Sunday, December 27, 2009

नव वर्ष: किचन के संदर्भ में

किचन में पर्ववत् सन्नाटा है।
मैं चाहता हूं नए वर्ष की सरगर्मी और उत्साह मेरे किचन में भी दिखाई दे।
मैं बार बार किचन में जाता हूं और मिट्टी तेल के पीपे को उलटता पलटता हूं और निराश हो जाता हूं।
मैं जादूगर आनंद या पी सी सरकार होता तो ऐसी निराशा मुझे नहीं होती। मैं एक बार मिट्टी तेल के खाली पीपे को हिलाता और उसे किचन में रखकर बेडरूम में चला जाता। बिस्तर पर पालथी मारकर बीड़ी के चार पांच कश लेता और बुझाकर उसे मिट्टी के एक कुल्हड़ में डाल देता । फिर बड़े इत्मीनान से किचन में घुसता । संजीवकुमार की तरह बांह हिलाकर कमीज की आस्तीनें बिना हाथ लगाए ऊपर सरकाता और झुककर पीपा उठाता । अब पीपा मिट्टी तेल से भरा होता। तालियों की गड़गड़ाहट से किचन भर जाता । ज्यादातर ये तालियां किचन में उपस्थित खाली डिब्बे और पतीलियां , अपने जलने का इंतजार करता स्टोव और केवल बीड़ी पीने के लिए इस्तेमाल की जा रही माचिस की डिबिया ही बजा रही होतीं। किचन में जो मुट्ठी भर भरी भरी सी चीजें होतीं वे अपने आभिजात्य के गर्व में केवल मुंह बनाती या दिखावे के लिए मुस्कुराती। मगर यह तो एक संभावित असंभव कल्पना है। वास्तविकता यह है कि किचन में पूर्ववत् सन्नाटा है।
मैंने फिर सिलिण्डर के नाब को घुमाया और चूल्हे के बर्नर को आन कर लाइटर किटकिटाया। बर्नर ने बिजली विभाग या राजस्व विभाग या किसी भी विभाग के क्लर्क की तरह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। मैंने फिर सिलिण्डर को हिलाया । फिर वही क्रियाएं दोहराई। इस बार भी कोई जादू नहीं हुआ। किचन तालियों की गड़गड़ाहट से नहीं भरा। मैं आदतन निराश होकर अपने बेडरूम कम स्टडी कम मीटिंग एंड ईटिंग रूम में लौट आया ।
डिप्रेशन और इन्फीरियटी में इस बार मैंने किसी दोस्त की छूटी हुई सिगरेट की डिबिया उठाई और उसमंे संयोग से उपलब्ध सिगरेट निकाली और गरीबों की प्रतिनिधि माचिस से ही जला ली। दो तीन कश लेने के बाद भी मुझे किचन मायूस और असहाय दिखाई दिया।
मैंने ध्यान बंटाने के लिए फिर टेबिल की मदद ली । टेबिल पर नए वर्ष की ग्रीटिंग तह की हुई रखीं हैं। बस पूरे कमरे में केवल ग्रीटिंग हैं जो करीने से रखीे हैं। बाकी सारी चीजें आम भारतीय नागरिकों की तरह बदहवास मायूस और उखड़ी हुई और अपने खास तेवर के साथ बिखरी हुई बेपरवाह सी पड़ी हुई हैं। मैं उन सब को देखकर आदतन शर्मिंदा हो जाता हूं।
नया वर्ष मेरे कमरे में नहीं आया है। किचन ,कमरे और मुझ कमबख्त में वही पुराने वर्ष की उदासी , खामोशी और बासीपन है।
दर असल सब यथावत है ,सनातन धर्म की तरह। वही रोज़मर्रा की तरह कभी यह नहीं , कभी वह नहीं का सिलसिला। उम्मीदों में जीता हुआ किचन। बदले जाने की कल्पना से अछूता दरवाजे पर लटका हुआ शर्मिंदा पर्दा और तिथियों से बेपरवाह मैं। कैलेण्डर मैंने कभी नहीं खरीदा और मेरी रिस्टवाच में डेट नहीं है। समय मैं दूसरों से पूछता हूं क्योंकि घड़ी के बिगड़ने के बाद मैंने उसे डिस्टर्ब नहीं किया। जैसे बिगड़ने के बाद हम अपने अधिकारी को डिस्टर्ब नहीं करते।
मैं इतवार को भी आफिस जाता हूं और चैकीदार के साथ बीड़ी और चाय पीकर लौट आता हूं। खाना मैं क्यों ,कैसे ,कब ,कहां ,क्या और किसलिए खाता हूं ,मुझे कुछ पता नहीं। तनख्वाह कभी एक तारीख को नहीं मिली। डीडीओ अक्सर एक तारीख को हेडक्वार्टर चला जाता है या बीमार पड़ जाता है। पैसा उसकी जेब से नहीं जाता मगर दस्तखत करने के एकमात्र सुख को वह लम्बा खींचकर नीरस ज़िदगी में रस का संचार करता है।उसके हाथ में हस्ताक्षर एक हेंडग्रेनेड की तरह है जिसे वह अक्सर चमकाता रहता है -‘‘खबरदार सालों ! मुझसे डरो । मेरे हाथ में तुम्हें मजा चखाने के लिए हस्ताक्षर है।’’
हम कुछ नहीं कहते। वह उसका मनोरंजन है। वह प्रशासन का आदमी है। उसके खिलाफ शिकायत करनेपर कोई सुनवाई नहीं होती। इसलिए हम भागयवादी हो गए हैं। चमत्कार का इंतजार करनेवाले नामुराद लोग।
मैंने फिर ग्रीटिंग उठा ली। बहुतों की जिन्दगी ऐसे ही कट रही है। खाली बैठे हैं और एक ही चीज को उठा रहे हैं और रख रहे है।
मैंने ग्रीटिंग उठाई तो मुझे उसमें धड़कन सुनाई दी। ग्रीटिंग को देखता हूं तो लगता है बाकी दुनिया में अभी सांस बाकी है। देखो कितनी बढ़िया ग्रीटिंग इन्होंने भेजी है। कैसे बढ़िया बढिया फूल , कैसे बढ़िया चेहरे , हंसमुंख और खाते पीते से। सोचता हूं ..इनके किचन में मिट्टी तेल तो जरूर होगा । शक्कर और बाकी चीजें भी करीने से रखीं होंगी। इस समय वे चाय पी रहे होंगे।
मैं ग्रीटिंग को देखता हूं और चोर निगाहों से अपने किचन को । मैं धीरे से हाथ बढ़ाकर ग्रीटिंग को छूता हूं और बड़ी उम्मीद के साथ टेबिल की दूसरी तरफ़ पड़े राशन कार्ड को उठाता हूं। मगर उस कमबख्त में नए वर्ष की ग्रीटिंग की तरह हसीन धड़कनें नहीं मिलती। हमेशा बंद रहनेवाली राशन-दूकान की तरह उसके अस्तित्व पर खालीपन पसरा हुआ है।
मैं घबराकर राशन कार्ड को रखकर फिर ग्रीटिंग-कार्ड उठा लेता हूं।
देखता हूं ,किसी को मेरे कुवांरेपन को छूने में मजा आ रहा है। उसने श्रीदेवी की तस्वीर भेजी है। मैं श्रीदेवी की बड़ी बड़ी आंखों में जाने क्या देखता हूं कि अचानक किचन की तरफ देखने लगता हूं। शायद मुझे उम्मीद थी कि तस्वीर से निकलकर श्रीदेवी किचन संभाल रही है और मेरे लिए सबसे पहले एक कप चाय तैयार कर रही है।
मगर अफसोस वैसा नहीं होता । किचन में पूर्ववत् सन्नाटा है।

// अमृतसंदेश ,रायपुर में धारावाहिक प्रकाशित अपने व्यंग्य स्तंभ 'नीरक्षीर' 12 जनवरी 1989 . से .साभार //

Friday, December 18, 2009

दो पहियों का फ़र्क़

जीवन में दो का बहुत महत्त्व है। दो आंखें , दो कान , दो हाथ , दो पैर , दो फैफड़े, दो किडनियां आदि और इत्यादि। जिन्हें ज्ञान की कमी नहीं हैं किन्तु समय की कमी है ,जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें जीवन के सूत्र नहीं मालूम, ऐसे लोगों को टीवी देखकर सीखना चाहिए। उसमें सीरियल से विज्ञापन आते हैं जो टीवी को जीवन दान देते हैं। और अधिक गंभीरता से सोचें तो बीवी को भी जीवन प्रदान करते हैं। बहुत ज्यादा गंभीरता से सोचा जा सके तो यहां भी देखिए कि दो का ही महत्त्व है। टीवी और बीवी। गृहस्थी को वास्तविक गृहस्थी का स्वरूप देने में इन दो का ही योगदान है। दोनों के बिना गृहस्थी एकाकी है। एकाकी का अर्थ ही है कि जो दो नहीं हैं।
बात को आगे बढ़ाने पर हम देखते हैं कि दो और दो चार होते है। चार का भी बहुत महत्त्व है क्योंकि वह दो का दूना है। किन्तु हे भारतीय दर्शक! आज जो दो है , वह सबसे पहले चार था। मनुष्य जिसका अंश है , वह विष्णु या नारायण चार हाथोंवाला दिखाई देता है। ब्रह्मा के चार मुंह थे। जिसके लिए हम मारामारी करते हैं, वह लक्ष्मी चार हाथोंवाली है। वैज्ञानिक बताते हैं कि आदमी भी पहले चार पैरोंवाला था। पूर्वजों के रूप में बंदर को बाप माना जाता है। देखा जाता है कि बंदर के ही गुण हममें ज्यादा हैं। बात बात पर खी खी करना, इस डाल से उस डाल पर बिना मतलब के या किसी खास मतलब के उछलकूद करना ,गुलाटी मारना , चाहे बूढ़े ही क्यों न हो जाएं। बूढे़ शब्द से याद आता है कि दरअसल बात मुझे बूढ़े से ही शुरू करनी थी। परन्तु हे कांच-प्रेमियों! मैं क्या करूं ? वहां भी झगड़ा दो और चार का ही है। उर्दू में चूंकि एक मुहावरा है ‘दो चार होना’ और ‘आंखें चार करना’। मैं दावत देता हूं कि आइये ज़रा उस बूढ़े से हम दो-चार हो लें। आंखें चार करने को कौन कहता है ?
मित्रों! आपने चाहे जिस उम्मीद या मजबूरी में टीवी देखी हो , आपने देखा होगा कि एक कार लाल लाइट जलने से सिगनल के इस पार खड़ी है। सिगनल भी मूलतः दो रंग के होते हैं - लाल और हरा। लाल रंग इस समय है और उसके कारण बहती हुई भीड़ खड़ी हो गई। कार उसी भीड़ का हिस्सा है। उसके बग़ल में आकर एक साइकिल खड़ी हो जाती है। साइकिल पर एक बच्चा है। यह आंकड़ा भी दो का बन गया। दो यानी द्वंद्व। बूढ़ा जिस कार में बैठा है उसके चके हैं चार। बूढे ने चार चीजें ऊपरी तौर पर पहन रखी हैं। सूट , बूट , कमीज और टाई। जो लड़का साइकिल पर है उसके पास दो का आंकड़ा है। साईकिल के दो पहिए , पेंट और शर्ट , जूते और मौजे , दो बांह वाली कमीज की दो बाहें। दोनों वाहें आधी मुड़ी हुई है। एक झलक में इतना ही दिखाई देता है। बूढे की नजर कार के बगल में आकर खड़े लड़के पर पड़ती है तो वह लाल पीला हो जाता है। हिकारत से कहता है-‘‘ आ जाते हैं कहां कहां से।’’ यह हिकारत का सिगनल है जिसमें बुजुर्गों ने दो रंग देखे लाल और पीला।कहते हैं , लाल और हरे को ढंग से मिलाने पर जो रंग बनता है वह पीला होता है। बच्चा उन दोनों रंगों से लाल रंग चुराकर उसे आत्मविश्वास से हरा कर लेता है। वह क्या करता है कि दानों चढ़ी हुई बांहों को तो पहले नीचे करता है। बाहों को चढ़ाना आपने सुना होगा ,यह उसका विलोम है। फिर वह जेब से मोड़कर रखी हुई टाई निकालता है। उसे कमीज़ की गरदन पर टाइट करता है और ठाठ से कहता है:‘‘ सिर्फ दो पहियों का फर्क़ है अंकल ! आ जाइन्गे।’’ इसके साथ ही हरी लाइट जलती है और पैडिल पर पैर मारकर बच्चाशान से चला जाता है। अच्छा लगता है। बांहें उतारकर लोगों को
अपनी शान बघारते तो सैकड़ों बार देखा है, बांह उतारकर शान जताते देखना पहली बार हुआ है। वव्वाह! अरे कांच के पर्दे! कभी कभी ही करते हो मगर तुम कमाल जैसा कुछ करते हो।
मगर दो सवाल हैं , जो खड़े हो गए हैं। जिसके जवाब में तुम ‘सवाल ही नहीं उठता’ नहीं कह सकते। क्योंकि ये तो खड़े हो ही गये। पहला , दो चक्के आएंगे कहां से ? दूसरा , आ ही गये तो उन्हें साईकिल में कैसे लगाया जाएगा ? जोश-जोश में क्या तुमने कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास नहीं फेंक दिया ?
मेरे अनुभव में सीधे रास्ते और केवल आत्मविश्वास के बल पर ऐसा तो आज तक घटित नहीं हुआ। जिस चीज़ का यह विज्ञापन है वह सफाई से ताल्लुक रखनेवाला प्रडक्ट है। इसीलिए इतनी सफाई से दो को वह चार बना गया। फिर तो उसे पांच भी कर देना था। मैंने यह गणित भी कांच के रंगीन पर्दे पर घटित होते देखा है। दो और दो पांच। इस नाम से बनी फिल्म में दो हीरो दो हीरोइन थे। पांचवा एक बच्चा था जिसके आसपास कहानी हास्य बुनती रहती है।
यह बच्चा भी हास्य कर रहा है। आजकल हास्य प्रधान विज्ञापन बनाकर दर्शकों का खूब मनोरंजन किया जा रहा है। कीड़े मारने की दवा में दो-चार कीड़े जरूर छोड़ दिए जाते हैं। टेन परसेन्ट का बिजनेस है। अगर जनता को हण्ड्रेड परसेन्ट फायदा हो जाए तो बिजनेस ढप्प हो जाए। बीपी की दवा रोज लेनी पड़ती है। अस्थमा का मरीज रोज इन्हेलर लेता है।
तो मान लेते हैं कि डिटरर्जेन्ट वाले जल्दी दो से चार चके बना लेंगे। डी कंपनी के नाम से जो मशहूर है वह शायद यही डिटर्जेन्ट कंपनी का शार्ट फार्म होगा, जिसमें हाथ हिलाते ही पैसा बरसने लगता है। डिटर्जेन्ट का उपयोग करने वाले तो मलते रहते हैं ..डिटर्जैन्ट मिलाते रहतें हैं, हाथ मलते रहते हैं। धन्धा होता ही ऐसा है। दो के चार न किए तो फायदा ही क्या। वह बच्चा डिटरजेन्ट कम्पनी का होगा। आज अभी धन्धा शुरू किया है। बस कार आने में कितना समय लगता है। इधर जनता बैठी है तैयार कि तुमने विज्ञापन दिखाया और उसने प्रडक्ट खरीदा। हो गए मालामाल। बढ़िया है , अरे कांच के पर्दे ! बढ़िया है।

