Sunday, December 29, 2013

अतिथि देवो भव!?


अतिथि देवो भव!? 
अर्थात् नववर्ष शुभ हो!!

हमारा समाज ही ऐसा है कि हमारे यहां लोग आते-जाते रहते है। कुछ लोगों का हमें इंतजार रहता है कि साल-छः महीने में वो आएं-जाएं। मज़ा इसी में है कि औचक आएं और भौचक कर जाएं। औचक आनेवाले को अतिथि कह सकते है। जो सावधान करके आए वो कोई खास ही होता है और खास किस्म के इंतजाम का अभिलाषी होता है। खास व्यक्ति पहले से इत्तला कर के आए ऐसा हर सुग्रहणी चाहती है। सुव्यवस्थित रहने में ग्रहणी की नाक रह जाती है। ग्रहणियां बड़ी संवेदनशील होती हैं। कई परिवारों में पत्नियां अपने पतियों से झगड़ पड़ती है कि तुमने बिना किसी सूचना के अपने किसी खास साथी को खाने पर बुलवा लिया, यह अच्छा नहीं किया। हमारे ग्रहणित्व पर प्रश्नचिन्ह लगवा दिया। कुछ कमी रह गई तो हमारी क्या रह जाएगी? ग्रहणियां सुव्यवस्थित और सलोना घर बनाना चाहती हैं। कुल मिलाकर जो पूर्व सूचना के आते हैं, उन्हें अतिविशिष्ट अतिथि कहते हैं।
किन्तु, इन्हें अतिथि कैसे कहोगे? ये तो सतिथि या सुतिथि हैं। किसी कार्यक्रम के अतिथि और मुख्य अतिथि भी पूरी तरह से सुनिर्धारित और सुनिश्चित तिथि पर आनेवाले लोग हैं। इनकी विशेष तैयारी होती है। विशेष आयोजन औश्र उसके विशेष प्रयोजन होते है। इन सब के चलते ये अतिथि कैसे हुए? पर प्रचलन है कि इन्हें अतिथि कहते हैं। विशेष अतिथि, मुख्य अतिथि आदि।
तो फिर अतिथि कौन? हिन्दी की व्युत्पत्ति की दृष्टि से अ$तिथि का अर्थ है- जिनके आने की कोई पूर्व सूचना या तिथि न हो। बिना किसी सूचना या तिथि के जो परिचित आकस्मिक रूप से आ जाते हैं हालांकि वे भी अतिथि कहलाते हैं।
‘उर्दू’ (अस्ल में फारसी, पुल्लिंग) में मेहमान भी वही है जो बिन बुलाए आ जाये। आनेवाला यदि अच्छे अनुभव न दे या ठसियल निकले तो कह सकते हैं कि मान न मान, मैं तेरा मेहमान। आगन्तुक और अतिथि के रूप में इस शब्द को स्वीकृति प्राप्त है। ‘मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है, ऐसा एक गीत भारतीयों ने खूब गाया और गाये जा रहे हैं।
संस्कृत परंपरा में ‘अतिथि देवो भव’ कहा जाता है। इसका प्रचलित अर्थ यह लिया जाता है कि अतिथि देव स्वरूप होता है। इस भावना पर विदेशियों के सम्मान खासकर विदेशी युवतियों के सम्मान पर इस सूक्ति का प्रयोग आजकल चल रहा है। इसका कारण यह है कि कुछ मनचले लोगों ने विदेशी युवतियों के साथ्ज्ञ अभद्रता की थी। भद्रता भारतीय युवतियों के साथ मानसिक विकृत लोग नित्य कर रहे हैं और हमारी संस्कृति षताब्दियों से गुहार लगा रही है कि यत्र नारयस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। इस सूक्ति के अनुसार आजकल भारत में देवता नहीं रहते क्योंकि यहां सबल लोग अबलाओं का निरन्तर अपमान कर रहे हैं।
हर सूक्ति के दो पहलू होते हैं। एक जो मूल्य वह स्थापित करना चाहती है। दूसरा उन्हीं मूल्यों का क्षरण हम देखते हैं। तो इसका एक तीसरा पहलू निकलकर सामने आता है कि सूक्तियां प्रचलित कदाचारों को समाप्त करने के लिए रची गई प्रार्थनाएं हैं कि प्लीज ऐसा मत करो। यहां ‘अतिथि देवो भव’ को ‘आयुष्मान भव’ के समानान्तर लेकर देखें तो बात समझ में आ जायेगी। यदि ‘आयुष्मान भव’ कहकर यह दुआ की जा रही है कि आप दीर्घायु हों, तो ‘अतिथि देवो भव’ भी इसी कोटि कि दुआ या प्रार्थना हो सकती है या होनी चाहिए कि हे भगवान! आगन्तुक अतिथि देवता निकले।
अतिथि देवो भव सूक्ति के दो पहलू हैं। पहला यह कि अतिथि को देवता समझना चाहिए और उसी के अनुरूप उसके प्रति हमारा व्यवहार होना चाहिए। दूसरे अतिथियों के रूप में अब तक बहुत कटु अनुभव  हुए हैं और अब ईश्वर से प्रार्थना की जा रही है कि हमेशा कि तरह दुष्ट अतिथि न आए बल्कि देवता अतिथि आए। यहां ‘अतिथि’ शब्द की एक तीसरी व्युत्पत्ति मूलक ध्वनि हो रही है। अति$थि के अर्थ में। अति+थि इस विग्रह का अर्थ अतिथि के रूप में वे सारे लोग आते हैं, जो आकर लंबे समय के लिए रुक जाते हैं। जैसे शरणार्थी, बेशर्म ठसियल आदि। कुछ सकारण लम्बे समय तक रखे जाते हैं जैस बीमार, असहाय, परित्यक्ता या विधवा। हालांकि इन्हें अतिथि कोई नहीं कहता, आश्रित कहता है। अतिथि तो ये जब कहलाते जब किसी असहाय में अपने पैरों पर खड़े होने का स्वाभिमान, अवसर या व्यवस्था इस देश में होती। बीमार अच्छा हो जाए अपने काम में लग जाए। जब विधवा-विवाह का प्रचलन परंपराओं में हो  जाये या परित्यक्ता को कोई अच्छा साथी चुनकर पुनर्विवाह का खुशख्याल या आत्मविश्वास आ जाए और वह नया घर बसा ले। ऐसा कम मात्रा में हो भी रहा है। मैं इस मामले में मात्रावादी हूं। अगर ऐसा बहुतायत से होने लगेे तो फिर ये तथाकथित आश्रित भी ‘अतिथि’ यानी फारसी में मेहमान कहलाने लगेंगे। मैं कन्याओं को भी पराया-धन की बजाय प्राकृतिक अतिथि कहना अच्छा समझूंगा। ये शब्द इन पर खूब फबेगा। क्योंकि कन्याओं के साथ होता ऐसा ही है। न जाने कब, आपके चाहे या न चाहे, ये आपके आंगन में किलकारियां भरने लगें और ना जाने कब इनके जाने की शुभ घड़ी आ जाये।
हमारे देश में वृद्ध भी आश्रित होते हैं। वृद्धाश्रम में भी वे आश्रित ही हैं। अगर ऐसा हो जाए कि कोई वृद्ध अचानक युवा हो जाए और चल निकले अपने पैरों पर खड़ा होने।तब उसे आश्रित कहलाने से मुक्ति मिल जाएगी। वह अतिथि कहलाएगा। पर प्रकृति इसकी इजाजत नहीं देती। वह उन्हें आश्रितावस्था से दूर की यात्रा पर ले जा लेती है। और अब तो, इस तथ्यात्मक सत्य पर मैं इन्हें आश्रित कहने की बजाय ‘अतिथि’ कहना चाहूंगा। इनकी कोई तिथि नहीं है जाने की। अति ठहरे या अल्प, जायेंगे जरूर। जानेवाला तो अतिथि ही हुआ। कबीर कहते हैं- ‘आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर।’ चादर तानकर कोई नहीं सोनेवाला। डा. हरिवंशराय बच्चन का भी एक मुक्तक इसे दुहराता है कि केवल मधुशाला यानी दुनिया ही स्थायी ह,ै बाकी जो है सो ‘आने के ही साथ जगत में कहलाया जानेवाला।’ कबीर तथा बच्चन  और मेरे इस व्याख्यान के अनुसार, हम सब इस तरह अतिथि ही हैं।
अब तो मानोगे कि हम क्यों प्रार्थना करें कि अतिथि देवता होना चाहिए, वह होता ही देवता है। बात क्योंकि हमारे भी अतिथि कहलाने पर आ गई है तो हम जो ‘मनुष्य-श्रेष्ठ’ कहलाना पसंद करते हैं तो क्या देवता से कम कुछ कहलाना पसंद करेंगे?
अब अतिथि तो इस तरह बिना हींग और फिटकरी के देवता हो गए। अपने लिए कौन छोटी उपमाएं लेता। कम में हम कहां संतुष्ट होते हैं।
पर इससे भी ज्यादा अतिथि के देवता कहलाने का कारण मेरे पड़ोस में नज़र आया। पड़ोस में मेरे एक मित्र हैं आनंदस्वरूप डेनियल। उनका त्यौहार नजदीक है। क्रिसमस पूरे विश्व में मानवता के मसीहा, प्रेम और करुणा के ईश्वरीय पुत्र क्राइस्ट का जन्मदिन ईसाई धर्मावलंबी बड़ी शान और उत्साह से मनाते हैं। वे बड़े सवेरे तैयारी से निकले। सूट-बूट कोट-टाई के साथ। भारतीय ईसाई की यह वेशभूषा जानी पहचानी है। मैंने पूछा-‘मार्निग मार्निग में किधर जेन्टलमैन?’
