Monday, August 8, 2016

तुम्हारा पता




बड़ी लम्बी कहानी है...

बहुत दिन बाद आया था
यहां पर हर कदम पर धूल के
रूखे बवंडर थे
हवाएं बदहवासी में
मुझे कसकर पकड़ती थीं
शहर की बेतहासा भागती
पागल सी दुनिया थी
सभी के पैर की ठोकर से गिर जाता
कभी कोई जइफ लम्हा
कभी कोई हसीं लम्हा

मगर जब शाम को
थककर उजाले घर को जा लौटे
तुम्हारा फिर पता खोला
जरा सा चैन आया

अरे,
इस शहर में
अब भी
कहीं पर रातरानी है...

बड़ी लम्बी कहानी है...



0 डा. रा. रामकुमार,



Saturday, August 6, 2016

भिखारिन: सामाजिक-परंपरा का अर्थशास्त्र और साहित्य का रासायनिक-विश्लेषण

रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुण्य तिथि (7 अगस्त) पर विशेष- गुरुदेव की कहानी ‘भिखारिन’ की वीक्षा



कहानी के रासायनिक विश्लेषण से विद्वानों ने सात-तत्व निकाले हैं। आश्चर्य है कि ‘समुद्र-मंथन’ नामक धार्मिक पौराणिक कहानी से चौदह-तत्व निकले जिन्हें रत्न कहा गया। स्त्री, विष और अमृत को भी रत्न कहा गया। रासायनिक परिभाषा रत्न को तत्व नहीं मानती। व्यक्ति तो तत्व हो ही नहीं सकता। वह पांच तत्त्वों का यौगिक है..छिति,जल,पावक,गगन,समीरा। पांच तत्त मय रचा सरीरा।तत्व तो वह है जिसके अंदर दूसरी और वस्तुएं न हों। मनुष्य और रत्न में अनेक तत्व होते हैं। विष का रासायनिक विश्लेषण हो चुका है। अमृत का नहीं हुआ है। वह एक काल्पनिक द्रव्य है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुण्य तिथि को अमरत्व दिवस भी कहते हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने समय के प्रभावशाली लेखन के कारण अमर हुए। इसीलिए लेखन को अमरत्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयाण भी लोग मानते हैं और इसीलिए लेखन की दुनिया में अमर होने के लिए मर मिटने के लिए तैयार रहते हैं। वहीं कुछ हैं जो प्रतिद्वंद्वी को मार डालने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। कुछ लोगों की चरित्र-हत्या के माघ्यम से भी अनेक रचनाकार अपने को अमर मानने लगते हैं।
हर रचनाकार का अपना एक जीवन होता है, अनुभव और विचार होता है, जीवन शैली होती है। उसी के परिपाक और संमिश्रण से वह भविष्य का यौगिक साकार करता है, इसी के आसवन से रचना जन्म लेती है। सारतः हर रचना को लेखक अपनी मानसिकता से रचता है और हर पाठक उसे अपनी मानसिकता के साथ समझ लिया करता है।
यहां पाठक के दो वर्ग हो जाते हैं - एक होता है साधारण पाठक, जो केवल रचना का प्रभाव ग्रहण करता है तथा रचना के इतिहास, वर्तमान, भविष्य और विचाारधारा को परखने की उसकी कोई रुचि नहीं होती है। उसको वह महत्व ही नहीं देता।
दूसरा होता है साहित्यिक पाठक, जो रचना को उसके तत्व के आधार पर विश्लेषित करता है और वह कालक्रम, वातावरण, विचारधारा, कथानक, चरित्र, संवाद, भाषा, दिशा-बोध, उद्देश्य आदि का विचार करता है। समय के सापेक्ष उसका मूल्यांकन करता है। यही कारण है कुछ कहानी या रचनाएं लिखी भी जाती हैं और कुछ लिखवाई भी जाती हैं। व्यक्ति भी लिखवाता है और समय भी।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने समय की अनेक रचनाएं लिखीं। एक ही समय में अनेक उद्देश्य को आधार बनाकर अनेक रचनाएं लिखी जाती हैं। अनेक लेखक एक ही उद्देश्य पर अनेक कथानक बुन सकते हैं। एक ही लेखक अनेक उद्देश्यों को लेकर अनेक रचनाएं रच सकता है। काबुलीवाला, अनमोलरत्न आदि के कथाकार रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक कहानी ‘भिखारिन’ लिखी। ‘भिखारी’ को केन्द्रीय-पात्र बनाकर रवीन्द्रनाथ के समकालीन प्रेमचंद ने एक उपन्यास सृजित किया था ‘रंगभूमि’। इस उपन्यास का मुख्यपात्र भिखारी ‘अंधा’ है। आश्चर्यजनक ढंग से रवीन्द्रनाथ टैगोर की भिखारिन भी ‘अंधी’ है। ‘अपने समय का लेखक’ अपने पात्रों का चयन खुद करता है और उनसे प्रतीकात्मक कार्य लेता है। द्वापर के प्रसिद्ध पात्र को वेदव्यास ने ‘अंधा’ बनाया तो उसके अनेक प्रतीक उभरकर सामने आये। एक तो यही कि जो हम नहीं देख पाते, उसे दुनिया देखती है।
आलोच्य कहानी ‘भिखारिन’ का कथानक तीन भागों में बंटा है।
पहले भाग में बनारस काशी मंदिर के सामने एक अंधी भिखारिन भीख मांग रही है। वह मंदिर में आनेजोनवालों से कहती है -‘बाबूजी, अन्धी पर दया हो जाए।’ गुरुदेव की अंधी का आशय यह कदापि नहीं है कि मंदिर आनेजानेवालों में दया होनी चाहिए!’ क्योंकि आगे उन्होंने स्वयं कहा है -‘मन्दिर में आने वाले सहृदय और श्रध्दालु हुआ करते हैं। उसका यह अनुमान असत्य न था। आने-जाने वाले दो-चार पैसे उसके हाथ पर रख ही देते।’
इसी स्थल पर तुलनात्मक दृष्टि से कहानी में लेखक वर्णन करता है-‘रास्ते में भी याचना करती जाती किन्तु राहगीरों में अधिक संख्या श्वेत वस्त्रों वालों की होती, जो पैसे देने की अपेक्षा झिड़कियां दिया करते हैं। तब भी अन्धी निराश न होती और उसकी याचना बराबर जारी रहती।’
इसी भाग में अंधी, मंदिर के दयालुओं और झिड़की देनेवाले राहगीरों के अलावे एक बच्चे से भी परिचित कराया जाता है। लेखक के शब्दों में ‘झोंपड़ी के समीप पहुंचते ही एक दस वर्ष का लड़का उछलता-कूदता आता और उससे चिपट जाता। अन्धी टटोलकर उसके मस्तक को चूमती।
बच्चा कौन है? किसका है? कहां से आया? इस बात से कोई परिचित नहीं था। पांच वर्ष हुए पास-पड़ोस वालों ने उसे अकेला देखा था। इन्हीं दिनों एक दिन संध्या-समय लोगों ने उसकी गोद में एक बच्चा देखा, वह रो रहा था, अन्धी $$ उसे चुप कराने का प्रयत्न कर रही थी। $$ उसी दिन से यह बच्चा अन्धी के पास था और प्रसन्न था। उसको वह अपने से अच्छा खिलाती और पहनाती।’
इस भाग के अंत में एक हांडी से भी परिचय कराया जाता है जो इस कहानी का प्रमुख ‘अचल पात्र’ है। इस पात्र को अंधी ने झोंपड़ी में गाड़ रखा है। अंधी ‘संध्या-समय जो कुछ मांगकर लाती उसमें डाल देती और उसे किसी वस्तु से ढांप देती।’