Wednesday, December 2, 2009

शिल्पा की शादी और खिसिआया हुआ मैं

सुबह रोज की तरह से ज्यादा खराब है। शाल लपेटकर मैं कुहरे में छीजती नुक्कडिया छाबड़ी में फुल चाय के लम्बे गहरे घूंट भर रहा हूं ताकि छाती सिंक जाए। समाने एक टेबल पर टीवी रखा है जो ग्राहको को लुभाने का काम कर रहा है। चााय के घूंट भरकर उसे मैं छाती में महसूस करता हूं और दूसरा घूंट भरने के पहले के अंतराल में टीवी देख लेता हूं। टीवी में शिल्पा की शादी का हो हल्ला है।मैं थोड़ी देर बर्दास्त करता हूं लेकिन जल्दी मेरी चाय कड़वी लगने लगती है। छाबड़ी में टूटी हुई बेंच और गंदा टेबल मुझे बेचैन करने लगते हैं। वे शिल्पा की भव्य शादी के साथ मैच नहीं कर रहे। मैं उठकर घर लौट आता हूं। शिल्पा की शादी मेरे जहन में छूटी हुई चाय की तरह चिपकी चली आती है।
ं मुझे समझ नहीं आता कि मौसम इस बुरी तरह खराब है और शिल्पा की शादी हो रही है ? शिल्पा की शादी होने से मौसम खराब है या मौसम खराब है इसलिए शिल्पा शादी कर रही है ,इस बात से मै पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं। शिल्पा की शादी से वैसे भी मेरा कोई लेना देना नहीं है। हां मौसम खराब होने से है। मौसम की खराबी ने मेरा बजट बिगाड़ दिया है। ठंड बुरी तरह बढ़ गई है और बर्फीली सर्दी में नहाने की औपचारिकता पूरी करने के लिए गरम पानी जरूरी है। गरम पानी के लिए मैंने यह फैसला लिया है कि जो लकड़ियां फर्नीचर की टूट फूट और बगीचे की टूटी झाड़ियों से निकली हैं ,उन्हें जला कर पानी गर्म किया जाए। इससे बजट पर बोझ नहीं पड़ेगा। दवा खाने से बेहतर है कि आवश्यकतानुसार गर्म पानी से नहा लेना चाहिए। यह हमारी बजटीय सावधानी है।
बहरहाल मौसम खराब है और पानी गर्म करने के लिए बगीचे में दो चार ईंटें जमाकर इकानामिक कच्चा चूल्हा बना लिया है। इसमें मैं अधगीली लकड़ियां जलाने की कोशिश कर रहा हूं। आधा ढक्कन मिट्टी तेल डालकर आग भड़काने की कोशिश मैंने की। पर व्यर्थ। शिल्पा की तरह आग की एक छरहरी लम्बी सी लपट दिल्ली और पटना हिलाकर गायब हो गई। सीली लकड़ियां धुंधिया रही हैं। मैं बदले मौसम को कोस रहा हूं । न मौसम बदलता न मुझे आग भड़काने की नाकाम कोशिशें करनी होती। मैंने सुना है , नये नये रूप धरकर अवाम को परेशान कारने वाला कोई फयान नामक अरबी तूफ़ान दक्षिण में आया है और उधर उत्तर वालों ने भी नकली बर्फबारी की है जिससे पूरा हिन्दोस्तान आतंकित हो गया है। पीड़ित और परेशान तो खैर हुआ ही। इसी परेशानी के दौरान मुझे आतंकवाद की नई परिभाषा मिली है। मेरा अपना विचार अब यह हो गया है कि आतंकवाद सिर्फ पश्चिम से भारत में नहीं आ रहा है। वह वाममार्ग से भी आ रहा है और दक्षिणवादी इलाकों से भी। कट्टरवाद और फट्टरवाद की फिलासफी मुझ अंगूठाधारी को नहीं आती। मैं यहां जानबूझकर अंगूठाछाप नहीं कह रहा हूं। मुझपर अंगूठा की छाप नहीं है। अंगूठा मेरे पास है और लाइसेंस बनवाने के लिए दाएं और बाएं हाथ के अंगूठे की छाप इलेक्ट्रानिक-अंगूठा-मशीन पर लगाकर मुझे अंगूठाधारी होने का गर्व प्राप्त होता है। ऐसे छोटे-मोटे गर्व हम कभी भी और कहीं भी प्राप्त कर लेते है। जैसे शिल्पा की शादी हो रही है और देश गर्व कर रहा है कि इतनी महंगी शादी हमारे यहां भी हो सकती है। मेरा भारत महान। अभिषेक की शादी भी बहुत ऐश्वर्यशाली शादी थी। वे हीरे जवाहरात से शादी करते हैं। मैं अब तक एक अदद लड़की से शादी को ही शादी समझे हुए था।
खैर जब जागे तभी सवेरा। मुझे भी गर्व है कि शरीर का मांस सूख गया हैं ,कंकाल पर केवल चमड़ी चिपकी हुई है , लेकिन करोड़ों कमाकर लौटी शिल्पा पर करोड़ों कमाने वाला एक उद्योगपति मोहित हुआ है। मैं यह देखकर सोच रहा हूं कि यह शरीर का नहीं आत्मा का विवाह है। हीरे-जवाहरात और बैंक-बैलेंस का विवाह है। पुअर इंडियनंस के आरोपों के खिलाफ़ राजसी विवाह है। चालीस के बाद का यह आध्यात्मिक और व्यावसायिक व्यावहारिक विवाह है। विवाह जैसी पवित्र संस्था के सम्मान की रक्षा के लिए किया जानेवाला सामाजिक समझौता वाला विवाह है। किसी विद्वान ने विवाह को सामाजिक समझौता कहा है। सच कहा है। विवाह के पूर्वान्ह में कोटे की शक्कर की तरह प्रेम और अपरान्ह में रोज-रोज नल की कतार में जैसे-तैसे पानी भरने जैसा समझौता ही विवाह होता है, मैं हजारों मामलों में देख चुका हूं।
लो ,मैं कहां भटक गया। आंख में धुआं न लगे इस लिए मुंह इधर फिराया तो क्या क्या दिमाग में घुंस गया। बात इतनी सी है कि मेरा चूल्हा नहीं जल रहा है। लकड़ियां बेमौसम की बारिस से गीली हो गई और मैं जैसे तैसे मिट्टी तेल डालकर उन्हें सुलगाने की कोशिश कर रहा हूं। धुआं इतनी मात्रा में है कि वह आग को उठने नहीं दे रहा है। बाहुबलियों का जरूरी चीजों पर कब्जा करना और उन्हें दबाए रखना शायद इसी को कहते हैं। अचानक नाक ,आंख और हवा फूंकने के लिए खोले गए मुंह में ढेर सा धुआं घुस जाने से अकबकाकर मैं उठ जाता हूं। सोचता हूं पानी डालकर चूल्हे को पूरा ठंडा कर दूं। एक दिन नहीं नहाए तो कौन सा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मगर फिर सोचता हूं आखिरी कोशिश कर देखूं। कार्यालय से चलते वक्त जो अखबार दबा लाया हूं उन्हें ही जलाता हूं। एक कोने में पड़े अखबार मैं उठा लेता हूं और इस आशा से कच्चे चूल्हे की तरफ बढ़ता हूं कि अब फतह मेरी है।
मैंने जो अखबार हाथ में लिया है वह रंगीन चित्रों से भरा है। लालच मेरा हाथ पकड़ लेता है। मूर्ख! रंगीन चित्रोंवाले अखबार को जला देगा तो खाली समय में क्या देखकर खुश होगा। मैं एक बार फिर पूरे अखबार को ललचाई नजरों से देखता हूं। अखबार मंे सजी धजी ,कीमती जेवरातों से लदी-फदी शिल्पा की तस्वीरें हैं। कमाल है , चूल्हा तो जल नहीं रहा है और मैं सुलग उठा हूं। ये अखबारवाले भी सरकार की तरह हमें जलाने पर तुले हुए हैं। तुलें भी क्यों नहीं । राज्य नामक बिल्डिंग के वे चैथे स्तंभ यानी खंभा जो हैं। सरकार नये ये ख्वाब दिखाकर जलाती है और यह चैथा ख्ंाभा रंगीन चित्र दिखाकर जलाता है। मुझे लगता है शिल्पा के चित्र देखूंगा तो और जलूंगा।डिसीजन मेकिंग में अब मैं देरी नहीं करता और फर्र्र से अखबार के टुकड़े करता हूं। मुझे संतोष होता है कि एक झटके में मैंने भव्यता के तिलिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं। अब मैं माचिस की एक और तीली जलाता हूं और अखबार के टुकड़े को जलाकर चूल्हें में डाल देता हूं। क्या देखता हूं कि सजी-धजी खिलखिलाती ,कीमती जेवरातों से सजी हुई शिल्पा भरभराकर जल रही है। यह मैं देख नहीं पाता। हाथ बढ़ाकर जलती हुई शिल्पा को चूल्हे से निकाल लेना चाहता हूं। मगर बहुत देर हो चुकी है। जैसे अब लड़की वाले मुझे देखकर कहने लगे हैं कि बस अब बहुत देर हो चुकी है। अब हो गया ,इतनी कट गई तो आगे भी काट ले। शादी क्यों करता है? बेकार किसी अच्छी भली लड़की की जिन्दगी बरबाद करने से क्या मिलेगा ?
मैं थूक निगलता हूं। अखबार का टुकड़ा राख हो गया है। सीली लकड़ियां है कि सिर्फ धुंधियाये जा रही हैं। मैं फिर अखबार फाड़ता हूं। इसमें उन लोगों की तस्वीरें दिखाई देती हैं जो मेहमानों के रूप में शाही-शादी में मौजूद थे। मैं अखबार के उस टुकडे को मरोड़कर गुच्छा बना देता हूं। इस गुच्छे में सारे लोग मुड़ तुड़ गए हैं। मरो। क्या जरूरत थी शादी में जाने की। तुम्हारे घर में खाने को नहीं था क्या? क्या कमी थी तुम्हें? अब भुगतो। सुना है शादी में शामिल आमंत्रित और अनामंत्रितों को कीमती उपहार दिए जाने लगे हैं। लो उपहार। जल गए न मेरे चूल्हे में ?
मगर यह टुकड़ा भी राख हो गया। गीली लकड़ियां और ज्यादा धुंधियाती रहीं। मैं खिसियाकर बाकी अखबार को भी नोंच-नोंच कर चिन्दी-चिन्दी कर देता हूं और चूल्हे में झौंक देता हूं। एक प्लास्टिक की बोतल में जो छटाक भर मिट्टी तेल बच गया था उसे भी उड़ेल देता हूं। बड़ी मुश्किल से यह तेल मैंने जुटाया था। राशन कार्ड में दो लीटर मिट्टी तेल कभी कभी मिल जाता है। वर्ना सारा मिट्टी तेल तो पैट्रोल पंपों में समा जाता है। जनता राशन की दूकानों के सामने कतार बना-बनाकर बुढ़ाती रहती है। दुकान खुलती है और राशन दूकानवाला पहले से लिखा हुआ बोर्ड टां्रग देता है। ‘‘शक्कर नहीं है। मिट्टी तेल नहीं है।’’ रहे भी कैसे ? गोदामों से तेल और शक्कर बाजारों में सीधे पहुंच जाती है। हमारे प्रजातंत्र की जनता अब बुढ़िया गई है ,सठिया गयी है। जब जनता जवान थी तब भी लुटी और अब भी बुढ़ापा बर्बाद कर रही है।
मैंने देखा कि आग थोड़ी सी लकड़ी पर चिपकी सी दिख रही है। अब इस थोड़ी सी आग पर ही भरोसा है। मैं उठकर , हथेलियां रगड़ते हुए , मुफ्त में पसरी हुई धूप में चला जाता हूं। धूप ठंडी है मगर मैं हूं कि ताप रहा हूं।
24.11.09

Monday, November 23, 2009

वनस्पतियों का सौदर्यशास्त्र

उर्फ रसिक पुष्पवृक्ष और रस-केन्द्र सुन्दरियां

हमारे आंगन में फूले गुलाब और इठलाते डहलियों की कई प्रजातियां दूर से लोगों को आकर्षित करती रही हैं। पीले डहलिया भ्रमणार्थी रमणियों को विचलित कर देती और वे गुलाब के भ्रम में उन्हें देखने आ जाया करती। हमारे पड़ोस में एक नमकमिर्ची-पूर्णा थी। वह जुबान की काली थी। अगर वह आपके स्वास्थ्य की तारीफ कर दे तो आप बीमार पड़ जाएं। हमारे आंगन और बाड़ी में पत्नी अभिरुचि और प्रेम के कारण लहराते हुए गुलाब ,डहलिया ,सेवंती, गेंदे ,अनार ,अंगूर , चीकू , पालक , मैथी , बड़ी तुअर आदि की वह ‘मुंह में कुछ और दिल में कुछ’ के अंदाज में तारीफ करके उन्हें नज़र लगा चुकी है। उसकी तारीफ़ों से पत्नी को आजकल भय होने लगा है। हमेशा खिली रहनेवाली फुलवारी आजकल उदास हो गई है।
एक दिन पड़ोसन आई और झूठी सहानुभूति जताते हुए बोली:‘‘ अरे तुम्हारे आंगन को क्या हो गया भाभी ?’’ तो भरी बैठी पत्नी ने दुखी स्वर में कहा-‘‘ पता नहीं किस डायन की नजर लग कई पुन्नो ! कुछ दिनों से पनप ही नहीं रही हैं।’’ पड़ोसन समझ गई कि पोल खुल चुकी है। अब पड़ोसन नहीं आती और पत्नी नये सिरे से बगिया की संभाल में लग गई है।
पहले मुझे इस तरह की बातों पर यकीन नहीं होता था और लगता था कि यह सब बोड़मबत्तीसी है। पर उस दिन बच्ची ने कोई फिल्म देखी थी और मुझे बताया था:‘‘ पता है पापा ! जापान या हांगकांग में कहीं पेड़ काटते नहीं ।’’
‘‘गुड वेरी गुड, इकोलाजी के महत्त्व का ज्ञान है उन्हें।’’ मैंने पर्यावरण प्रेम प्रदर्शित करते हुए कहा।
‘‘ आंहां.. नहीं ! दरअसल वे जिस पेड़ के आसपास इकट्ठे होकर उसे बहुत भला बुरा कहते हैं। सुबह तक वह पेड़ अपने-आप सूख जाता है।’’ बच्ची ने कहा।
मैं दंग रह गया। चुप्पी लगी रह गई मुझे। मैं सोच के भूंसे में धंस गया था और सच्चाई की सूई को ढूंढने लग गया था। बच्ची ने चाइल्ड साइकोलाजी कीे अंधी परत को खोलने की पहल की थी। किसी बच्चों की फिल्म से उसने यह संवाद या सूत्र सुना था और बड़ों के द्वारा कमजोर बच्चों को दिए जानेवाले उलाहनों को इस तरह खारिज किया था। वह कहना चाहती थी कि जब पेड़ पौधे गाली दिये जाने से सूख जाते हैं तो बच्चे , जिन्हें ईश्वर ने शायद वनस्पतियों से ज्यादा संवेदनशाील बनाया हैं , उन पर आपके दुव्र्यवहार का कितना बुरा असर होता होगा ? यह आशय है इस सूत्र का।
अभिभावको को बच्चों की परवरिस की तालीम थी इसमें। ‘‘मैंने यथासंभव बच्चों को प्यार से रखा है और उन्हें अपनी बात कहने की आजादी बख्शी है ,इस ‘‘आत्म-आश्वासन’’ के साथ मैं वनस्पतियों की संवेदनशीलता की ओर उन्मुख हो गया था।
वनस्पतियों से बातें करने और वनस्पतियों को सुनाने के कई टोटकों , औषधिविज्ञान में उसके घटित चमत्कारों और विश्वासों की चर्चा मैं कई बार कर चुका हूं। इस बार मैं सुन्दरियों के कमाल को खंगालकर आया हूं।
जिस औरत की ब्याजस्तुति से वनस्पतियां मर जाती हैं ,मैं उस खड़ूस औरत की तरफ से अपना ध्यान खींचकर उन सुन्दरियों की ओर खिंच आया हूं जिन्हें कुछ वनस्पतिमिजाज शायर ‘ फूलों की रानी’ और ‘बहारों की मलिका’ कहा करते हैं। स्त्रियों को हम सहजाकर्षण का केन्द्र कहा करते हैं। दबे छुपे उनके अनिन्द्य सौन्दर्य का ध्यान और रूपपान किया करते हैं। किन्तु यह लम्पटपना नहीं है। लुच्चई भी नहीं है। कुदरत ने हमारे जीवन को सौन्दर्य का वरदान स्त्रियों के रूप में ही दिया है।
क्षमा करें ,यह मैं नहीं कह रहा , हमारे बुजुर्ग कहा करते हैं। आपको याद होगी यह कहावत ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’ यह तो मैंने नहीं कहा। ‘‘यस्य नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’’ यह भी संस्कृत की सुभाषित है। नारियों को सम्मान देने और उनकी देखभाल के कोमल सिद्धांत सैकड़ों हैं। उन्हें प्रकृति ने कोमल बनाया है मगर उनके बिना प्रकृति का गुजारा नहीं है। स्त्रियों की सुरक्षा के लिए पुरुष रूपी स्तम्भ भी हैं। मैंने सुना है स्त्रियां बेलाएं हैं और पुरुष तना है , जिसपर चढ़कर वह आकाश को छूती है। मैंने यह भी सुना है कि प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे एक महिला है। इसलिए ‘भिक्षुक-कवि’ निराला वर मांगते हैं, ‘वर दे वीणावादिनी वरदे!’
प्रकृति की फुलवारी भी स्त्रियों से ही खिली खिली है। संस्कृत के कवि राजशेखर अपनी कृति काव्यमीमांसा के तेरहवें अध्याय में प्रकृति के पुष्पवति होने के लिए अनेक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं-
कुरबक कुचाघात क्र्रीड़ारसेन वियुज्यसे
बकुलविटपिन् स्मर्तव्यं ते मुखासव सेचनम्
चरणघटनाशून्यो यस्यस्य अशोक सशोकताम्
इतिनिजपुरत्यागे यस्य द्विषां जगदुः स्त्रियः।।
- अर्थात् कुरबक झकुचाघात और क्र्रीडा़रस से ; बकुल मुखासव के सिंचन से , कुल्ला करके पुलकने से , जिसके पास कोई नहीं जाता ऐसा अशोक ,संसार की ऐसी स्त्रियों के चरणस्पर्श से पुष्पित हो जाता है जिन्होंने अपना घर त्याग दिया है।क्ष् शायद इसीलिए कि अशोक खिल उठे, रावण ने घर से बिलगाकर सीता को अशोकवाटिका में रखा था और फलस्वरूप हनुमान ने उसमें लाल-लाल फूल देखे थे ...‘जनु अशोक अंगार’...
मुखमदिरया पादन्यासैर्विलास विलोकितैः
बकुलविटपी रक्ताशोकस्तथ तिलकद्रुमः।।
जलनिधि तटीकांताराणां क्रमात्ककुभां जये
झटितिगमिता यद्वग्र्याभिर्विकासमहोत्सवः
-अर्थात् बकुल ,रक्त-अशोक ,तिलकद्रुम क्रमशः मुखमदिरा , पादन्यास व विलासावलोकन से ,झटितगामिनी स्त्रियों के कारण समुद्र के किनारे की शोभायमान झााड़ियां पुष्पवति हो जाती हैं।
आलिंगितः कुरबकस्तिलको न दुष्टो
नो ताडितश्च सुदृशां चरणैः अशोकः
सिक्तो न वक्त्रमधुना बकुलश्च
चैत्रे चित्रं तथापि भवति प्रसवाकीर्णः ।
-‘तथापि भवति’ अर्थात् समय न होने पर भी आलिंगन ,स्पर्श , अवलोकन ,मधुरसंभाषण से ही क्रमशः कुरबक , तिलक ,अशोक ,बकुल दोहद प्राप्त करते हैं । शब्दशः कहें तो प्रसवाकीर्ण हो जाते हैं। दोहद का अर्थ पुष्पित होना या फलोत्सुक होना है, अन्य शब्दों में कहें तो उम्मीद से होना है।
यह संस्कृत साहित्य है जो वनस्पतियों को आश्रय बनाकर स्त्रियों के द्वारा समाज को सुन्दरता के देय का बखान कर रहा है। मगर हिन्दी साहित्य को भी पीछे नहीं रहने दिया गया है। ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी , कवि-प्रसिद्धियांे के माध्यम से ऐसे ही रसिक-पौधों और वनस्पतियों का अनुसंधान करते हैं जो आशिक मिज़ाज़ पुरुषों की भांति सुन्दरियों को देखते ही या स्पर्श पाकर या अन्यान्य स्त्री-संसर्ग से खिल उठते हैं। मैं संकल्पवान और दृढ़-प्रतिज्ञ परुष-पुरुषों से केवल निवेदन ही कर सकता हूं कि ज़रा प्रकृति और स्त्रियों के अतर्संबंधों का अनुसंधान मात्र तो करके देखें । अनुसंधान करते रहना चाहिए क्योंकि राजशेखर काव्यमीमांसा के अधिकारी की ‘मूल-अर्हता’ अनुसंधान ही मानते हैं। वे कहते हैं, ‘जो कवि अनुसंधान नहीं करता उसके गुण भी दोष हो जाते हैं और जो सावधान रहता है उसके दोष भी गुण हो जाते हैं।’ तो सावधान होकर सुन्दरियों के वानस्पतिक-अवदान का अनुसंधान करें। साहित्य के अवगाहन और निमज्जन के पश्चात् हजारीप्रसाद जी ने कुछ अनुसंधान- अवदान दिए हैं ,जिन पर मैंने अपनी आदत के अनुसार तड़का लगाए हैं। आप भी ज़रा उनपर गौर फर्माएं और स्त्री विमर्श की इक्कीसवीं सदी में स्त्रियों के महत्त्व को समझते हुए ,उनके पास उस-उस उद्देश्य से जाएं।
1. प्रत्येक संभ्रांत महापुरुष के भवन के द्वार के अभिरक्षक ‘अशोक’ का स्त्री-प्रेम देखिए कि वह सुन्दरियों के पदाघात से ,उनके लात खाकर खिल जाता है, उसमें पुष्प आ जाते हैं।
2. कर्णिकार जिसे अमलतास या आरग्वध भी कहते हैं ,वह थोड़ा सामन्ती किस्म का है। उस विलास-वैभवी कर्णिकार (अमलतास) के आगे अगर स्त्रियां नृत्य करें तो वह पुष्पित हो जाता है।
3. कुरबक जो झिंटी,कटसरैया या पियावासा के नाम से जाना जाता है ,वह जरा ज्यादा लोभी है। उस व्यभिचारी वृक्ष का यदि स्त्रियां आलिंगन करें तो वह पुष्पित हो जाता है।
4. चंपक अथवा चंपा नाम का सुन्दर और कोमल पौधा ,जो नामधारियों ,शीर्षककारों और संवादशिल्पियों की प्रायः पसन्द है , अपेक्षाकृत शालीन और संस्कारित-श्रेणी का है। यह शिष्ट चंपा रमणियों के पटुमृदुहास से ,दबी छुपी मुस्कान से ही पुष्पित हो जाता है।
5. तिलक या पुन्नाग नाम का यह वृक्ष इतना शर्मिला और संवेदनशील है कि सुन्दरियों के वीक्षणमात्र से ,केवल नजर पड़ने से कुसुमित हो जाता है। दूसरे शब्दों में , प्रथम दृष्टिपात से ही इसे कुछ-कुछ हो जाता है।
6. नमेरु या सुरपुन्नाग नाम का यह वृक्ष ,जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ‘सुर’ का प्रेमी है, संगीत का शौकीन है। सुन्दरियां यदि इसके आगे बैठकर गाएं तो वह खिल जाता है।
7. प्रियंगु नाम का यह वृक्ष मन ही मन पता नहीं कैसे कैसे ख्यालों में खोया रहता है कि स्त्रियों के स्पर्शमात्र से विकसित हो उठता है। छुआ लगते ही मस्त हो जाता है। प्रियंगु नाम ही है उसका। प्रिया के अंग लगने की तड़प लिए वह दुनिया में जैसे आया है।
8. मंदार पौधा जिसे अंग्रजी में कोरल ट्री कहते हैं ,बड़ा भोला-भाला और सीधा-सादा है। यह रमणियों के नर्मवाक्य से ,ज़रा-सा मीठा-मीठा बोलने से पुष्पित हो जाता है। इसीलिए तो औघड़- बड़दानी आशुतोष भोलेनाथ का यह प्रिय है। ‘मंदारमाला कुलतालकाये’ यही है। इसे ही अर्क और धत्तूर कहते हैं। धत्तूर और धतूरा में जातिसाम्य हो सकता है ,मगर है दोनों अलग।
9. सहकार ,रसाल और आम तो रसों का राजा है। विश्व में उसके स्वाद और रस का डंका पीटा जाता है। यह सफल और कूटनीतिज्ञ जानते हैं किससे कान फुंकवाता है। हर सम्राटृ की भांति इसके कान भी स्त्री ही फूंकती है। कवि प्रसिद्धि है कि सुन्दरियों के मुंह की हवा पाकर सहकार तरु या आम का वृक्ष कुसुमित हो जाता है। पता नहीं एसे क्या पट्टी पढ़ाती हैं कि केवल मुंह की हवा से वह फूल जातस है ! वैसे आम स्वनामधन्य वृक्ष है। अर्थात् आम लोगों का वृक्ष। एकअमराई का भी समय था जब पुरुष स्त्रियों के लिए आम के पेड़ की टहनियों से झूला बांधते थे और अमराई खिलखिला उठती थी। आम पुरुष भी है और स्त्री भी। अर्द्धनारीश्वर है यह। वृक्ष भी है और लता भी। मेरे उपवन में जो नारीरूप बड़ी बड़ी पत्तियोंवाला आम्र-गुल्म है ,उसकी बेलाकार टहनियों और तने को सहारा देने के लिए हमें मोटी बल्ली का उपयोग करना पड़ा। कालिदास के सामने भी यही समस्या आई होगी ,तभी उनके नाटकों में सहकार-लता का वर्णन मिलता है।
10. बकुल या वकुल ,जिसे मौलसिरी (मौलश्री) भी कहते हैं ,ज़रा शरारत पसन्द है। पंडितजी बताते हैं कि सुन्दरियों की मुखमदिरा से सिंचकर बकुल पुष्प कुसुमित हो जाता है। वे जरा शिष्टता से कहते हैं। दरअसल स्त्रियां अगर कुल्ला करके इसके ऊपर पुलक (थूक) दें तो यह ‘पुलकित’ हो जाता है, खिल जाता है। किसी फिल्म में नायक ने पानी पीकर किसी नायिका पर पुलका (थूका) था और पैसा कमाने की दृष्टि से आयोजकों के कहने से उस काम को कई कई बार स्टेज शो आयोजित कर लड़कियों पर किया गया था। टीवी देखने वाली स्त्रियां चिल्लाती थीं ‘छीः’। भई ये अंदाज़ बेचने के लिए थोड़े हैं। यह तो सहज-सगाई है। एक फिल्म में भी एक प्रसिद्ध नायक की बेटी को नायिका बनाने के लिए यही टोटका आजमाया गया था। मगर सब व्यर्थ। सुना है दोनों फिल्में फलाप हो गईं। इसलिए सावधान ,भावनाओं के मक्खन को बाजार में मत बेचो। वह खट्टा हो जाएगा। फूल हमारी भावनाओं के पुष्प हैं और स्त्रियां इस फुलवारी की मालिन। दोनों के नम्र और शालीन उपादान का हमें सम्मान करना चाहिए और सुगंधित हो सकने का प्रयास करना चाहिए।
इति सुमन-सुन्दरी वार्ता ।
221109

