Wednesday, June 24, 2009

आग लगी आकाश में

और
बिन पानी सब सून

आकाश में सूखे की संभावनाएं ,बेपानी बादल और आग उगलता सूरज ,आखिर किस असंतोष को प्रदर्शित कर रहे हैं। बिजली बेमियादी और बेमुद्दत हो गई है। दिन में केवल तीन चार घंटे और वह भी किश्तों में । कभी एक घंटे, कभी पंद्रह मिनट ,कभी दो मिनट भी नहीं। इन्वर्टर पूरी खुराक़ के अभाव में चीखने लगे हैं। उनकी प्लेटों पर ‘खट’ जमने लगी है। ‘खट’ को थोड़ी देर के लिए खटास ही मान लें। बिजली का काम करनेवाला कम पढ़ालिखा लड़का उसका केमिकल नाम नहीं जानता । हम जानते हैं तो क्या कर लेंगे। पानी बदलकर एसिड डालकर तो उसे ही धोना है। हम उसी पर निर्भर हैं।
नगरपालिका ने नोटिस पर दस्तखत ले लिए हैं कि अब कटौती को बढ़ाकर एक दिन के आड़ में पानी देंगे। पानी का भंडारण भी सूख रहा है। पानी ही नहीं हैं।
आसमान सूना ,जमीन सूखी ,बिजली गायब ..... हम जो अब तक आदी हो गए थे बिजली के बहुआयामी उपयोगों के और प्राकृतिक आबोहवा से दूर हो गए थे , प्रकृति की तमाम सहजावस्था के नज़दीक आ गए हैं। टीवी-कम्प्यूटर ने हमें बांध लिया था और अपनों के साथ दो घड़ी बैठ पाने के लिए हमारे पास समय नही था । सूखे ने जैसे उन कंुभलाए हुए संबंधों और भावनाओं पर पानी सींच दिया है। अब हम पंखे डुलाते हुए एक साथ बैठने लगे हैं और कोशिश करने लगे हैं कि हम जब पंखा करें तो पास या आसपास बैठें अपनों को ज्यादा हवा लगे।
कबीर ने जो कहा था , उसे अब समझे :-
आग लगी आकास में ,गिर गिर पड़ें अंगार ।
कबीर जल कंचन भया , कांच भया संसार।।
और रहीम ने भी एकदम सही चेताया था:-
रहिमन पानी राखिए ,बिन पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरे ,मोती मानुस चून।।
- मैं इसेे यूं समझता हूं कि पानी जाने के बाद ही हम अपनी गफलतों से उबर पाते हैं। पहले तो होश ही नहीं रहता कि पानी की रक्षा कैसे और क्यों करें !

मित्रों ! एक निवेदन बिजली के अभाव में अब मिलना अनिश्चित है। कृपया भूल न जाएं।
- डाॅ. रा. रामकुमार
24.06.09

2 comments:

AlbelaKhatri.com said...

is paanidaar aalekh k liye aapko haardik badhaai !

MAYUR said...

dr. sahab aap ko nahi bhoolenge,
aap yun hi padhate rahie

bijli to aati jati hi rahegi
आपका चिटठा खूबसूरत है , आपके विचार सराहनीय हैं ,
यूँ ही लिखते रहिये , हमें भी ऊर्जा मिलेगी
धन्यवाद,
मयूर
अपनी अपनी डगर
sarparast.blogspot.com