दूसरे भाग में काशी के सेठ बनारसीदास से परिचय कराया जाता है। ‘बहुत प्रसिध्द व्यक्ति $$ देशभक्त और धर्मात्मा $$ बारह बजे तक $$ स्नान-ध्यान में संलग्न$$ हर समय भीड$$$ कर्ज के इच्छुक $$ अपनी पूंजी सेठजी के पास धरोहर रूप में रखने वाले $$’ तो आते ही आते ‘सैकड़ों भिखारी अपनी जमा-पूंजी इन्हीं सेठजी के पास जमा कर जाते। अन्धी को भी यह बात ज्ञात थी,’ इसलिए एक दिन वह भी गई और ‘भीख मांग-मांगकर अपने बच्चे के लिए दो-चार पैसे संग्रह’ किये थे वह उसने सेठ के पास जमा कर दिए क्योंकि उस बुढ़िया के कथनानुसार -‘मैं अंधी, अपाहिज कहां रखती फिरूंगी?’
इस ‘आधुनिक कहानी’ में यहां एक नई ‘समकालीन बात’ पता चलती है कि स्वतंत्रता के पूर्व से ही श्रेष्ठी-वर्ग, भिखारियों तक के बैंक का काम करते थे और उनकी पूंजी को अपने व्यापार में लगाते थे और बदले में ‘सुरक्षाव्यय’ लेेते थे। बचत बैंक और बदले में ब्याज का ‘तथाकथित कल्याणकारी’ विचार तो बाद में आया। आज तो भिखारियों की स्थिति और सुदृढ़ हो गई है। वे भू स्वामी हैं, उनके भवन किराये से चल रहे हैं। उन्होंने ‘भिक्षाकेन्द्र’ को संप्रभुता के भूगोल में बांट रखा है। वे देश के एक व्यवस्थित व्यवसाय ही नहीं हैं, एक सम्पूर्ण उद्योग के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनके अनेक रूप हैं। रंगबिरंगे वस्त्रों में लिपटी ‘पूर्णता’ और वस्त्रावरण में छुपी ‘अपूर्णता’ भिक्षा को वसूली के रूप में समाज में मान्यता प्राप्त करा चुकी है। अगर इतिहास के इस ‘स्वर्ण-पक्षी’ भारत के पुराने पृष्ट पलटे जाये तो भिक्षु-संस्कृति’ की गौरव-शाली परम्परा हमें दिखाई देती है। सतयुग में हरिश्चंद्र और भर्तृहरि जैसे राजाओं की कथा है जो अंततः भिक्षु हो गए और जीवन के उस भाग को भी उन्होंने संपूर्ण गरिमा के साथ जिया। फिर सारा संन्यासी जीवन, साधु और तपस्पियों का जीवन भी भिक्षुकों का जीवन बना। गुरुकुलों में भी आत्मनिर्भरता के साथ ‘भिक्षाटन’ का भी पाठ पढाया गया। यह परम्परा आगे बढ़ी और जब राजकुमार सिद्धार्थ और राजकुमार वर्धमान जीवन के ‘परम-सत्य’ की खोज के लिए राजमहलों को छोड़कर गये तो लौटकर वे भिक्षुकों और श्रमणों को हमारे समाज की मुख्यधारा बना लाये। चंदा, कर, दान, सहायता, दायित्व आदि अनेक नामों से आज भी हम दीन-हीनों और जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं। देश, बैंक, उद्योग, अधिष्ठान चला रहे हैं। भारत कृषि-प्रधान देश तो बहु-प्रसारित है ही, दान-प्रधान, भिक्षा-प्रधान देश भी यह है। गुप्तदान, वस्त्रदान, वेतनदान, श्रमदान, रक्तदान, मतदान आदि हमारे देश की विशिष्टताओं में से एक है।
इस कहानी के पीछे गुरुदेव का दृष्टिकोण इस ‘पूंजी-आश्रित’ श्रेष्ठी-वर्ग और भिक्षु-वर्ग के मध्य पूंजी के संबध के अतिरिक्त और अधिक भावनात्मक सम्बंध विकसित करने का प्रयास है। यह प्रयास हमें कहानी के तीसरे और अंतिम भाग में दिखाई देता है।
तीसरे भाग में एक ‘दुखद-सुखद’ मोड़ उपस्थित किया गया है। अंधी का सात वर्षो से पालित बारह वर्षीय पुत्र बीमार पड़ता है। ‘अंधी ने दवा-दारू की, झाड़-फूंक से भी काम लिया, टोने-टोटके की परीक्षा की, परन्तु सम्पूर्ण प्रयत्न व्यर्थ सिध्द हुए। लड़के की दशा दिन-प्रतिदिन बुरी होती गई, अंधी का हृदय टूट गया, साहस ने जवाब दे दिया, निराश हो गई। परन्तु फिर ध्यान आया कि संभवतः डाक्टर के इलाज से फायदा हो जाए। इस विचार के आते ही वह गिरती-पड़ती सेठजी की कोठी पर आ पहुंची। सेठजी उपस्थित थे।
अंधी ने कहा- ‘सेठजी मेरी जमा-पूंजी में से दस-पांच रुपये मुझे मिल जायें तो बड़ी कृपा हो। मेरा बच्चा मर रहा है, डाक्टर को दिखाऊंगी।’
सेठजी ने कठोर स्वर में कहा- ‘कैसी जमा पूंजी? कैसे रुपये? मेरे पास किसी के रुपये जमा नहीं हैं।’
धर्मात्मा, धर्मजीवी, ध्यानी और दानी के रूप में प्रसिद्ध सेठ का यह चरित्र देखकर बुढ़िया और पढ़कर पाठक दंग रह जाते हैं। कथा में उत्कर्ष और भावनात्मक मोड़ उपस्थित करने के लिए भी और धर्मात्माओं के चरित्र उजागर करने के लिए भी यह चित्र खींचा गया है।
आश्चर्य होता है कि एक ‘धर्मामा सेठ’ एक ‘भिखारिन’ के पैसे देने से मुकर जाता है। बीमारी, लाचारी भी उसे पिघला नहीं पाती। धन सभी भावनाओं पर भारी हो जाता है। वित्त-हरण से पत्थर हुआ चित्त पसीजता नहीं। रवीन्द्रनाथ के शब्दों में ‘परन्तु पत्थर में जोंक न लगी।’ कविवर संभवतः कहना चाहते हैं कि जोंक जीवधारियों के तन पर लग जाती है, क्योंकि वह खून पीती है। खून पीकर भी जोंक लचकदार बनी रहती है। आदमी खून पीकर पत्थर हो जाता है। इसीलिए जोंक से भी बड़ा चूषक है। क्या मनुष्य को इसी तरह धीरे धीरे सर्वश्रेष्ठ होने का गुण प्राप्त हुआ। यह विचार का विषय है। यह विचार ‘सेठ’ बनने की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाल सकता है।
बहरहाल सेठ के बेईमान हो जाने पर ‘अंधी लाठी टेककर खड़ी हो गई और सेठजी की ओर मुंह करके बोली-‘अच्छा भगवान तुम्हें बहुत दे।’ और अपनी झोंपड़ी की ओर चल दी।
यह अशीष न था बल्कि एक दुखी का शाप था।’
बहुत अधिक हालत बिगड़ जाने पर अंधी बच्चे को लेकर सेठ के दरवाजे पर धरना दे बैठती है। सेठ बुढ़िया को भगाने के लिए निकलते हैं तो उनकी नजर बच्चे पर पड़ती है। सात वर्ष पहले मेले में खोये अपने बच्चे की सूरत अंधी के उस पालित पुत्र से मिलती है, जो सात वर्ष पूर्व उसे भटकता मिला था और उस समय लेखक की सूचना के अनुसार उसकी आयु पांच वर्ष थी।
जिस समय कहानी आरंभ होती है और भीख मांगती अंधी झोंपड़े में पहुंचती है तब दस वर्ष का बालक उससे लिपटता है, जिसे पांच वर्ष पहले अचानक लोगों ने उस बुढिया के पास देखा था। पांच वर्ष के बालक को देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ लेकिन लेखक के शब्दों में ‘वह कोई असाधारण घटना न थी, अतः किसी ने भी न पूछा कि बच्चा किसका है।’
इसी बच्चे के लिए बुढ़िया पैसा एकत्र कर रही थी और पांच वर्ष एक़ करने के बाद उसे सेठ के पास जमा किया जिसको लेखक के अनुसार ‘दो वर्ष’ हुए। समय को लेकर लेखक सावधान है, इसलिए हम भी सावधानीपूर्वक गणना करते हुए बीमार बच्चे की आयु बारस वर्ष निकालते हैं।
सात वर्ष पूर्व मेले में खोये अपने पांच वर्षीय बेटे मोहन से इस बारह वर्ष के बीमार अंधी के बेटे से सूरत मिलती है। जांघ के एक निशान की भी निशानदेही की गई। वह भी मिल गया। सेठ ने अपना बच्चा अंधी के पास से छीन लिया।