‘गेस्ट आ रहा है...फेस्टीवल सेलिब्रेट करने...एक्चुअली...मेरी सिस्टर ने मेसेज दिया है कि ही इज गुड मेट फाॅर अवर नीज़...’
‘ओह! हमारी दुआ है कि मामला तय हो जाए।’ मैंने हंसकर कहा तो आनंदस्वरूप डेनियल बड़े आनंद के साथ ‘थैंक यू’ बोलकर चलने लगे। तब मैंने कहा-‘अरे भाई बैठोगे नहीं? इस खुशख़बरी के मौक़े पर चाय हो जाये।’
आनंदस्वरूप डेनियल सादे दिल के व्यक्ति हैं। बिना ना-नुकुर के आकर बगीचे में डली कुर्सी पर बैठ गए। मैंने मुस्कुराकर चुटकी ली-‘आपकी तैयारी देखकर ही कोई समझ सकता है कि किस कदर इंपार्टेन्स दे रहे हैं आप इस फेस्टिवल को।’
‘असली इंपार्टेन्स देखना है तो ज़रा हमारा होम चले जाइए...होल फेमिली मिलकर इस तरह साफ़ सफ़ाई और डेकोरेशन में लगी हुई है कि लगता है गेस्ट इज रिअली अ गाॅड...’ हम दोनों बेमतलब ज़ोर से हंसे। पर मैं ‘गेस्ट इज़ गाॅड’ पर अटक गया। मुझे लगा वे ‘अतिथि देवो भव’ का अंग्रेजी अनुवाद कर रहे हैं।
अंग्रेजी में एक ‘पेइंग गेस्ट’ भी होता है। यह भारत की परम्परा नहीं है। अंग्रेज आए थे गेस्ट बनकर व्यापार करने। उन्होंने हमें व्यापार के गुण सिखाए और हम उनकी अदाओं के गुलाम हो गए। दो सौ सालों तक यह भक्ति चली। और जहां अतिथि देवता हों और हम उनकी अदाओं के गुलाम हों, भक्त हों तो फिर हमारा क्या हश्र हो यह अतिथि ही जाने। इतिहासकार बताते हैं कि हमारी भक्ति और गुलामी का खूब दोहन या शोषण हुआ। सारा धन विदेश यानी ब्रिटेन चला गया।
परन्तु शहरों में अंग्रेजी के अनुकरण पर जो पेइंग गेस्ट होते हैं, वे लूटकर जानेवाले अतिथि नहीं होते। वे हर माह एक निश्चित मासिकाना देकर रहने-खाने की आपसी रजामंदी से मकान का उपयोग करनेवाले होते हैं। आजकल यह व्यापार की शक्ल ले चुका है। अंग्रेजों ने यह अच्छी आर्थिकी हमारे देश को सिखाई है। जिनके मकान है या जमीन है वे नीचे तो अपने लिए बनवाते हैं, ऊपर दस बाई दस के कमरे स्पेशली दो दो छात्राओं के लिए बनवा देते हैं। इस धंधें में अंगूर के गुच्छों की तरह मुनाफा बरसता है। पेइंग गेस्ट का अर्थ ही है पे करनेवाला अतिथि। अतिथि हो तो देकर जाओ। बदले में सुविधाएं ले जाओ।
आतिथेय और आतिथ्य की यही आचार-संहिता है। अतिथि यानी मेहमान कुछ लेकर आता है और बदले में आतिथिक यानी मेजबान कुछ उपहार यानी विदाई भी देता है। हालांकि मुफ़्तख़ोर निठल्ले चतुरों ने अतिथि बनकर इस परम्परा का खूब दोहन किया और रंगीन कपड़ों और भाषा में जनता को खूब छला।
क्षमा करें, इस बीच पत्नी चाय ले आयी हंै, क्योंकि उनका कोई कार्यक्रम टीवी के आस्था और संस्कार-मूलक चैनल में आनेवाला है या चल रहा है। मुझे चाय पिलाने का उद्देश्य यह होता है कि मैं उतनी देर उनकी आस्था का लाभ ले सकूं और अपना कल्याण कर सकूं।
बीवी यानी पत्नी ने टीवी यानी दूरदर्शन चला लिया है। चतुर चाय की चुश्कियों के बीच मैंने देखा कि श्वेत परिधान में श्वेत दाढ़ीयुक्त एक बाबाजी ‘गीता’ पर कुछ प्रवचन कर रहे हैं। मैं चैंक पड़ता हूं। वहां भी वही प्रसंग..... मेहमान और मेजबान की आचार संहिता की चर्चा। मथुरा राज्य का सुदामा नामक एक दरिद्र पुजारी मथुरा के महाराज वासुदेव का उज्जयिनी के संदिपनी गुरुकुल में सहपाठी रह चुका है। तब वासुदेव एक ग्राम प्रधान के पुत्र के रूप में जाने जाते थे। दरिद्र सुदामा को कहां पता था कि एक दिन ग्राम प्रधान का यह पुत्र मथुरा का महाराज हो जाएगा। सुदामा की पत्नी है सुशीला। ईश्वर की कृपा से उसे एकाधिक बच्चे हैं और गृहस्थी में खाने को कुछ नहीं। दान और दया में जो मिल जाता है उसे नारायण का प्रसाद मानकर यह दरिद्र दंपति अपने बच्चे को पालने की लीला में भाग ले रहे हैं। एक दिन सुशीला ने सुझाया-‘‘कुछ बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते? वासुदेव तुम्हारा सहपाठी है। जाकर उससे अपनी व्यथा बताओ। शायद कुछ करे। राजा क्या नहीं कर सकता। सहस्रों लोगों ने आग बढ़कर युक्ति से अवसर का लाभ उठाया है। एक तुम हो कि भाग्य के भरोसे घिसट रहे हो।’’ सुदामा ने सहस्रों पतियों की तरह हारकर कहा-‘‘ला, कहीं से मांगकर कुछ सीधा (श्रद्धा) वगैरह। जाकर देखता हूं मथुरा के राजा को।’’
और फिर जो कुछ कथाओं में आता है वह आप जानते है। पड़ोसियों से मांगकर लाए गए थोड़े से चांवल लेकर सुदामा गए। वासुदेव ने पूछा-‘‘क्या भेजा भाभी ने मेरे लिए...(यानी अतिथि! कुछ लेकर आए हो या चले आए खाली हाथ।) फिर संकोच के मारे सुदामा की पोटली खोलकर हंसते हुए वासुदेव दो मुट्टी कच्चे चांवल खाए ही थे कि रुकमिनी ने रोक दिया। ‘‘कच्चे चांवल खाओगे तो पेट दुखेगा महाराज! फिर मुझे ही उपचार में कष्ट उठाना होगा।’’ (अतिथियों की भेंट भी कम मात्रा में लेना चाहिए यह सीख यहां मिलती है।) फिर बाबाजी ने बतलाया कि रुकमिनी जानती थी कि महाराज वासुदेव प्रत्यक्ष में ले रहे हैं, पर अप्रतयक्ष में बहुत कुछ दे रहे हैं। कथाओं से पता चलता है कि सुदामा जब लौटे तो देखते हैं कि वासुदेव के इंजिनियरों ने उनका झोपड़ा तोड़कर वहां भव्य अट्टालिका बनवा दी है और वर्षों तक चले, इतना राशन भर दिया है। यह होती है मेजबान की अदायगी। अर्थात् अतिथि का देय।
हमने देखा कि अतिथि का अर्थ ऐसे आगंतुक से है जो आकस्मिक रूप से योजना बद्ध तरीके से आता है, जिसके आने की तिथि या तो नहीं होती या सुनिश्चित होती है। उसका रुकना मगर अनिश्चित
होता है। कब जायेगा यह या तो उस पर निश्चित होता है या मेजबान के आग्रह पर निर्धारित होता है। अच्छा आगंतुक हुआ तो ‘‘दो दिन और रुकिए’’ का आग्रह मेजबान करता है। खराब आगंतुक के सामने बार बार जानेवाले साधनों और गाड़ियों की समयसारिणी बताने लगते हैं। तब भी नहीं माना तो पूछ लेते हैं ‘‘कब जाइएगा?’’ महमानी का उसूल ही है कि अच्छा आनेवाला वही है जो जल्दी जानेवाला हो। भ्ज्ञले ही अतिथ्ज्ञि के आने की कोई तिथि न हो पर जाने की तिथि आने के पहले ही उसे तय कर लेनी चाहिए।
यूं भी तिथि का अर्थ है ‘तिल भर ठहरनेवाली’। तिथियां सच्ची अतिथि होती है। आई और ये चली। ठहरने के मामले में वे अति नहीं करती। अब यही लीजिए, ईसवीं सन दो हजार तेरह की तिथियां तेजी से चली जा रही हैं। जाते हुए वे हमसे क्या ले जा रही हैं? जो कुछ भी हम कर पा रहे हैं, बस वही। जो भी हम कर रहे हैं, प्यार से कर रहे हैं। अपने लिए कर रहे हैं। तिथियां तो बस उसे छूकर हमें ही दे जा रही हैं। परन्तु आगंतुक की मर्यादा और अभिदान कल दिखाई देगा, जब दो हजार तेरह की आखिरी तिथि केलेन्डर से फड़फड़मी हुई निकल भागेगी और उसके स्थान पर खड़ी होगी दो हजार चैदह की पहली सौभाग्य-कांक्षिणी तिथि, जिससे हम सब यही उम्मीद लगाए बैठेंगे कि वह कोई भी ऐसी कड़वी याद नहीं दे जाए जो सोलह दिसम्बर दो हजार बारह से ज्यादा शर्मनाक हो। अभी उसके घाव सूखे भी नहीं है क्योंकि उसके बाद उसी की नकल पर सैकड़ों तिथियां हमारे मुंह पर कालिख पोतती चली गईं। मावता अब भी कराह कर कह रही है -बारह तो बारह, तेरह रे तेरह। हम अब ‘अतिथि देवो भव’ की तर्ज पर प्रार्थना कर रहे हैं कि ‘तिथि देवो भव।’ यानी नववर्ष की हर तिथि देववत हो।

