Thursday, November 15, 2012

विवेकानंद के जीवन दर्शन का साहित्य पर प्रभाव


विवेकानंद के जीवन दर्शन का साहित्य पर प्रभाव

विवेकानंद भारतीय राष्ट्रीय संदर्भों में युवकों के प्रेरणा सा्रेत के रूप में प्रासंगिक रहे हैं। विवेकानंद का नाम भारत के गौरवपूर्ण धार्मिक-अध्यात्म को विश्वस्तर पर प्रशस्त करने के अर्थ में स्थापित हो चुका है। इस तथ्य की चर्चा बहुत कम हुई है कि यह नामकरण ‘विवेकानंद’ उनके 1८९३ में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद में भाग लेने के लिए ही किया गया।
विद्वान भोैतिकवादी पिता और अत्यंत धर्म परायण मां की संतान वीरेश्वर और नरेद्र दत्त ने भारत को नये वैज्ञानिक अर्थ और ऊंचाइयां दी। वे वेदांत के पुरोधा के रूप में वैदिक संस्कृति के नये और प्रगतिशील मानदंडों के उद्गाता बने। इसीलिए अमेरिका की भूमि में बिल्कुल नवीन और ऊर्जवसित कण्ठ से उन्होंने विश्वबंधुत्व का नारा दिया, तथापि हिन्दुत्व की भावभूमि पर बने रहकर। उन्होंने अपने प्रथम परिचयात्मक उद्बोधन में कहा-‘‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया।’’
भारतीय गौरव के प्रति आत्माभिमान से संतृप्त यह युवा 25 वर्ष की आयु में ही संन्यासी हो गया। भारत को संपूर्ण रूपेण जानने की दृष्टि से उसने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। हरिहर शर्मा के अनुसार-‘‘ भारत भ्रमण के दौरान उन्होंने जो पहला चित्र देखा उससे चिंताक्रांत बन गए। भूखे, प्यासे, कपडे विहीन, घर विहीन भारत की महा दरिद्रता देखी। इस गरीब भारत के दर्शन ने उन्हें द्रवित कर दिया। सारे विश्व को खिलाने वाला भारत आज दरिद्र दयनीय क्यों? यह चिंतन किया। दूसरा चित्र - एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को घर में नहीं आने देता अर्थात् अश्पृश्यता। “आत्मवत सर्व भूतेषु” बाले भारत के अंदर यह कैसा पागलखाना? क्या हो गया मेरे भारत को? तीसरा चित्र- एक ओर पढे-लिखे अहंकारी लोग, अपने मजे में रहनेवाले लोग। दूसरी ओर निरक्षरता। निरक्षरता, अश्पृश्यता, गरीबी, शोषण के दृश्यों ने उन्हें रुदन करा दिया। नरेंद्र से सच्चिदानद फिर विविधानंद बना यह युवा सन्यासी कष्ट दीनता से समरस हो, केवल रोया नहीं, उसने संकल्प लिया कि विश्व नत-मस्तक हो, ऐसा भारत खडा करना है।
भारत की दशा और दिशा का निर्धारण सदा सत्ता के सबल हाथों में रहा है। संभवतः यही सोचकर उन्होंने भारत के तत्कालीन राजाओं से संपर्क किया और अपना उद्देश्य बताया। जो भी उनके संपर्क में आया, उनका हो गया। यही नहीं उन्होंने उनके अभियान को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई। मैसूर के महाराज रामनाड के अतिरिक्त खेत्री के महाराज भी उनकी सहायता में आगे आए। खेत्री के महाराज के ही प्रस्ताव पर उनका अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में ज्ञान प्रकाश हेतु जाना निश्चित हुआ। यात्रा के लिए आर्थिक अधोरंचना की गई और निश्चित हुआ उनका नया नाम-स्वामी विवेकानंद। सभी जानते हैं कि सम्मेलन में अपनी पहली छाप युवा स्वामी विवेकानंद ने कैसी छोड़ी और कैसे भारतीय जीवनदर्शन विश्व में पुनः अग्रणी हुआ।
परन्तु यह सफलता केवल पलक झपकते, किसी चमत्कार के रूप में नहीं मिली। हरिहर शर्मा के अनुसार उनकी संघर्ष गाथा कुछ यूं है-‘‘मुम्बई से जलमार्ग द्वारा पूर्णतः अपरिचित देश अमरीका पहुंचे इस सन्यासी ने क्या कुछ नही सहा? जाकर मालूम हुआ कि सम्मलेन की तिथि दो महीने आगे बढ़ गई है। अनजान स्थान पर जहां भारत की तरह मांग कर भी नही खाया जा सकता था, कैसे वे रहे होंगे, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। कोई गाली देता तो कोई थूकता। निंदा करते इन लोगों के व्यवहार को ‘विवेकी’ होने के कारण सहन करते रहे। इस अपरिचित देश को अपना बनाने आये थे, इसलिए कोई प्रतिरोध नहीं। ऐसे में एक व्यक्ति मिला। उसने पूछा-‘किसको ढूँढते हो’? इन्होने उत्तर दिया -‘ आपको ही।’ विस्मय से उसने पूछा- ‘कोई मित्र है?’ ‘हाँ है ना , आप हैं !’- इन्हांेने उत्तर दिया। आश्चर्य और आनंद से अभिभूत वह व्यक्ति इन्हें अपने घर ले गया। वह अनजान व्यक्ति अमेरिकन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राईट थे। उन्होंने ही परिचय-पत्र देकर विवेकानंद जी को सर्वधर्म सम्मलेन में भेजा।’’
विश्वकोष में इस अद्भुत् घटना के बारे सिर्फ यह कहा जाता है कि एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला, किन्तु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। परन्तु हरिहर शर्मा ने जिन तथ्यों को उपलब्ध कराया है उससे तो लगता है कि विवेकानंद का विश्व से परिचय कराने में सहायता प्रोफेसर राईट ने ही की।