बालक का उपचार होता है। वह ज्वर मुक्त होता है। होश में आता है किन्तु अपरिचितों को देखकर और ‘मां’ को न देखकर वह पुनः आंख बंद कर लेता हैं और फिर बीमार पड़ जाता है। उसकी हालत फिर बिगड़ती है। वह बेहोशी में ‘मां’ की रट लगाए हुए है। यह दृश्य भारतीय सिनेमा कई बार दोहरा चुका है।
विवश सेठ अंधी के झोंपड़े में पहुंचते हैं। वह भी बीमार है। यह इस बात का प्रमाण है कि मन के रिश्ते रक्त से नहीं भावनाओं से संचालित होते हैं।
कहानी के अंत में गुरुदेव ने भावनाओं के साथ व्यावहारिकता का समावेश किया है। बुढ़िया सेठ के अनुरोध और ममता के आवेश में बंधी आती है। बीमार बच्चे के माथे पर हाथ रखती है। वह स्पर्श चिकित्सा का काम करता है। बच्चा दस पंद्रह दिन में एकदम स्वस्थ हो जाता है।
सैद्धांतिक दृष्टि से जीवन यहां सामान्य हो जाता है। लेकिन व्यावहारिक जीवन अभी सामान्य होना बाकी है। बुढ़िया अपने झोंपड़े में जाना चाहती है। सेठ चाहते हैं कि वहीं रहे। मगर कथाकार ऐसा अंत नहीं कर सकता था। विसंगतियों की अपनी एक सनातनी परम्परा है। उस परम्परा का निर्वाह करते हुए अंधी को उसकी झोंपड़ी के लिए विदा दी जाती हैं। इसके साथ ही विदा में उसे वही थैली दी जाती है जो अंधी ने सेठ के पास जमा कर रखी थी। लेखक के अनुसार-‘जब वह चलने लगी तो सेठजी ने रुपयों की एक थैली उसके हाथ में दे दी। अन्धी ने मालूम किया, ‘‘इसमें क्या है।’’
सेठजी ने कहा-‘‘इसमें तुम्हारी धरोहर है, तुम्हारे रुपये। मेरा वह अपराध’’
अन्धी ने बात काट कर कहा-‘‘यह रुपये तो मैंने तुम्हारे मोहन के लिए संग्रह किये थे, उसी को दे देना।’’
अन्धी ने थैली वहीं छोड़ दी। और लाठी टेकती हुई चल दी। $$$ वह एक भिखारिन होते हुए भी सेठ से महान थी। इस समय सेठ याचक था और वह दाता थी।
व्यवहार में हमने यह उदारता, यह महानता चाहे न देखी हो पर कहानी में दिखाने का प्रयास किया गया है। लेखक का आशय इस कहानी के पीछे क्या है? यह अगला प्रश्न हो सकता है। पाठ्यक्रमों में इसकी भाषा, शिल्प, चरित्र चित्रण, कथानक, संवाद, चरमोत्कर्ष और आशय के लिए पूछा ही जाता है। हमने क्या सीखा? क्या समझा? लेखक समाज को क्या बताना चाहता है? आदि आदि। एक विश्वविख्यात लेखक की कहानी सिर्फ मनोविनोद कैसे हो सकती है?
गुरुदेव शांतिनिकेतन और विश्वभारती के संस्थापक गुरु थे। क्षितिमोहन सेन, हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे विद्यावाचस्पतियों और आचार्यों से भरे विश्वविद्यापीठ के पीठेश्वर थे। इसी संस्थान से भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को शिक्षा मिली,यहीं गुरुदेव ने उनका विश्वप्रसिद्ध नामकरण ‘प्रियदर्शिनी’ किया था। यहीं अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार प्राप्त अमत्र्य सेन का जन्म हुआ जो ‘कबीर’ साहित्य के विशेषज्ञ क्षितिमोहन सेन के नाती हैं। स्वयं रवीन्द्र ने फक्कड़ ‘कबीर’ पर शोध किया और उनके सौ पदों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। यही नहीं उन्हीं के शांतिनिकेतन के आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘कबीर’ को ‘वाणी के अधिनायक’ सिद्ध करते हुए अपने शोध से आधुनिक-काल की दिशा ही बदल दी। ऐसे गुरु की कहानी का अंत साधारण और मनोरंजन मात्र कैसे हो सकता है?
बंगाली में लिखी इस कहानी का अनुवाद छद्म रूप से प्रेमचंद ने किया होगा, ऐसा प्रतीत होता है। अनुवादक किसी भी स्थिति में घटनाओं से छेड़खानी नहीं कर सकता। यह समय का प्रभाव था कि दरिद्रों को केन्द्र में रखकर उनकी ‘महानता’ के गुण गाए जा रहे थे और सम्पन्नों को ‘दीनबंधु’ बनने के मार्ग प्रशस्त किये जा रहे थे। यह हमारी परम्परा है।
हमारा समाज विभाजनों का समाज है। उच्च वर्ग की वरीयता और निम्न वर्ग की उपेक्षा का समाज है। रवीन्द्रनाथ सम्पन्न परिवार से सम्बंघ रखते हैं। पिता देवेन्द्रनाथ ने बंगाल में ब्रह्मसमाज की न केवल स्थापना की थी बल्कि इसके लिए अनेक ग्रंथों का लेखन भी किया था। बनारस से लाकर वेदों को पूरे बंगाल में फैलाया था। मदनमोहन मालवीय की विचारधारा को जनप्रिय बनाया था। कुरीतियों का उन्मूलन किये जाने के लिए समाज में जाग्रति आवश्यक थी। सामाजिक-पारम्परिक-अर्थशास्त्र और साहित्य के रसायनशास्त्र में तालमेल बिठाना जरूरी था।
कहानी का स्पष्ट दिशादेश यह है कि दरिद्रों के प्रति सहानुभूति बढ़े और धन के प्रति इतनी भी लिप्सा न हो कि उसके लिए ईमान बेचा जाए। कहानी के अंत में सेठ अपने बेटे के बदले वही और उतना ही धन (धरोहर) अंधी को लौटाता है, जो उसने उसके पास जमा किया था। पर अंधी वह भी नहीं लेती। अंधी ने दरिद्रता में एक बेटा पाया था, उसके लिए धन एकत्र किया और वह बेटा खो दिया। अब वह फिर ‘सर्वहारा’ है। उसे पूरी दुनिया मिल सकती थी। पर सेठ की दशा देखकर लगता है, उसे पाकर भी वह क्या करती। भीख के पैसों पर नीयत खोटी करने से बेहतर है कि बेहतर सोच के साथ दीन बने रहो। यही अंधी की आंखों से देखा गया सच है, जिसे भिखारिन’ कहानी के जरिए दिखाया गया है।
यह वह समय था जब ‘सर्वहारा को पाने के लिए पूरी दुनिया और खोने के लिए कुछ भी नहीं’ के नारे उछाले जा रहे थे। यह सिद्धांत जैसे छुपकर चुपचाप इस कहानी में उतर आया। लेकिन उल्लेखनीय है कि कविगुरु साम्यवादी नहीं थे। यह समय का प्रभाव हो सकता है। या केवल एक संयोग।
कहानी तो साफ साफ हृदय परिवर्तन का दृश्य खींच रही है। जो रवीन्द्रनाथ को ‘गुरुदेव’ उपाधि देनेवाले ‘महात्मा’ गांधाी की विचारधारा है। यह परिवर्तन पुत्र-मोह के अपनत्व का हृदय-परिवर्तन है। सामाजिक या आर्थिक या धार्मिक परिवर्तन की इस समय तक कोई गुंजाइश नहीं बन पाई थी। धर्म का जो शाश्वत अर्थशास्त्र है, उसे स्पर्श भी नहीं किया गया है। ऐसा लगा है, एक मनोरंजक नुक्कड़ नाटक के बाद मंदिर अपनी जगह, भिक्षुक अपनी जगह और सम्पन्न धर्मात्मा अपनी जगह आकर खड़े हो गये हों। अगले नाटक की तैयारी के लिए।
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Sunday, July 31, 2016