Wednesday, November 18, 2009

खाने की टेबल पर मां और बीवी का मसाला

एक वो भी मसालेदार विज्ञापन था कि आफिस से लौटा हुआ आदमी घर में घुसते ही हवा सूंघता था और बीवी से पूछता था,‘‘ मां आई है क्या ?’’
बीवी मुस्कुराकर मसालों को धन्यवाद देती थी। इसका मतलब कि अब मां खाने में नहीं महकेगी। उसका स्थान अब मसालों ने ले लिया है। इस तरह मसालों की नई खपत ने कम से कम किचन से मां के महत्व को खत्म कर दिया। मां का स्थान अब अमुक कम्पनी के मसाले ने ले लिया। पर उससे पत्नी का भी महत्व कम हो गया । पत्नी के स्थान पर कामवाली बाई या कोई भी बाई आराम से खाने को स्वादिष्ट बना सकती है। आप अगर बाई की कोई खास जरूरत किचन में नहीं समझते हों तो आप खुद भी उस खास कम्पनी के खास मसाले का उपयोग कर एक साथ मां ,बीवी और बाई की कमी को पूरा कर सकते हैं। (सीरियल वाले या फिल्म वाले इस समय मुझे थैंक्यू कह सकते हैं। मैंने उन्हें एक नया टाइटिल सुझाया है ‘मां ,बीवी और बाई। विज्ञापनवाले भी चाहें तो इसका लाभ उठा सकते हैं।)
अभी-अभी एक नया विज्ञापन आया है। टेबिल सजी हुई है। मां भी है ,बीवी भी और खानेवाला वह कमाउ पूत भी जिसे खुश करने लिए खाना बना है। वही खाना बाकी लोगों के खाने के लिए बना है। खाने के टेबिल पर भी एक ही खाना दो अवतारों में दिखाई देता है। खैर ,आगे के दृश्य में क्लाइमैक्स पैदा करते हुए मसालेदार खाने में कमाउ पूत की प्रतिक्रिया का तड़का लगाया जाता है। कमाउ पूत झिझकते हुए अपनी पत्नी से कहता है,‘‘ आज तुमने तो मां से भी अच्छा खाना बनाया है।’’ यहां बुद्धिमान कैमरा स्वयमेव पत्नी पर चला जाता है- वह एक लट संवारती है और कभी सास और कभी पति की तरफ देखती है,मतलब सास से ‘सारी ,यू आर फिनिस्ड नाव’और पति से ’ ‘थैंक यू ! तुम खुश हुए न ?’
अब कैमरा मां पर पलटता है। मां के चेहरे पर ऐसे भाव हैं जैसे कभी उमा के या अभी कुछ दिनों पहले वसुन्धरा के चेहरे पर थे। सत्ता छिन जाने के भाव। राजनीति वाणिज्य का नकाब ओढकर खाने की टेबल पर घुस आई है। मुझे लगता है अब यह गाना बजेगा, ‘‘अब चाहे मां रूठे या बाबा , मैंने अपनी चाल तो चलदी।’’ मगर गाने के स्थान पर विज्ञापन में इस स्थान पर एक आकाशवाणी गूंजती है ,‘‘ अब जो सच है , वो सच है।’’
यानी मसाला सच है। नमक-मिर्च का युग बीत चुका है । सभी नमक-मिर्च लगाने लगे तो मसालों ने अपने को लांच कर दिया। वे पूरी मुस्तैदी से स्थापित हो चुके हैं। इसी का नतीजा है कि अमुक कम्पनी के मसाले सदी के शताब्दी पुरुष या महानायक हो गये। कमाल मसाले का जितना है उससे ज्यादा विज्ञापन का है। यह एक ऐसा टीमवर्क है जिसमें पता लगाना मुश्किल है कि विज्ञापन में मसाला है या मसाले में विज्ञापन है। यही होना भी चाहिए। यहां पर मैं राधा और कृष्ण का उदाहरण विनम्रता पूर्वक देने की अनुमति चाहता हूं। दोनों ने एक दूसरे को इतना मैंनेज किया कि राधा कृष्ण दिखने लगी और कृष्ण राधा दिखाई देने लगे। विज्ञापन में मसाले का प्रयोग उसी अनन्याश्रित प्रगाढ़ता का परिचायक है।
अस्तु , कवि पहली पंक्ति में आंख फाड़कर पूछता है, ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है!’
दूसरे पद में उनका कौतुहल मुंह के अंदर उंगली डालकर बुदबुदाता है ,‘‘ नारी ही कि सारी है कि सारी ही कि नारी है ?’’
अंत में टीवी रूपी कवि पूछता है कि हे मूर्ख उपभोक्ता ! क्या तूने कभी सोचा है कि विज्ञापन मसाले के लिए बने हैं या मसाला विज्ञापन के लिए बना है ? नहीं सोचा है तो खाने के पहले सोच । फिर तेरी आ ही गई है तो खा मर.
-अरे कांच के पर्दे ,हास्यास्प्रदी ,10.11.09

Thursday, November 12, 2009

पग: द ब्रांड एम्बेसेडर




बच्चे स्कूल ना जाने के बहाने ढूंढते हैं। स्कूल जाना ही पड़ा तो टीचर के एक्सीडेन्ट में मर जाने की कल्पना करते है।वास्तव में...शोक सभा के बाद घर जाकर सचिन तेन्दुलकर या शाहरुख बनने की भावना उनमें प्रबल होती है। हमने अपनी आने वाली पीढ़ी को खेल-खेल में कितना भविष्यगामी बना दिया है।
इधर एक दूसरा ही बच्चा है जो आजकल लाइट में है। यह बच्चा अपनी मां की उम्र की मिस रोजी के ना आने से चिन्तित है। वह उसमें अपनी मां देखता होगा। पता चलता है कि मिस रोजी आज बहुत उदास है क्योंकि उसका कुत्ता मर गया है। वह आज स्कूल नहीं आएगी। यानी छुट्टी। अब कायदे से बच्चे को घर जाकर सचिन या शाहरुख बनने की कोशिश करनी चाहिए थी। मगर यह उल्टी ही खोपड़ी का बच्चा है जो अपनी प्यारी टीचर मिस रोजी को खुश करना चाहता है। यह प्रेरणा उसे राजू नाम से लोकप्रिय जोकर राजकपूर से नहीे मिली है जो अपने बचपन में ऐसी ही किसी रोजी को प्यार कर बैठता है और उसे सेन्सर नाम की मजेदार संस्था के सौजन्य से नहाते हुए देखता है। उस राजू की बजाय यह बच्चा शाहरुख से प्रभावित है जो एक अद्वितीय फिल्म में अंकल की उम्र का होने के बावजूद पता नहीं किस यूनिवर्सिटी के नियम के तहत अपने से बहुत छोटी उम्र के बच्चों की क्लास में भर्ती हो जाता है और एक आवश्यक आयु और सौन्दर्य वर्ग की टीचर से अनिवार्य रूपसे प्यार करने लगता है।
यह बच्चा बहुत छोटा है और टीचर आंखों को अच्छा लगने की तमाम आवश्यताओं से परिपूर्ण है। बच्चा अपनी किताबें फाड़कर उसकी गेंद बनाकर टीचर की गोद में डाल देता है। टीचर उसे फेंकती है तो वह कुत्ते की तरह दौड़कर उठाता है ...बिल्कुल कुत्ते की तरह एक पैर उपर करके .. और मुंह में दबाकर मिस के पास लौट आता है। पानी पड़ा हुआ है। कीचड़ मचा हुआ है। टीचर अपनी खूबसूरत उदासी और उतनी ही खूबसूरत शाल ओढ़कर बैठी है। बच्चे के कपड़े सफेद झक....और वह उन कपड़ों की परवाह किये बगैर ,कीचड़ में लिथड़ता हुआ मिस को खुश करने के लिए कुत्ते की भूमिका में परफेक्शन ला रहा है। बच्चे की कोशिश कामयाब होती है। टीचर उस कीचड़ में लिपटे हुए बच्चे के अंदर की उजली भावना को देख लेती है। काश यह काम हमारी सरकारें कर लेतीं तो...खैर जो नहीं हुआ उसका क्या जिक्र ? एक साफ-सुथरे बच्चे ने कीचड़ में लिथड़कर मरे हुए कुत्ते का स्थान ले लिया है। यह कीचड़ धोनेवाली साबुन या डिटजेन्ट का विज्ञापन है।
मगर जो कुत्ता हमारा लक्ष्य है वह मरा नहीं है। वह इस बच्चे से ज्यादा पारिश्रमिक पाता है और एक कम्पनी का ब्रांड एम्बेसेडर है। वह कुत्ता पग है। हथेली में आ जाए इतना छोटा। वह कुत्ता एक विज्ञापन में स्कूल जाती बच्ची के मौजे ढूंढकर लाता है। यह कुत्ता समय पर न सोने वाले बच्चे की मदद पुंगी बजाकर आनेवाले खतरे और फिर चले जानेवाले खतरे की सूचना देता है। यह एम्बेसेडर कुता ण्क बच्ची के साथ बागवानी कर रहा है। फूलों के पौधे रौप रहा है। वह गड्ढे कर राह है ओर बच्ची उन गड्ढों में पौधे रौप रही हैं। इस विज्ञापनी और एक खास कम्पनी के लिए एक खास ब्रांड के लिए पता नही कितने लाख की एम्बेसेडरी करने वाले इस पग जाति के कुत्ते से बच्चों को प्यार हो गया है। एक छोटी बच्ची उसे ला देने की जिद करने लगी है। उसके मध्यमवर्गी पिता ने कहीं से उसकी कीमत पता की है। वह सबसे महंगा कुत्ता है। एक सप्ताह के नवजात पिल्ले की कीमत करीब पचास से पचहत्तर हजार रुपये है। मध्यमवर्गीय पिता ने शायद इतनी बड़ी रकम एक साथ कभी नहीं देखी। अब वह बच्ची को क्या जवाब दे ? कि यह कुत्ता चाइना मेड है ? कि ऐसे कुत्ते होते ही नहीं ? कि हम गरीब हैं और ऐसे कुत्ते अफोर्ड नहीं कर सकते ? कि हम विज्ञापन में दिखनेवाले इस कुत्ते से गए बीते हैं ?
अरे कांच के पर्दे ! कुछ तो बता ! इतने बड़े-बड़े झूठों में एक तो सच बता जो विज्ञापनों के कीचड़ में कंवल खिला सके। एक पिता अपनी रोती हुई बच्ची को चुप करा सके। जिन्दगी ने हमारे रास्तों में जो गड्ढे खोदे है उनमें एक पौधा ता किसी फूल का लगा सके। वक्त ने हमारी जो जुराबें छुपा दी है उन्हें खोजा जा सके। ऐसा हो सके कि जब मुसीबतें आएं तो यह पग हमारे लिए चेतावनी की पुंगी बजा सके ओर हम सुरक्षित हो जाएं। आखिर कब तक अर्थशास्त्र हमारे साथ ऐसे ही गदागदैय्यल खेलता रहेगा ? हास्यास्प्रदी 101109

Tuesday, November 3, 2009

जीवन की उलटबांसियां

सुबह चाय के साथ चुहल का दौर भी चल रहा था। चाय में मिठास थी और मैं छेड़छाड़ का नमक उसमें डाल रहा था। खिड़की पर तभी एक बिल्ली आकर बोली ,‘मैं आउं ?’
‘ये कहां से आ गई।’ पत्नी ने कहा।
‘बहन से मिलने आई होगी।’ -मैंने कहा।
‘मम्मी आप को बिल्ली कह रहे हैं।’ -पुत्री ने मां को उकसाया।
‘कहावत है न -हमारी बिल्ली हमीं को म्यांउं’ -पत्नी मुस्कुराई।
‘कहावत गलत है। होना था, ‘हमारी बिल्ली हमीं को खाउं’ -मैंने काली मिर्च भी डाल दी
पत्नी आंख निकालकर बोली-‘अब गुर्राउं ?’
‘हमसे क्या पूछती हो , हम तो चूहे हैं’ -यह देखने में था तो समर्पण ,मगर बम था। पुत्री ने मां की वकालत की-‘ पापा अभी गणेशेत्सव गया है। हमने देखा कि एक चूहा भी हाथी को ढो सकता है।’
यह मेरे लिए हाइड्रोजन बम था। मैं चैंककर ,आश्चर्य से पुत्री को देखने लगा। वह हंसते हुए बोली ‘क्या हुआ पापा ,ठीक तो कह रही हूं।’
पत्नी मेरी कैफियत समझ गई। बोली-‘चल हमारा काम खत्म। इनको चारा मिल गया। नास्ता पकाने लगे हैं।’
मैं सचमुच नशे की हालत में डाइनिंग से रीडिंगरूम तक आया। बात निकली है तो अब दूर तक जाएगी और मैं सोच के धागों में बंधा हुआ चुपचाप घिसटता रहूंगा। ‘एक चूहा हाथी को ढोता है।’ अद्भुत बिंब हैं। अनोखे प्रतीक। गणेश-वाहन चूहे की प्रतीक-छाया में मैं चूहा तो दिखाई दे रहा हूं , मगर गुहस्थी के हस्तीवत् गुरुभार को ढो भी रहा हूं। यह बच्ची का काम्प्लीमेंट था। एक चम्मच में उसने दो गुलाब जामुन निकाले थे। मम्मी और पापा दोनों की बातें एक पासंग में थी। एक रत्ती फर्क नहीं।
विसंगतियों के ये प्रतीक और बिंब हमारे मनीषियों और गल्प-जीवियों ने बुने हैं। जीवन को वास्तविकता के गरल की जगह आध्यात्मिकता का मधुपान कराया है । जीवन की विसंगतियों को कैसे अद्भुत ढंग से प्रस्तुत किया है। गणेश जैसे विशालकाय को चूहे की पीठ पर बैठाया है। तुलसीदास ने तभी कहा:‘केशव कहि न जाये का कहिए। देखत तव रचना विचित्र अति, समुझि मनहिं मन रहिए।’
लेकिन मन ही मन रहने या रखनेवाले दिखते कम है, पर हैं जरूर। हम उत्सव मनाते हैं और गणेश को चूहे पर बैठाते हैं। बड़े चूहों पर सवारी करते हैं। इस आध्यात्मिक बिंब की प्रतीकात्मकता को राजनीति अपने ढंग से ले रही है। सामंतांे ने अलग ढंग से लिया। पूंजीपतियों ने अलग। माक्र्सवादियों ने बिल्कुल कहानी पलट दी।
साम्यवाद और पूंजीवाद की द्वंद्वात्मकता पर एक कहानी याद आती है ; जो आजकल एक नेटवर्किंग कंपनी का विज्ञापन बनी हुई है। कहानी का मूल शीर्षक है ‘द पाइड पाइपर आफ हेमलिन’। कहानी समस्या के निदान की पुरानी नेटवर्किंग का चित्रण है। हैमलिन शहर चूहों से परेशान है। एक पाइड पाइपर (शहनाई वादक ) वक्त की नजाकत को समझता है और अपने प्रडक्ट को बेचने के लिए स्वयं को चूहों को पकड़नेवाला (चूहापकड़) कहकर प्रस्तुत करता है और शहनाई बजाता हुआ वह सारे चूहो को संमोहित करके नदी में डुबो भी देता है। यह पूंजीवाद है। धन-संग्रह की एक कला।
साम्यवाद चूहों को संगठित करके क्रांति का हंसिया चलाते हैं ,हथौड़ा पीटते है। जिन्हें सामंतवादी और भव्यतावादी लोग श्रमिक और हीन समझते हंै ,उन्हें उपेक्षित करते है। अपने को सिंह और उन्हें चूहा समझते हैं। साम्यवाद उन्हीं चूहों को संगठित बलों में बदल देता है। शेर और चूहे की कहानी भी यहां पढ़ी जा सकती है जो जाल में फंसे शेर को चूहे द्वारा मुक्त कराना चित्रित करती है।
हर विसंगति अपनी मुक्ति के लिए अलग कहानी बुनती है। मनुष्य की सोच का विरेचन करती है। भारतीय मनीषा ने गणेश के विशालकाय व्यक्तित्व को चूहे के हीनकाय अस्तित्व पर ढोने की कल्पना क्यों की ? समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति की बात करनेवाले घोषपत्रों के साथ इसे मिला कर देखूं या न देखूं। हमारी परम्परा विसंगतियों के बिम्बों और प्रतीकों से भरी पड़ी है। गणेश के पिता शंकर ने देवलोक के जीवों को बचाने के लिए न केवल जहर पिया बल्कि अपने पुत्र के वाहन चूहे के शत्रु नाग को गले से लिपटा लिया। स्वयं बैल पर बैठे और पत्नी को सिंह की सवारी कराई। पति और पत्नी के बीच तो प्रायः तू-तू मैं-मैं होती ही रहती थी , बैल और सिंह केसे निबाहते रहे हांेगे ? बड़े बेटे के वाहन मयूर से अपने कण्ठहार नाग की रक्षा उन्होंने कैसे की होगी ? मोर केे लिए तो सांप का मांस ही प्रिय है। कभी सोचना पड़ता है कि हम ‘समवेत के संगच्ध्वम्’ को स्वीकार करते हैं या जंगलराज की सच्चाई को ?
और फिर कबीर याद आते हैं जो अपनी द्वंद्वात्मकता को रहस्यवाद के मुठिये1 से बुनते हैं। कबीर कहते हैं: एक अचम्भा देखा रे भाई ! ठाढ़ा सिंह चरावै गाई।
पहले पूत पीछे भई माई । चेला के गुर लागै पाई।
जल की मछली तरुवर ब्याई। पकड़ि बिलाई मुरगे खाई।
बैलहिं डारि गूंनी घर आई। कुत्ता को ले गई बिलाई।
तल तरि साखा ऊपरि मूल। बहुत भांति जड़ लागै फूल।
- कबीर की उलटबांसियों के पूरे मिज़ाज़ में ही अचम्भा है। अचम्भा है कि सिंह गायों का पालक बना हुआ है। रक्षक जहां भक्षक बने हुए हैं वहां भक्षकों को रक्षक बनाना आजकल व्यंग्य बन जाता है। प्रजातंत्रीय घोषणापत्रों ने ऐसे व्यंग्य बहुत किये हैं।
- अचम्भा ही है कि पहले बेटे हुए और बाद में माताएं। जीव को माया कहुत बाद में दबोचती है। अगर व्यवसाय या मुद्रा-स्वार्थ का वाणिज्यशास्त्र देखें तो एक समय बाद मां सिर्फ होर्डिंग रह जाती है और पुत्र के पीछे बहुएं (मायायें) राज्य करती है। यह नीति की नहीं अर्थशास्त्र की मजबूरी है।
-अचम्भा ही है कि जल के बिना न रह सकने वाली मछलियां हवा मे अपने बच्चे देती है। बिल्ली को पकड़कर मुरगियां खाने लगती हैं। बैलों के बिना भरे हुए मालवाली गाड़ियां गोदामों में पहुंच जाती हैं। भड़ियाई के लिए प्रसिद्ध बिल्लियां वफादारी के लिए विख्यात कुत्तों को लेकर चम्पत हो जाती हैं। भारतीय पुरुष विदेशी हो जाते हैं।
-अचम्भा ही है कि शाखाएं नीचे तल के नीचे चली गई हैं। भूमिगत हो गई हैं और जड़ों में बहुत प्रकार के फूल-फूले हुए हैं। जड़बुद्धि फल-फूल रहे हैं, ऐसी बातें कहकर बहुत से भारी-भारी विद्वान लोग आहें भरते हैं और फिर भी केवल परिचितों को ,गांठ के पूरों को उछालते रहने से बाज नहीं आते। उन्हें अपने बिलाने का खतरा है। गांठ के पूरे ही उन्हें उबार सकते हैं।
अचम्भा से भरे हुए हैं कबीर। वैसे बहुत दूर और बहुत देर तक चलने के बाद सब कुछ अचम्भा ही लगने लगता है। किस-किस की चर्चा की जा सकती है ? जब जगत के ईश को जल के ऊपर सहसफनी नाग के बिस्तर पर लेटे हुए हम देखते हैं और देखते हैं कि लक्ष्मी उनके पैर चांप रही है तो क्या अचम्भा नहीं होता ? क्या अचम्भा नहीं है कि हम कांटों में गुलाब और कीचड़ में कमल को खिलते देखते रहते हैं। ज़िन्दगी की उलटबांसियों को कहां तक सीधा करने की कोशिश करेंगे हम आप। तस्मात् युद्धाय उत्तिष्ठ धनंजय के भाव से संघर्ष करते रहें।ज्यादा है तो बिल्ले और चूहे यानी टाम और जैरी के कार्टून देखकर मन बहलाते रहें।

1. कपड़ा बुनने के लिए धागे की भरनी।
03/04.11.09 , मंगल-बुध.