साहित्य पर प्रभाव

इसमें संदेह नहीं है कि विवेकानंद का संघर्ष, उनका लक्ष्य के प्रति समर्पण, उनकी संगठन-क्षमता, उनकी अद्वितीय वाग्मिता आज भी भारतीय युवकों के लिए प्रेरक है। इसका कारण यह है कि अत्यंत निष्पक्षता पूर्वक विवेकानंद ने भारतीय समस्याओं का विश्लेषण किया। धर्म, संस्कृति, समाज, जाति एवं वर्ण व्यवस्था, आर्थिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में भारत की दुर्दशा का उन्होंने विस्तार से अध्ययन किया और उसके निर्मम निष्कर्ष भी दिए। निर्मम इस अर्थ में कि केवल वे भारतीय धर्म जिसे, आजकल ’हिन्दुत्व’ कहकर उछाला जा रहा है, वे केवल उसका यशोगान ही नहीं करते रहे, वरन उन्होंने बहुत कटु शब्दों में स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलाई गई कुरीतियों और अंधविश्वासों पर भी प्रहार किये। उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘नया भारत निकल पड़े मोदी की दूकान से, भड़भूंजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से, निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।’’ और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गांधीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानंद के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। यही कारण है कि तत्कालीन राजनीति और साहित्य पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा।
आज हम जिस गीत को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में गाने लगे हैं, वह एक ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संन्यासियों की संगठित संघर्ष की कहानी कहता है। यह उपन्यास ‘आनंद मठ’ बंकिमचंद्र की वह कालजयी रचना है जिसमें ‘वंदे मातरम्’ का समवेत गान कर संन्यासियों ने अपना राष्ट्रप्रेम उद्घाटित ही नहीं किया वरन् संपूर्ण जन जागरण का कार्य भी किया। क्या इस उपन्यास को प्रखर युवा-संन्यासी स्वामी विवेकानंद को किया गया समर्पण नहीं कहा जा सकता? ऐसी कितनी ही साहित्यिक कृतियां हैं जिसमें भारत के धर्म, भारत की सहिष्णुता, भारत का विश्वबंधुत्व और भारत का सबको अपना बना लेने की संस्कृति का उज्ज्वल पक्ष दिखाई देता है। अपनी खोई हुई पहचान को जानने,  अपने आत्म-साक्षात्कार के लिए उद्वेलित करती कितनी ही कालजयी रचनाएं हिन्दी में भी रची गई। प्रसाद के नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ के नायक द्वारा जो युद्ध कौशल और नायिका द्वारा जो जन जागरण किया गया वह उसी धर्म और संस्कृति को दर्शाता है जो अंत में राष्ट्रहित में व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर त्याग और संन्यास के शिखर तक पहुंचाने के दृश्य के साथ समाप्त होता है। महादेवी वर्मा का जागरण गीत ‘जाग तुझको दूर जाना’ और निराला की रचनाएं ‘जागो फिर एक बार’, ‘राम की शक्ति पूजा’ आदि में भारतीय धर्म और दर्शन के अंतदर्शन होते हैं। कौन नहीं जानता कि अपनी व्यग्रता के काल में महा्रप्राण निराला, स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित ‘श्रीरामकृष्ण मिशन’ के गेरुआ संन्यासी हो गए थे।  
प्रसिद्ध भारतीय साहित्य के प्रथम नोबलिस्ट गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर भी विवेकानंद से प्रभावित थे। उन्होंने कहा था -‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’
भारत को विदेशों में प्रतिष्ठा दिलाने में विवेकानंद प्रथम थे। उनसे प्रभावित पश्चिमी लेखक रोमां रोलां का यह कथन रोमांचित करता है-‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देखकर ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, ‘शिव!’  यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’’ या यह कह सकते हैं कि उस व्यक्ति ने विवेकानंद को शिव-रूप में देखा।