‘मंत्र’: आदमी और सांप के किरदार

प्रेमचंद जयंती(31 जुलाई) पर विशेष -
 मुंशी  प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ की आख्या:

-डाॅ. रा. रामकुमार,

प्रेमचंद की ‘मंत्र’ कहानी दो वर्गों की कहानी है। ये दो वर्ग हैं ऊंच नीच, अमीर गरीब, दीन सबल, सभ्य और असभ्य। ‘मंत्र’ दोनों के चरित्र और चिन्तन, विचार और सुविधा, कठोरता और तरलता के द्वंद्वात्मकता का चरित्र-चित्रण है। मोटे तौर पर देखने पर यह कहानी ‘मनुष्य और सांप’ के दो वर्ग की भी कहानी है। अजीब बात हैं कि मनुष्य अपनों में सांप बहुतायत से देख लेता है किन्तु सांपों को मनुष्य दिखाई नहीं देते।
यद्यपि प्रेमचंद अपनी कथाओं में समाज का यथार्थ चित्रण करते थे किन्तु उनका उद्देश्य आदर्शमूलक था। उनकी सभी कहानियां समाज के द्वंद्वात्मक वर्गों का व्यापक चित्र प्रस्तुत करती हैं। अच्छे और बुरे, अमीर और गरीब, ऊंच और नीच, पढे-लिखें और अनपढ़, ग्रामीण और शहरी, उद्योगपति और मजदूर। स्थूल रूप से भारत का समाज ऐसे जितने भी वर्गों में विभाजित है और उसमें जितनी भी विद्रूपताएं हैं, उनका वर्णन संपूर्ण व्याप्ति और पूर्णता के साथ प्रेमचंद की कथाओं में मिलता है।
भारत वर्गों का नही जातियों का देश है। यहां वर्गों का विभाजन अकल्पनीय है। हम जातीय समाजों में रहते हैं। यह जातीय समाज विविध वर्गों में रहता है। यह वर्ग गणित के वर्ग से बिल्कुल भिन्न है। गणित का वर्ग तो उस समाज से बिल्कुल मेल नहीं खाता जिसका चित्रण प्रेमचंद ने अपनी तीन सौ पचास घोषित और बहुपठित कहानियों में किया है। इन वर्गों में गणित के वर्गों की भांति एक भी भुजा बराबर नहीं है, न तो एक भी कोण ही समकोण है। गणित के वर्ग में जो चारों भुजा की बराबरी और प्रत्येक कोण के समकोण होने का सिद्धांत है, वह समाज में नहीं चलता। यह भारतीय समाज है। विषमतावादी समाज। भारतीय समाज का वर्ग ‘रेच’ होने की विद्रूपता से भरा हुआ है। इसकी हर भुजा ऐचक हैं और हर कोण रेच में है। भारतीय वर्ग दुनिया के किसी भी गणित में आंकिक या रैखिक नहीं बैठता। इस समाज की आंतरिक त्रिकोणमिति भी समीकरणों में बंटी हुई है। यही वजह है कि भारतीय समाज और वर्ग का न तो वर्गमूल ही निकलता है, न कोई हल।
‘मंत्र’ कथा में प्रेमचंद ने इसका हल निकालने का प्रयास किया है। मार्मिक यथार्थ और आदर्शात्मक निदान के माध्यम से। किन्तु यह भी द्वंद्वात्मक निष्कर्ष है। एक तरफ अमीर, सभ्य, सुविधासम्पन्न लोगों के पास दया, सेवाभाव, करुणा, ममता, सहानुभूति का अभाव है। उसका पूरा समय तो अपने लिए सुख, सुविधा, लाभ, श्रेय जुटाने में बंटा हुआ है। किसी विवश हितापेक्षी, संकटग्रस्त व्यक्ति के लिए उसने समय बचाकर ही नहीं रखा।
दूसरी तरफ दीन, हीन, वंचित, सर्वहारा, श्रमजीवी वर्ग है, जिसके पास अपने लिए भले ही कुछ न हो, ‘दूसरों के लिए समय ही समय’ है। सेवा, उपकार, श्रमदान आदि इसी वर्ग के लिए बनाए गए आदर्श हैं। बिना किसी भुजा और बिना कोणवाला यह अद्भुत वर्ग इन्हीं अपेक्षाओं में जीता है कि जितना बने दूसरों के काम आओ। आर्थिक और आस्त्रिक विपन्नता उसकी विवशता हो सकती है। इधर विज्ञानवादी सुविधाभोगी समाज में इन सिद्धांतों की केवल भाप निकलती है। वे न तो द्रवित होते हैं न उनका कोई ठोस आधार बनता। असहायों का आपेक्षिक घनत्व सभ्य समाजों में शून्य है। वे अपनी आवश्यकतानुसार समर्थों की आंखों का पानी हटाने की सामथ्र्य नहीं रखते।
इसी परिकल्पना को प्रमेय बनाकर प्रेमचंद ने अपनी कहानी के सूत्र बुने हैं।
‘मंत्र’ कहानी में तीन प्रमुख पात्र हैं। पहला समर्थ मनुष्य डाॅ. चडढा। दूसरा सर्वहारा-दीन-जीव भगत। तीसरा एकलवर्गी सम्पन्नता-विपन्नता, ऊंचता-नीचता विहीन सांप। जैसा कि प्रेमचंद इनका हुलिया बताते हैं, डाक्टर चड्ढा व्यस्त, प्रतिष्ठित, मंहगे खेल के शौकीन, स्वस्थ पचास वर्षीय फुर्तीले व्यक्ति हैं। भगत बूढ़ा, जर्जर, कुशकाय, रस्सीकस है। सांप एक खाते पीते शौकीन घर का हृष्टपुष्ट प्राणी है।
कथा का आरंभ ऐसे होता है कि डा. गोल्फ खेलने अपने बंगले से निकलकर कार की तरफ बढ़ते हैं, तभी एक बूढ़ा आदमी अपने दस दिन से बीमार और मूच्र्छित बच्चे को लेकर आता है। व्यस्त डाक्टर खेलने के
समय में से एक मिनट भी बीमार को देखने के लिए नहीं निकाल पाते। वे खेलने की विवशता और समयसारिणी से बंधे हुए हैं। बूढ़े की करुण पुकार, अनुनय-विनय, पगड़ी तक उस बंधन को शिथिल नहीं कर पाती। बूढ़ा देखता रह जाता है और डाक्टर की कार चली जाती है। उसी रात बूढ़े का इकलौता बेटा उपचार के अभाव में मर जाता है।
इधर सम्पन्न, व्यस्त और सभ्य डाक्टर की तीन सन्तानों में एक पुत्र है। पुत्र को भारतीय समाज-भूमि में ‘वंश-बीज’ कहते हैं। वही दाम्पत्य की ‘सर्वोच्च-उपलब्धि’ होती है। मनुष्य की चिकित्सा करनेवाले डाक्टर के इस ‘सहज-सम्पन्न’ पुत्र कैलाश को ‘सांपों को पालने और उनसे खेलने का शौक’ है। सम्पन्नों की रुचि और क्रीड़ा हमेशा खतरनाक होती है। आज के युग में कार, बाइक की हौलनाक गति और उसके अद्भुत कारनामे इसके ही समसामयिक उदाहरण हैं। डा. चडढा के पुत्र का सांप-अनुराग अपने वर्ग के अनुकूल था।
प्रसंग यह है कि डाक्टर चडढा के पुत्र कैलाश का जन्म दिन है। मित्र एकत्र है और ‘उत्सवानुकूल उत्साह’ में हैं। मित्रों में युवतियां भी हैं। एक युवती मृणालिनी जो प्रेयसी है, कैलाश से आग्रह करती है कि सांप का खेल दिखाओ। स्त्री के समक्ष पुरुष का पुरुषत्व हिलौरें न मारे तो समझ लीजिए आज दिन ही नहीं निकला। वह मित्र भी मित्र नहीं जो मित्र को न उकसाए, जली कटी कहकर आग न लगाए।
मित्र उधर लड़की को उकसा रहे थे, इधर लड़के को जली कटी सुना रहे थे। ‘‘दांत तोड़ डालेे होंगे।’’ यह आक्षेप कैलाश के शौर्य पर सबसे बड़ा आघात था। हालांकि हर संपेरे को यह लांछन सुनना ही पड़ता है। यही तो फर्क है आम संपेरे और संभ्रांत संपेरे में।
अहं पर पड़ी चोट से बलखाकर कैलाश ने एक काले सांप की गर्दन दबोची और मुंह खोलकर उसके दांत दिखाने लगा। इस टिप्पणी के साथ कि मेरे पास इससे बड़ा और जहरीला सांप दूसरा नहीं है, अगर किसी को काट ले तो आदमी आनन फानन में मर जाए।