Saturday, October 17, 2009

फूल हरसिंगार के

राचौ ऋषिकेश और हरिद्वार से लौट आए हैं। वहां की हवा तो शायद नहीं न ला पाए मगर वहां के फूलों और वनस्पतियों के बीज जरूर ले आए हैं। जी हां , हरिद्वार और ऋषिकेश का अर्थ अब केवल धार्मिक कर्मकाण्ड और साधना नहीं रह गया है। पर्यटन तो था वह पहले से ; अभी कुछ वर्ष पहले राजनैतिक समीकरण और बंटवारे का भी वह प्रतीक बन गया है। योग के शारीरिक-संस्थान और आयुर्वेद के विश्व-बाजारवाद की हवा भी इन पर्वतीय नगरों को लग गई है। शुक्र है मेरे मित्र राजनीति और योग का बाजारवाद लेकर नहीं आए। वे कश्मीरी तुलसी , दार्जिलिंग की मिर्ची और हिमाचल के फूूलों के बीज लेकर आए हैं। पहले उन्हें गमलो में अंकुरित किया और एक के बाद एक उन्हें मेरे बागीचे में रोपते गए। पहले उन्होंने कश्मीरी तुलसी लगाई और कई बार आकर उसकी पत्तियों की इल्लियां निकालते और गमले की मिट्टी संवारते रहे।
मेरे उपवन में उन्हें इतनी रुचि क्यों ? दो कारण हैं.. एक वे और दूसरे हम। हम अपने बगीचे को चाहनेवालों की चाहतों से दूर नहीं करते। चाहे फूल हों ,चाहे सब्जियां हों या चाहे अमरूद और आम के फल हों। जो मांग सकते हैं, वे मांग ले जाते हैं। ज्यादा हो तो हमीं बांट आते हैं। इससे मेल-मिलाप की सुगंध और स्वाद मिलते रहते हंै। पड़ोस है मेरे आसपास , कोई हिन्दुस्तान या पाकिस्तान का राजनैतिक विवाद नहीं है। हां , कुछ संकोची और प्रातः भ्रमणार्थी भी होते हैं जो घुसपैठियों की तरह जासौन और चमेली के फूलों को चुरा ले जाते हैं। डालियां नहीं टूटती तो हमें भी दुख नहीं होता।
दूसरा कारण वे हैं। वे अपने पिता की जमीन पर बनाए मकान में सबसे ऊपर उपलब्ध कमरे में रहते हैं। चाहकर भी वे उपवन नहीं लगा सकते। हमारे उदार उपवन में वे अपनी इच्छाओं का प्रत्यारोपण करते रहते हैं। हमें भी अच्छा लगता है।
इस बार आए तो बोले ,‘‘ पारिजात का पौधा लाया हूं। आपके बगीचे की सुन्दरता बढ़ाएगा। गैट के बगल यह ठीक रहेगा।’’
कौन सी चीज कहां लगेगी इसका फैसला पत्नी करती है। उसने राचै को ,‘‘जैसा तुम उचित समझो भैया!’’ कहा तो राचै ने खुद ही लोहे की छड़ उठाई और पौधा रोप दिया। फिर चाय का दौर चलना ही था। चर्चा चली कि पारिजात क्या होता है और कैसा होता है ? मैंने पढ़ा है पारिजात का कोई फूल होता है मगर देखा नहीं है। राचै ने बताया कि सफेद रंग के सुगंधित फूल होते हैं। कोई दस फुट का झाड़ ही होता है। फूल रात मंे खिलते हैं और दिन में झड़ जाते हैं।
मेरी स्मृति में तत्काल एक गीत क्लिक हुआ और बजने लगा:‘‘ सांझ खिले ,भोर झरे , फूल हरसिंगार के ; रात महकती रहे।’’
‘‘ क्या यह हरसिंगार है ?’’ मैंने गीत पाॅज करते हुए पूछा। राचै नहीं जानता था। मुझे याद आया कि पड़ौसी ने कुछ माह पहले हरसिंगार का जिक्र किया था। उनकी पत्नी को कई सालों से साइटिका है और उसके इलाज के लिए हरसिंगार की पत्तियों का काढ़ा वे बनाना चाहते थे। तब गर्मी के कारण पत्तियां झर चुकी थीं। वे शरद ऋतु का इंतजार कर रहे थे। तब भी यह गीत मेरे दिमाग में गूंजा था। खैर उस वक्त बात अज्ञान के पाले में चली गई।
राचै के जाते ही पत्नी बोली ,‘‘ पता है , हरसिंगार घर के सामने नहीं लगाते !’’ मैं उत्सुकता से भर गया। पत्नी जानती है कि यह हरसिंगार ही है जिसका दूसरा नाम पारिजात है। ‘‘यानी पारिजात ही हरसिंगार है।’’ मैंने पूछा।
‘‘पता नहीं मगर लक्षण अगर यही हैं कि रात में खिले और सुबह झर जाए तो यह हर सिंगार है और इसका घर के सामने रौपा जाना कोई अच्छा सगुन नहीं है। नानाजी कहते थे कि सुबह इसके झरे हुए फूल देख लो तो दिन मनहूस हो जाता है।’’
‘‘हह....मैं इन बातों को नहीं ंमानता।’’ मैंने बात को टाल दिया। मेरी जिज्ञासा सिर्फ यह थी कि बचपन से गीत की शक्ल में गूंज रहे गीत का अनुसंधान कर सकूं। आलसी हूं या अज्ञानी या दोनों , मुझे कुछ पता नहीं। आखिर अपने संसाधनों से मैंने शीघ्र ही अपनी तड़पती हुई जिज्ञासा को सारे उत्तर उपलब्ध करा दिए।
पारिजात ही हरसिंगार है। बंगाल की शैफाली और तमिल की पाविजामल्ली। मैं फिर सारे सूत्ऱ लेकर गुनगुनाने लगा:‘‘सांझ खिले भोर झरे फूल हरसिंगार के ,रात महकती रहे।’’ पूरे दिन यह गीत मेरे गले में खदबदाता रहा और पत्नी पकती रही।

शाम को एक हादसा हो गया। मैं जब घूमकर लौटा तो देखा कि पारिजात का पौधा गेट के बाजू में नहीं है। मैंने पत्नी से पूछा। उसने बताया कि उसे अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए उसने पौधा उखाड़कर बगीचे के पिछवाड़े लगा दिया है। अब उसे अच्छा लग रहा है।
‘‘ओह..’’ मैं संतुष्ट हुआ कि बगीचे में कहीं भी हो ,मेरा अज्ञात बालमित्र सुरक्षित तो है। मगर क्या सचमुच उसका भविष्य सुरक्षित है ? जिसका इतिहास चोट और बर्बादी से भरा हुआ है उसका वर्तमान कितना सुरक्षित रह सकता है। हरसिंगार के साथ यह जो मनहूसित का लांछन लगा हुआ है क्या वह सही है ? क्या पत्नी को अच्छा नहीं लग रहा था तो उसकी वजह उसकी घर के सामने मौजूदगी थी ? मैं अब गंभीर हो गया था। घर के सामने था हरसिंगार तो पत्नी उदास थी और अब वह पीछे हो गया है तो मैं गंभीर हूं। यह द्वंद्वात्मक-मानसिकता विचारों के कारण थी। मुझे उत्तर मिल गया। हम अपनी सोच को जीवन का हिस्सा बना लेते हैं। मैं जो गीत गुनगुना रहा था उसमे सुबह खिलने की बजाय झरने की बात थी। पर उस गीत में संगीतकार रघुनाथ सेठ का माधुर्य और संयोजन कोई नहीं देख रहा था। क्या बात थी कि संगीतकार हेमंतकुमार मुखोपाध्याय अपनी बेटी रानू मुखर्जी के साथ उस गीत को गाने के लिए विवश हुए। क्या कारण है कि डाॅ.हरिवंशराय बच्चन ने अपने गीत के लिए हरसिंगार के खिलने और झरने की अस्वाभाविकता को चुुना। मैं इस गीत को इसलिए नहीं गुनगुनाता था कि मैं उदास होना चाहता था। इसका संगीत संयोजन और खिलने झरने की विपरीतता मुझे आनंद देती थी। उदास गीतों का सौन्दर्य मुझे अक्सर रोमांचित और आनंदित करता है। यह टिपिकल है क्या ? मैं उदास गीतों को गुनगुनाकर आनंदित होता हूं कि कितना सहजोच्छवास और अभिव्यक्ति का कितना उदात्त संमिश्रण कवि ने किया है। उदासी मुझे नहीें घेरती , तो क्या मैं संवेदना से शून्य हूं ? मेरी मान्यता है कि उदासी के गीतों से भी रस और आनंद की सृष्टि हो सकती है।विरेचन हो सकता है। उदास गीत सुनकर उदास होना ही ईमानदारी नहीं है। गीत के साहित्यिक सौन्दर्य में डूबना भी ईमानदारी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कबीर की उलटबासियां अद्भुत नहीं होतीं। अगर ऐसा नहीं होता तो नर्मदा परम्परा के विपरीत पूरब से पश्चिम बहकर पूजनीय नहीं होती है।
फिर हरसिंगार ,पारिजात या शैफाली का इतना अनादर क्यों ? शैफाली से याद आता है कि मेरे मोहल्ले में एक बंगाली लड़की थी शैफाली । ठिगने कद की उस सुन्दर सी लड़की का काॅलेज में मैं सीनियर था। मोहल्ले का होने से वह मुझे भाई मानती थी। वह अपने को सुरक्षित और विश्वस्थ समझती थी कि मैं था। पर सुना कि विवाह के बाद वह जलकर मर गई। वह एक हादसा होगा। क्या नाम उसका शैफाली था इसलिए वह जल गई ?
शैफाली , पारिजात या हरसिंगार को लेकर एक दुखांत कहानी भी रची गई है। एक सुन्दरसी लड़की थी पारिजातिका जो सर्वसाक्षी सूर्य के असाक्ष्य प्रेम
में पड़ गई। जो सबकी दृष्टि का कारण बनता है , वही सूर्य उसके प्रेम को नहीं देख पाया। परिस्थितियां ऐसी बनी कि प्रेम की तीव्रता और प्रिय की निरन्तर उपेक्षा के कारण पारिजातिका को आत्मोत्सर्ग करना पड़ा। शैफाली सर्वसाक्षी के जीवन से चली गई। कवियों को इसीलिए लगा कि पारिजात रात में खिलता है और सूर्य के उगने के पहले ही झर जाता है। हालांकि कहानी यह भी बनाई जा सकती थी कि पारिजातिका चंद्रमा के प्रेम में थी और अब भी है। भारतीय स्ववाग्दत्ताओं की तरह वह केवल चंद्रमा की प्रतीक्षा करती है , इसलिए रात में खिलती है और सूर्य जैसे पराए पुरुष की नजर न पड़े इसलिए सूर्योदय के पहले ही झर जाती है। मगर तब यह केवल प्रेम-कहानी होती। दुखांत बनाने के लिए पारिजातिका का उत्सर्ग जरूरी समझा गया।
ऐसे कवियों और कथागूंथकांे से मैं क्या शिकायत करूं ? शिकायत मुझे अपने प्रिय और सम्माननीय साहित्यकार पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी से है। उन्होंने पुनर्नवा में भट्टनी की दाह देखी। अशोक के फूल की तरफ गौर से देखा। कुटज जैसे जीवंत वन-पादप भी उनकी नजर से नहीं बच सके। ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ लिखते हुए कविप्रसिद्धियों के बहाने वे चम्पा और मालती का जिक्र शीर्षक बनाकर करते रहे। मन्दार और मौलश्री की पड़ताल करते रहे। मगर बंगाल के संस्कारों से सने और गुरुदेव के सानिध्य में पके इस संस्कृतनिष्ठ गद्य-कवि ने जब शैफाालिका का जिक्र किया तो बड़ी उपेक्षा के साथ। ज्यादा जांचपड़ताल ,खोजखबर तो दूर ; एक अदना उपशीर्षक भी इस ‘वैद्यनाथ’ ने उसे नहीं दिया! चलते हुए पैराग्राफ में उसे निपटा दिया! क्या सचमुच पंडितजी नहीं जानते थे कि पारिजात या शैफाालिका एक ‘देवपुष्प’ है ? क्या सचमुच उन्हंे नहीं पता था कि यही एकमात्र ऐसा पुष्प है जो पृथ्वी पर गिरकर भी देवताओं के सिर पर चढ़ने के योग्य होता है ? इसी कारण इसका नाम पड़ा ‘दि फ्लावर आॅफ गाॅड’।
अंधेर है हरसिंगार। एक बात और ! हरसिंगार कहने से ‘हर’ शब्द पहले आ रहा है। हर अर्थात् भूतनाथ शंकर। हरसिंगार कहने से तो तुम शंकर के सिंगार हो जाते हो। कहीं इसीलिए तो वैष्णवी मानसिकता के भारत ने तुम्हारी उपेक्षा नहीं की ? नहीं मुझे यह नहीं लगता। मैं मानव कमजोरियों और स्वभाव की तरफ यात्रा कर रहा हूं।
वैज्ञानिकों ने तुम्हें ‘निक्टेन्थिस अर्बार्टिªस्टिस’ यानी रात को खिलनेवाला शोकवृक्ष कहा। तुम्हें ‘ट्री आॅफ सारो’ कहा। फिर यह भी बताया कि किन-किन रोगों को दूर करने के लिए तुम्हारी पत्तियां और छाल काम आती है। घर को महकाने के लिए तुम जलकर भी सुगंध फैलाते हो। सौन्दर्य प्रसाधन में तुम्हारा पेस्ट लाभदायक ,सर्दी जुकाम में तुम्हारा काढ़ा कामयाब ,साइटिका में तुम्हारी पत्तियों का रस उपयोगी। पेट दर्द और कब्ज तुम्हारी पत्तियों का रस दूर कर देता है। मगर दिमागी कब्ज को कौन दूर करे। इतने लाभकारी होनेके बादभी कृतघ्न समाज तुम्हें मनहूस समझता है जबकि तुम सुबहसुबह उनके लिए पांवड़े बन जाते हो।
परन्तु पारिजातिके! शैफाालिके! अगर तुम बुरा न मानो तो मैं अपना प्रेम निवेदित करता हूं। इसमें यह शर्त भी नहीं है कि तुम सूरज को भूल जाओ। मेरे लिए इतना काफी है कि तुम उसके सामने नहीें खिलोगी। सुना े! एक खुशखबरी है कि राशि के लिहाज से तुम मेरे लिए लकी हो। मैं सेजीटेरियस हूं...धनु। आज दीपावली है। ज्योतिष अभी अभी पत्नी को बता गया है कि आपके पति पारिजात का पौधा लगाएं और विष्णु की आराधना करें। लक्ष्मी प्रान्न होकर दीपावलीमें धन बरसाएगी। पारिजातिके!देवताओं ने तुम्हे हमेशा चाहा है। तुम्हारा पौधा रोपने को लेकर कृष्ण की दोनों पत्नियों में भी झगड़ा हो गया था। कृष्ण कहीं से पारिजात का पौधा ले आए। सत्यभामा और रुक्मिणी अपने अपने आंगनों में लगाने की जिद करने लगी। कृष्ण दोनों पक्षों को खुश करने में माहिर। सत्यभामा को तो पौधा दे दिया ताकि पारिजात फूले तो सुबह रुक्मिणी के आंगन में फूलों की चादर बिछ जाए।देखा तुम मनहूस नहीं हो शैफालिके!
इसलिए पारिजातिके ! विष्णु की आराधना और धन की बरसात पर मै ंबिल्कुल विश्वास नहीं करता। मगर सोचो तो तुम मेरी राशि के लिए शुभ होने से कितनी सुरक्षित हो गई हो। अब चाहकर भी मेरी पत्नी तुम्हें उखाड़ नहीं सकती। तुम्हें न सही मेरे भाग्य को तो वह बचाएगी ही। तो प्रेम भले ही स्वीकार न करो, दीपावली की शुभकामनाएं तो स्वीकार कर ही सकती हो। हैप्पी दिवाली।