25-30.12.13


आप सबको  नववर्ष की मंगल कामनाएं...
 


Thursday, October 10, 2013

Interesting Indian Idioms


Interesting Indian Idioms

On Eating.

Says an Indian proverb or aphorism ‘eat to live, not live to eat.(Jeene ke liye khao, khane ke liye mat jio.) Proverbs are the facts that reveal the truth we can realize what is going on. We see everywhere everyone is living to eat. It is amusing that they are not eating only eatable, but eating ‘not eatable’ things too. Usually some government, central or provincial, officers and employees are being known as ‘excess eating person’ The people usually say ‘Bahut khat hai yar.’  Here khata is not not meant ‘eats’ eatable. Eats denotes that eats ‘money,’ without ‘extra money’ he dose not perform his duties for which he is being taken salary accordingly.
India is a country based on agriculture, specified to produce grains eatable. Bharat ek krishipradhan desh hai. Indian government has made lots of  ‘go-downs’ under food corporation of  India ((FCI)  where all the produced eatable grains are preserved. It doesn’t matter that most of which is being wasted and  rotten in absence of proper care. The most entertaining thing is this  that the big part of its voting population is still hungry and collecting food from dustbins.
Who is eating their food, their eatables? Who knows?
As we have discussed above that un-eatable is being eaten by government employees and ministry-men. News nowadays coming that there are several ministers  pushed into jail for unjustified eating.  They ate chara or ghas (grass), ate coal, lands, machines etc. Think, they have eaten un-eatables. So India should not only known as an agricultural country, it must be known as ‘an eating country, which can eat every thing eatable or uneatable.
Thus we see, India is most sensitive about eating as it is a country of agriculture. What agriculture land is producing for man is also being eaten by pets and unwanted animals, insects, birds etc.. The grains are abstracted and the rest part of a crop is left to be fed to pet animals like cows, bulls and buffaloes. 
Many parts of land is also left to grow grass for animals.  India shown that it does not has any difference between man and animal. As animal can eat the eatables meant for men, the men can also eat the grass or the chara.  They use to say about an idiot person that his or her wisdom is gone to eat grass.( Aql chara charne gayi.)
Many and many proverbs and idioms are there about eating or on eating. Some of the idioms can make you refreshed as you ‘ate’ some rich refreshment.
Let’s take some uneatable things those have been used in Indian idioms. An Indian can eat oath(qasam khana) as well as a person.(aadmi or khasam  khana). In punjabi they use an abuse khasman nu khani. An Indian can eat sandles or shoes. In an Indian film millennium star Amitabh Bachchan is asked by his co-actress Farida Jalal whether to eat shoes. (Jute khaiyega kya?)  As murgh musallam (spicy-cock) is eaten by rich non-vegetarians, poor persons are use to eat sorrows.(gham khana). An Indian government is also blamed by opposition along-with the people of India that the government has sold the nation and ate it.( sarkar desh bechkar kha gai.) Anything in India can be eaten. The eat gaali (abuses) as they eat goli (bullets in battles and tablets in illness.)
If they are fond of eating  tambakoo (tobacco), they are also devoted eater of chugli (backbiting). They culturally eat  paan or tambul (beetles). Their folk song is ‘paan khaye saiyan hamaro’ ( my husband eat beetles.) The most powerful function is Rishvat khana ( eating  means taking bribes.)
Taao khana (being irritated) is their another favourite attitude. Similarly bhao khana (showing attitude) is their most natural behaviour. In this way they enhance their prices, value, cost etc. Bhao is being used as the price of any marketable thing or place. Allo kya bhao diye? (what is the price of potato per kg.) That is also concerned with the price of person also. Uske to bade bhao hain yaar.(he is very  prominent or popular.) woh to  bade bhao khata hai or uske to aajkal bhao badh gaye hain.( he shows attitudes or he is nowadays became arrogant)
Idioms on eating have a wide spectrum. Let’s conclude with a ‘classified study’ of the different types of idioms based on khana that is eating.
We can classify the idioms in three sectors. Veg, Nonveg and Mixed veg-nonveg.
Veg idioms are - paapad belna, chatni peesana, aaloo chheelna, khichdi pakaana, daal galna, daal galaana, daal na galna, namak mirch lagaana, achaar daalna, roti senkna, bhurta banana, daana dalna, chaara daalna, etc. 
Non veg idioms : murgha banana, bakra halal karna, gala / gardan katna, machhli marna, machhali phansna, kaleja / dil nikaalna, boti boti karna, bheja / dimag / jaan khana etc.
Mixed – Veg-Non veg idioms : ghar ki murgi daal baraabar, roti beti / boti ka rishtaa hona, etc.

Thinking this may make you a little refreshed. If digested please have some more afterward.

Dated : 5,6,7,8,9.10.13

Dr. R.Ramkumar,
Associate Professor,
Govt. PG College,
Balaghat. MP.

Monday, August 12, 2013

और अंतिम रस है- वात्सल्य-रस:



बाल कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के विशेष संदर्भ में 
-
कभी कभी और प्रायः सोचता हूं कि मीठा अंत में क्यों परोसा जाता है? समारोह का अध्यक्ष आख़री में क्यों बोलता है? प्रथम विजेता की घोषणा अंत में ही क्यों की जाती है? सबसे ज्यादा और  प्रभावशाली कवि को बाद में ही क्यों प्रस्तुत किया जाता है? नव-रसों में श्रृंगार को पहला स्थान क्यों दिया गया तथा औचकदन कूद पड़नेवाले वात्सल्य रस को दसवें रस के रूप में क्यों दिया गया?
यदि इन सब सवालों से बचकानापन टपक रहा है तो टपक रहा है। इस बचकानेपन को छोड़ पाना या इससे अलग हो पाना संभव होता तो ‘झांसी की रानी’ के गौरव का गान करनेवाली कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान का मातृत्व कभी ‘कदंब के पेड़’, कोयल, खिलौनेवाला और धूप और पानी जैसे कालजयी बाल-गीतों की तरफ़ नहीं मुड़ा होता।
मेरा बचपन जिस बालगीत को ‘मां की आरती’ की तरह गाकर तृप्त होता रहा है, वह हर बच्चे की तरह मेरा अपना आत्मीय गीत बनकर दिल में रच-पच गया था। यह बहुत बाद में मुझे पता चला कि वह गीत ‘झांसी की रानी’ गानेवाली तथा ‘वीरों का कैसा हो वसंत’ सिखानेवाली स्वतंत्रता-समर की वीरांगना कवयित्री सुभद्राकुमारी चैहान का ही है।
  सुभद्राकुमारी चैहान के पारिवारिक सामाजिक और राष्ट्रीय संस्कार वीरता के थे। उनके बालमन पर भारतीय औदार्य और परहित मुलक धार्मिक नैतिक सिद्धांतों का इतना प्रभाव था कि नौ वर्ष की बाल्यावस्था में उन्हांेने ‘नीम’ जैसे कड़वे पेड़ पर गीत लिखा तो उसमें उदारता, सहिष्णुता, परोपकार आदि के सामाजिक सुगंधित फूल और मीठे फल लद गए।वे अपने पहले गीत में ही उनकी सामाजिक बानगी की देखें-  
नीम
हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है।
नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली।
तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
तू दुःखहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी।
$$$
जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो।
तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो।
नीम से आरंभ करनेवाली यही बालिका कोयल जैसी मीठी चिड़िया पर भी लिखती है-
कोयल

देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
इसने ही तो कूक कूक कर
आमों में मिश्री घोली
$$
कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलायी है?
डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
‘सबसे मीठे मीठे बोलो’’
यह भी तुम्हें बताया है
बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी।
अपने अंदर के उभरते रचनाकार के परिमार्जन के लिए ‘कोयल बोलो तो’ तथा ‘एक पुष्प की अभिलाषा’ जैसे स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता से भरे गीतो के लिए विख्यात ‘‘एक भारतीय आत्मा’ दादा माखनलाल चतुर्वेदी के पास सुभद्रा जी ने अपने गीत पहुंचाए तो दादा ने उनके अंदर के मातृत्व को पहचान लिया। उन्होंने सलाह दी कि यदि वे अपने मातृत्व को अपनी रचनाओं में उडे़ंलती है तो वे रचनाएं ज्यादा प्रभावशाली होंगी। परिणाम सामने था ‘‘कदंब के पेड़’’ के रूप में जो तत्कालीन बाल पाठ्यक्रमों में सम्मिलित हुआ और बच्चे बच्चे के हृदय में आज भी गूंज रहा है।
यह कदम्ब का पेड़
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।
आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।

यह वह गीत है जो आज भी याद दिलाता है कि कोई बच्चा उहापोहों से भरी गहन यमुना के
किनारे खड़ें किसी कदंब पर छुपा बैठा है और अपने गए हुए बचपन को वात्सल्य की बांसुरी
बजाकर मां की तरह बुला रहा है।
मातृत्व सुभद्रा जी अन्यतम पहचान है। यही कारण है उनकी बाल कविताओं में मां सदैव उपस्थित
रहती है। मां से संवाद करती  उपर्युक्त कविता के साथ साथ कोयल में मां की महिमा का वर्णन हम देख
ही आए हैं। बच्चों के बालमन में मां जिस तरह स्थापित होती है उसका अद्भुत चित्रण अत्यंत प्रभावशाली
है-
कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलायी है?
डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
‘सबसे मीठे मीठे बोलो’’
यह भी तुम्हें बताया है
बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी।
शिक्षाशास्त्र और मनोविज्ञान में मां को प्रथम गुरु का स्थान प्राप्त है। उसका समर्थन यहां देखा जा सकता है और मां के प्रति सुभद्राजी के आत्मीय आग्रह और लगाव को भी अनुभूत किया जा सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है केवल कोमल और मीठे कोयल के गीतों में ही मां सिखावन बनी हुई है, जहां बच्चों के प्रिय खिलौनों पर भी सुभद्राकुमारी गीत लिखती है तो मां वहां भी परिदृष्य से अदृष्य नहीं होती। हो भी नहीं सकती क्योंकि बचपन और मातृत्व तो अव्ययी हैं।
खिलौनेवाला कविता में बच्चा मां को संबोधित करते हुए कहता है-

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।

हरा-हरा तोता पिंजड़े में,
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा ‘टी सेट’ है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
‘नए खिलौने ले लो भैया
जोर-जोर वह रहा पुकार।’

मुन्नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ से लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है

अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।

बालमनोविज्ञान का उपयोग करते हुए कवयित्री इस गीत को उद्देश्यमूलक बनाने का उद्यम करती है। बच्चे से वे कहलवाती है-

तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।

मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
और उनका मातृत्व संस्कृति का तड़का लगाना भी नहीं भूलता-
यही रहूँगा, कौशल्या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
फिर वे सहज ही यथार्थ के धरातल पर आ जाती है और मां के बिना बच्चे के भय को भी रेखांकित करती है, मां के महत्व की स्थापना के साथ साथ-
 पर माँ, बिना तुम्हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा?
कौन प्यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे देगा?

रवीन्द्रनाथ टैगौर की कहानी ‘काबुलीवाला’, भगवतीचरणवर्मा की ‘मिठाईवाला’ और जयशंकर के ‘छोटा जादूगर’ के प्रभाव के बरअक्श सुभद्राजी ने स्वयं ‘हींगवाला’ लिखकर जहां वात्सल्य में राष्ट्र हित को जोड़ा वहीं प्रेमचंद की कहानी ‘‘ईदगाह’ के हमीद के समानान्तर बच्चे के बालमन की सरल महत्वाकांक्षा को शब्द प्रदान किये और वात्सल्य को स्थापित किया।
 मां के महत्व या वात्सल्य को उन्होंने अपनी कविता ‘मेरा बचपन’ में और भी अधिक व्याख्यायित किया है। मा और बेटी के अंतर्संबंधों, युवावस्था के सापेक्ष बचपन के महत्व आदि पर कवयित्री की सतर्क दृष्टि ठहरी हुई है-

मेरा बचपन
बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे
मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई
$$$
माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना
आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति
वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
$$$
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी
‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा
पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया
मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया।

भावनाओं के सूक्ष्म और स्वाभाविक चितेरे महाकवि सूरदास के उलाहना-संग्रह ‘भ्रमरगीत’ के समकक्ष ही उनका वात्सल्य-चित्रण चलता है। यही से जो वात्सल्य की मंदाकिनी बही, वह बहती हुई सुभद्रा जी की लेखनी से फूट कर प्लावित हो गई। हम समझ सकते हैं कि कैसे सूरदास और सुभद्रा की दृष्टि से वात्सल्य-रस, राग-भैरवी की भांति संगीत-समारोह की अंतिम प्रस्तुति बनकर स्थापित हो जाता है।


0 डाॅ. रा. रामकुमार, हिन्दी विभाग, शासकीय जटाशंकर स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बालाघाट। म.प्र.।  
             

