अमलतास की स्वर्णिम फुहारें
आग्नेय नगर, नवेगांव, परसवाड़ा-बालाघाट
आग्नेय-नगर (ओह-रम सिटी), जहां मैं रहता हूं, उसके चारों ओर घूम लो तो लगभग दो किलोमीटर हो जाते है। इस के जितने बन पड़ें, उतने फेरे ले लो और दो का पहाड़ा पढ़ लो तो कुल किलोमीटर निकल आते हैं। दो किलोमीटर यानी लगभग ढाई हज़ार चरण-चाप। शक्कर के और बेतहासा मोटापा के मरीज़ दस हज़ार चरण-चाप चलते हैं। यानी कॉलोनी के पांच चक्कर । मैं किसी के चक्कर नहीं लगाता। स्वस्थ रहने के लिए दो चार किलोमीटर ठीक हैं। उतना मैं चल लेता हूं। हालांकि बोझ-बाहुल्य होने कारण ख़ैर ख़्वाह मतदाता और चिकित्सक कहते हैं कि दस हज़ार किलोमीटर चला करो। मैं नहीं मानता। कोई आया है तो किसी उम्मीद से ही आया होगा, क्यों बेकार भगाना?
बहरहाल, मैं घूमता हूं। सीधा सीधा नहीं घूमता, 'फ़िगर ऑफ एइट' यानी अंग्रेजी के आठ की आकृति में घूमता हूं। पूरा आग्नेय नगर चार भागों में बंटा हुआ है। इस हिसाब से इसमें पांच आड़े रास्ते हुए और दो खड़े। दोनों खड़े रास्तों से ही सभी पांचों रास्ते जुड़े हुए हैं। प्रवेश द्वार की तरफ़ जो आड़ा रास्ता है, उससे दो जुड़ी हुई सींग जैसे रास्ते निकलकर उस राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ जाते हैं जो आगे चलकर बाइस तेईस किलोमीटर बाद, महाराष्ट्र का हो जाता है।
'ओह-रम' सिटी (आग्नेय नगर) के बीचों बीच कॉलोनी का बड़ा बगीचा है। पांचों रास्तों को दो पालियों में चार-अष्टाकृत आवृत्तियों से बांधकर मैं एक मध्यांतर लेता हूँ। चार खंडों में बंटे बगीचे के दो हिस्सों में कुछ कांक्रीट की बेंचे हैं। जिस पर मन करता है, बैठ जाता हूं और लगभग प्राणायाम करता हुआ, कमाई हुई ऊर्जा, उद्जन और उमंग को तहें लगाकर सँजोता हूँ। मन उत्साह भरे विचारों के साथ क्रीड़ा करने लगता है।
आज भी वैसा ही हुआ। नहीं, नहीं, ठीक वैसा ही नहीं, हमेशा की तरह कुछ नया। भूगोल वही, सड़कें वही, बगीचा वही, वनस्पतियां वहीं, बेंचेस वही, मगर अनुभूति नई, विचार नए।
यानी आज वैसा हुआ जैसा पहले नहीं हुआ।
'पुरानी अमराई' या अनेक प्रजातियों से सम्पन्न 'आम-बाग़' को उजाड़कर बनाई गई कॉलोनी के इस पंद्रह वर्षीय बगीचे में कुछ ऐसा दिख गया जो पहले छूट गया था।
कॉलोनी के उत्तरी-हिस्से में ऊगे भिन्न भिन्न आमों के अनेक उत्तरीय डालता-उतारता मैं बगीचे के आग्नेय कोण पर बनी धनुषाकार बेंच पर बैठ गया। मैंने देखा कि बेंचके आसपास और मेरे पांव के नीचे पीली पंखुड़ियां बिछी हुई थीं।
किस पर हुई है ये पुष्प-वृष्टि? प्रातः भ्रमण में कॉलोनी की गलियों में घूमनेवालों में से मेरे सिवा कोई और बगीचे में नहीं घुसता। किसी न किसी गली में उनके घर होते हैं, वे घर चले जाते हैं। मैं प्रकृति का साथ और हाथ छोड़कर इतनी जल्दी घर नहीं लौटता। कुछ देर भरी भरी प्रकृति के बीच बिताकर फिर घर लौटता हूं। घर में भी एकदम नहीं घुस जाता। आंगन के मुखमण्डप (पोर्च) या ओलती में बैठकर अख़बार पढ़ता हूं, चाय पीता हूं और फिर घर में घुसता हूं।