मित्रों ने सांप के दांत देखे तो रोमांचित हो गए। भारतीय मनुष्य की यही विशेषता है। वह गाय, बैल दांत देखकर खरीदता है। शेर और भालू के दांतों के ताबीज़ पहनता है और सांपों के प्राणान्तक दांत देखकर रोमांचित होता है। भारतीय आदमी इसीलिए भारतीय आदमी को खुश करने के लिए दांत दिखाता है। समर्थ के समक्ष असमर्थ दांत निपोरे खड़ा रहता है कि ‘भैया जी’ का ‘अहं’ संतुष्ट रहेगा। एक ‘असहाय भारतीय’ को दांत निपोरता देखकर ‘भारतीय मनुष्य’ अपने मित्रों के सामने दांत दिखाकर कहता है -‘देखा मेरा जलवा।’ मनुष्य की सभ्यता का इतिहास वास्तव में ऐसी ही ‘दंत-कथाओं’ से भरा पड़ा है।
कहानी ‘मंत्र’ में इस ‘दंत-प्रदर्शन’ के पश्चात एक घटनात्मक मोड़ आता है। जिस सांप के बारे में कैलाश ने मित्रों में यह वक्तव्य दिया था कि सांप बड़ा समझदार होता है। अगर उसे विश्वास हो जाये कि इस आदमी से मुझे कोई हानि न पहुंचेगी तो वह उसे हर्गिज न काटेगा। उसी सांप ने गर्दन पर पकड़ ढीली पड़ते ही कैलाश के हाथ में दांत गड़ा दिये। सांप का दांत गड़ाना अर्थात विष की दस एम्पूल मात्रा शरीर में प्रविष्ट कराना और जीव का जीवन के लिए संघर्ष प्रारंभ होना। अर्थात् सभ्य-समाज की मनोरम घोषणाएं ‘सांप-वृत्ति’ पर लागू नहीं होती।
कैलाश को बचाने में कई सर्प-विशेषज्ञ असफल हुए। कई जड़ी-बूटियां निष्फल हो गईं।
कथा अब अपने चरमोत्कर्ष की तरफ चलती है। प्रेमचंद लिखते हैं-‘शहर से कई मील दूर एक छोटे-से घर में एक बूढ़ा और बुढ़िया अंगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। बूढ़ा नारियल पीता था और बीच-बीच में खांसता था। बुढ़िया दोनों घुटनियों में सिर डाले आग की ओर ताक रही थी। एक मिट्टी के तेल की कुप्पी ताक पर जल रही थी। घर में न चारपाई थी, न बिछौना। एक किनारे थोड़ी-सी पुआल पड़ी हुई थी। इसी कोठरी में एक चूल्हा था। बुढ़िया दिन-भर उपले और सूखी लकड़ियां बटोरती थी। बूढ़ा रस्सी बट कर बाजार में बेच आता था। यही उनकी जीविका थी। उन्हें न किसी ने रोते देखा, न हंसते। उनका सारा समय जीवित रहने में कट जाता था। मौत द्वार पर खड़ी थी, रोने या हंसने की कहां फुरसत!’
इस दीन-हीन अवस्था में रहनेवाला यह बूढ़ा भगत वहीं है जिसके बच्चे को डा. चडढा ने देखा तक नहीं
  था और वह मर गया था।
इस पूरे प्रकरण को प्रेमचंद ने बहुत मार्मिक बना दिया है। करुणा, मानवीय चेतना, परोपकार, व्यक्तिगत राग-द्वेष, प्रतिहिंसा, सत-असत के वैचारिक अंतद्र्वंद्व के भंवर में डूबता-उतराता यह बूढ़ा ‘जाड़े-पाले की रात में’ रात के एक बजे अपने बुझ़ापे की असमर्थता को परे धकेलकर, अपनी दीन अवस्था को कुचलता हुआ अपने ‘सांप काटे के मंत्र से’ एक जान बचाने दौड़ा जा रहा था। जो बाप अपने बेटे की जान नहीं बचा पाया, वही उस व्यक्ति के बेटे की जान बचाने जा रहा था, जिसने उसके बेटे की जान अपनी गोल्फ स्टिक से दूर छिटका दी थी। छोटे लोग ऐसे ही होते हैं।
प्रेमचंद ने भगत के आहत पिता की मनोदशा का सशक्त चित्रण करते हुए लिखा है: भूल नहीं गया हूँ। पन्ना की सूरत आंखों में फिर रही है। इस निर्दयी ने उसे एक नजर देखा तक नहीं। क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? खूब जानता था। चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाह देख लेने से अमृत बरस जाता। नहीं, खाली मन की दौड़ थी। अब किसी दिन जाऊँगा और कहूँगा: क्यों साहब, कहिए, क्या रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे, कोई परवाह नहीं। छोटे आदमियों में तो सब ऐब हैं। बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं।‘’ वही ‘छोटा आदमी’ दौड़ा चला जा रहा है, अपनी इन ‘आहत घोषणाओं’ को काटता हुआ।
अंततः दीन-हीन आहत बूढे के ‘मंत्र’ से कैलाश का मृत शरीर जीवित हो उठता है। लोग आनंद अतिरेक में एक दूसरे को बधाइयां देने में लगे रहे और बिना श्रेय जताए, बिना कुछ महत्व जताए ‘भगत लपका हुआ घर चला जा रहा था कि बुढ़िया के उठने से पहले पहंुच जाऊं’। ऐसे ही होते हैं अनपढ़ छोटे लोग।
कहानी के डाक्टर का ‘हृदय-परिवर्तन’ होता है। यह कहानी का ‘गांधीवादी’ अंत है। गांधी ने दीन-हीनों के दुखों को दूर करने और दलितों के उत्थान पर जोर दिया था। अपराधियों को ‘हृदय-परिवर्तन’ से बदलने की बात कही थी। प्रारंभ में प्रेमचंद गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। उनकी अनेक कहानियों में यही ‘हृदय परिवर्तन वाला उदारात्मक दृष्टिकोण’ दिखाई देता है। वंचितों के प्रति उदारता और उनकी उदात्तता को मंडित करने का भाव उनमें अंत तक रहा। इसी मसाले से उनके समकालीन सुदर्शन ने ‘हार की जीत’ लिखी।
आज भी कितने ही डा. चडढा हैं। उन्होंने अपनी फीस बहुत बढ़ा ली है। वे स्वयं उच्च रक्तचाप और शुगर के मरीज हैं लेकिन बेहतर मार्केटिंग के जरिये उन्हीं सब बीमारियों का इलाज भी कर रहे हैं। उधर दूसरी ओर आज भी भगत के बच्चे मर रहे हैं। आज भगत के मंत्रों की किसी को जरूरत नहीं रही, न आज उनकी कुछ गिनती ही होती। वह विद्या अब अंधविश्वास है और संभ्रांत लोगों के लिए अपने ‘उच्चता के महाकाश’ से नीचे उतरना असंभव है। वहीं ‘विश्वास के इंजेक्शन’ या तो स्टाक में नहीं हैं या मिलते भी हैं तो उसकी कीमत चुकाने की क्षमता किसी के पास नहीं बची है? विश्वास भी उतनी मात्रा में काम नहीं करता जितनी मात्रा का जहर ‘सांप’ उगलते हैं। परिणाम वही पलसा के तीन पत्ते।
निष्कर्षतः, आज हमारा समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से सारे ‘उदारवादी मूल्य खदेड़े जा चुके’ हैं। दबंगों के इस युग में अब यह घटना घटती है कि जिसकी जरूरत है उसके हाथ पांव बांधकर लाओ, मंत्र पढ़वाओ, असर हुआ तो ठीक वर्ना अगलेे को पाखंडी कहते हुए पीट-पीकर मार डालो। उच्छ्रंखलता को मनमानी करने का अवसर मिला हुआ है। देखें कब तक! कोई भगत जरूर आएगा जो इस सांप के काटे का मंत्र जानता होगा और ‘समय के सांप से दंशित समाज’ को ‘मृत्यु-शैया’ से बाहर लायेगा।