Monday, August 5, 2013

नागपंचमी

नागपंचमी त्यौहार हमारी ‘सांस्कृतिक विरासतों में एक’ प्रतिनिधि-त्यौहार है। विदेशों में भारत ‘संपेरों के देश’ के रूप में जाना जाता है। ऐनाकोंडा और कोब्रा जैसे ख़तरनाक सांपों को विदेशी महत्व का समझा जाता है लेकिन ‘नागलोक’ को भारत का ही पर्याय माना जाता है। मैं कैसे भूल सकता हूं कि हमारी पाठशालाओं में पहला महत्वपूर्ण आयोजन ‘नागपंचमी’ का ही होता था। हम अपनी पत्थर की स्लेटों पर खड़िया की शलाकाओं से ‘नाग-देवता’ यानी ‘ंिकंग-कोबरा’ की आकृति बनाते थे, जिसमें हमारे अभिभावक योगदान करते थे और फिर उसे हम स्कूलों में ले जाते थे। वहां सारे स्लेटी नागों की सामूहिक पूजा होती थी और हमारे पैसों को इकट्ठा करके बुलवाए गए पानीवाले नारियलों की बलि देकर मीठी चिरौंजी के साथ उसका प्रसाद वितरित किया जाता था। मैंने हमेशा सोचा है और हमेशा सोचता रहूंगा कि नागों की पूजा क्यों? इतने बचपन में क्यों? जबकि विद्या की देवी सरस्वती बतायी जाती हंै और महाविद्यालयों में उसे तब मनाया जाता है, जब वैसी विद्या की आवश्यकता नहीं रहती, जैसी बचपन को चाहिए। महाविद्यालयों में सरस्वती पूजा मौज का त्यौहार है, डिस्को म्यूजिक और चंदे की मौज का त्यौहार। वह पूर्णतः युवकानंद के लिए समर्पित त्यौहार है, जिसमें विद्या का कुछ भी योगदान नहीं है। बच्चों के स्कूलों में भी सांस्कृतिक उत्सव के रूप में उसे युवा शिक्षक-शिक्षिका बच्चों को एकत्र कर मनाते हंै। परन्तु नाग-पंचमी? बच्चों की पाठशालाओं में इसे क्यों मनाया जाता है? विशेष तौर पर ग्रामीण और कस्बाई स्कूलों में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। सवाल फिर वही कि क्यों? क्या इसलिए कि भारत की छबि सांपों और संपेरों के देश के रूप में है? हमारे तो प्रतीक और बिंब भी सांप और नाग हैं। भारत के दो प्रतिनिधि राष्ट्रीय सत्तावादी राजनैतिक दलों को राजनीति के समीक्षक ‘एक नागनाथ तो दूसरा सांपनाथ’ के रूप में उल्लेखित करते हैं। साहित्य में सेना से रिटायर्ड एक कवि ने सांपों पर एक कविता लिखी- ‘सांप तुम न सभ्य हुए, न शहरों में रहे, फिर विष कहां पाया? काटना कहां सीखा?’ सापों के देश में यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। इस कविता से कवि भी एक प्रयोगवादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गए। अर्थात् सांप किसी देश और उसके प्रयोगधर्मियों की प्रसिद्धि का कारण है। संभवतः यही कारण है कि पाठशालाओं में नाग-पंचमी का उत्सव मनाकर, बच्चों में नागों की पूजा के संस्कार डाले जाते हैं। ग्रामीणी और शहरी इलाक़ों में सांप के विष को झाड़-फूंककर उतारने वालेे ओझा तथा बैगाओं की रैली निकलती है। यह झाड़-फूंक से ठीक हुए लोगों की समापन किस्त होती है। पहलवानों का दंगल भी इसी दिन आयोजित होता है। सांपों और नागों के उत्सव में पहलवानी का क्या औचित्य? बिना हाथ पैर वाले नागों के सामने पहलवानी के दांव-पेंच क्या काम आते होंगे भला? ये बात और है कि भारत जितना सांपों के लिए प्रसिद्ध है, उतना पहलवानों के लिए भी। दारासिंह ने इस कला में विश्व स्तर के कीर्तिमान स्थापित किए। मगर सांप और पहलवानी में कोई समानता नज़र नहीं आती। सांप और पहलवान की सफलताओं का राज़ उनका फुर्तीला होना है। लेकिन एक दूध पीकर अपने देश के लिए कीर्तिमान लाता है। दूसरा दूध पीकर भी विष ही उगलता है। उदाहरणार्थ - प्रेमचंद की प्रसिद्ध कथा ‘मंत्र’ में डा.ॅ चड्ढा के बेटे की कहानी। कहानी तो महाभारत की भी नागों के योगदान पर है। कृष्ण के नाती परीक्षित को तक्षक नाग डसनेवाला है। वेदव्यास परिक्षित के ‘मृत्यु-भय’ को मोक्ष के ‘दिव्य-मनोविज्ञान’ से दूर करने के लिए महाभारत की कथा सुनाते हैं। परिक्षित को आत्मबोघ होता है और वह मृत्यु को वरण करने योग्य हो जाता है। अगर यह सोचकर कि हमारे बच्चों का आगे चलकर कदम-कदम पर तक्षकों से सामना होगा, उन्हें मानसिक रूप से सांपों और नागों के मुक़ाबले तैयार किये जाने के लिए, बचपन की कोरी शिला-पट्टिकाओं पर नागों की आकृतियां बनवाकर नागपंचमी का उत्सव मनाया जा रहा है, तो ठीक है। मगर फिर सवाल अपना फन उठाता है कि ‘नाग-पूजा’ क्यों? अपने अंदर के भय से घबराकर दूसरों पर आक्रमण करनेवाले नागों की पूजा क्यों जो प्रकृति द्वारा आत्मरक्षा के लिए दिए गए ‘हथियार’ का अकारण, अविवेकपूर्वक, बिना सोचे समझे निर्दोषों पर दुरुपयोग करता है। माना कि आतंकवाद, राजनैतिक प्रतिशोध और अपराधवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, सांस्कृतिक-संप्रदायवाद, इतिहासवाद, परिवादवाद, सेना और पुलिस का सुरक्षा के नाम पर स्त्रियों पर जुल्म, रुपयों के लिए बिकते न्याय आदि ‘ये सब’ और ‘अन्य अनेक अमानवीय कुकृत्य’ नाग और तक्षकों के प्रतीक हैं, मगर इनसे ‘वोटर-युग’ कीे जंजीरों में जकड़े कमज़ोर बच्चे कैसे लड़ पाएंगे? उन्हें परीक्षित पुत्र जनमेजय के नागयज्ञ की शिक्षा दी जानी चाहिए, जिसमें सारे नाग स्वयमेव आकर भस्म हो जाएं। जनमेजय का ‘नाग-यज्ञ’ एक कथा है, तथ्य नहीं। इसलिए नागपंचमी में नागपूजा सिखाई जाती है। जिनसे जीत नहीं सकत,े उन्हें पूजने लगो। हमारे यहां यही संस्कृति चली आ रही है। यद्यपि नागों की सर्वाधिक उपस्थिति महाभारत-काल में ही हुई है। रामायण काल में संभवतः नागों की संस्कृति उत्पन्न अथवा विकसित नहीं हुई थी। एक दो दृष्टांत ही इस विषय में मिलते है। एक, लक्ष्मण को शेष नाग का अवतार कहा गया है। दूसर,े पाताल-प्रकरण में अहिराज यानी सर्पों के राजा अहिरावण का उल्लेख हुआ है। यहां तक कि हनुमान की मुठभेड़ भी मगरमच्छों की रानी सुरसा से हुई। हनुमान का किसी भयानक नाग से सामना नहीं हुआ। हो भी नहीं सकता था क्योंकि भारतीय पुराणवाद के अनुसार हनुमान स्वयं शंकर के अवतार है। शंकर का कण्ठहार नाग है। बाजुबंद नाग है। जूड़ा का बंधन नाग है। नाग उनके आभूषण हैं। केवल द्वापर में नागों का खूब विकास हुआ। कृष्ण का उनसे अच्छा आमना सामना भी होता रहा। बलभद्र जो उनके बड़े भाई थे, वे स्वयं शेषनाग के अवतार थे। बचपन में एक कालिया नामक काले नाग से उनका संग्राम प्रसिद्ध है। तक्षक और नागयज्ञ का जिक्र हो चुका है। त्रिदेवों में शंकर नागों को गले में डाले घूमते थे तो विष्णु की प्रिय शय्या शेषनाग ही थी। कुलमिलाकर, हमारी संस्कृति ही नाग संस्कृति है। मुझे याद है, मैं जब दसवीं का छात्र था, मेरे एक शिक्षक हुआ करते थे, जो हमें रसायन-शास्त्र और गणित पढ़ाते थे। उनके आतंकवाद से त्रस्त बच्चों ने प्रतिरोध में कुछ किया होगा। उन्होंने एक्स्ट्रा-क्लास के नाम पर सारे बच्चों को घर बुलवाकर एक ही बात कही-‘‘मैं वो नाग हूं, जिसका काटा पानी भी नहीं मांगता।’’ सारे बच्चे समझ गए कि पे्रक्टिकल में आंतरिक वीक्षक के रूप में उन ‘नागराज’ का क्या महत्व है। बच्चों ने उन्हंे तात्कालिक रूप से पूजनीय बना लिया और ‘दोनों’ में दूध पिलाया। दूध पीना और पिलानेवालों को डसना हमारी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक परम्परा है तथा नागपंचमी का त्यौहार हमारी सांस्कृतिक विरासत। अगले महीने नागपंचमी है। कच्चा दूध नागों को पिलाने और कच्चा नारियल खुद खाने का दिन।

और एक अद्भुत संयोग देखिए। अगला महीना अगस्त है। अगस्त कोई अंग्रेजी महत्व के व्यक्ति रहे होंगे, लेकिन एक ऋषि भी भारत में हुए हैं। उन्होंने विन्ध्याचल का कद छोटा किया था। नागों के मामले में उनके योगदान की कथा मुझे पता नहीं, लेकिन कच्चे घरों में जहां नाग बेखटके आकर आतंक फैला सकते हैं वहां एक पंक्ति लिखी जती है-‘अगस्त मुनी की आन’ अर्थात् तुम्हें अगस्त मुनि की कसम, इससे आग मत बढ़ना। ऐसा माना जाता है, कि हिन्दी पढ़े-लिखे होने से भारतीय नाग, जहां यह लिखा होता है ‘अगस्त मुनि की आन’, उन घरों में प्रवेश नहीं करते। ओह, शायद इसीलिए बच्चों की स्लेटों में नाग होते हैं। वे सरककर बाद में आस्तीनों में चले जाते हैं। जो लोग आस्तीन चढ़ाते हैं, वे शायद अपने अंदर के नागों को सामनेवाले पर छोड़ते हैं कि जा डस ले।
तो कृपया आस्तीनों से सावधान रहें और नागपंचमी की शुभकामनाएं स्वीकार करें। हेल कोबरा!! मंगलवार, 9 जुलाई 2013, प्रातः 9 बजे