क्या इसलिए मेरे स्वागतं में ये पुष्पवृष्टि हुई है? ये पुष्प पांवड़े बिछे हैं? इस बचकाने विचार से ध्यान हटाकर, पैरों के नीचे पीली पंखुड़ियों के पांवड़ों से नज़र उठाकर मैंने आसपास सर घुमाकर उस उदार वृक्ष को देखना चाहा जिसने इस हिस्से पर फूलों की बारिश की थी। आग्नेय कोण पर पीले फूलों से भरे और झूमते हुए वृक्ष पर नज़र पड़ते ही मैं भौचक्का होकर आंखें फाड़े देखता रह गया।
'अरे, यह तो अमलतास है। मेरे दिमाग़ में बरसों से गूंजता एक नाम। मेरे प्रिय लेखक हजारी जी के विश्वभारती का साथी, शांति निकेतन का स्वर्णाभ उपहार! यह यहां कैसे? यहां न रवींद्रनाथ टैगोर हैं, न हजारीप्रसाद द्विवेदी। फिर तुम मंगलाप्रसाद पारितोषक किसे देने आ गए? आमों के बगीचे को उजाड़कर पत्थर के नगर की उधड़ी हुई सड़कों पर चलते हुए तुम किसके लिए चले आये? बिना मां बाप की आवारा-लावारिस संतानों जैसी इस चिथड़े चिथड़े सड़कों वाली बस्ती में तुम्हारी आवभगत कौन करेगा? मेरे तीस पैंतीस वर्ष पहले बिछड़े मित्र! कहीं तुम मुझसे ही मिलने तो नहीं आ गए?
किंतु प्रिय स्वर्णाभ अमलतास! तुम्हें अचानक देखकर तीस पैंतीस साल पुराने मुरझाए दिन हरे हो गए। पीले को देखकर हरा होना नयापन नहीं है क्या? नई अनुभूति, नया मुहावरा नहीं है क्या? पिछले सात अप्रेल सात बैसाख मैंने इस कॉलोनी में गुज़ारे हैं, पर तुम तो पहली बार दिखे? क्या तुम अभी अभी इस बगीचे में आये हो? क्या तुम मेरे पैंतीस वर्ष पुराने मित्र की संतान हो? कितनी उम्र है तुम्हारी? कितने वर्ष में फूल जाता है अमलतास? अनुभवी उद्यान या वनस्पति विशेषज्ञों के अनुसार तो अमलतास अंकुरण के तीन से पांच साल में फूलने लगता है, फलने भी। परवरिश और खानपान पर निर्भर है। कभी कभी तो अच्छी ज़मीन नहीं मिलने पर अमलतास को फूलने में दस साल तक लग जाते हैं। तुम्हें देखकर तुम्हारी उम्र का पता लगाना ज़रा मुश्किल लग रहा है। अभी किशोर लग रहे हो। तो क्या इस बगीचे में तीन चार साल ही तुम्हें हुए हैं। तब ठीक है। जब तुम पहली बार फूले तभी मेरी नज़र पड़ी। पहला प्रफुल्लन, पहली नज़र।
तुम शरमाये तो नहीं? लड़की हो या लड़का? 'कितना बड़ा या बड़ी हो गया/गयी' कहते ही संकोच में पड़ते तो हैं।
पर तुम लड़की नहीं हो सकते। वृक्ष, पेड़, दरख़्त या शज़र लड़की नहीं होते, लड़का होते हैं। चाहे लड़की को कितने ही भायें, इमली या अमिया, होतीं तो वे झाड़ पर ही हैं। झाड़ भी पुल्लिंग है। गाछ यानी पेड़ के जितने भी पर्यायवाची हैं, तरु, विटप, द्रुम कि रूख (रूखा), सब पुल्लिंग यानी लड़के। लड़कियां हैं बेल या बेला, लता, वल्ली। लाड़ में इन्हें ही पुकारो तो यही हो जाती हैं- बेलड़ी, लतिका, वल्लरी।
पर प्रकृति भी अज़ीब है। बेलाएं श्रृंगार के फूलों तक सीमित है, मगर सारे रसीले, चटखारे फल देने की जवाबदारी वृक्षों की है। रसाल आम को तो रसराज का सम्मान प्राप्त है।
वेणियों वाले अमलतास में भी गूदेदार लंबे, गोल, बंसेड़ी (एक फुटिया बांसुरी)जैसे फल होते हैं। इसकी सुंदरता को, रसिकों की तरह हाथों में वेणियों जैसे पुष्पगुच्छ लटकाए खड़े, इस विटप को देखकर, अगर किसी का मारे जलन के पेट ख़राब हो जाये, तो इसके इसके रूल-आकृत लंबे काले काफिया फलों का गूदा इलाज़ कर देता है। तभी तो इसे आयुर्वेद आरुग्वध या व्याधिघात ( दोनों का अर्थ रोगनाशक) कहता है। मेरे प्रिय आरुग्वध! तुम्हें कैसे पता चला कि मुझे संजीविनी की ज़रूरत है, जो तुम चले आये? बहुत बहुत हार्दिक आभार मित्र! क्या देकर तुम्हारा स्वागत करूं? इस सार्वजनिक स्थल में दौड़कर तुम्हारा आलिंगन भी तो नहीं कर सकता। इस नगर के लोग वैसे ही बड़े वैसे हैं, जाने कैसे कैसे लांछन लगाते फिरें। मेरा भाव भरा मौन अभिनंदन स्वीकार करो।