Thursday, October 15, 2009

कलाकार के हाथ

ब्रह्मा नाम है कलाकार का। कलाकार लकड़ी का काम करता है। फर्नीचर-रैक-अल्मीरा.....और दूसरे भी लकड़ी के इन्टीरियल-डेकोरेटिव काम करता है। प्लाईवुड का काम ज्यादा है इन दिनों। वह आसानी से मिलता है और यह काष्ठकर्मी उनसे मनचाहा व्यवहार कर सकता है। मनचाहे रूप दे सकता है। सागौन अब भी उपयोग में आता है, मगर वह नम्बर दो में है; क्योंकि उसका काम नम्बर दो में होता है। सागौन माफिया आपकी चाही हुई मात्रा में रात में चोरी की लकड़ी आपके घरों में बाकायदा चोरी की मर्यादाओं और आचार संहिताओं को पालता हुआ पटक जाएगा। ताकि चोरी का भ्रम बना रहे। दूसरे- तीसरे दिन वनरक्षक या वन विभाग का कोई कर्मी आपसे पूछेगा कि इस तरफ लगभग इतना माल आया है। क्या आप बता सकते हैं किसके यहां आया है ?
दरअसल वनकर्मी को पता रहता है कि कितना माल कब और कहां जाना चाहता है। चोर उनसे पूछकर ही चोरी छिपे का लिहाज रखते हुए काम करते हंै। आपने सुना होगा कि एक चड्डी गिरोह है। वह चोरी के लिए , डाका के लिए घरों में घुसता है। घरस्वामी हुज्जत किए बिना माल दे देना चाहता भी है तो वे धुनाई करते हैं। बाद में माफी मांगते हुए माल लेकर जाते-जाते कहते हैं-‘‘ माफ करना , बिना मेहनत की कमाई हमारे डाकाशास्त्र’ में हराम है।’’ सागौन चोरों के लिए भी चोरी का वातावरण बनाए बिना लकड़ी चुराना हराम है। वनकर्मी ही चोरांे के वास्तविक ठेकेदार होते हैं। अब आप अपनी पोजीशन के हिसाब से बात संभाल लेते हैं। दरअसल बात होती ही इसलिए है कि संभल जाए । काम में रिस्क होती है ,संभलकर चलने की सलाहें दी जाती हैं और बातें जो हैं कि संभलती रहती हंैऔर सारा काम कायदे से चलते रहता है।
मेरा नगर सागौनपुर या सगुणनगर है। सागौन या सागवान जिसे कहा जाता है, मुझे लगता है वह ‘सगुन’ शब्द से बना होगा। सगुण शब्द सागौन की गुणवत्ता की रक्षा करता है और उसके सम्पूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व को उजागर करता है। सागौन गुणवानांे की पहली पसंद है। इसलिए मैं सागौन को सगुण कहता हूं। इस नगर को सगुणनगर कहता हूं। यहां वही इज्जतदार आदमी है जिसके पास सारा फर्नीचर, दरवाजे खिड़कियां नम्बर दो की सागौन का है। आसपास सगुण-सागौन का सैकड़ों मील फैला घना जंगल है। फलस्वरूप ज्यादातर लोग यहां इज्जतदार हंै। लगभग सेंटपरसेंट। एक दो परसेंट वो लोग हैं जो सिद्धांतों की भूलभुलैया में परिस्थितिवश पड़े हुए हैं। जैसे कि गुरुदेव सामरिया। गुरु सामरिया मेरे घर के सामने रहते हैं। मेरी तरह वे भी सिद्धांतों की भूलभुलैया में घिरे हुए हैं। इसलिए सिद्धांतों के कारण जब वे परिस्थियों से पिटते है तो मैं उन्हें सान्त्वना देता हूं और कहता हूं-‘‘ सत्य परेशान तो हो सकता है मगर पराजित नहीं हो सकता।’’ यही बात वे मुझे कहते हंै जब मै परिस्थियों से सिद्धांत नामक आत्मज के कारण पिट जाता हूं। हम दोनों एक दूसरे के राहत केन्द्र हंै। प्रायः रोज ही हमें राहत की जरूरत पड़ती है और रोज ही हम एक दूसरे को वह ‘परेशानी और परास्त’ का सिद्धांत ,सूत्र या काढ़ा पिलाते रहते हैं। लोग समझते हैं कि हम दोनों में जमती है। इसीलिए किसी ने कहा है-‘‘खूब गुजरेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।’’
काष्ठकर्मी ब्रह्मा उनके घर में काट-छांट, ठुकाई-पिटाई कर रहा है। सामरिया गुरु भी अपनी अंटी को संभालते हुए उसके आसपास ही लगे हुए हैं। जैसा कि ऐसे मामलों में होता है ,मुझसे रहा नहीें जाता। मैं जानबूझकर किया गया नमस्कार उनसे करता हूं और सर्वर मिलते ही कहता हूं , ‘‘ गुरुदेव! क्या आप भी नगर की इज्जतदार परम्परा से जुड़े जा रहे हैं।’’
वे सान्त्वनेय होकर कहते हैं ,‘‘नहीं आदरणीय, पलंग ढीला हो गया था, दीवान का प्लाई घुन गया था , वही ठीक करा रहा हूं। यानी वही अपनी सीमाओं की रिपेयरिंग चल रही है। नगर के सभी लोग गणमान्य हो जाएंगे तो भगवान की नैया कौन चलाएगा ?’’मैं जोर से हंस पड़ा और बोला ,‘‘ मैं तो घबरा गया था कि आप भी साथ छोड़कर चले....’’
वे सान्त्वना के मूड में आ गए और बोले ,‘‘ नहीं नहीं कैसी बात करते हैं.... उधर भी साथ ही चलूंगा।’’
मैं आश्वस्त हो गया। यही तो मैं होना चाहता था। उधर , वहां और उस तरफ का ख्याल बना रहता है। हम दोनांे इन शब्दों के मतलब समझते हंै और वेदरक्षा करते हैं।
अचानक दोपहर में जब पढ़ने आए बच्चों को मैं निपटा रहा था तभी गुरुदेव के घर से लगभग झगड़ने जैसी आहट आयी। मैं राहत की थैली सम्हालते हुए दौड़ा। किस्सा-ए-मुख्तसर यह कि कलाकार कुछ कलाकारी करना चाहता था। पाए और प्लाई में कुछ नयी डिजाइनें डालना चाहता था और इसके लिए उसे नये सिरे से सामान चाहिए थे जो उससे जुड़े हुए प्लाई-विक्रेता के यहां ही मिल सकते थे। गुरुजी कला के विरोधी नहीं है और कलाकारों का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन उनकी मजबूरी यह है कि कला सिर्फ कला के लिए है और अपने बजट में वे उसे दखलंदाजी की छूट प्रदान नहीं कर सकते। मंदिर की आरती में जाकर वे शामिल हो सकते है ंमगर घर में मुर्ती स्थापित करने के वे पक्ष में नहीं हो सकते। वे भड़क गए थे। मै जब पहुंचा तो वे कह रहे थे -‘‘ भाई ब्रह्मा! तुम बहुत ऊंचे कलाकार हो ,तुम्हारा काम बहुत ऊंचा है, मैं तुम्हारे काम की प्रशंसा करता हूं। मगर तुम समझते क्यों नहीं कि तुम इस नगर के नगरसेठों के यहां काम नहीं कर रहे हो। तुम एक गुरुजी के यहां काम कर रहे हो। तुम उस ऊंचाई में जाकर मुझे क्यों पुकार रहे हो ? मैं नहीं चढ़ पाउंगा भगवन! मुझे माफ करो। और फिर इस पलंग पर मुझे सोना है, मुझे ... मुझे। किसी ऐश्वर्या राय या अमिताभ बच्चन को नहीं। हम आम आदमी की भूमिका नहीं कर रहे हैं , आम आदमी हैं। इसलिए इसे केवल पलंग बनाओ , अजंता और ऐलोरा है हिन्दोस्तान में।’’
काष्टकर्मी ब्रह्मा मुंह बाए गुरुजी का मुंह देख रहा था। पता नहीं वह उनकी बात समझ भी रहा था या नहीं मगर इतना जरूर समझ रहा था कि गुरुजी का बजट बिगड़ रहा है। मैंने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कहा-‘‘ जैसा कहते हैं वैसा ही बनाओ , कला को कहीं और के लिए सुरक्षित रखो।’’ ब्रह्मा ने थूक निगलकर सिर हिला दिया और ठोंक-पीट करने लगा। मगर उसका उत्साह धीमा पड़ गया था। गुरुजी ने उसके हाथ काट दिए थे। ये वो हाथ थे जो कला को तो आकार देना ही चाहते थे मगर गुरुजी की अंटी को भी क्षतिग्रस्त करना चाहते थे। जानबूझकर नहीं अनजाने में। कलाकार तो अपनी धुन में काम करता है। वह बजट की परवाह नहीं करता। क्यांेकि उसे काम का पैसा समय के हिसाब से मिल रहा है। बजट सामनेवाले का बढ़ रहा है। काष्टकर्मी का बजट बन रहा है। उसकी कला पेट के लिए थी। गुरुजी पेट काटकर काम करा रहे थे। उनका वश चलता तो खुद ही पलंग सुधार लेते। मगर पलंग बिना कारीगर या काष्टकलाकार के सुधरते ही नहीं। मजबूरी में उन्होंने बढ़ई को बुलवाया था।
खैर कला ने बजट के साथ समझौता कर लिया था। गुरुजी ने कहा, ‘‘आपको चाय पिलवाऊं आदरणीय’’ और बिना उत्तर ग्रहण किण् वे अंदर चले गए। उनके अंदर जाते ही कलाकार का दर्द मेरे सामने फूट पड़ा-‘‘ गुरुजी बेकार नाराज हो रहे हैं... ऐसा काम कर के देता कि लोग देखते और पूछते किसने किया.. मगर क्या करूं...मेरे तो हाथ कट गए..’’
मैंने कहा -‘‘ तुमको पता है कि पहले क्या होता था...ताजमहल बनते थे , कलाकार अपनी पूरी कला उसमें उड़ेल देते थे.. उन्हें राजा मुंहमांगा पैसा भी देते थे और ईनाम भी देते थे। मगर उनके हाथ काट लेते थे ताकि वैसी कला वह और कहीं दिखा ना पाए। तुम शुक्र करो कि तुम्हारे हाथ सलामत हैं, तुम्हारी कला बची हुई है। कहीं और उसका इस्तेमाल कर लेना।’’
मगर कलाकार का मन खिला नहीं। वह अब एक आम बढ़ई की तरह ठोंक पीट कर रहा था।

Saturday, October 3, 2009

प्रेम के माइम और दुख की मिमिक्री

दो धाराएं हैं जिनमें समाज बह रहा है। एक प्रेम है और दूसरा दुख। दुख होता है तो दिखाई देता है। प्रेम भी छुपता नहीं।
दुख दिखाई देता है तो पर्याप्त समय-प्राप्त लोगों को सहानुभूति होती है । करुणा और सान्त्वना आदि प्रदर्शित करने के प्रयासों की घटनाएं भी हो सकती हैं। दुख बहुत गंभीर हुआ तो भीड़ करुणा में इकट्ठी हो सकती है।
प्रेम दिखाई देता है तो चर्चा होती है। घृणात्मक आक्रोश होता है। हंगामा भी हो सकता है। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो सकती है। तमाशा देखने या आलोचना के पत्थर फेंकने। मजे लेने या थू थू करने....थू थू यानी अपने अंदर की गंदगी को बाहर उलीचने।
दोनों स्थितियों में भीड़ इकट्ठी हो रही है। भीड़वादी लोग इसका लाभ उठाने का वर्षोें से प्रयास करते रहे हैं। दुख के कारण और प्रेम के कारण गौण हो सकते हैं किन्तु भीड़ का लक्ष्य ऐसे लोगों के लिए गौण नही होता। यहां से प्रेम और दुख की अभिनय-यात्रा शुरू होती है। प्रेम और दुख के अभिनय देखकर लोग प्रभावित होते हैं और उसका जन-संचार करते हैं। दुबारा उसे देखने की कोशिश भी करते हैं। प्रेम और दुख के व्यावसायिक संगठन और संस्थान विभिन्न नामों से कार्यरत हैं। राजनैतिक, वाणिज्यिक, सामाजिक, धार्मिक ,गैर शासकीय ,आदि तरीको से प्रेम और दुख का अपेक्षित दोहन किया जा रहा है। दुख और प्रेम के दोहन की अपनी अपनी शैलियां और विधाएं हुआ करती हैं। अभिनय की परम्परागत शैलियों के अलावे एकाभिनय की दो विभिन्न शैलियां भी प्रचलित हैं। मूकाभिनय और एकल प्रदर्शन। अंग्रेजी में इन्हें हम माइम और मिमिक्री के नाम से जानते हैं।
माइम के माध्यम से अभिनेता या प्रस्तुतकत्र्ता लोगों की करुणा और वाहवाही लूटने की चेष्टा करता है। वह गंभीर उद्देश्यों की व्यंजनामूलक अभिव्यक्ति की कला है। मूकाभिनय के माध्यम से दर्शकों के दिमाग के जागे रहने की मांग इस कला में छुपी होती है। इसमें अनजाने और अछूते विषयों को छूने की कोशिश की जाती है।
मिमिक्री पूरी तरह प्रसिद्धों की विद्रूपताओ का माखौल या नकल होती है। इसमें ध्वनि और संवादों का पूरा प्रयोग होता है। दर्शक जिसमें हास्यानुभूति जीवित होती है वह दिमाग को एक तरफ सरकाकर मजे के स्वीविंग पूल में छलांग लगा देता और जोर जोर से हाथ पर हाथ और जमीन पर पैर पटक पअटक कर हंसता है। दिमाग ऐसे समय पूरी तरह आकसिमक अवकाश पर होता है और तरोताजा होकर फिर अपने दुख के भवसागर में माइम करने चला आता है।
कहते हैं वह सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार होता है जो सर्वाधिक दुखी होता है। अब तक भारत में हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई माने जा रहे हैं। उनहोंने अपने व्यंग्य से हंसाया भी है और खुद हंसे भी है। उन्होंने सवाल उठाया -‘‘ व्यंग्य क्या है ?’’ आगे उत्तर दिया -‘‘ चेखव ने कहा है ,‘ जो दुखाी होता है ,वह हास्य व्यंग्य लिखता है। जो सुखी होता है वह दुख का साहित्य लिखता है।’’’
व्यंग्य और हास्य में अंतर होता है। दुख की मिमिक्री करने से हंसी आती है। कुछ कलाकारों ने हंसते हुए रुलाया भी है। वे हास्य की भूमिका रचते हैं और लोग करुणा से भरने लगते हैं। मेहमूद यहां जीत गए। हंसाते हंसाते रुलाने में वे सिद्धहस्त कहलाए। उनके हास्य में तीखा व्यंग्य और आक्रोश भी दिखाई देता है। राजकपूर ने हमेशा नायक बनने का प्रयास किया । वे करुण पात्रों की हास्यास्प्रद परिस्थियों में करुणा की तलाश करते हुए नायक बनते थे। जोकर के अति कारुणिक परिस्थिति में हास्यास्प्रद होकर और रोकर वे न रुला सके न हंसा सके। उनकी उस कल्पना को भारतीय दुखवादी
दर्शकदीर्घा ने अस्वीकार कर दिया। यही भूल आलातरीन गायक मोहम्मद रफी ने की। ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ में जहां उन्होंने लयात्मक सिसकारी भरी है ,वह प्रभावहीन हो गई और मोहम्मद रफी फिसलकर नेपथ्य में चले गए। पर उनके अमर गीत आज भी अपनी जगह हैं। फिसलता इंसान है ; रचनाएं अपनी जगह खड़ी रहती हैं।
इन दिनों मिमिक्री को हास्य में तब्दील करके दर्शकदीर्घा में टी आर पी का जाल फेंका जा रहा है। मगर वह फूहड़ क्षणजीविता का हुनर है। दुख पर हंसना हम चाहते हैं क्योंकि दुख की घुटनभरी कोठरी से बाहर आना चाहते हैं। प्रेम हमारे लिए माइम ही बना हुआ है। प्रेम की बात चलते ही हम मूक हो जाते हैं। प्रेम में ‘हंसे तो फंसे’ का जुमला द्वि-अर्थी है।फंसने का अर्थ जीवन भर की मुसीबत मोल लेना भी हां सकता है। प्रेम की बात चलते ही हंसे तो अविश्वसनीयता के घेरे में आ जाओगे। वह मादक हंसी दूसरी है जो रक्त में तूफान पैदा करती है और हंसी को चुप्पी की मोहनी जकड़ लेती है।
राजनीति दोनों का सौदा करती है। एक ही व्यक्ति गंभीर राजनेता भी है और उद्देश्यपूर्वक हंसोड़ वक्तव्य देता है।लोग हंसते हैं तो वह अपनी सफलता पर खुश होता है और हंसता है। इसी हंसोड़ घोषणापत्र को लेकर वह देश के सर्वोच्च पद की चाहत भी रखता है। मगर वह सिर्फ प्रसाद नहीं है , लाल भी है और सिंह भी। शराब सबके असली चेहरे और नकली गंभीरता को उंडेल कर बाहर उलीच देती है। हंसाते हुए भी तुम कूटनीतिज्ञ हो और गंभीर होकर भी तुम मज़ाक कर रहे हो। जनता जानती है कि कौन कब जनता का नहीं है। राजनीति जनता को नहीं स्वयं को धोक़ा देने से शुरू होती है और स्वयं को छलती हुई खत्म हो जाती है। जयशंकर प्रसाद ने ठीक कहा था कि जब वीरता भागती है तो उसके पैरों से राजनीति के छल छंदों की धूल उड़ती है। 021009

Thursday, October 1, 2009

उम्मीद के चेहरे

सारे शहर में उसने तबाही सी बाल दी
अपना पियाला भरके सुराही उछाल दी

हमने उड़ाए इंतजार के हवा में पल
वो देर से आए ओ कहा जां निकाल दी

मां को पता था भूख में बेहाल हैं बच्चे
दिल की दबाई आग में ममता उबाल दी

जिस आंख में उम्मीद के चेहरे जवां हुए
बाज़ार की मंदी ने वो आंखें निकाल दी

नंगी हुई हैं चाहतें ,राहत हैं दोगली
‘ज़ाहिद’ किसी ने अंधों को जलती मशाल दी
021009/शुक्रवार

Sunday, September 20, 2009

जिनमें निश्छल दर्द हुआ है
उन गीतों ने मुझे छुआ है।

मुख्य-मार्ग में रेलम पेला
पथपर मैं चुप चलूं अकेला
खेल-भूमि पर हार जीत का
कोई खेल न मैंने खेला ।
बहुत हुआ तो चलते चलते
कांस-फूल को गोद लिया है।

फिसलन हैं ,कंकर पत्थर हैं
मेरे घर गीले पथ पर हैं
भव्य-भवन झूठे सपने हैं
अपने तो चूते छप्पर हैं।
छल प्रपंच के उजले चेहरे
निर्मल मन में धूल धुआं है।
मंगली हैं मेरे सब छाले
दिए नहीं मन्नत के बाले
मेरी नहीं सगाई जमती
कोई सगुन न मेरे पाले
हाथों कष्टों की रेखाएं
सर पर मां की बांझ दुआ है।


फिर भी मैं हंसता गाता हूं
जिधर हवा जाती जाता हूं
दिल में जो भी भाव उपजते
गलियों में लेकर आता हूं
बोया बीज न फसल उगाई
खुले खेत भी कहां लुआ है।
080909