Thursday, January 31, 2013

औरत की जात, ( भाग 1)


           दुष्यंतकुमार ने अपनी एक स्वाभिमानी ग़ज़ल में प्रकृति के ‘कार्य कारण संबंधों’ पर हमारे व्यावहारिक कयासों का चित्रण करते हुए लिखा है-
                  कल रात जो फ़ाके में मरा, उसके बारे में,
                  सभी कहतें हैं कि ‘ऐसा नही ऐसा’ हुआ होगा।
                        ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा,
                        मैं सजदे में नहीं था आपको धोका हुआ होगा।
          इन दिनों हम बलात्कार के, अपनी अपनी समझ के अनुसार, कारणों के अनुमानों की बौद्धिक चर्चा में व्यस्त हैं और ऐसा समझा जा सकता है कि एक ज़रूरी सामाजिक सरोकार में अपनी हिस्सेदारी कर रहे हैं। ये सवाल हम उन लोगों से कर रहे हैं जो ऐसे प्रकरणों में न तो कभी उलझे और ना ही कभी ऐसे मामलों के चस्मदीद गवाह ही रहे। यह भी विश्वास किया जा सकता है कि इस दिशा में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा। जबकि जो बलात्कार में जाने अनजाने और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः जुड़े रहे हैं, वे चुपचाप अपना काम कर रहे हैं और इस विषय में वर्षों से कानूनी कवायद कर रहे हैं।
           मैं रक्षा, सुरक्षा और विघि व्यस्था के साथ संलग्न अधिकारियों का ही जिक्र कर रहा हूं। हमारे देश में ही क्या पूरे विश्व में सामूहिक बलात्कार के आपराधिक और राजसत्तात्मक प्रकरण सदियों से घटते रहें हैं और घट रहे है। क्या कारण है जब आक्रमणकारी आततायी किसी देश पर या समूह पर सामूहिक हमला करते हैं तो वे बच्चों, बूढ़ों और वयस्क पुरुषों को तो हलाक कर देते हैं, लेकिन स्त्री के साथ दुष्कर्म के नये नये वहशियाना तरीके ईजाद करते रहते हैं? ऐसा उन देशों की स्त्रियों के साथ भी होता है जो बुर्के और पर्दों में रहती हैं, वहां भी जहां उन्हें देवी की तरह पूजा जाता है और उन देशों में भी होता है, जहां आज़ादी की हर किस्म का औरतें खुले आम उपभोग करती हैं। इसका अर्थ यह है कि बंधन और मुक्ति की हवा का इस कार्य या दुष्कर्म से कोई सीधा संबंध नहीं है। जो बलात्कार कर रहा है वही बता सकता है कि क्यों उसने ऐसा किया और इससे उसके किस उद्देश्य की पूर्ति हुई है? परिस्थितियों की पड़ताल के साथ साथ अपराधियों के मानसिक विश्लेषण का जिम्मेदार प्रयास अत्यंत आवश्यक है।
         जो चीजें सामान्य परिस्थियों में प्राप्त नहीं होती उनकी प्राप्ति के लिए लूट की जाती है, ऐसा समझा गया है। काम से क्रोध उत्पन्न होता है इसका ‘प्रतीत्समुत्पाद’ गीता में कृष्ण ने अर्जुन को बताया है और बुद्ध ने भी अपने अनुयायियों से कहा है।
          गीता कहती है-
                 ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते,
                 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोेभिजायते।
                 क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः
                 स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणस्यसि। 62-63/ अध्याय 2
        ‘कारणकार्य’ का निर्धारण करते हुए कृष्ण/गीताकार कहते हैं कि विषयों का ध्यान करने से उसकी आसक्ति होती है, आसक्ति से काम का जन्म होता है, काम में ही क्रोध संलग्न होता है। क्रोध के अविजित सम्मोहन से स्मृति-विभ्रम होता है, अच्छे बुरे का ज्ञान लुप्त हो जाता है, इस प्रकार स्मृति विभ्रम से बुद्धि नष्ट हो जाती हे और बुद्धि नष्ट होते ही व्यक्ति अपने पथ से भटक जाता है।
            अपराध-शास्त्र का जिन्हें ज्ञान है और जो उसको आजीविका बनाकर चलते हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि अगर अपराध के कारणों का अध्ययन और विश्लेषण हो चुका है और एक सुनियोजित संस्थान ही उस पर काम कर रहा है तो क्या कारण हे कि अपराध या दुष्कर्म निरन्तर घट रहे हैं? जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे अपराध को रोकेंगे, वे ही उसे बढ़ावा दे रहे हैं। कानून तोड़नेवाले कानून जानने वालों की सहायता ले रहे हैं, कानून बनानेवालों को ‘बना’ रहे हैं। जिन स्थानों पर सुरक्षा मिल सकती है, उन स्थानों से व्यक्ति क्या पा रहा है? इसका विश्लेषण कौन करेगा?
          भारत की राजधानी दिल्ली अपराधों का दुर्ग बन गई है। ‘चिराग तले अंधेरा’ को चरितार्थ करती हुई, भारत में कानून बनानेवाले कारखानों से ही चीखों की आवाजं़े आ रही हैं। कोई लड़की तंदूर में भूनी जाती है तो किसी महिला पत्रकार को सुबह के पहले पहर में मार दिया जाता है। महिला राष्ट्रपति, महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय राजनैतिक दल की महिला अध्यक्ष, महिला लोकसभाध्यक्ष, महिला मुख्यमंत्री, महिला न्यायविदों, महिला उच्च सुरक्षा अधिकारियों आदि से सुसज्जित दिल्ली में ही एक महिला सामूहिक बलात्कार का न केवल शिकार होती है बल्कि ‘काम’ के क्रूरतम और जघन्य शारीरिक उत्पीड़न और अत्याचार के परिणाम स्वरूप अंततः दम तोड़ देती है। पहली बार ऐसे जघन्य अपराध की देशव्यापि प्रतिक्रिया होती है। क्यों? यह सवाल भी है और जवाब भी। हम जागे हैं पहली बार या हमारे जागने के भी निहितार्थ हैं? ये सवाल अपनी जगह मजबूती से खड़े हैं। हम अभी भी ईमानदार हुए हैं, इस पर संदेह क्यों किया जा रहा है? फास्ट ट्रेक न्यायालयों से क्या हम पूरी तरह आश्वस्त हो गए हैं? पहले से मौजूद बलात्कार और दुष्कर्म विरोधी कानूनों के बावजूद दण्ड विधान की कठोर व्यवस्था बनाने पर हम जोर दे रहे हैं। मूल कारण और समस्या इतने हंगामों के बावजूद अभी भी हमारी चिंता और चिन्तन से अलग थलग पडी हुई है।
           अपराध को औद्योगीकरण की सन्तान कहा गया है। बलात्कार को शरीर के खुले विज्ञापनों और शरीर पर आधारित उद्योगों को को कारण माना जा रहा हैं जितना लोभ ओर लालच हम हम जगा रहे हैं उतनी पूर्ति और आसान पूर्ति तो कतई संभव नहीं है। ऐसे उत्पाद के औचित्य पर चर्चा होनी चाहिए जो समाज के लिए बड़ी मात्रा में आवश्यक नहीं है। कुछ लोगों के मुनाफे के लिए उपभोक्ताओं को अंधेरों में डालनेवालों को अपराधी क्यों नहीं समझना चाहिए? शराब पीने को केवल हानिकारक कहने और शराब के ठेकों की खुलेआम नीलामी, अपराध की किस संस्था की तरफ़ इशारा करती है? यह बताना क्या यहां जरूरी है। इस देश को जिस क्षण सुरक्षा के आंतरिक और बाह्य आक्रमणों से निपटनें की तैयारी करनी चाहिए, वह युवराजों को स्थापित करने की कवायद में लगा है। कमजोर क्षणों में लपकने की मुद्रा में संलग्न सिंहासन के लोभियों से हम किस तरह उम्मीद करें?
