।
पता नहीं बहुत सालों बाद साइकिल चलाने से या अस्थमेटिक होने से अथवा बहुत सोचने के कारण मुझे हल्का सा चक्कर आया। मैं लड़खड़ाया। किसी ने मुझे पहचान लिया और साइकिल समेत गिरने से बच लिया। व्यही पकड़कर मां की चिता से निकलती लपटों के पास मुझे ले आये।
मेरे तीनों भाई वहां मौजूद थे। बड़े भाई लोकेश ने बड़े पुत्र की हैसियत से मुखाग्नि तो दे ही दी थी, अब वे कपाल-क्रिया की तैयारी कर रहे थे। उसे रोककर उन्होंने पंच-लकड़ी के नेम के लिए चंदन की पांच लकड़ियां मेरे हाथों में थमाई और मंत्र पढ़ते हुए एक-एक लकड़ी मां की धू-धू करती चिता की लपटों में डालने का संकेत किया। मुझे उनके मंत्र सुनाई नहीं दे रहे थे। मैं तो उपलों और लकड़ी की ऊंची लपटों के बीच मां का अकूत शांति और प्रेम से भरा मुँह देखना चाह रहा था। चाह रहा था कि कम से कम उन लपटों के बीच से मां की आंखों में ही मैं पड़ जाऊं, ताकि मेरे आने का संतोष लेकर वे जाएं।
एक बार तो ऐसे लगा जैसे मां उन लाल पीली लपटों के रूप में, बांहें पसारे मुझे छाती से लगाने लपक रही है। सम्मोहित सा मैं भी आगे बढ़ा कि पास खड़े भाई ने मुझे पकड़कर कहा -"संभालो अपने को। यहां लपट और धुंआ में तुम्हारी तबियत और बिगड़ जाएगी। वहां चम्पे के नीचे बेंच पर बैठो।"
उन्होंने एक भतीजे को इशारा किया और भतीजे ने मुझे सम्हालकर चम्पे के नीचे बेंच पर बैठा दिया। चम्पे के नीचे शव-यात्रियों के लिए पानी की व्यवस्था थी। भतीजे ने मुझे पानी भी पिलाया, जिसकी मुझे सख़्त ज़रूरत थी। पानी पीते हुए मैंने देखा कि बसन्त में चम्पे का पेड़ श्वेत-पीताभ फूलों से भरा हुआ है। श्मशान की चंपा के नीचे मुझे स्वास्थ्य, शीतलता और सुगंध मिली।
कपाल-क्रिया के बाद शोकांजली दी जाने लगी। दो मिनट का मौन रखा गया।
अब मैंने स्वीकार कर लिया कि जिन आंखों ने मुझे दुनिया दिखाई, अपनी गोद में लेकर जिसने मेरी बेहोश आंखें खोलीं, वे आंखें अब नहीं रहीं।
मैंने भी आंखें बंद कर ली और मौन के बहाने मन ही मन मां से बातें करने लगा-
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे!
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।
"मां, जीवन-जीने की विधि के अज्ञान से, धन के अभाव से, आलस्य या उत्साहहीनता के कारण, समस्त अशक्तताओं (असमर्थताओं) में घिरकर, मैं तुम्हारे चरणों, आचरणों और सान्निध्य से रहित हो गया। अतः सबका उद्धार करनेवाली हे कल्याणी मां! कालजनित कार्य-कारणों से हुई इन सभी त्रुटियों को क्षमा कर दो। मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम कर दोगी क्योंकि पुत्र, कपूत हो सकते हैं, पर मां कभी कुमाता नहीं होती।
@डॉ. रा.रामकुमार वेणु,
१ फरवरी २६, माघ पूर्णिमा,
(रविदास जयंती, मां का परिनिर्वाण)
संकेत : श्मशान चंपा=श्मशान वैराग्य

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