Thursday, September 3, 2009

राष्ट्र-ऋषि नहीं कहलाएंगे शिक्षक



चाणक्य के देश में शिक्षक दुखी है ,अपमानित है और राजनीति का मोहरा है। वह पीर ,बावर्ची और खर है। खर यानी गधा। उस पर कुछ भी लाद दो वह चुपचाप चलता चला जाता है। आजादी के बाद से गरिमा ,मर्यादा और राष्ट्र-निर्माता के छद्म को ढोते-ढोते वह अपना चेहरा राजनीति के धुंधलके में कहीं खो चुका है। वह जान चुका है कि शिक्षकों के साथ राजनीति प्रतिशोध ले रही है। फिर कोई चाणक्य राजनीति के सिंहासन को अपनी मुट्ठी में न ले ले ,ऐसे प्रशानिक विधान बनाए जा रहे हैं।
आजादी के बाद इस देश में शिक्षकों को राष्ट्रपति बनाया गया। एक राजनैतिक चिंतक ने राष्ट्र को दार्शनिक-राजा द्वारा संचालित किये जाने की बात की थी। डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् जैसे प्रोफेसर को राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर बैठाकर भारत ने जैसे अपनी राजनैतिक पवित्रता प्रस्तुत की। राष्ट्रपति राधा कृष्णन् के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाए जाने से जैसे शिक्षकों और गुरुओं के प्रति राष्ट्र ने अपनी श्रद्धा समर्पित कर दी। लेकिन पंचायती राज्य ,जनभागीदारी और छात्र संघ चुनाव के माध्यम से शिक्षकों को उनकी स्थिति बता दी गई कि तुम राष्ट्र निर्माता नहीं हो ,सब्बरवाल हो।
शिक्षक राजनीति की तरफ बहुतायत से गए हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी शिक्षक हुए है। भारत के मध्यप्रदेश में दर्शनशास्त्र में स्वर्णपदक प्राप्त मुख्यमंत्री पदस्थ हैं। शिक्षामंत्रालय में भी महाविद्यालयीन शिक्षिका मंत्राणी होकर आई हैं। शिक्षा क्षेत्र में नये-नये प्रयोग वे इन दिनों कर रही है। स्कूल शिक्षा और तकनीकी शिक्षा को भी वही संभाल रही हैं। वे शिक्षकों को देखकर शब्दों की भीगी ओढनियां हवा में उड़ाने लगती हैं कि छींटें शिक्षकों पर पड़ें और वे गदगद हो जाएं। मुख्यमंत्री भी लगातार अपने दार्शनिक स्वर्णपदक को रगड़ रगड़कर शब्दों के जिन्न पैदा कर रहे हैं। एक तरह से शब्दों का मायाजाल रचकर वे प्रदेश को नये स्वप्नलोक में पहुंचा रहे हंै। उनके मूल राजनैतिक दल में मंसूबों और नीयत के खतरे मंडरा रहे हैं। जलती हुई फुलझड़ी के तिनगों की तरह कद्दावर नेता टूटकर बिखर रहे रहे हंै और मुख्यमंत्री अपने दर्शनशास्त्र के तर्कवाक्यों से प्रदेश में नयी क्रांति का शब्दव्यूह रचे जा रहे है। शिक्षकों को लुभाने के लिए उन्होंने एक नया शब्दास्त्र फेंका है। शिक्षिका से मंत्राणी हुई उनकी सहयोगी ने शिक्षक दिवस पर शिक्ष्कांे और गुरुजियों को राष्ट्र-ऋषि की उपाधि से सम्मानित करने की घोषणा की है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने अध्यापकों को शिक्षाकर्मी कहकर अपमानित किया था। फलस्वरूप वे निर्वाचन में अप्रत्याशित पराजय से पराभूत होकर आत्मनिर्वासन के महात्याग और संकल्पों की पैन्टिंग बनाने में लगे हैं। पराजित होकर देश की जनता को लुभाने का अंदाज कलयुगी है। कलयुग के प्रारंभ में दो दो राजकुमारों ने चरमोत्कर्ष के क्षणों में सत्ता का त्याग किया था। वह वास्तविक आत्मसाक्षात्कार का वीतराग था। सात्विक जनकल्याण का मार्ग था। उन्हीं सिद्धार्थ और वर्धमान के इस देश में भीषण नरसंहार के बाद आत्मग्लानि से बैरागी बननेवाले राजा अशोक भी दार्शनिक दृष्टांत हैं। दूसरी ओर शिक्षकों द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री ने अपने पहले दौर में उन्हें फिर अध्यापक बनाया और अब राष्ट्र-ऋषि कहकर वह उन्हें सर्वोच्च सम्मान देने का राजनैतिक भ्रम खड़ा कर रहे हैं। दूसरी ओर महाविद्यालयीन शिक्षकों को अभी तक छटवां वेतनमान यह दार्शनिक सरकार घोषित नहीं कर पायी है। देना तो दूर। जबकि केन्द्र सरकार की विश्वविद्यालय अनुदान आयोंग की सिफारिश पर केंन्द्र सरकार नया वेतनमान की अस्सी प्रतिशत अंशदान दे चुकी है। ऐसे दोहरी नीतियों के चलते राष्ट्रऋषि का खिताब शिक्षक कैसे स्वीकार करें ? शिक्षकों ने इस सम्मान को अपना अपमान माना है ,छल समझा है।
क्यों मान रहे हैं शिक्षक राष्ट्र-ऋषि के खिताब को अपना अपमान ? हमारे पूजनीय पुराणों में निरंकुश और दुराचारी राजाओं ने ऋषियों का सतत् अपमान किया। उनके आश्रमों पर हड्डियां और मांसफेंका। उन्हें पकड़कर मारा पीटा। क्यों ? क्योंकि शिक्षक धर्म और नैतिकता पर आधारित एक सामाजिक समाज का निर्माण चाहते थे। असामाजिक तत्वों को इससे खतरा था। आतंक और अत्याचार पर टिका हुआ उनका राज्य ध्वस्त होता था। उन्होंने ऋषियों को जिन्दा भी जलाया। शिक्षक कुराजाओं के राज्य में अपना हश्र देख चुके हैं। पुराणों और पुरखों की दुहाई देने वाले पुरोधाओं के पिछलग्गू राजाओं द्वारा अब कौन ऋषि कहलाना चाहेगा ? क्या ऋषि कहकर तुम भविष्य के तमाम अत्याचारों को विधिक स्वरूप देने की फिराक में हो ? यही पूछ रहा है शिक्षक।
अब सरकार सकते में है। वसिष्ठ से दुर्वासा हुए शिक्षकों को कैसे मनाए। राजनैतिक दांव का वह कौनसा पांसा फेंके कि शिक्षक चारोंखानों चित्त। शिक्षक दिवस को अभी दो दिन बाकी हैं।
ग़ालिब के शब्दों में -
थी हवा गर्म की ग़ालिब के उड़ेंगे पुरजे ,
देखने हम भी गए थे पै तमाशा न हुआ ।

मित्रों ! आप क्या सोचते हैं ? क्या होगा शिक्षक दिवस पर ? दार्शनिक सरकार शिक्षकों के दर्द को समझेगी या तमाशा होगा ? 03.09.09

Tuesday, September 1, 2009

तोता उड़ गया



और आखिर अपनी आदत के मुताबिक मेरे पड़ौसी का तोता उड़ गया। उसके उड़ जाने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। वह दिन भर खुले हुए दरवाजों के भीतर एक चाौखट पर बैठा रहता था। दोनों तरफ खुले हुए दरवाजे के बाहर जाने की उसने कभी कोशिश नहीं की। एक बार हाथों से जरूर उड़ा था। पड़ौसी की लड़की के हाथों में उसके नाखून गड़ गए थे। वह घबराई तो घबराहट में तोते ने उड़ान भर ली। वह उड़ान अनभ्यस्त थी। थोडी दूर पर ही खत्म हो गई। तोता स्वेच्छा से पकड़ में आ गया।
तोते या पक्षी की उड़ान या तो घबराने पर होती है या बहुत खुश होने पर। जानवरों के पास दौड़ पड़ने का हुनर होता है , पक्षियों के पास उड़ने का। पशुओं के पिल्ले या शावक खुशियों में कुलांचे भरते हैं। आनंद में जोर से चीखते हैं और भारी दुख पड़ने पर भी चीखते हैं। पक्षी भी कूकते हैं या उड़ते हैं। इस बार भी तोता किसी बात से घबराया होगा। पड़ौसी की पत्नी शासकीय प्रवास पर है। एक कारण यह भी हो सकता है। हो सकता है घर में सबसे ज्यादा वह उन्हें ही चाहता रहा हो। जैसा कि प्रायः होता है कि स्त्री ही घरेलू मामलों में चाहत और लगाव का प्रतीक होती है।
दूसरा बड़ा जगजाहिर कारण यह है कि लाख पिजरों के सुख के बावजूद ; लगाव ,प्रेम ,लाड़ और देखभाल के बावजूद तोते अपनी पक्षीगत उड़ान पर निकल जाते हैं। हर पक्षी का यह स्वभाव है कि वह आकाश में स्वच्छंद उड़े। चील और बाजों के भय के बावजूद वह उड़ान भरे। तोते को चूंकि प्यार से पाला पोसा जाता है क्योंकि वह मनुष्यों की बोली की नकल कर लेता है। मम्मी तो बोलता ही बोलता है। बाकी के शब्द भी वह दोतराता है। ऐं ऐं की टें टें तो दिन भर करता रहता है। हंसता है ,छोटे छोटे वाक्य बोल लेता है। चिढ़ाता भी है। मैने अपने तोते को लड़की की छींक के बाद छींकते देखा सुना है। लड़की को भाई या मां की सच्ची झूठी डांट पड़ती है तो उसे हंसते देखा है। तोते कमाल के मनोरंजक पालतू पक्षी हैं। लेकिन वे इन सब के बावजूद किसी घर के होकर नहीं रह जाते। मौका मिलते ही उड़ जाते हैं। उनके इसी स्वभाव के कारण तोतों को बेईमान कहा गया है। मगर इस बेईमानी के बाद भी उसे पालना लोग छोड़ते नहीं। उसे अनुकूल बातें सिखाना नहीं छोड़ते। उसे हिफाजत से पिंजरे में रखना नहीं छोड़ते। मनुष्य कहना चाहता है कि हजार धोकों के बावजूद विश्वास और आशा वह नहीं छोड़ेगा।
एक होता है कबूतर । वह केवल गुटरगूं करता है। उसे बहुत कम लोग पालते हैं। वह लौटकर आता है। दिन भर इधर उधर उड़ता है और शाम होते ही अपने दड़बे में लौट आता है। पालनेवाले उसे पहचानते हैं और वह पालनेवालों को । पालनहार के घर को भी कबूतर पहचानते हैं। उसके उड़ने का कभी खतरा नहीं । इसलिए वह पिंजरे में नहीं होता। वह कभी संदेश लेकर जाता भी था और आता भी था।
कबूतर शांति और निष्ठा के प्रतीक हैं। केनेडी और नेहरू उन्हें आकाश में उड़ाते थे कि वही शांति और निष्ठाएं आकाश की ऊंचाइयों से फिर जमीन पर आएं।

इतिहास में एक कहानी है कि दो प्रेमी राजा रानी बगीचे में दो पक्षियों से खेल रहे हैं। किसी काम से राजा थोड़ी देर के लिए कहीं जाता है और पक्षियों को वह रानी के हाथों में दे जाता है। लौटता है तो देखता है कि रानी के हाथ में एक ही पक्षी है। राजा पूछता है एक कहां गया ?
रानी कहती है उड़ गया। राजा पूछता है -कैसे ? रानी दूसरा हवा में उछालकर कहती है- ऐसे। जिस फिल्म में मैंने यह शाट देखा था उसमें प्रेयसी के हाथ में कबूतर थे। मगर कबूतरों और तोतों के चरित्रों का विश्लेषण करनेपर साफ पता चलता है कि यह शाट निर्देशक ने अपनी टेक और रिटेक की सुविधा की दृष्टि से किया है। तोते एक बार उड़े तो उड़ेही उड़े। कबूतर दुबारा लौटेंगे और उन्हें वापस उनके मालिकों को दिया जा सकेगा। तोतों के साथ रिस्क और अनावश्यक समय की बर्बादी है। कितने रिटेक होंगे उस हिसाब से तोते रखने होंगे। जबकि दो कबूतरों से काम निकल जाएगा और वे मूलधन की तरह वापस आएंगे। ब्याज में किराया तो मिल ही रहा है। तोते तो किसी प्रोजेक्ट की निश्चित असफलता से डूबनेवाली लागत भी हैं और चूंकि लोन लेकर प्रोजेक्ट लांच किए जाते हैं इसलिए ब्याज भी डूबता है। अस्तु , हाथों से जो उड़े वो तोते ही थे ;कबूतर नहीं। इसलिए तोता उड़ना मुहावरा है सब कुछ के नष्ट हो जाने का।
ेबच्चों के सामान्यज्ञान और सतर्कता से संबंधित एक मासूम सा खेल है। जमीन पर बच्चों से हाथ रखकर कहा जाता है- तोता उड़ , चिड़िया उड़ , कबूतर उड़ , चील उड़ , तीतर उड़ , बटेर उड़ ,बगुला उड़ आदि। बच्चे हर बार हाथ जमीन से उठाकर उड़ने का समर्थन करते हैं। इसी बीच खेल का संचालक भैंस उड़ /हाथी उड़ /गैंडा उड़ का अप्रत्यासित पासा फेंकता है और प्रायः एक दो हाथ उड़ने के सकेत में अभ्यासवशात उठ जाते हैं। वे बच्चे फाउल हो जाते हैं या आउट हो जाते हैं। उन्हें दंड देना पड़ता है। वे सतर्क बच्चे नहीं हैं जो न उड़नेवालों को भी उड़ा देता है। इस खेल से उड़ने और नाउड़नेवालों की अच्छी पहचान हो जाती है। लेकिन मित्रों ! यह जिन्दगी है। लाख सिखाने के बाद भी बहुत कुछ अनसीखा रह ही जाता है।
इसलिए पुरखों के जमाने से यह बात हम सुनते आएं हैं कि तोते उड़ गए। तोते उड़ गए यानी सारा किया धरा मिट्टी में मिल गया। अच्छे दिनों के साथी की उम्मीद में जिसे पाला पोसा ,जिसकी हर बात का ध्यान रखा ,अंत में वही उड़ गया। धोका ,विश्वासघात तुम्हारे साथ हुआ ,मगर चलो जरा तोते से पूछें कि वह क्यों उड़ा।
लोग घर और जीवनसाथी के बिना जिन्दगी बेकार समझते हैं। फिर एक तोता भरा पूरा परिवार और आराम की जिन्दगी छोड़कर मुंह फेरकर क्यों उड़ जाता है ? अगर आजादी ही प्राकृतिक है तो मनुष्य पिंजरे क्यों बनाता है ? अपने लिए और उड़ जानेवालों के लिए। लौटकर घर और दड़बों तक आनेवाले ,केवल गुटरगूं करनेवाले कबूतरों से ज्यादा प्यार उन तोतों को क्यों मिलता है ,जो बोलते तो मीठा हैं ,मगर एक दिन ऐसे उड़ जाते हैं कि जैसे कभी वास्ता ही नहीं था। 31.09.09

Friday, August 14, 2009

प्रेम की पत्रकारिता


मेरे एक मित्र के ब्लाग में एक पत्रकार मित्र ने बड़े दुख और क्षोभ के साथ लिखा है कि देखो प्रोफेसर मटुकनाथ भी पत्रकारिता के अखाड़े में उतर रहे हैं। हिन्दी के प्राफेसरों से उन्हंे खास शिकायत है। ये प्रोफेसर वो साम्राज्यवादी सामन्त लोग हैं जो हर मामले में टांग अड़ाते हैं, कही भी उतर जाते है। देखा कि कोई बाजार है तो ये अपनी दूकान खोलकर बैठ जाते हैं। इनसे स्वरोजगार से जुड़े हुए लोग बेरोजगार होते हैं। प्रोफेसर डॉ. मनमोहन प्रधानमंत्री बन गए। प्रो. दंडवते, प्रो. जोशी वगैरह कितने ही लोग हैं जो राजनीति के रास्ते से संसदमें घुस गए।
मैं झल्लाए हुए मित्र के पक्ष में हूं। एक उच्च शिक्षा मंत्री हुई महिला प्रोफेसर की हालत को देखकर मैं चिंतित हूं। मैंे अपने विद्यार्थीकाल से ही प्रोफेसरों की आलोचना और उनकी मूर्खताओं के किस्से सुनते आया हूं। एक बीए पास राजनैतिक कार्यकर्ता और एजेन्ट और लेखक को मैंने ज्ञान का ठेका करते देखा है। वे प्रोफेसरों के शंत रवैये से नाखुश थे। जो किताबें वे चाहते थे उन्हें न पढ़नेवाले प्रोफेसर को वे वज्र मूर्ख कहकर नकार देते थे। सैकड़ों लोगों की तरह वे भी यह मानते थे कि जो कहीं कुछ नहीं कर पाते वे कालेज में प्रोफेसर हो जाते है।
नई पीढ़ी मे प्रोफेसर बनने के लिए कोई रुझान नहीं हैं। बी ई , एम बी बी एस ,एम बी ए , कम्प्यूटर , आई टी आई जैसे रोजगार मूलक कार्यक्रमों की तरफ उनका झुकाव है। राज्य सेवा परीक्षा जैसे प्रशासनिक कैरिसर की तरफ वे झुक जाते हैं। शिक्षकों और प्रोफेसरों को नया समाज बैल और ढोर समझता है। उनसे पढ़ाना छोड़कर बाकी के सारे काम लिए जाते हैं। आज शिक्षक समाज के निकृष्ट श्रमिक हैं , दलितवर्गी लोग हैं। कलेक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों सहित समाज का अनपढ़ पत्रकार भी उन्हंे आंखें दिखाते हंै। शिक्षक समाज का वह गला हुआ अंग है जो आखिरी सांसों की तरह प्रशासन ,राजनीति और समाज का कामकाज गिन रहा है। प्रसिद्ध प्रशासनिक लेखक श्रीलाल शुक्जल ने ठीक ही कहा है कि शिक्षा सड़क के किनारे बैठी वह कुतिया है जिसे हर कोई लात मारक र चला जाता है। ऐसी स्थिति में प्रोफेसर मटुकनाथ पत्रकारिता जैसे पवित्र और प्रतिष्ठित पेशे की तरफ बढ़ रहे हैं। अनर्थ ,घोर अनर्थ।
प्रोफेसर मटुकनाथ को कौन नहीें जानता। अपनी शिष्या के साथ प्रेम करके बहुप्रचारित हुए हजारों गुरुओं में से एक चैधरी मटुकनाथ भी हैं। महाविद्यालय प्रबंधन ने उनकी सेवाएं निरस्त करदी है ताकि वे ठीकसे प्रेम कर सकें। प्रेम व्यक्तिगत वस्तु है , ध्यान की तरह। यदि उसका व्यवसाय नहीं किया जा रहा है तो। प्रेम को व्यावसायिक और सार्वजनिक तौर पर प्रचारित-प्रसारित करनेवाले लोग मुम्बई की ओर बढ़ते हैं। मटुकनाथ पत्रकारिता की ओर बढ़ गए। हालांकि प्रेम की भी पत्रकारिता होती है। चूंकि प्रेम शब्दों से ज्यादा देह के हाव-भाव और क्रिया-कलापों का विषय है। इसलिए विजुएलाइजेशन के दौर में जब मोबाइल ,नेट और वीडियो सीडीज़ युवाओं को आसानी से उपलब्ध हैं तब प्रिंटिंग एरिना में घुसना कोई अक्लमंदी नहीं हो सकती। ब्लैकमेलिंग करनेवाले बेरोजगारों और आपराधिक जीवन को सत्य मान लेने वालों की बात और है। वे किसी भी एरिना में हिट हो सकते हैं। लेकिन प्रेम करनेवालों के लिए सीधा और दर्शनीय माध्यम ही सही है। पता नहीं मटुकनाथ ने इस दिशा में विचार क्यों नहीं किया। जबकि प्रो. मटुक और जूली दोनों बॉडी-लैंगुएज और अभिनय के मामले में प्रवीण हैं। लोग उन पर फिल्म भी बनाने के लिए उत्सुक हैं। वे फिल्मों में पैसा भी कमाएं , विज्ञापन फिल्में करें ,ब्लॉगिंग करें और अपनी शेष जिन्दगी पूरी करें। चाहते ही हैं तो पत्रकारिता भी करें। परन्तु जैसा कि मैंने कहा ,यह रास्ता प्रेम करनेवालों के लिए नहीं है। प्रश्न सहज और स्वााभाविक है कि पत्रकारिता क्या है और किनके लिए है ? तीन चार विषयों में एम.ए. और पी.एचडी करनेवाले भारतीय राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के अनुसार ,‘ पत्रकारिता पेशा नहीं है। जनता की सेवा है।’ यानी यह जनता की सेवा है और जन-सेवा की भावना रखनेवाले लोगों को इस क्षेत्र में आना चाहिए। इसी प्रकार पश्चिमी पत्रकार जेम्स मैकड¨नॉल्ड कहते हैं कि पत्रकारिता रणभूमि से अलग है और पेशे से भी ऊंची को चीज है। वे स्वीकार करते हैं ,‘यह एक जीवन है जिसे मैं स्वीकार करता हूं।’ इसका क्या तात्पर्य हुआ ? जेम्स कहना चाहते हैं कि इसे मैंने स्वीकार किया और इस तरह स्वीकार किया है कि यह पेशा नहीं है। एक जीवनसंघर्ष है।
दूसरी ओर एस के मेहता जैसे विद्वान हैं जो मानते हैं कि पत्रकारिता एक ऐसा सोचा-समझा और गढ़ा गया उत्पाद है जो अपना खास उपभोक्तावर्ग तैयार करता है और उनमें निरंतर अपने लिए चाहत और खिंचाव पैदा करता है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए पश्चिमी विद्वान जोसेफ पुलित्ज़र पत्रकारिता को बेहद गंभीर सामाजिक उत्तरदायित्व मानते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ‘‘उच्चतम विचारों ,सत्य के प्रति आत्यंतिक जिज्ञासा और तथ्यों की सटीक जानकारी ही पत्रकारिता को बचाए रख सकती है।’’
सवाल यह है कि कहां हैं ऐसे लोग जो इन बातों को मानकर पत्रकारिता के क्षेत्र में दाखिल होते हैं ? वे मित्र जो मटुकनाथ जैसे लोगों के आने से विचलित हैं या भयभीत हैं ,वे लोग जो पदों के हिसाब से बुद्धियों को चिन्हित करते हैं या वे लोग जो हरकारे होकर छù पत्रकार बनकर ब्लैकमेलिंग करते हैं इन बातों पर खरे उतरते हैं ? वे लोग सही हा सकते हैं जो इसे विचार संप्रेषण ,संपादन ,मुद्रण प्रकाशन आदि की कला मानते है और नित्य नई नई चुनौतियों को स्वीकार करते हुए हर आगनतुक का भव्य स्वागत करते हैं।
अब रही बात प्रोफेसरों के इस इलाके में दाखिल होने की। यह बात सिरे से गलत है कि किसी वर्ग या पद्धति का व्यक्ति ही बौद्धिक होता है। जैसे किसी जाति या संप्रदाय के पास ज्ञान कुंडलित है। हजारों शिक्षकों में से कोई विरला शिक्षक राधाकृष्णन होता है। किसी भाषा या संकाय के हवाले साहित्य या प़कारिता नहीं रही। अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं सहित विश्व की सभी भाषाओं पर चिकित्सक, प्रशासनिक अधिकारियांे , अन्य भाषा के विद्वानों ने लेखन किया है और पुस्तकें प्रकाशित कराई हैं जिनका विश्व साहित्य में सम्मान भी है। जो जिस विधा में श्रम करेगा वह वहां पायेगा ही। थोड़ा या ज्यादा की बात यहां नहीं है।
आने दें प्रो. मटुकनाथ चैधरी को भी। जूली की तरह पत्रकारिता को भी उनका भविष्य तय करने दे। वे आत्मरक्षा का प्रयास कर रहे हैं। शायद वे अकबर इलाहाबादी के इन शब्दों को अपना आदर्श बना कर पत्रकारिता के क्षेत्र में कूद पड़े हैं कि - खींचों न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो ।
09/120809