          बलात्कार से जुड़ी घटनाओं की इस देश में कब कमी रही है? किसी गांव में बाहुबलियों का दल किसी समूह पर सामूहिक हमला करता है और औरतों के साथ दुष्कर्म करता है। किसी स्त्री को सामूहिक बलात्कार के बाद नंगा घुमाया जाता है। दिल्ली की घटना के तत्काल बाद लगातार दिल्ली आरे मुम्बई में ऐसी घटनाएं रोजमर्रा की प्रक्रिया की तरह घटती हंै। बूढ़े कामुक और मानसिक विक्षिप्त पुरुष दस साल से लेकर चार साल की बच्चियों को बलात्कार का शिकार बनाते हैं। सामूहिक बलात्कार एक जैसे उद्देश्य के लिए एक समय में संगठित गिरोह के द्वारा हो रहा है। भारत के कोने कोने में हो रहा है ओर देश अन्य घटनाओं की भांति इसे दर्शक भाव से देख रहा है, क्योंकि कानून ओर पुलिस इस पर काम करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है। फिर घटना जिस पर घटी है वह जाने, हम क्यों अपनी नींद ख्राब करें?
           हमारी नींद को लम्बा समय हो गया है। हम अभी और सोना चाहते हैं। अच्छे स्वास्थ्य  लिए के सोना जरूरी है। जागना होता तो हम महाभारत काल में ही जाग गए होते। धर्म की रक्षा के लिए जिस काल को जाना गया है, उसी काल में सिंहासन के सामने सामूहिक स्त्री अपमान का खेल खेला गया ओर युद्ध धुरन्धर योद्धा भी शांत बैठे रहे। जिन्हें अंधा बताया गया है वे तो उस सामूहिक दुराचार को नहीं देख सके पर जो देख सकते थे, वे भी अंधे बने रहे। वह कौन सा धर्म था जिसने सत्ताधीशों को अपने ही परिवार की कुलवधु के सामूहिक अपमान का अधिकार दिया? 'परम शक्ति' का प्रतीक 'पुराण पुरुष' केवल वस्त्र बढ़ाकर अपने देवत्व से मुक्त हो जाता है। अगर उसी समय कोई कठोर कार्यवाही हो जाती तो ‘यत्र नारियस्तु पूजयंते, रमंते तत्र देवताः’ यह वाक्यांश भाषणों में शोभा के लिए बोला गया केवल एक श्लोक नहीं रहता, महामंत्र हो जाता।      
          इसी ‘दुष्कर्म-कथा’ को आधार बनाकर प्रसिद्ध महिला लेखिका महाश्वेतादेवी ने एक कहानी लिखी। इस कहानी में अधिकारों की लड़ाई लड़नेवाली एक युवती को पुलिस वांटेड घोषित करती है और शिकंजें में कसने की कवायद में जब वह उसे पकड़ लेती है तो उसके साथ निरन्तर सामूहिक बलात्कार करती हे। उसकी वीभत्सता का चित्र वैसा ही है जैसा दिल्ली की युवती का है। महाश्वेतादेवी की उस युवती ने फिर कपड़ा पहनना स्वीकार नहीं किया। उसका सवाल था, ‘इतना होने के बाद अब कपड़े की क्या जरूरत?’ मरते दम तक उसने अपना यह वस्त्र-विरोध जारी रखा। महाश्वेता अपनी इस पीड़िता का नाम द्रोपदी ही रखती है। क्योंकि कानून के नाम पर यहां पुलिस रूपी कुरुपुत्रों ने यह दुष्कर्म किया है इसलिए।
        रक्षकों के भक्षक बनने का यह पहला मामला नहीं हे। शर्मिला अभी भी सेना के विरोध में दो दसकांे से यह लड़ाई पूर्वांचल मिजोरम में पूरे क्षेत्र के लिए अकेली लड़ रही है।
        हमारे पड़ोसी देशों में स्त्री के साथ यही किया गया। अभी हाल ही में ईरान में अचानक एक गिरोह एक पार्टी में एकत्र संभ्रांत महिलाओं पर टूट पड़ा और खुला सामूहिक बलात्कार कई समूहों में बंटकर एक ही स्थान पर किया गया। ‘नैतिकता की स्थापना के लिए’ अनेक स्त्रियों को दिए गए इस ‘अनैतिक दण्ड’ को किस श्रेणी में रखा जाए? स्त्रियों के साथ बलात्कार की क्रूरता को हमारे ऐन पश्चिमी देशों में ‘धर्म’ माना गया है। मुल्लाओं और उलेमाओं ने उतनी ही ‘धार्मिकता’? की भावना से कहा कि गलती उन सभी महिलाओं की थी क्योंकि जिन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ उन सभी ने आपत्तिजनक परिधान पहने थै। सामूहिक बलात्कार की शिकार एक महिला तो गर्भवती थी ओर प्रसव के अंतिम समय में थी। यानी बलात्कार का एक कारण आपत्तिजनक परिधान भी है !?
              लेकिन वहां भी औरतें जागती है और लड़ती हैं। इसका किस्सा पिछले दसक में सामने आया। पड़ोसी पश्चिमी देश में एक औरत को सारे गांव के सामने गांव के बाहु-बलियों ने सामूहिक रूप से बलात्कार का शिकार बनाया। पड़ोसी देश में वह पीड़ित अशिक्षित महिला वर्षों कानून की लड़ाई लड़ती है और जीतती है। पड़ोसी राष्ट्र की न्यायपालिका उसे मानहानि का मुआवजा दिलवाती हे, जिससे वह एक स्कूल खोलती हे जिसमें महिलाओं को शिक्षित करने का काम वह अब भी कर रही है। मध्य भारत के एक अखबार ने महीनों इस कथा को धारावाहिक रूप से प्रस्तुत किया। भारत को इस धारावाहिक सच्ची कथा से शिक्षा लेनी चाहिए और  महाश्वेता देवी की कहानी  जिसे अंग्रेजी में ‘ब्रेस्ट स्टोरीज’ के नाम से संकलित किया है, से भी सचेत होना चाहिए।
             जब ऐसे अपराधों के निदान की बात की जाती है तो कुछ सुझाव भी सामने आते हैं जो इस प्रकार है- ‘कठोरतम कानून बनें, त्वरित न्याय हो, सशस्त्र महिला पुलिस की संख्या में वृद्धि हो, अपनी सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले पुलिस कर्मियों का निलंबन हो, संवेदनशील और सार्वजनिक स्थानों में सी.सी. टी वी कैमरे हों, न्यायिक प्रक्रिया में अविलम्ब सुधार अपरिहार्य है, अपराधियों को दंड तो मिले ही साथ ही उस भयंकर दंड का इतना प्रचार हो कि सबको पता चल सके।  महिलाओं की आत्मनिर्भरता, साहस और कोई ऐसा प्रशिक्षण उनको मिलना चाहिए कि छोटे खतरे का सामना वो स्वयं कर सकें, विदेशों की भांति उनके पास मिर्च का पावडर या ऐसे कुछ अन्य आत्म रक्षा के साधन अवश्य होने चाहियें. मातापिता को भी ऐसी परिस्थिति में लड़की को संरक्षण अवश्य प्रदान करना चाहिए, ऐसे अपराधी का केस कोई अधिवक्ता न लड़े।’ ये सुझाव ब्लाग लेखक एन.एस. बाघेला के हैं। इन सुझाावों के साथ बाघेला का कहते हैं ‘ल्ेकिन पतन समाज के सभी क्षेत्रों में है, आज महिलाएं भी निहित स्वार्थों के वशीभूत होकर या चर्चित होने के लिए कभी कभी मिथ्या आरोप लगती हैं, ऐसी परिस्थिति में उनको भी सजा मिलनी चाहिए। केवल दिल्ली में ही भारत नहीं बसता, सुरक्षा प्रबंध सर्वत्र होने चाहियें।’ कुछ लोग ‘बलात्कारियों को फांसी या कठोर सजा’ देने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना हे कि अगर ऐसे अपराधियों सजा मिलती है तो सारे देश के असमाजिक तत्व भयभीत होंगे। लेकिन एक भय भी व्यक्त किया जा रहा है कि कहीं इस कानून का दुरूपयोग - दहेज उत्पीडन कानून, हरिजन एक्ट, लेवर एक्ट, टाडा, पोटा, आदि की तरह न हो। सभी को पता है कि आज इन कानूनों के अंतर्गत जितने भी केस चल रहे हैं उनमे से अधिकाँश केस झूठे हैं और उनका असली उद्देश्य केवल दोनों पक्षों से अधिक से अधिक पैसा वसूलने में होता है।
          एक दूसरे लेखक शीतलासिंह ‘बलात्कार कैसे रुके?’ के माध्यम से लिखते हैं ‘अब दिल्ली की पीड़ित छात्रा की मृत्यु के बाद जो भी प्रतिक्रियाएं और विरोध हो रहे हैं, उन सबमें अभियुक्तों को कड़ा दण्ड देने की मांग हो रही है। लेकिन यह इस प्रश्न का जवाब नहीं है कि कडे़ दण्ड से ही इस दुष्कर्म से मुक्ति हो सकती है। इसलिए इसे समाप्त करना हो तो कुछ ऐसे उपाय ढूंढने पड़ेंगे जिनसे भविष्य में आन्दोलनों की जरूरत भी न पड़े और अपराधी भी इससे विलग रहने में ही अपना कल्याण मानें।’