डा. रा. रामकुमार,

Thursday, June 30, 2016

इस कारवाने जीस्त में...



बढ़ते रहो, रुकना नहीं, कैसी भी हो मुश्किल बड़ी!
हर हाल में चलते रहो, हर हार से मंजिल बड़ी!
ताकत बड़ी, हिम्मत बड़ी, हर हौसला, चाहत बड़ी,
इस कारवाने जीस्त में, हर राह है संगदिल बड़ी!

डाॅ. रामकुमार रामरिया,
नये राम मंदिर के पीछे, गुलमोहर गली,
35, स्नेह नगर-27, बालाघाट
शुक्रवार,1 जुलाई 2016, प्रातः 7.19

शब्दावली :

कारवाने जीस्त: जिन्दगी का अभियान, जीवन की यात्रा,
संगदिल: पत्थरदिल, कठोर, निर्मम,

Wednesday, June 22, 2016

मोको कहां ढूंढे रे बंदे

कबीर जयंती पर विशेष ..

कहानी -


 मोको कहां ढूंढे रे बंदे

निस्तारखाने में बाल्टी रखकर अमर इसके पहले कि मां को इस घटना का हाल सुनाता, उसने देखा कि रमजू, अलतू और शफ़्फू उसे घेरकर खड़े हो गए।
‘‘तुम कोई तीसमारखां हो?’’ रमजू ने अपनी कमर में हाथ रखकर सवाल किया ‘‘रात में भी तुम गेट से अंदर घुसे...और एकदम सामने बैठे...और अब पानी के नल पर हुश्नपरियां तुमसे गुफ़्तगू करने लगी हैं।’’
‘‘तो मैं क्या करूं?’’ अमर ने कहा।
‘‘हां, अब ये क्या करे?’’शफ़्फ़ू ने कहा। अल्तू ने हां में हां मिलाई।
रमजू सिर खुजाने लगा। अमर उससे एक क़दम निकल गया था। रमजू का चेहरा खिंच गया।
अमर उत्साह में था। वह सब कुछ बताना चाहता था। रमजू को फुसलाते हुए बोला: ‘‘रमजू! क्या बात है उस्ताद?’’
‘उस्ताद मत कहो, अम्मू उस्ताद! तुम तो हमारे भी उस्ताद निकले।’’ रमजू ने हथियार डाल दिए। उसके चेहरे पर मुस्कान फिर खिल उठी थी।
पंचायत बैठी। वास्तव में उसे चौपाल कहना ठीक है। पांच नहीं, चार थे वे लोग। अमर, रमजान, अलताफ़ और शफ़ीक़। चारों की चौपाल में हुश्नपरियों की चर्चा चली।  वे जहां ठहरी हैं सराय में उस मेहमानख़ाने का नक़्शा खींचा गया।
इस चौकड़ी के परिवार जहां रहते हैं वह चाल वास्तव में ‘धन्ना सेठ की सराय’ का ही एक हिस्सा है। आगे के हिस्से में इनकी दूकानें और परिवार है, पीछे किराने और चाय समोचे की दूकानें हैं। ऊपर के हिस्से में सराय हैं, जहां थियेटरवाले ठहरे हुए हैं। उसी के सामने ही मैदान है जहां थियेटर लगा हुआ है।
‘‘यानी ये लोग ठीक हमारे सर पर ठहरे हैं!....तो हमें भी उन्हें सरआंखों पर लेना चाहिए।’’ रमजू ने प्रस्ताव रखा।
चौपाल ने फैसला किया कि जब वे मानती है कि वे हमारी मेहमान हैं तो उनकी पूरी ख़ातिरतवज़्ज़ो की जाएगी।
आंखों ही आंखों में आपसी इकरारनामे पर दस्तखत हो गए। रमजान तो आसमान पर उड़ने लगा। जन्नत इतने नजदीक है और हमें ही पता नहीं। उसने सारी ताकत इस पेशकश पर लगा दी कि अम्मू उस्ताद को जो गाने का दावतनामा पेश किया गया है वह किसी भी सूरत में टाला नहीं जाएगा।

दोपहर होते होते चारों बच्चे पीछे की सराय के रास्ते पर खड़े थे। टिकट-कीपर भाईजान सीढ़ी पर ही मिल गए। मुस्कुराकर अमर से बोले-‘‘होर छोटे म्यां! सब ख़ेरियत तो हे...कां चल दिए मझे मझे में..’’
‘‘कही नहीं...हम तो ऐसे ही...’’ अमर सकुचा गया तो रमजान ने आगे बढ़कर मोर्चा सम्हाल लिया-‘‘ सलाम भाई जान! दरअस्ल सुबो सुबो इसका गाना...बेबियों ने सुना...होर...’’ उसकी आधी बातें हलक में ही अटक गई क्योंकि जिस सीढ़ी पर वे खड़े थे उसी पर फरफराती हुई वही लड़कियां ऊपर चढ़ी आ रहीं थीं।
‘‘आदाब!’’ छरहरी गायिका और नर्तकी ने, जिसने इस वक़्त सलवार कमीज़ पहन रखी थी, अमर को आदाब पेश किया। अमर ने हाथ जोड़ दिए और हकलाकर कहा -‘‘ ये रमजान अली है..ये शफीक खान और ये अलताफ़ खान है..और मैं अमरकुमार...ये सब मेरे दोस्त हैं।’’
बाद सबको आदाब के उस छरहरी लड़की ने ठीक उसी अंदाज़ में परिचय पेश किया जिस अंदाज़ में अमर ने किया था.-‘‘ये बेबी शकीला है..ये बेबी फरीदा है ..ये बेबी फातिमा है और मैं हूं बेबी इंदिरा .ये तमाम मेरी हमगीर हैं...’’
सबने नजदीक से देखा कि छरहरी लड़की ज़रा सांवली थी लेकिन उसके नाक नक्श काफ़ी तीखे थे। उसकी हंसी चमचमाती हुई बिजली थी जिसमें गीले इंद्रधनुषी रंग बिखरे पड़ रहे थे। उसके दांतों में अभी-अभी पजाकर सान पर धार बनाए गए चाकू की चमकार थी। उसने इन्हें तस्वीर बनते देखकर कहा -‘‘आइए...उस्तादजी के पास रियाज़ के लिए चलें।

इतना कहकर सारी परियां फरफराती हुई यूं सीढ़ियों पर उड़ती हुई चली गर्हं, जैसे वे जन्नत आबाद करने जा रहीं हों। कम से कम रमजू को ऐसा ही लगा। अमर का कंधा पकड़कर कर उसने कहा-‘अम्मू भाई! मेरे को ऐसा लग रा हे कि परियां जन्नत को आबाद करने को उड़ी जा रहीं हों।’
‘चलो हम बी जन्नत का नजारा करें।’ अलतू ने बेसब्र होकर कहा तो सब ऊपर उस्ताद जी को ढूंढने बढ़े। जहां से साजों के बजने की आवाज़ें आ रही थी उसी ओर बढ़ने पर उन्होंने पाया कि वे संगीत के कारखाने में पहुंच गए हैं। उस्ताद जी के सजे हुए दरबार में तबला, सारंगी, ढोलक, मंजीरे, खड़ताल वगैरह अपनी अपनी बानगियां दिखा रहे थे। वे सब परियां सर पर ओढ़नियां लेकर पैर मोड़कर बैठ गई जैसे .. जैसे किसी शून्य को छोटे उ की मात्रा लगा दी हो.... अमर अंदर ही अंदर हंसा..
उनके आने से केवल तबलावाले, ढोलकवाले, मंजीरे और खड़तालवाले असर में आए .. उस्ताद आंख मूंदें सारंगी में ‘ऊं ईं आं’ कर रहे थे ... और अमर ने ... और रमजान ने ... और शफीक ने... .और अल्ताफ   ने .. पहले एक दूसरे की तरफ देखा और फिर ... कोने की तरफ जहां एक भोंपू, अपनी पूंछ के अंतिम सिरे को कटोरे की तरह गांठ बांधकर पूंछ की नोंक को एक घूमती हुई थाली (अंग्रेजी की डिस्क) पर टिकाकर गाना गा रहा था .. ‘कौन आया मेरे, मन के द्वारे, पायल की, झनकार लिये...’ अमर हैरान रह गया कि इस जिन्न जैसे दिखनेवाले दुमदार भोंपू को कैसे दिखा कि कोई आया ..
 तभी तबलेबाले ने एक हाथ उठाकर उन्हें बैठने के लिए कहा और तबड़ तबड़ उंगलियां नचाने लगा।
वे बैठ जरूर गये लेकिन अमर की आंखें कोने के गाते हुए जिन्न की तरफ से न हटी जो ऊपर से एक भौंपू था और सांप की तरह बलखाकर नीचे आया तो उसकी दुम घूमती थाली पर खड़ें कटोरे के ऊपर टिक गई। भौंपू के साथ साथ एक और कोई गा रहे थे जो उस्ताद के ठीक बगल में बैठे  थे... आखिर उन्होंने लम्बा खींचकर कहा - ‘कौऽऽऽन आऽऽया? और चुप हो गए  ..... ठण्डी आंखों से इन्हें देखते रहे।
  एक आदमी कोने पर गया और गाते हुए जिन्न की  दुम क्टोरी सहित उठायी और उसे एक टेढ़ी उंगली के जैसी खूंटी पर टांग आया जो घूमती हुई थाली के एक किनारे ठुंकी हुई थी। अमर के लिए वह एकदम नई चीज थी, उसकी नजर वहां से हट ही नहीं रही थी।
उस्ताद ने कहा: 'म्यां, वह गिरामोफून है, वह हमारा भी उस्ताद है .. वही सब सिखाता है हमें.. हां इन्दू बानो, कौन हैं वो नन्हें उस्ताद जो।’
सांवली छरहरी लड़की ने कहा: ‘ये अम्मू मियां हैं .. सुबह सुबह यही गाया करते हैं ..’
अमर सकपका कर बोला: ‘नहीं, मेरी मां गाती है तो मैं भी गा देता हूं..’
उस्ताद मुस्कुराए और बोले: ‘मियां जो मां का शागिर्द होता है न ..उस पर अल्लाह की भी नहीं चलती, वह कुदरती हुनरमंद होता है .. मां को याद कर के कुछ गाओ ..’
अमर ने इंदिरा की तरफ देखा। उसने गाओ का इशारा किया। अमर ने इशारे से पूछा कौन सा। इंदिरा ने फुसफुसाकर कहा: ‘सुबहवाला’
अमर के मुंह से निकला: ‘ओ मां!’
लोग हंस पड़े। उस्ताद ने कहा: ‘इरशाद!’
इंदिरा ने फुसफुसाकर कहा: ‘गाओऽऽ!!’