संवेदनशील कल्पनाजीवी कवियों को इस स्वर्णिम-निर्झर (गोल्डन शावर) अमलतास की सुंदरता से अतीव अंतः-स्फुरण होता है। कुछ को तो इसके नाम से ही कुछ कुछ होने लगता है। आज से तीस पैंतीस साल पहले मुझे भी इसके केवल नाम से ही चटका लगा था। तब मैंने इसका नाम मात्र पढ़ा था। देखा नहीं था। लेकिन इसके नाम का इतना असर था कि मेरे एक गीत में वह अनायास उतर आया। गीत का स्थायी है-
विषधर ही विषधर हैं, अब अपने आसपास।
अंतिम अंतरा में अमलतास इस तरह उतरा-
शब्दों के थिगड़ों से सज्जित विरुदावली।
नागफनी अंतस हैं, चेहरे हैं अमलतास।।
आज जब अकस्मात को पहली बार साक्षात देखा तो अप्रयास यह गीत याद आ गया। फिर तो सारा कच्चा चिट्ठा ही निकल आया।
यानी कि अमलतास को गोल्डन शावर (स्वर्णिम फुहार, कैसिया फिस्टुला, कैसिया नालव्रण, कैसिया अब्बरे विएटा, कैसिया फरुगीना) के नाम से भी जाना जाता है। चमकीले पीले फूलों के मनमोहक गुच्छों वाला मध्यम आकार का यह पर्णपाती वृक्ष अप्रैल से जून तक खिलता है।
नागरिकता की दृष्टि से यह भारतीय हो सकता है। अंग्रेजी में इसे पुडिंग-पाइप ट्री या गोल्डन शावर, इंडियन लेबर्नम कहते हैं। इंडियन लेबर्नम अर्थात भारतीय अमलतास। नाम से ही लग रहा है कि यह भारतीय है। लेबर्नम कहने में स्वतंत्रता और उदारता की ख़ुशबू उड़ती है। भारत में इस स्वतंत्रता और उदारता को बड़ा सम्मान प्राप्त है। स्वतंत्रता संग्राम में तो यह मंत्र की तरह उच्चारा गया है- 'स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।'
बंगाली इसीलिए इसे सोनालु कहते हैं। केरल का तो यह आधिकारिक राज्य-पुष्प है और थाईलैंड का राष्ट्रीय-वृक्ष सह फूल भी है। केरल के विशु-उत्सव के दौरान इसका विशेष मान सम्मान होता है।
हो भी क्यों नहीं। यह पादप लगाने वालों को वर्षों नहीं तरसाता। रोपण के तीन से पांच साल के बाद फूल देने लगता है। ज़ाहिर है, जो फूलेगा, वह फलेगा भी। मेरे सच्चे धन्वंतरी, तुम व्याधि हरने के लिए कितने अनुशासन प्रिय हो कि छोटे छोटे रूल लेकर फलते हो। सचमुच आरुग्वध, रुग्णता में कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं।
इसलिए मेरे व्याधिहर, तुम्हें देखकर मन आनंदित हो जाता है?
हंस रहे हो। बताओ क्या बात है?
देखो धूप चढ़ रही है। इस बार बैशाख की धूप बहुत मारक है। पारा रोज़ एक एक डिग्री बढ़ रहा है। इसके पहले कि मुझे लू लग जाए, बता दो कि क्या बात है?
क्या कहा?
अच्छा तो ये बात है जिससे तुम्हें देखकर ख़ुश हो जाते हैं लोग! है भी खुशी की बात। तुम्हारे फूलने के पैंतालीस दिनों के बाद झूम के बरसात होती है। भीषण गर्मी के बाद बारिश की फुहारें किसे आनंदित नहीं करेंगी। तुम्हारा नाम स्वर्णिम फुहार इसलिए पड़ा है कि तुम वर्षा की फुहारों के अग्रदूत हो। स्वागत है अग्रदूत, चलो अंजुरी में भरकर घर ले चलूं।
(इति तिथि: २५.०४.२६)

Comments
के के विरुरकर