 वे समाज के एक छिपे पहलू को उजागर करते हुए लिखते हैं ‘ 47 प्रतिशत बलात्कार के मामलों में तो लड़की के घर, परिवार, रिश्तेदार के लोग ही शामिल पाये जाते हैं, इनके लिए जो सामाजिक, नैतिक मानदण्ड बनाये गये हैं उनको तोड़ने की इच्छा किन कारणों से होती है और उसे कैसे रोका जाय, इसका उपाय केवल दण्ड की सीमा बढ़ाना ही नहीं है। जब बाप के खिलाफ भी बेटियों द्वारा दुष्कर्म की शिकायतें दर्ज कराई जायें और पदों पर बैठे लोगों को भी इसके लिए दोषी ठहराया जाये तब यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल गुण्डे, दरिंदे ही नहीं, ऐसे लोग जिनकी अपराध में रुचि है, वे भी इसके मूल कारण हैं। पदों और स्थितियों का लाभ उठाने वालों को कैसे रोका जाये, यह भी मुख्य प्रश्न है। विभिन्न प्रकार का लालच देकर या उनमें सामाजिक रूप से स्थापित करने की भावना पैदा करके उससे पीछे हटने वालों के साथ क्या किया जाये।
सबसे बड़ी शिकायत तो यह है कि अपराधों के नियमन, नियंत्रण और पंजीयन की जिम्मेदारी जिन संस्थानों के पास है, पुलिस और सुरक्षाबलों के लोगों के भी तो इसमें अग्रणी होने की शिकायत मिलती है। कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में जहां सेना को विशेष अधिकार दिया गया है, उसके खिलाफ भी तो शिकायतें कम नहीं हैं। लेखक लिखते हैं, ‘यह दुष्कर्म सृष्टि के आरम्भकाल से ही अस्तित्व में है। गौतम की पत्नी अहित्या के साथ भी देवताओं के राजा इन्द्र दुष्कर्म करते हैं। अहिल्या को ऋषि का शाप भोगना पड़ता है। जब हम समाज को समता के आदर्श और सिध्दान्त पर आधारित मानदण्डों के अनुसार बनाना चाहते हैं तब हम यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि महिलाएं सदैव किसी संरक्षण में ही रहें। एक वयस्क कन्या माता-पिता के अधीन, वयस्क अपने पति के अधीन और बुढ़ापे में वह अपने बच्चों के अधीन क्यों रहे? अधीनता की यह कल्पना और लोकतांत्रिक मान्यता यह दोनों ही समान दृष्टिकोण के परिचायक नहीं हैं।’ वे एक सुझाव देते हैं ‘दुराचार के आरोपियों को चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार बनने से रोकने के लिए भी कोई प्रतिबंधात्मक व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसे लोग जीतकर संसद और विधान मंडलों में भी पहुंचते हैं तो उन्हें हटाने के लिए भी कोई व्यवस्था होनी चाहिए।’
         बलात्कार के कारणों में समाज के बिगड़ने का एक कारण ओर प्रस्तुत किया जाता है कि टीवी और फिल्मों के कारण अश्लीलता का प्रचार और प्रसार हुआ है। विज्ञापनों और कुछ नृत्य के सीरियलों में नग्नता को उभरा गया हैं। विदेशी तर्ज पर जो सीरियल बने हैं उनमें भी अश्लील साइटों की गर्हित महिलाओं को पेश किया गया है। अपनी बेटी को लेकर आपत्तिजनक फिल्म बनानेवाले तथाकथित बोल्ड निर्माता ने अपनी बेटी के साथ अश्लील साइट की इस महिला से संपर्क किया और उसे लेकर फिल्म भी बनाई। इससे इस देश के बच्चों, नाबालिगों और युवाओं में अश्लील साइटों के प्रति आकर्षण बनाने की जिम्मदारी किस पर होगी? ऐसे समय धन्यवाद के पात्र हैं वे लोग जिन्होंने दोबारा दूसरी अश्लील एकट्रेस के आने पर रोक लगा दी। इस तरह के सीरियल और साइट बंद होने चाहिए। यह आचार संहिता की ओर इशारा है। लेकिन हमारे देश में पहले से ही आचार-संहिताओं की कमी नहीं है। हमारे देश में ऐसे मंदिर हैं जिनमें यौन मुद्राएं अंकित है और उन्हें श्रेष्ठ कलात्मक कृतियों का स्थान प्राप्त है। इन्हें अश्लील कहनेवाले दकियानूसी ओर कलाविहीन कहे जाते हैं। ऐसी संस्कृति की वकालत करनेवालों से क्या कहें?
         एक अजीबो गरीब सुझाव भी सामने आया है। कुछ लोगों का मानना है कि लाइसेंस्ड वेश्यावृत्ति की परम्परा पुनः आरंभ की जानी चाहिए। यानी जो सुंदर है उसे सार्वजनिक बना दिया जाय। क्या इस मूर्खतापूर्ण स्त्री विरोधी प्रावधान से बलात्कार की घटनाएं कम हो जायेंगे? क्या वेश्यावृति को प्राकृतिक मानकर उसे राष्ट्रीय कर्म मान लिया जाये ।तो वैवाहिक संस्थाओं का क्या होगा? परिवार कहां जाएंगे? यह तो ऐसी बात हुई कि शराब छुपकर पीनेवालों के लिए गलीगली में शराबखाने खोल दिये जायें। शराब पीना खराब है कहने वाले राजस्व के लिए शराब के ठेके देते हैं। क्या वेश्यावृत्ति को लाइसेंस देकर राजस्व कमाने की लालसा घृणित नहीं है? ययातियों के इस देश में राजस्व आधारित विचारधारा से मुक्त होकर ही गंदी फिल्में, विज्ञापन, अश्लील प्रकरण, उत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पादों पर रोक लग सकती है। इसे संभव बनाना होगा।
        ठसी प्रकरण में आध्यात्मिकता को उत्पाद के रूप में बेचनेवाले एक सर्वाधिक धनी ‘उत्पाद मालिक’ का कहना है कि वोट दो और आध्यात्मिक राजनैताओं को जिताओ। ऐसे लोगों को जिताओ जो अध्यात्म पर भरोसा करते हो। पर क्या अध्यात्म और धर्म के उत्पादों का संस्थान चलानेवाले दुष्कृत्य नही करते? एक बापू पर तो ऐसे कई मामले हैं। इसी नैतिक देश में कई सरस्वती महाराज रंगे हाथों पकड़े गए हैं।
        हमारी इच्छा है कि संसद को स्वच्छ होना चाहिए और मंत्री भी विदेशों से अश्लीलता आयात न करें जैसा कि पिछले सालों में हमने देखा कि एक केन्द्रीय मंत्री पकड़े गए थे जिनके पास कई अश्लील सीडीज़ थीं। संसद के चलते सत्र में कतिपय सांसद अपने मोबाइल में अश्लील वीडियो देखते पाये गए। इसी धर्म और नैतिकता प्रधान प्रजातांत्रिक देश में कई सांसदों को महिलाओ पर यौनाचार के आपराधिक मामलों में पकड़ा गया है। अर्थात् संसद का शुद्धिकरण हो तो देश में सुधार संभव है।
          आज भी इस देश में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक स्वच्छ और स्वस्थ शिक्षा जरूरी है। आर्थिक सामाजिक उच्चता और निम्नता से भरे भेदभाव विहीन समाज के निर्माण हेतु नई नीतियों की आवश्यता है। व्यावसायिक न्यायायिक और दण्ड विधान के स्थान पर जनता के हित और कल्याण के लिए कार्यरत मुक्त-न्यायालयों की आवश्यकता है। पद के मद के स्थान पर ‘पन’ के ‘प्रण’ की आवश्यकता है।
          कुल मिलाकर संपूर्ण आमूलचूल परिवर्तन, धर्मनिरपेक्ष संपूर्ण-क्रांति की आवश्यकता है। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई धर्मों के स्थान पर मनुष्य-धर्म की स्थापना की आवश्यकता है। सत्य तो यह है कि जिस स्त्री पर बलात्कार होता है वह धर्म नहीं, शरीर होती है। स्त्रीत्व तो हर धर्म की स्त्री की अमूल्य निधि है। अतः स्त्री-रक्षा विश्वधर्म हो, जाति धर्म नहीं। जाति, समाज और धर्म में बांटकर स्त्री कभी सुरक्षित नहीं रही है, यह अध्ययन बताते हैं।