घबराकर अमर ने आंख बंदकर ली! मां को याद किया। मां का हंसता हुआ चेहरा सामने था। अमर अक्सर दूघ के ऊपर पड़ी मलाई को उंगली से हलके से छूकर गुदगुदाता था और मां से पूछता था:‘‘मां मैं मलाई खा लूं!’’ फिर मां की तरफ देखता था। मां हंसकर सिर हिलाती थी, जिसका मतलब होता था:‘‘हां, खा ले।’’ मां अक्सर बोलने की बजाय सिर हिलाती थी और उसके मतलब अमर समझ जाता था। इस बार भी समझ गया। मां ने बंद आंखों के अंदर हंसकर जैसे कहा:‘‘हां, गा दे!’’
अमर के होंठ मुस्कुरा पड़े। फिर उसने गाना याद किया कि कैसे, कहां और क्यों मां ने उसे वह गाना सुनाया था।

तेज बरसात थी। वे गायकोठे की छप्पर के नीचे थे। पानी बहुत देर से गिर रहा था। कोठे के आसपास पानी नदी की तरह बह रहा था। छप्पर के नीचे मां एक नारियल-बूच की रस्सी से बनी झुलंगी खाट पर उसे लेकर  बैठी थी। कोठे के किनारे से पानी धारों धार बह रहा था। छप्पर से भी पानी अंदर छलक रहा था। अमर को ऐसा लगता था छप्पर के ऊपर कोई छुपकर उसपर छींटे मार रहा है। कोई क्या, वही होगी उसकी हमउम्र मेघा गुरट्टी .. मामाजी की लड़की ... जब जब वह आती या जब जब मां के साथ उसके घर जाते तो वह चुपके से उसे किसी भी तरह उकसाकर चली जाती ताकि अमर हरकत में आए, उसे गुरट्टी कहकर चिल्लाए.. गुरट्टी इसलिए कि वह गोरी चिट्टी थी .. अमर गेंहुआ .. वही गुरट्टी (गोरी चिट्टी का संक्षिप्त) जब पानी लेकर चलती तो चुपके से अमर पर छींटे मार देती और सीधी बन जाती।
अमर चिल्लाता ‘‘मारूंगा गुरट्टी!’’
वह कहती:‘‘ देखो न बुआ, मैंने कुछ नहीं किया .. ये जबरदस्ती!’’
तब मामी मेघा को ही कहती:‘‘ हां तू बहुत सीधी है!’’
मेघा तब ‘‘अगर सीधी नहीं हूं तो लो ..’’ ऐसा कहकर अमर पर पूरा गिलास उलटकर भाग जाती।
अमर उसके पीछे दौड़ता -‘‘ठहर गुरट्टी!’’

अमर याद की तेज धाराओं पर तैर ही रहा था कि तभी फिर एक फुहार छप्पर से अमर पर आई। अमर छप्पर की तरफ देखकर जोर से चिल्लाया -‘‘मारूंगा गुरट्टी!’’
मां हंस पड़ी। उसके सिर पर हाथ फेर कर बोली:‘‘बहन की याद आ रही है? मामा के घर जाना है?’’
अमर झेंप गया। ‘‘नहीं, छप्पर से पानी आया न तो ...’’
उसने फिर कोठे के बाहर देखा। पानी और तेजी से बह रहा था। लगता था, बाढ़ आ गईं। फिर उसने उस खाट के नीचे देखा। पानी पैरों को छूने की कोशिश कर रहा था। वह चिल्लाया:‘‘मां! खाट के नीचे पानी!!’’
मां ने निश्चिन्तता से कहा:‘‘नदी पर नाव तुझे अच्छी लगती है न, ले नदी खुद तेरे पास आ गई. ...’’
‘‘और .. नाव?’’‘
‘ये है न अपनी खाट!’’ ऐसा कहकर मां छप-छप पांव ऐसे चलाने लगी जैसे  चप्पू चला रही हो .. अमर ने भी पांव हिलाया पर उसके पैर अभी पानी तक नहीं पहुंचे थे। मां के पांव टखने तक डूबे हुए थे।
घबराकर अमर ने कहा-‘‘मां! नाविक कहां गया....अपने साथ कोई नहीं है, नाव डूब गई तो?’’
‘‘अपने साथ अपना नाविक है न, तुझे नहीं दिख रहा! आंख बंद कर के मेरी छाती से लग जा। वो तुझे दिख जायेगा।’’ फिर मां पैर को पतवार की तरह छप छप चलाकर गाने लगी-‘‘ मोकोे कहांऽऽआं, ढूंढेऽ रेऽऽ बंदे, मैं तो तेरेऽ पाऽऽस में.ऽ...’’
अमर की जब आंख खुली तो बारिश बंद हो चुकी थी। केवल छप्पर से पानी झर रहा था...झरर झरर झरझर

तड़तड़ तड़तड़ तड़तड़
तालियां गूंज उठीं।
अमर की आंख झपझपाकर खुल गईं।




                  ----लेखक के बाल उपन्यास ‘अलिफ जबर पै’ से,




Tuesday, December 30, 2014

खुशसुखन हम बांटते हैं।


 

मुख्यपृष्ठों! सोचना मत हासिये हैं।
हम कसीदे बुननेवाले क्रोशिये हैं।

पाट देते हैं दिलों की दूरियां हम,
खुशसुखन हम बांटते हैं, डाकिये हैं।

समन्दर हैं आंख की सीपी में सातों,
इसलिये ये अश्क सारे मोतिये है।

भ्रम न फैलाते न कोई जाल रचते,
हम खुली वादी में जीभरकर जिये हैं।

जन्में हैं हम पत्थरों में, शिलाजित हैं,
गुलमुहर से रिश्ते तो बस शौकिये हैं।

आंधियों इतराओ मत झौंकों पै अपने,
वक़्त जिसकी लौ है खुद, हम वो दिये हैं।

नाव से निस्बत रखें न हम नदी से,
साहिलों तक तैरकर आया किये हैं।

बस्तियों में रात हो जाये तो ठहरें,
मन है बैरागी तो चौले जोगिये हैं।

कब किसी अनुबंध में बंधते हैं ‘ज़ाहिद’
जिस तरफ़ भी दिल किया हम चल दिये हैं।
वीक्षकीय, 30.12.14

सुगढ़ और सुधि सुमति-समृद्ध समर्थ नेतृत्व के अभाव में वाणिज्यिक विज्ञापनी-प्रबंधन दुरभिसंधि से भरकर एक लहर और हवा की तरह सरसरा रहा है। इससे बहुत सी आत्ममुग्ध यथास्थितिवादी स्थापक शक्तियां अपनी बांबियां रचने लगी हैं। इन दीमकों की सुगमुगाहट से अकुलाकर कुछ शेर खुदबखुद उतर आये। इनका तहेदिल से इस्तकबाल है। तसलीम।
0 डा. रा.रा.वे. कुमार ‘ज़ाहिद’,

Wednesday, September 17, 2014

चिड़िया-घर में खड़ी विलुप्तप्राय हिन्दी

  

