गर्मी का झोल
प्रातः की ठंडक में गर्मी का झोल।
कौन रहा चंदन में अंगारे घोल।
कौन रहा चंदन में अंगारे घोल।
पंगु लगें वातायन, खिड़की बीमार।
मूक हुए हर घर के, आपद में द्वार।
अंधे बहरे हैं अब, बैठक के बोल। कौन रहा...
पर कुतरे पंखी से, पंखे लाचार।
शायद हवा को है, लकुवे की मार।
डालों से झौंके भी, कुछ दिन से गोल। कौन रहा...
शर्बत के कतरे तक, कतराते आज।
बंद हुए पानी सा, प्यास का समाज।
बंदी से बंधे पड़े, पनघट में डोल। कौन रहा....
उमड़ घुमड़ बादल की, काग़ज़ी पुलाव।
बिजली के बिगड़े हैं, सकल हाव भाव।
बारिश के कोई दो, हाथ पांव खोल।
एक बूंद पानी अब, लगता अनमोल।
@रारा वेणु, १७.०५.२६, रविवार, प्रातः 5 बजे, नयागांव।

Comments
एक एक शब्द इसका खोल रहा पोल, बोल गर्मी बोल गर्मी बोल गर्मी बोल।
आतो से जातों से वसुल रही टोल,
बोल गर्मी बोल गर्मी बोल गर्मी बोल।
कुंजकिशोर विरुरकार
17-5-26.