बीस दोहे
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जल, जंगल, भू नष्ट।
भारत-मां निज कोख का, स्वयं समझती कष्ट।।
1.१२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०९.३१
बनी हड़प्पा साधना, द्वंद्व, विभाजन लक्ष्य।
वर्तमान को भूनकर, खाना प्रियतम-भक्ष्य।।
2. १२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०८.१६.
सम-मत, सम-रुचि, दृष्टि-सम, सह-जीवन, सम-रूप।
कोलाहल में ढूंढ मत, ठंडी छाया धूप।।
3. १२.०२.२६, गुरुवार, प्रातः ०९.००.
०
अध्ययन-चिंतन-मनन बहु, अतिशय कम अभिव्यक्ति।,
शब्द-चयन, सीमित कथन, मत की अन्तर्शक्ति।।
4. ११.०२.२६, बुधवार, प्रातः ०८.३०.
०
दो पद में ही नापिए, धरा गगन परिमाप।
धरकर इनको शीश पर, मुग्ध रहें चुपचाप।।
5. ११.०२.२६, बुधवार, प्रातः ०८.१०.
०
'कटुक क्रोंच, कुचला, कनक, केर, किमाच, कनेर।'
कोदो, कुटकी से सदा, इनको रहता वैर।।
6. १०.०२.२६, सोमवार, अपरान्ह १२.१०.
०
वक्ष करें दृढ़तर सदा, दुर्दिन से कर प्रेम।
सूर्य-नमन साष्टांग कर, यही योग यह क्षेम।।
7. १०.०२.२६, सोमवार, अपरान्ह १२.१०.
०
अगर अंधेरा बढ़ रहा, चलो लिए कंदील।
नहीं मनोबल कम करो, मन को दो मत ढील।।
8. ०९.०२.२६, सोमवार, अपरान्ह १२.१०.
०
डर बस डर का नाम है, डर से डरना व्यर्थ।
निडर अभय निर्भय रहे, सुस्थिर सदा समर्थ।।
9. ०९.०२.२६, सोमवार, प्रातः ०९.३०.
०
पड़ा प्रेम निष्ठुर गले, नित्य बढ़ाता मोह।
जितना आहत हो रहा, मन का बढ़े उछोह*।।
10. ०७.०२.२६, शनिवार, प्रातः ११.५५.
(*उछोह = उत्साह)
०
प्रेम बहुत, भय भी बहुत, निर्दय है संसार।
जंगल में मन लग गया, फिरते बांह पसार।।
11. ०७.०२.२६, शनिवार, प्रातः ११.२५.
०
कितना विष कटु कंटकी, भरे कनक-घट कूट।
'कर विध्वंस विनास जा!', भाग्य दे रहा छूट।।
12. ०७.०२.२६, शनिवार, प्रातः ६.३०.
०
भव्य भवन में भेड़िए, भौंक रहे दिनमान।
कंटिल केर करील कटु, यह कैसा उद्यान।।
13. ०७.०२.२६, शनिवार, प्रातः ६.३५.
०
जाग रहा है कौन यह, लिए कुल्हाड़ी हाथ।
श्याल श्वान शापित समय, अंधियारा है साथ।
14. ®०७.०२.२६, ६. ४३ प्रातः
{श्याल:// संस्कृत : संज्ञा, पुल्लिंग, अर्थ : शृगाल, गीदड़, सियार,पत्नी का भाई, साला}
०
रंग किसी के हाथ हैं, हाथ किसी के कीच।
जिसके अंदर जो भरा, बाहर रहा उलीच।।
15. ०५.२.२६/७.५०, गुरुवार, प्रातः
०
-कर्कट; -विष; विद्वेष है-, सर्व-मैत्री सापेक्ष।
राष्ट्र-शांति के हित बनो, जाति, धर्म-निरपेक्ष।।
16. ४.२.२६, १२.२०,
०
माँ के आँसू पोंछना, सर्वोत्तम पुरुषार्थ।
नहीं लक्षणा, व्यंजना, सरल-उक्ति अभिधार्थ।।
17. १ फरवरी २६, माघ पूर्णिमा, (रविदास जयंती, मां की पुण्यतिथि)
०
उड़ती चिड़िया के गिने, सुबह रोज़ ही पंख।
कहीं बांसुरी बज रही, कहीं बज रहे शंख।।
18. ३१.०१.२६, चित्रकथा।
०
अवसर पा डसते सदा, विषधर-व्याल कराल।
अनुभव कहता उम्र का, बच्चे सांप न पाल।।
19 ३०.०१.२६, चित्रकथा।
०
परजीवी बनकर जिएं, पिस्सू और पठार।
इससे बेहतर केंचुए, जीते ख़ुद-मुख़तार।।
20. ३०.०१.२६, ०५.५५.प्रातः
(पठार : फीत कृमि।(tap worm)/ख़ुद-मुख़तार : आत्म-निर्भर
००
@ डॉ. रामार्य रामकुमार वेणु

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