आज हिन्दी दिवस है।
सुबह आंख खुलते ही मेरे दिमाग में अलार्म की तरह यह धुन बजने लगी कि आज हिन्दी दिवस है। इसका श्रेय मैं उन तथाकथित हिन्दी-सेवकों को देना चाहता हूं जिन्होंने पत्र लिखकर या फोन करके मुझे बार-बार याद दिलाया था कि आगामी फोरटीन सितम्बर हिन्दी दिवस है। मैं हिन्दी का प्राध्यापक हूं, इस नाते प्रमुख वक्तव्य देना मेरा कत्र्तव्य है। वे मुझे आमंत्रित नहीं कर रहे थे, बल्कि मेरे हिन्दी के प्रति बाई-डिफाल्ट कत्र्तव्य की याद दिला रहे थे। उनके अनुसार, यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि मैं इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिये अवश्य टाइम निकालूं। मैं समझ गया कि न वे ऐसे छोड़नेवाले हैं, न मैं।
हिन्दी दिवस पर क्या बोलूंगा, यह मैं समझ नहीं पा रहा था। लोगों का रुझान दिवस मनाने में ही रहता है। एक कार्यक्रम हो गया, जिन्होंने मनाने के लिये कहा है, उन्हें रिपोर्ट कर दी, बस। यही आयोजकीय है। हिन्दी क्या, क्यों, कहां, कैसी, कितनी आदि का ना तो उन्हें पता है, ना वे पता करना चाहते। उन्हें या तो सब आता है, जैसा कि उन्हें मुगालता है, या हिन्दी में क्या रखा है, जैसा कि हर व्यक्ति सोचता है। हिन्दी सेवकों के नाम पर खड़े इन हिन्दी विरोधियों को भला मैं क्या बता पाउंगा।
बहरहाल, मैं तनाव में हूं कि हिन्दी-दिवस पर कुछ बोलना है, पर क्या बोलना है, नहीं मालूम। इसी बीच चाय आ जाती है और चाय के दो घूंट भरता हूं तो अखबार आ जाता है। इस क्षेत्र का सबसे ज्यादा वेल एस्टेब्लिश्ड, वेल मार्केटेड और लोकप्रिय अखबार ही मेरे घर आता है। सभी द बेस्ट चाहते हैं।
मैं हेड लाइन पढ़ने लगता हूं, बिल्कुल बीचोबीच काले अक्षरों में लिखा हैै- ‘अमित शाह के खिलाफ चार्जशीट। भड़काऊ भाषण मामला। दोषी पाए जाने पर तीन साल की हो सकती है सजा।’ इसे आज की सुर्खी कहा जा सकता है। (कहा इसलिये जा सकता है क्योंकि है ‘सुर्खी’, पर छपी काली स्याही में है।)
दूसरी हेडलाइन- ‘एक लाख जिन्दगी बचाई, पांच लाख बचाने की चुनौैती।’
तीसरी हेडलाइन-‘छत्तीसगढ़ में बनेगी देश की पहली तेंन्दुआ सफारी। सौ हैक्टेयर इलाके में फेंसिंग कर रखे जायेंगे तेन्दुए।’
मुझे जिस तरफ जाना है, वह रास्ता दिखने लगा है। मैं उत्सुकता से आगे पढ़ता हूं-‘छत्तीसगढ़ के बार-नवापारा अभ्यारण्य में देश की पहली तेन्दुआ सफारी बनाने की कवायद की जा रही है।$$वनविभाग ने सफारी का पूरा प्रोजेक्ट तैयार कर लिया है। इसे वे अक्टूबर में दिल्ली स्थित सेन्ट्रल जू अथारिटी के सामने पेश करेंगे।$$नंदनवन से 20 काले हिरण बार-नवापारा के जंगलों में शिफ्ट किये जायेंगे।
इस समाचार के नीचे ही वन विभाग के बड़े अधिकारी का बयान छपा है-‘‘बार नवापारा के जंगलों में तेंदुए बड़ी तादाद में हैं। यहां कुछ इलाकों को तेंदुआ सफारी के रूप में डेवलप करने का प्लान हैं।’’-एसएसडी बड़गैया, डीएफ।(इस अभ्यारण्य में हिन्दी के लिये भी सफारी का प्रावधान है क्या भाई?)
चलिये, मुझे वह मिल गया है जिसकी मैं तलाश कर रहा था। मैं दो और मजे़दार समाचार सुनाता हूं जिसका संबंध भी मेरे मन्तव्य से है, फिर आपको बताता हूं कि मुझे क्या मिल गया। तेंदुआ सफारी वाले समाचार के ठीक ऊपर ‘राष्ट्रीय-अस्मिता और नैतिकता’ से जुड़ा बड़ा रोचक समाचार है। हेड लाइन है-‘केरल सरकार को सुको ने बार लाइसेंस रद्द करने से रोका।
नई दिल्ली। सुको ने केरल सरकार को फिल्हाल बार लाइसेंस रद्द करने से रोक दिया है। सरकार के फैसले के मुताबिक पूरे राज्य में गुरुवार से यह लाइसेंस रद्द हो रहे थे।$$उसने सिर्फ फाइव स्टार होटलों को ही बार लाइसेंस देने का फैसला किया है। जबकि करीब 700 छोटे होटलों को गुरुवार तक उनके बार बंद करने के निर्देश दिये थे। इसके खिलाफ़ होटल मालिकों ने शीर्ष कोर्ट में अर्जी दाखिल कर तुरंत सुनवाई की मांग की थी।$$बेंच ने कहा कि उसे सरकार की नई शराब नीति में कोई तर्क नज़र नहीं आता।’
(तर्क तो शराब के लाइसेंस किसी को भी देने में नहीं है जनाब सुको बेंच साहब!) इससे ठीक बगल में राष्ट्रीय-चरित्र, सांवैधानिकता और संस्कृति पर प्रश्न-चिन्ह लगाते दूसरे समाचार पर जरा गौर फर्माएं-‘‘तेलंगाना का अपमान किया तो दफना दूंगा: सीएम।
हैदराबाद। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव ने मीडिया को धमकी दी है। राव ने कहा है कि तेलंगाना की बेइज्जती करनेवाले मीडिया कर्मियों की गर्दन तोड़ देंगे। उन्हें जमीन के 10 किमी नीचे तक दफन कर देंगे।’’(दफनाने की क्रिया और मि. राव? बात कुछ जमी नहीं। धमकी हास्यास्प्रद हो गई।)
खैर, राजनीति के महारथियों पर दो और हैडिंग देखिये-पहली-‘‘सोनिया की फोटो के खिलाफ दायर याचिका खारिज। यूपीए अध्यक्ष की हैसियत से सरकारी विज्ञापनों के जरिये प्रचार-प्रसार के आरोपों को हाई कोर्ट ने नाकाफी पाया।
दूसरी-‘मानहानि मामले में सुब्रह्मण्यम (सुब्रमणियम जी देखेंगे तो अपने अजीबोगरीब ढंग से लिखे नाम से घबरा ही जायेंगे।) स्वामी को समन। तमिलनाडु की एक कोर्ट ने भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम (सुब्रमणियम) स्वामी को समन जारी किया है। मुख्यमंत्री जयललिता की मानहानि के मामले में उनसे 30 अक्टूबर को अदालत में पेश होने को कहा गया है। जयललिता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य सेसन जज आदिनाथ ने समन जारी करने के आदेश दिए।’’ (प्रकरण श्रीलंका में बंदी तमिलियन मछुआरों के बंदी बनाए जाने का है।)
ये तो रहे राष्ट्रीय राजनीतिक समाचार। लगे हाथ दो अंतर्राष्ट्रीय हैडिंग का लुत्फ लेते चलें। तमिल सुब्रमणियम (संस्कृत ‘शुभ्रमणियम्’) स्वामी के समाचार के ठीक नीचे ये हैडिंग है-‘‘ब्रिटेन की संसद पर चर्चा, भारत ने जताया ऐतराज। मानवाधिकारों पर ब्रितानी सांसद करेंगे बातचीत।’ इसी पेज में ऊपर कोने में हमारी अंतर्राष्ट्रीय नीति पर प्रकाश डालती यह हैडिंग देखिये-‘‘याचिका-इटली जाने की इजाजत से पहले मेडिकल जांच हो नौसैनिक की। नई दिल्ली। बीमार इतालवी नौसैनिक को स्वदेश जाने की इजाजत देने से पहले उसकी मेडिकल जांच कराई जानी चाहिए।$$इतालवी नौसैनिक को 15फरवरी 2012 को की गई फायरिंग में दो भारतीय मछुआरे मारे गए थे।$$कोर्ट से नौसैनिक मैसी मिलियानो लातोरे की जांच के लिए एम्स के डाक्टरों का बोर्ड बनाने का आग्रह किया गया है।’’
इन सब समाचारों में सूचनाएं तो होती हैं, जिन्हंे हम चाव से पढ़ते हैं या पढ़कर गहरी सांस लेते हैं। परन्तु इन सब समाचारों के कुछ निहित अर्थ भी होते हैं। हम सब किसी न किसी प्रभाव को ग्रहण करते हैं, कुछ सोचते हैं, किसी न किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। मोबाइल फोन, टीवी या कम्प्यूटर से बिना देखे जाने निकलनेवाली रेडिओ एक्टिव किरणों की तरह ये लिखित समाचार भी हमारे मष्तिष्क और अवचेतन को वायरल करते हुए गुजर जाते हैं।
इसके बावजूद, हिन्दी-दिवस के अवसर पर मैं इन समाचारों को आज दूसरे ही परिप्रेक्ष्य में देख रहा हूं। हिन्दी भाषा की वर्तमान दशा और वह किस दिशा में निकल आई है, यह देख रहा हूं। अंग्रेजी और अरबी-फारसी के रक्त और मांसपेशियों से भरी-पूरी आज की  गुदाज अखबारी भाषा में हिन्दी को विलुप्त होते किसी शेर की तरह ढूंढ रहा हूं। हिन्दी के शिकार पर प्रतिबंध न होने से शिकार के शौकीन अंग्रेजी काउ-बाॅय और अरबी अजीमुश्शान शहंशाहों ने हिन्दी को पता नहीं कहां और किस प्रकार भून कर खा लिया। अब तो वह चिड़िया घरों मंे दिखाई देनेवाले सिंहों-शेरों पढ़ी और बोली जानेवाली भाषा में यदाकदा दिख जाती है। आजकी यानी 14 सितम्बर 2014 की हिन्दी ट्राई-लिंगुअल दिखाई दे रही है जिसमें अरबी-फारसी के जांबाज अलफा़जों की आन, बान और शान तो है ही, इंगलिश का ग्लैमर और ग्लोबलाइजेशन भी पूरे पावर में है। यही है महोदय आज की हिन्दी। चाहें तो एक बार फिर मेरे चयनित उद्धरणों को पढ़ ले या कोई भी हिन्दी का अखबार यानी न्यूज पेपर उठा कर देख लीजिये। समझ जाएंगे कि मैंने समाचार-पत्र उठाने की बात क्यों नहीं की।
14 सितंबर 2014 गुरुवार।
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