Thursday, August 13, 2009

अथ सुअर-वार्ता


अथ सुअर-वार्ता उर्फ ‘स्वाइन-फ्लू’

तमस का आरंभ भीष्म साहनी ने सुअर के दड़बे में सुअर-युद्ध से किया है। सुअर अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है और उपन्यास का पात्र कुछ राजनैतिक व्यक्तियों की दुरभिसंधि के लिए सुअर को लाश बनाने के लिए अपनी जान का दांव खेल रहा है। अस्तित्व का संकट दोनों के सामने है। आदमी के हाथ में हथियार है और सुअर के पास केवल नैसर्गिक जिजीविषा है। सुबह अभी हुई नहीं है। अंधकार दोनों के लिए एकसा है। दोनों आहटों की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक आहट पर वार कर रहा है ,दूसरा आहट के साथ होनेवाले वार से खुद को बचाता हुआ सापेक्षिक प्रहार कर रहा है। बचाव की रणनीति सुअर की है। अंत में दुष्ट-प्रयास जीत जाता है और निरीह सुअर मारा जाता है।
भारत में धर्मान्धता को भड़काकर हिन्दू- मुस्लिम दंगे कराने के लिए मरे हुए सुअर को हथकण्डे के रूप में रातनीतिक लोग प्रयुक्त करते हैं। यही बात भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में बुनी है। सुअर को आधार बनाकर सांप्रदायिक दंगे की व्यूह रचना मानवीय विकास हो सकता है लेकिन मनोवैज्ञानिक उसे उन्माद कहते हैं। धार्मिक-उन्माद। वह भी एक प्रकार का फ्लू है -रिलीजन फ्लू।
भारत के लिए ‘सुअर-रोग’ यानी ‘स्वाइन-फ्लू’ नया है। किन्तु जिस सुअर को हम घृणा की दृष्टि से देखते हैं वही सुअर भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पुराणकाल से उपस्थित है। तैंतीस करोड़ आर्य देवताओं में वराह देवता भी हैं। विष्णु के वराह रूप में अवतार लेने से ही दशावतार पूर्ण होते हैं। वराह यानी यही आज का लोकप्रिय सुअर। आज जिस सुअर ने पूरे विश्व को
मृत्यु के आसन्न संकट में डाल दिया है ,उसी सुअर ने एक दिन रसातल में डूबी हुई पृथ्वी को अपने खीस में उठाकर उसे जीवनदान दिया था। उस मुक्तिदाता को जंल मिला। वह जंगली सुअर कहलाया जिसे खीस होते हैं ,हाथी की तरह थूथन से निकले हुए। हाथी और सुअर के अंतर्संबंध की बात जीवविज्ञानी जाने किन्तु देखने में दोनों में विकासात्मक अंतर दिखाई देता है। हाथी अवतार नहीं है ,वराह अवतार है।
अंग्रेजी में स्वाइन या पिग कहे जानेवाले खीसविहीन पालतू प्राणी को हिन्दी में सुअर ,शूकर और वराह कहते हैं। कभी कभी प्यार से इसे सुंगरा या सूंगर भी लोग कहते हैं। मेरे पड़ोस में एक संभ्रांत महिला है जो अपने बच्चों की एकांतप्रियता को कोसती हुई ब्याजनिंदा में प्यार से कहती है, ‘हमारे बच्चे सूंगर है साले, कहीं आते जाते नहीं ,किसीसे मिलतेजुलते नहीं।’ जब मां कहती है तो हर गाली आंचल की तरह लिपट जाती है। फिर चाहे वह सुअर ही हो।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सुअर के देवावतरण के कारण हिन्दू इसे प्यार करने लगे हों , इसकी पूजा करने लगे हों। भारत मे इतनी धर्मान्धता नहीं है। भारतीय जनता अपनी सुविधा और लाभ की दृष्टि से किसी की पूजा करती है और नुकसान या भय के कारण उससे घृणा करती है। मनोरंजन और आत्मश्लाघा के लिए भी वह घृणा के सूत्र बंटती है। सुअर पौराणिक होने के बावजूद किसी के सम्मान के लिए उपयोग नहीं आता। सुअर , बौना , कुत्ता ,कछुआ, मछली आदि भले ही भारतीय धर्म की अवतारात्मक अभिव्यक्तियां है किन्तु किसी को कोई इस तरह अभिनंदित नहीं करता कि आप हमें सुअर ,बौने ,कुत्ते ,मछली या कछुए की तरह पूज्य लगते हैं। व्यावहारिक दृष्टि से धर्म उनके व्यक्तिगत उपयोगके लिए नहीं है जिन्होंने उसकी रचना अपने लाभ के लिए की है और बाकी लोगों पर लागू करने के लिए की है। इसीलिए दशावतारों में से एक होने के बाद भी भारत में सुअर अस्पश्र्य है, निकृष्ट है ,उपेक्षणीय है।
दूसरी तरफ शेष विश्व है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुअर का बच्चा यानी पिल्ला बचत का फण्डा है। पिगी-बैंक के नाम से वहां बच्चों को बचत सिखाने के लिए चीनी मिट्टी का पिगी उपलब्ध है। इजराइल के प्रसिद्ध युवा लेखक एतगार केरेत ने हिब्रू में एक बहुत ही मार्मिक कहानी लिखी है। यह कहानी एक पिता द्वारा अपने बच्चे को बचत सिखाने की भावना से रची गई है। इसलिए हिन्दी में प्रस्तुत करते समय अनुवादक ने इसका नाम ‘सीख ’ रखा है। कहानी का सारांश यह है कि बच्चा किसी महंगे खिलौने की मांग करता है और पिता उसमें फिजूलखर्ची के खिलाफ बचत के संस्कार डालने के लिए एक पिगी-बैंक खरीद कर देता है और कहता है कि जब पिगी के पेट में इतने सिक्के हो जाएंगे कि उसका बजना बंद हो जाए तो वह खिलौना उसे उन्हीं पैसों से खरीदकर दे दिया जाएगा। पिगीबैंक यानी सुअर के पिल्लेनुमा गुल्लक के पेट में सिक्का डालते डालते बच्चे को साहचर्य के कारण उससे लगाव हो जाता है। वह उस पिगी के साथ खेलता है बातें करता है ,उसे पोंछता है, नहलाता है और उससे अलग नहीं हो सकता। एक दिन वह भी आता है कि पिगी का पेट बजना बंद हो जाता है। यही उसका अंतिम दिन है। पिता पिगी को बजाकर देखते हैं और बच्चे को हथौड़ी थमाकर कहते हैं कि तोड़ो पिगी का पेट और निकालो पैसे। कल तुम्हारा खिलौना तुम्हें मिल जाएगा। आंख में आंसू लिए बच्चा उस रात की मोहलत मांग लेता है और एकांत मिलते ही उस पिगी को बचाने के लिए एक झाड़ी में छुपा देता है। बचत सीखते-सीखते बच्चे मानवीय रिश्तों को नर्मी सीख जाते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक ने शायद इसी कहानी से प्रेरणा लेकर एक योजना शुरू की है। प्राथमिक तथा मिडिल स्तर के बच्चों को बचत की बेंकिंग सिखाने के लिए ‘राजू और आसमान की सीढ़ी; तथा ‘राजू और पैसों का पेड़ ’ नामक दो किताबें स्कूलों को प्रेषित की है। इस समाचार के साथ एक पिगी-गुल्लक के छेद में सिक्का गिरते हुए दिखाया गया है। सुअर फायदे का प्रतीक है। एक साथ सुअर बारह बच्चे देती है। इतनी किफायती जन्मदर शायद ही किसी दूसरे प्राणी की हो। विदेशों में सुअर व्यापारिक दृष्टि से लाभ का धंधा है। विदेशों में पिग-फार्मिंग यानी सुअर की खेती की जाती है। जैसे भारत में कुक्कुट या मुर्गी पालन ,भेड़ पालन ,बकरी पालन ,मछली पालन किया जाता है। अच्छी तरह पालपोसकर उपयुक्त समय पर उसे काट डाला जाता है। जैसे कृषि आदि उत्पादन में किया जाता है। बाकायदा बीजारोपण के बाद तमाम तरह की देखभाल की जाती है। देखा जाता है कि उन्हें कैसे पुष्ठ किया जाए कि उसका बाजार भाव ऊपर उठ जाए। भारत में सरकार आजकल पिगरी , पोल्ट्री , फिशरीज को बढ़ावा देने के लिए अनुदान और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। पिगरीज या शूकर-कृषि में बर्ड-फ्लू की तरह का खतरा भी नहीं है। बर्ड फ्लू मुर्गियों को होता है जबकि ‘स्वाइन-फ्लू’ यानी ‘पिग-इन्फ्लूएंजा’ आदमियों को रहा है। मेरी पत्नी ने पूछा है कि सुअरों को होनेवाला स्वाइन-फ्लू आदमियों को क्यों हो रहा है ? क्या हो सकता है संभावित उत्तर ? वह उत्तर जो श्रीमतीजी के कुकर में पक रहा है ? शायद यह कि आदमी ही सुअर हो गया है इसलिए !
बहरहाल सुअर आज बहुत लोकप्रिय हो रहा है। घर घर उसकी चर्चा है। देशी सुअरों की तरफ हम देखना भी पाप समझते रहे हैं। स्वाइन-फ्लू के चलते अब उसे लोग देख रहे हैं कि यही है आज जो टीवी और अखबारों में छाया हुआ है। एक अवसर होता है छाने का और सुअर भी छा जाता है। लोगों को ऐड़ियां घिसते सालों बीत जाते हैं और वह लोकप्रियता की एक पायदान नहीं चढ़ पाते।
इति सुअर-वार्ता ।
दि. 110809

Tuesday, July 21, 2009

सदी का महानायक: कुत्ता


इक्कीसवीं सदी में एक नया इतिहास बना है। ओबामा साहब राजनैतिक विश्व में सबसे शक्तिशाली देश के पहले ग़ैर-श्वेत नस्ल के राष्ट्रपति के रूप में सत्तारूढ़ हुए हैं। विद्वान हैं ,उत्साही हैं ,सुलझे हुए हैं और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। हालांकि उनकी विद्वता ,उत्साह ,सुलझाव और आत्मविश्वास की दिशाएं पूरी तरह खुली हुई नहीं हैं। अमेरिका को इसलामिक राष्ट्र और पुतिन को राष्ट्रपति कहकर उन्होंने संकेत जरूर दिया है कि वे किधर जा रहे हैं। पर इतिहास रचनेवाले तो वे हमेशा रहेंगे।
बराक साहब की लोकप्रियता का एक और कारण है । पद पर आकर उन्होंने सबसे पहले जिस प्राणी की खोज की वह एक शानदार जानदार समझदार कुत्ता था। इसके साथ ही मनुष्य समाज का सबसे वफादार दोस्त कुत्ता नामक प्राणी दुनिया भर में फिर चर्चा का विषय बन गया। दुनिया भर के बलागर्स में कुत्ते भी शामिल हुए । उन्होंने न केवल बराक ओबामा को कुªªत्ता जाति को सम्मानित करने के लिए धन्यवाद प्रेषित किये बल्कि अपने-अपने रिज्यूम भी भिजवाए ताकि उनका यथास्थान नियोजन हो सके।
यद्यपि यह पहली बार नहीं हुआ कि कोई कुत्ता सत्ता के गलियारों में इतने शानदार ढंग से प्रविष्ठ हुआ हो। महाभारत काल में महाराज युधिष्ठिर के पास भी एक कुत्ता था जो विश्व इतिहास का पहला महानायक है। महानायक इस अर्थ में कि सारे पंचनायक अपनी अवसान बेला में हिमालय जा रहे थे और उनके साथ सबसे आगे युधिष्ठिर का कुत्ता भी था। एक एक कर सारे नायक और महानायिका भी मार्ग में ध्वस्त हो गए किंतु कुत्ता अपनी संपूर्णता के साथ युधिष्ठिर के साथ खड़ा रहा। वह पहला प्राणि था जो स्वर्ग गया। किताबें कहती हैं कि वह रूपांतरित हुआ। किताबें कभी-कभी लोकहित और लोकधर्म के कारण थोड़ा बहुत रूपांतरण कर लेती हैं। तथापि यह सच है कि वह स्वर्ग गया और महालक्ष्य को प्राप्त करने के कारण महानायक कहलाया।
भारतीय परम्पराओं में कुत्ते एक देवता दत्तात्रेय के भी साथ देखे गए हैं। परन्तु वे वहां आसपास मंडराते चार छर्राें से ज्यादा नहीं है। भगवान भैरव के रूप में भी कुत्ता प्रतिष्ठित हुआ है।
सतयुग की कई कथाओं में कुत्ता एक महत्वपूर्ण उत्कर्ष उपस्थित करता है। कभी किसी राजा की व्रतप्रियता की परीक्षा में वह रोटी खाता है तो कभी कोई ऋषि उसका मांस खाकर तुच्छ जीवन की रक्षा करता है।
त्रेतायुग के रामराज्य में भी एक कुत्ता साधु और कुत्ता के बीच न्याय की वकालत करता है और मुकदमा जीतता है।
द्वापरयुग में अभी महाभारत काल की चर्चा ऊपर हो चुकी है।
कलयुग में कबीर अपने को राम का कुत्ता कहकर एक और क्रांति की थी। उन्होंने कहा‘‘ मैं तो कुत्ता राम का ,मुतिया मेरा नांवुं। गले राम की लेहड़ी ,जित खींचे तित जांवंु।। ‘‘ उनके पीछे आनेवाले रामभक्तिधारा के लोककवि तुलसी ने भी कुत्ते की उपाधि स्वर्ग के राजा इंद्र को प्रदान की थी। उनके ही शब्दों में ‘‘सूख हाड़ि लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेह जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहिं न लाज ।।‘‘ नारद तप करने बैठे तो स्वभाव के कारण इन्द्र को भय हुआ कि कहीं वे स्वर्ग के राजा तो नहीं बनना चाहते। कहां विधिपुत्र नारद और कहां सुरपति इंद्र। परन्तु मानसिकता का कोई क्या करे ? तो वे घबराए। उनकी घबराहट की तुलना करते हुए कुत्ते का रूपक महाकवि ने खींचा कि जैसे सठ-कुत्ता सिंह को आता देखकर मुहं-दबी सूखी हड्डी लेकर ऐसे दौड़ पड़ता है जैसे सिंह उसकी सूखी हड्डी छीन लेगा। जड़-इंद्र का डर भी ऐसा ही है। तात्पर्य यह कि तुलना के लिए अलंकार-सिद्ध महाकवि तुलसी ने भी कुत्ते को उपमान के रूप में चुना।
प्रसिद्ध उपन्यास सम्राट् प्रेमचंद की कई कहानियों में कुत्ता सहनायक बनकर आया है । ‘पूस की रात‘ अगर आपको याद हो तो हरखू के मित्र के रूप में और हरखू के काम में उससे ज्यादा मुस्तैदी से कुत्ता ही लगा दिखाई देता है। पे्रमचंद कुत्ते से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने ‘एक कुत्ते की कहानी‘ लिखकर उसका मान बढ़ाया।
प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणिश्वरनाथ रेणु के उनन्यास ‘परती परिकथा’ में कुत्ते का जो स्थान है वह प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक हरिशंकर परसाई के शब्दों में ही पढ़ना रोमांचक हो सकता है। परसाई लिखते हैं: ‘‘...‘परती परिकथा‘ का नायक है कौन ? आप कहेंगे जित्तन या जितेन्द्र बाबू। मैं नहीं मानता। मैं चार साल से इस पर विचार कर रहा हूं और इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि नायक वह कुत्ता मीत है। इस कुत्ते के चरित्र का लेखक ने अधिक कुशलता से विकास किया है। आरंभ से अंत उसके चरित्र में एक संगति है जो जित्तन के चरित्र में नहीं है।‘‘ अब तो इस बात का कोई काट विश्वसाहित्य में नहीं है क्योंकि विश्वसाहित्य की विश्वसनीयता तो स्वयं हरिशंकर परसाई हैं।
वैसे स्वयं परसाई भी कुत्ते के प्रभव से नहीं बच सके और उन्हें भी कुत्तें के नायकत्व में एक रचना प्रस्तुत करनी पड़ी , ‘एक मध्यमवर्गीय कुत्ता‘ शीर्षक से।
कुलमिलाकर कुत्ता हर क्षेत्र में सफलता पूर्वक अपनी धाक जमाए हुए हुए है। हर प्रतिश्ठित घर के सामने लिखा होता है कुत्ते से सावधान। धार्मिक आध्यात्मिक राजनैतिक सामाजिक साहित्यिक सांस्कृतिक मनोरांजनिक कहां आप कुत्तों से मुक्त हैं। वैसे सच्चाई यही है कि कुत्ते हैं तो हम सुरक्षित हैं। सुरक्षा के मामले में जाएं तो कुत्ता विश्व भर की पुलिस और विश्व भर की सेनाओं में कुत्ता बड़े अधिकारी के पद पर अभिराजित है। जनरंजन के सबसे लोकप्रिय और शक्तिशाली माध्यम फिल्म में भी कुत्ते को ऊंचा स्थान है। वे कई लोकप्रिय फिल्मों में बतौर नायक आए हैं। विदेशों में भी उनके नायकत्व में कई फिल्में बनीं। धर्मेन्द्र के बारे में बताने की जरूरत नहीं है जो जीवन भर कुत्ते का खून पीने की धमकी देते रहे। आजकल के महानायकों को अपने साथी नायकों के नाम से कुत्ते पालने का शौक बढ़ा है। एक नायक ने अपनी प्रेमिका को उपहार में कुत्ता भेंट किया है। 180709
क्रमशः

Saturday, July 4, 2009

राग-दरबारी उर्फ राग-विरुदावली

दाता के गुण गाओ -‘
राग-दरबारी उर्फ राग-विरुदावली

भीषण गर्मी की लू भरी शाम में भी हम इवनिंग वाक करने निकले थे। म्यूजिक प्लेअर में कोई गाायक ‘रागदरबारी ‘ में एक बंदिश गा रहा था -‘दाता के गुण गाओ...‘। गुणगान की बंदिश होने के कारण ही शायद ‘रागदरबारी‘ दरबारियों का राग कहलाता है। हालांकि राजदरबार के एक राजपत्रित दरबारी ने शिक्षा-व्यवस्था और शिक्षा-व्यवसाय के सिर पर तबला बजाते हुए तोड़-मरोड़कर थाट-तोड़ी पर पढ़ा जानेवाला ‘रागदरबारी’ गाया ,जो उतना ही लोकप्रिय हुआ ,जितना मर्मस्थल पर हाथ रखकर गानेवाले पापी गायक स्व. माइकल हुए। वे आज ही स्वर्गीय हुए हैं। उन्हें इन पंक्तियों के लेखक ने कभी सुना नहीं और देखा भी नहीं हैै। पर नाम तो नाम होता है। नाम होता है तो फिर देखने सुनने की क्या जरूरत?
वैसे गाए जानेवाले राग- दरबारी में बिला-शक मिठास बहुत है। यह मिठास सुरों की है या गुणगान की यह तो कोई सुरंदाज़ ही बता सकता है। मेरे जैसे साधारण सुननेवाले तो केवल संगीत की मिठास ग्रहण करते हैं। संगीत के सुर-शास्त्र से उनको क्या लेना देना ? जैसे भोजन बहुत बढ़िया है , इसकी तमीज़ हर खानेवाले को होती है लेकिन पाकशास्त्र का ज्ञान तो पकानेवाले को ही होता है। पकाने से याद आया कि शास्त्रीय संगीत को भी पका हुआ ,पक्का संगीत कहते हैं । शायद इसीलिए बहुत से लोग शास्त्रीय संगीत सुनकर कहते हैं कि क्या पका रहा है यार।
रागों के मामले जब उठे हैं तो बताना लाज़िमी है कि एक होता है ‘बादल-राग‘। ‘बादल-राग‘ को मेरे कुछ मित्र साहित्यिक-राग कहते हैं। उनके अनुसार ‘बादल-राग‘ निराला ने लिखा है। पर मैंने सुना है कि मियां तानसेन के पास भी कोई ‘बादल-राग‘ था जिसे गाने से बादल आ जाते थे। मेरे कुछ नान- म्यूजिकल मित्रों को भी यह पता है। इसलिए पसीना पसीना होकर शाम को घूमते हुए एक ने कहा: ‘‘ मर गए यार सड़ी हुई गर्मी और बीस बाइस घंटों की बिजली कटौती के मारे..अब तो कोई जाए और मानसून को मनाए..उसकी सूनी मांग को मान के सिंदूर से सजाए ..कोई कहीं से मियां तानसेन को लाए और वह आकर बादल राग गाए.....और इतना गाए कि पानी गिर जाए...थोड़ा सा तो चैन आए...‘‘
दूसरे मित्र ने कहा:‘‘ बादल राग से केवल बादल घिरेंगे...पानी गिराने के लिए तो किसी को राग-मल्हार गाना पड़ेगा....सुना है तानसेन का प्रतिद्वंद्वी बैजू बावरा था जो मजे से राग मल्हार में गाता था ..तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा.....अगर कहीं वो मिल जाए तो हमारे गांव में गंगा जमुना बह जाएं.. ‘‘
मैंने उकताकर गर्दन पर बहनेवाले पसीने को पोंछकर कहाः‘‘ यार एक बात बताओ.. क्या तुम्हीं लोगों ने ठेका ले लिया है गंगा जमुना बहाने का....‘‘
‘‘ तो तुम्हीं ले लो ...हम को तो बरसात चाहिए जिससे कि बाइस तेइस घंटों की अंधेरी हवा विहीन रातों से छुटकारा मिल सके...‘‘ बात उनकी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं थी। हमारे गांव में बिजली की अनिश्चितकालीन कटौती बाइस तेइस घंटे ही की होती है। मैंने बात बदलने के लिए कहा ‘ बिजली की समस्या के लिए भी एक राग है......दीपक राग। सुना है कोई मियां इसे गाते थे तो दीपक जल उठते थेे।‘
‘दीपक तो जल जाएंगे पर उससे जो गर्मी बढ़ेगी तो हम कहां जाएंगे... पहले तो राग मल्हार वाले को बुलवाओ...दीपक की बाद में सोचेंगे।‘ मित्र ने चिढ़कर कहा । इससे तत्काल लाभ यह हुआ कि हमारा खटराग बंद हो गया। दाता के गुण गानेवाले राग-दरबारी की भी कोई ध्वनि अब हमारे कानों में नहीं पड़ रही थी। मगर यह शांति कुछ देर की थी। कहीं दूर से भजनों के गाए जाने की आवाज आ रही थी। अब यह कौन सा राग है? हम तीनों ने एक साथ एक दूसरे का देखा।
‘‘मेरे ख्याल से यह कल्याण राग है...क्योंकि भजन का संबंध कल्याण से होता है...‘‘ मैंने कहा।
‘‘ कल्याण से तो ठीक है ,पर किसके कल्याण से ?‘‘ मित्र ने पूछा।
‘‘ सबके कल्याण से ..‘‘ मैंने कहा । इस पर मित्र ने कहा:‘‘ तुम इतने यकीन से कैसे कह सकते हो कि भजन का संबंध सबके कल्याण से होता है... भजन गानेवालों को तुम जानते हो ?‘‘मित्र ने पूछा।
‘‘ इसमें जानने की क्या जरूरत ...भजन तो ईश्वर का गुणगान है ,प्रार्थना है...सबके साथ मिलकर गाई जा रही है इसलिए जाहिरन सबके हित और कल्याण के लिए गाई जा रही है...‘‘ मैंने तर्क रखा। मित्र ने मेरे तर्कों पर झाड़ू मारते हुए कहा ‘‘ लीपापोती मत करो...तुम नहीं जानते ..भजन की नीति...? यह वही लोग है जो मंदिरों में भजन करते हैं और फिर शराफत की आड़ में बेईमानियां भी करते हंै।‘‘
‘‘ तुम तो राग भीम पलासी अलापने लगे...भीम की तरह भजनगीरों को पटखनी देने लगे ..बात क्या है ?‘‘
‘‘ मै इस समय राग में हूं..सभी पर मुझे आज राग आ रहा है....‘‘
‘‘ लेकिन तुम राग कहां कर रहे हो ,तुम तो गुस्सा कर रहे हो ...?‘‘
‘‘ मराठी में गुस्सा को ही राग कहते हैं...‘‘
‘‘ मगर गुस्सा किस बात का... मराठों की मायानगरी मुम्बई में तो झमाझम बारिश हो रही है.... ‘‘
‘‘ इसी बात का तो गुस्सा है ...आज अगर मैं मुम्बई में होता तो बारिश में भीग रहा होता । राग बिहाग और मल्हार छेड़ रहा होता..यहां तो तपिश के मारे जान निकली जा रही है..चारों तरफ राग रुदाली की बेसुरी ताने खिंची हुई है.... राग नहीं होगा मुझे ?‘‘
गर्मी के जिस असर के बारे में मैं सुना करता था वह मित्र पर शायद हो गया था। मैं चुप रहा ।लेकिन तभी एक ऐलान हमारे कानों में सुनाई पड़ा:‘‘ नागरिक बंधुओं ! मानसून के बिलंब के चलते और नदी के जल संग्रहण केन्द्र में पानी के अभाव में नगर पालिका द्वारा प्रदान किया जाने वाला पानी अब एक दिन की आड़ में केवल एक समय ही किया जाएगा। सम्माननीय नागरिकों को होने वाली असुविधा के लिए हमें खेद है।‘‘
ऐलान सुनकर मित्र भड़क उठे। कसमसाकर बोले:‘‘ ये देखो मक्कारी राग....चुनाव नजदीक है ...शहर का बिजली और पानी के लिए तरसाकर नेताओं के महलों तक जाने के लिए सड़कों और नालियों का काम जोर और शोर से कर रहे हैं... सारा पानी वहां झोंक रहे हैं ....कांक्रीट की सड़कें और नालियां बनाने में ...और नागरिको को उल्लू समझते हुए खेद व्यक्त कर रहे हैं...‘‘
‘‘ नई.. लेकिन मौसम विभाग ने भी तो अकाल और सूखा की भयानक संभावना व्यक्त की है...‘‘
‘‘ कब व्यक्त की है ? अब जब पानी नहीं गिर रहा है.... पहले क्यों नहीं की जब पानी को सुरक्षित किया जा सकता था और उसके लिए योजनाएं बनाई जा सकती थी... सड़कों के लिए अनुमति रोकी जा सकती थी... बेवकूफ समझते हैं जनता को ?... ये सब साले सरकारी खटराग हैं... इनमें सिर्फ झूठ और फरेब के बादल घिरते हैं और हरे भरे जंगल धू धू करते हैं...‘‘
मैं समझ गया कि मित्र के दिल में जो तांडव-राग मचल रहा है वह मेरे किए शांत नहीं होगा । इसलिए मौका मिलते ही मैंने कहा: ‘‘ आज तो बहुत देर घूम लिए ..घर में लोग चिंता कर रहे होंगे...चलें ?‘‘ और मित्र के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मैं घर की ओर चल पड़ा।

27.06.09

Wednesday, June 24, 2009

आग लगी आकाश में

और
बिन पानी सब सून

आकाश में सूखे की संभावनाएं ,बेपानी बादल और आग उगलता सूरज ,आखिर किस असंतोष को प्रदर्शित कर रहे हैं। बिजली बेमियादी और बेमुद्दत हो गई है। दिन में केवल तीन चार घंटे और वह भी किश्तों में । कभी एक घंटे, कभी पंद्रह मिनट ,कभी दो मिनट भी नहीं। इन्वर्टर पूरी खुराक़ के अभाव में चीखने लगे हैं। उनकी प्लेटों पर ‘खट’ जमने लगी है। ‘खट’ को थोड़ी देर के लिए खटास ही मान लें। बिजली का काम करनेवाला कम पढ़ालिखा लड़का उसका केमिकल नाम नहीं जानता । हम जानते हैं तो क्या कर लेंगे। पानी बदलकर एसिड डालकर तो उसे ही धोना है। हम उसी पर निर्भर हैं।
नगरपालिका ने नोटिस पर दस्तखत ले लिए हैं कि अब कटौती को बढ़ाकर एक दिन के आड़ में पानी देंगे। पानी का भंडारण भी सूख रहा है। पानी ही नहीं हैं।
आसमान सूना ,जमीन सूखी ,बिजली गायब ..... हम जो अब तक आदी हो गए थे बिजली के बहुआयामी उपयोगों के और प्राकृतिक आबोहवा से दूर हो गए थे , प्रकृति की तमाम सहजावस्था के नज़दीक आ गए हैं। टीवी-कम्प्यूटर ने हमें बांध लिया था और अपनों के साथ दो घड़ी बैठ पाने के लिए हमारे पास समय नही था । सूखे ने जैसे उन कंुभलाए हुए संबंधों और भावनाओं पर पानी सींच दिया है। अब हम पंखे डुलाते हुए एक साथ बैठने लगे हैं और कोशिश करने लगे हैं कि हम जब पंखा करें तो पास या आसपास बैठें अपनों को ज्यादा हवा लगे।
कबीर ने जो कहा था , उसे अब समझे :-
आग लगी आकास में ,गिर गिर पड़ें अंगार ।
कबीर जल कंचन भया , कांच भया संसार।।
और रहीम ने भी एकदम सही चेताया था:-
रहिमन पानी राखिए ,बिन पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरे ,मोती मानुस चून।।
- मैं इसेे यूं समझता हूं कि पानी जाने के बाद ही हम अपनी गफलतों से उबर पाते हैं। पहले तो होश ही नहीं रहता कि पानी की रक्षा कैसे और क्यों करें !

मित्रों ! एक निवेदन बिजली के अभाव में अब मिलना अनिश्चित है। कृपया भूल न जाएं।
- डाॅ. रा. रामकुमार
24.06.09

Tuesday, June 16, 2009

आगरा बाज़ार की वह रंगीन पतंग:

यानी ‘‘ हबीब तनवीर ‘‘

1972-73 की वह एक गुलाबी शाम थी जो अपने रूमानी अहसास को सीधे मेरे जिस्म के साथ जोड़कर चल रही थी। ठीक गाय के उस बछड़े की तरह जो जानबूझकर मां के जिस्म से टिककर घास में मुंह चलाने की मुहिम ज़ारी रखता है। मैंने इस शीतल अहसास को स्वेटर से रोकने कभी कोशिश भी नहीं की। जहां मेरे कैशौर्य में ठंड को पीने की मस्तीभरी शक्ति मौज़ूद थी वहीं आंखों में सारे विश्व के कौतुहल को जान लेने की जिज्ञासा लालायित थी। तभी स्टेट स्कूल के ग्राउंड में आगरा बाज़ार के प्रदर्षन की जानकारी मुझे मिली। रात होते ही मैं रंगप्रेमी दर्शकों के बीच में मैं उपस्थित था। बल्कि और पहले से। दो ट्रकों के डालों (कैरेज ट्राली) को जोड़कर स्टेज बनाने के रंगप्रबंधन को मैंने देखा ,जाना और सीखा। दोनों कैबिनों को अलग अलग तरीकें से अटारियों ,छज्जों और छतों में तब्दील किया गया था। दोनों ट्रकों के डालों को बाज़ार का विस्तार और विविधता प्रदान की गई। रात होते ही जब नाटक शुरु हुआ ,वहां आगरा बाज़ार के पतंग फ़रोश , खोंमचेवाले ,बाजीगर ,मदारी ,चनाज़ोर ...जाने कितने विभिन्न रंग-व्यापारों ने गतिशीलता भर दी। यह निर्देशक हबीब तनवीर के अनुभवों का वह रंग-संसार था जो आगरा से ,दिल्ली से और इंगलेंड के राडा से संस्कारित होकर ’आगरा बाज़ार’ के रूप में प्रतिफलित हुआ था। नज़ीर अकबराबादी की नजमें ,गज़ल और गीतों से सजा और हबीब तनवीर की अपनी संगीतात्मकता से रचा गया यह जादू देर रात तक चलता रहा। उस रात मैं घर लौटने की बजाय स्वप्नों की रंग-भूमी पर पहुंच गया था। ‘एक बेकार का सपना’ , ’ज़हरीला’ और ’ट्वेंटी फोर यूनिट्स’ को स्टेज पर फैलाते वक़्त मेरे मस्तिष्क पर कहीं इसी ब्रेन-ट्यूनिंग का प्रभाव था, जो बेहद सराहा गया।
हबीब तनबीर की इस खुली ब्रेन ट्यूनिंग से रंग-विश्व की हज़ारों प्रतिभाएं प्रभावित हुई हैं। रंगकर्म का एक अंतर्राष्ट्रीय स्कूल ही उनके माध्यम से विश्व क्षितिज में उभरा । जिसका नाम है-’नया थियेटर’। ’नया थियेटर ’ के रूप में हबीब तनवीर ने ’अपनी जन्मभूमि’ के प्रति अपनी निष्ठा और ’अपनी ज़मीन’ के प्रति अपने उत्तरदायित्व का परिचय दिया है। इप्टा और हिन्दुस्तान थियेटर से प्रारंभिक प्रशिक्षण और अनुभव लेकर हबीब जब इंगलेंड की रायल अकेडमी आफ ड्रामेटिक आर्ट्स में प्रशिक्षण के दौरान पूरे यूरोप में घूम रहे थे ,तब भी वह भारत की ज़मीन से जुड़े हुए लोगों के लिए सोच रहे थे। तभी तो यूरोप से लौटकर वे चकाचैंध से भरी फिल्मी दुनिया में नहीं गए ,जिसमें से होकर वे गुज़रे थे और जहां इप्टा , हिन्दुस्तान थियेटर और नेशनल स्कूल आफ ड्रामा से प्रशिक्षित उनके मित्र और अग्रज अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे थे। वे लौटे तो उन्होंने अपने जन्मांचल छत्तीसगढ़ को ही अपनी शुरूआत की कसौटी बनाया। वे लिखते हैं ,‘‘1958 में यूरोप से लौटने के बाद ’मृच्छकटिकमृ’ पर काम शुरू करने के पहले मैं परिवार से मिलने अपने घर रायपुर गया। मैंने सुना कि जिस हाईस्कूल में मैं पढ़ता था ,उसी के परिसर में नाचा का आयोजन हो रहा है। नाचा छत्तीसगढ़ी ड्रामा का धर्मनिरपेक्ष रूप है। मैं इसे रात भर देखता रहा।‘‘
हबीब तनवीर के अंदर के कलाकार को उसकी ज़मीन ,ज़मीर और जलाल पुकार रहे थे। उनके अंदर आयातित या प्रत्यारोपित प्रतिभा नहीं थी। वे स्वयंभू ऊर्जा के स्रोत थे और किसी गमले में भरी जाने वाली मिट्टी नहीं थे जिसमें नवधनाढ्य लोग बोनज़ाई बरगद या गुलमोहर लगाकार अपनी बौनी दृष्टि का परिचय देते हैं । कृषि प्रधान भारत में खेत बहमंज़िला इमारतों और होटलों में तब्दील हो रहे हैं और बरगदों को शो-पीस बनाया जा रहा है। इस हवा से बेपरवाह हबीब तनवीर ने अपनी रूह की ज़मीन को पहचाना और उसे उर्वरक बनाया । तनवीर किसी एक ढांचे में बंधकर विकसित होने वाले कलाकार नहीं थे। कोई हद या फ्रेम उन्हें बांध नहीं सकी। प्रतिभा के साथ समय हमेशा परीक्षा की मुद्रा में खड़ा होता है। उसके आसपास परजीवियों की गुच्छेदार दीमकें होती हैं जो संगठन के नाम पर ,व्यवस्था के नाम पर, समाज ,जाति और वर्ग के नाम पर ,भाषा के नाम पर ,प्रांत और विचारधारा के नाम पर उसकी प्रतिभा पर चिपककर उसे अपना अस्तित्व बनाना चाहती हैं। शायद दीमकें यह नहीं जानती कि प्रतिभा को निगलकर वे कोई नई चीज़ नहीं देंगी बल्कि जो है उसे मिट्टी कर देंगी। समर्थ प्रतिभाएं इन दीमकों से मुक्त होने का रास्ता तलाश लेती हैं और अपने को विकसित करने के लिए माकूल ज़मीन ,हवा ,पानी की व्यवस्था कर लेती हैं। प्रतिभा के अंदर से निरंतर आवाज़ें आती रहती हैं ,जो उसे यह बताती रहती हैं कि वह अभी कहां है और उसे किस तरफ़ जाना है या जाना चाहिए। इसीलिए यूरोप से लौटकर हबीब ने पहले से तैयार भव्य गमलों में ऊगने की बज़ाय अपनी ज़मीन खुद तैयार की । कुल जमा छः छत्तीसढ़ी कलाकारों को जोड़कर उन्होंने भोपाल में ‘नया-थियेटर ’ का बीजारोपण किया। रंगकर्म के मनीषियों की सर्वमान्य राय है कि नया-थियेटर ने भारत और विश्व रंगकर्म के मंच पर अपनी अलग छाप छोड़ी। लोक कलाकारों के साथ किए गए प्रयोग ने नया थियेटर को नवाचार के एक गरिमापूर्ण संस्थान की छांव प्रदान की। यह तनवीर के सधे हुए व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि कला के ठेकेदारों को भी उनके वर्चस्व को स्वीकार करना पड़ा।

समाचार पत्रों की राय है कि हबीब तनवीर अब हमारे बीच नहीं रहे। मगर गौर से देखें तो हबीब तनवीर का जिसम सुपुर्देखाक हुआ है। वह नजरिया , कला और ज़मीनी सरोकार जो हबीब रोपकर गए हैं ,वे तो हैं। उनकी शक्ल में ढलकर तनवीर अब भी हमारे बीच हैं। अगर अदृष्य होने को ही सच माना जाए तो कह सकते हैं कि ’देश का ऐ ऐसा बिरला रंगकर्मी हमसे विदा हो गया जिसने...छत्तीसगढ़ की नाचा शैली और भाषा को अपनी जादूभरी रंगदृष्टि से वैश्विक पहचान दी। इसके साथ यह भी सच है कि वे अपने पीछे रंगप्रेमियों की ऐसी जमात छोड़कर गए हैं जो उनसे अभी बहुत कुछ सीखने को लालायित थी। एक ऐसे कलाकार से...जो अपनी देशज कला के बल पर राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बना। जिसे संगीत नाटक अकादमी के साथ-साथ पद्यश्री और पद्यभूषण से सम्मानित किया गया। जिसे समचार पत्रों ने प्रमुखता के साथ अपने मुख्यपृष्ठों में ऐसी जगह प्रदान कीजो शायद किसी भव्यभवनों के बोनज़ाई को नहीं मिलती।