  भारतीय धर्म में ‘शिव’ महादेव के रूप में परिगणित हैं। शिव अघोरी थे, इस आधार पर उन्हें दलित देवता के रूप में भी जाना जाता हैं। उपर्युक्त दृष्टांत से विवेकानंद को शिव रूप में स्थापित किया गया है। इसका कारण यह हो सकता कि एक बार विवेकानंद ने कहा था, ‘‘ आनेवाला समय शुद्रों का होगा।’’ हिन्दुत्ववादियों का शूद्रों के प्रति क्या दृष्टिकोण है इसे सभी जानते हैं। वे संस्कृति और धर्म के नाम चार वर्णों का रूप यथावत् रखना चाहते हैं। छुआछूत के आरंभिक संस्कार विवेकानंद में भी थे। चातुर्वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक जाति और वर्ण का व्यक्ति दूसरी जाति और वर्ण के व्यक्ति से अस्पृश्यता का भाव रखता है। ऊंच नीच का दृष्टिकोण प्रत्येक जाति में दूसरी जाति के प्रति है, भले ही वह स्वयं उस कृत्रिम व्यवस्था से पीड़ित ही क्यों न हो। ब्राहमण ब्राह्मण से, क्षत्रिय क्षत्रिय से, वैश्य वैश्य से, शूद्र शूद्र से आपस में ही इस दुराचरण में लिप्त थे। इसे देखकर स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण के दौरान क्षुब्ध हुए थे। वे स्वयं कायस्थ थे। अभी पिछले दिनों संस्कृतिवादी राजनीतिक दल के अध्यक्ष द्वारा विवेकानंद और दाउद की तुलनात्मक टिप्पणी पर जमकर हंगामा हुआ। इस पर एक लेखक एक्सकैलिबर स्टीवेंस ने अपने लेख ‘शूद्र विवेकानंद पर चित्पावन बा्रहमण गडकरी का आक्षेप’ में लिखी है-  ‘‘बंगाल में विवेकानंद के नाम पर वोट नहीं मिलते। वर्ण व्यवस्था के मुताबिक कायस्थ शूद्र होते हैं। इस हिसाब से विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और ज्योति बसु तीनों शूद्र हैं। तीनों की भारतीय सवर्ण राजनीति ने क्या गत की है, इतिहास इसका मूक गवाह है। बंगाल में विवेकानंद के नाम पर वोट नहीं मिलते। वर्ण व्यवस्था के मुताबिक कायस्थ शूद्र होते हैं। इस हिसाब से विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और ज्योति बसु तीनों शूद्र हैं। तीनों की भारतीय सवर्ण राजनीति ने क्या गत की है, इतिहास इसका मूक गवाह है। नेताजी और विवेकानंद के नाम पर संघ परिवार हिंदुत्व राष्ट्रवाद का पुनरूत्थान की रणनीति शुरु से बनाये हुए हैं। डॉ. अंबेडकर के खिलाफ सुतीव्र घृणा के बावजूद अनुसूचित वोट के लिए गांधी के मुकाबले अंबेडकर को तरजीह देना भारतीय राजनीति की मजबूरी हो गयी है। विवेकानंद पर बवाल वोट बैंक साधने की कवायद के अलावा कुछ नहीं है।’
इस मिथक को अपने संन्सासी-जीवन में भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद ने स्वयं तोड़ा। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा स्वामी विवेकानंद की एक सौ पचासवीं जयंती के अवसर पर युद्ध स्तर पर मुहिम चलाया जा रहा है और शैक्षणिक कार्यशालाओं में विवेकानंद साहित्य प्रचुर मात्रा में बांटा जा रहा है। ऐसे ही आयोजन में प्रकाशित वितरित एक पुस्तिका में यह दृष्टांत भी प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है कि भ्रमण के दौरान एक स्थान पर बैठकर चिलम पी रहे एक व्यक्ति के साथ बैठकर चर्चा करने की इच्छा स्वामीजी को हुई। ये उसके पास गए तो ‘परंपरानुसार’ वह इनसे दूर खिसक गया और ‘स्वामी’ से अस्पृश्यता की रीति को निभाने लगा। स्वामीजी ने संवाद स्थापित करने की दृष्टि से उससे चिलम पिलाने का आग्रह किया। उस व्यक्ति ने कहा ‘मैं भंगी हूं महाराज!’ कायस्थ संन्यासी संस्कारवश उसके पास से उठकर आगे बढ़ गए। किन्तु उनके विचारों ने कुछ ही देर में उनको मंथन के आधार पर लौटने का मत दिया। उन्होंने सोचा-‘‘यह मैंने क्या किया? मैं पूरे भारत को छुआछूत जैसी कुरीतियों से दूर कर उसे एक बनाने निका हूं और मैं स्वयं..?’’ फिर वे लौटे और आग्रहपूर्वक उस भंगी के साथ बैठकर उन्होंने चिलम पी। इसके बाद ही उन्होंने भारतीय जाति व्यवस्था और संस्कृति पर अपनी क्रांतिकारी पुस्तकंे लिखीं। इन्हीं पुस्तकंों के आधार पर भारत के क्रांतिकारी दल में उनके विचारों का भरपूर स्वागत किया गया।
भारत के उदारतावादी जानते हैं कि ईश्वरों में शिव, राम, कृष्ण, हनुमान, ऋषि मुनियों में नारद, अगस्त, वेदव्यास, शंकराचार्य आदि ‘संस्कारित होकर’ ब्राह्मण हुए हंै। अन्यथा मनुस्मृति के आधार पर तो सभी देहधारी जन्मना शूद्र ही हैं। (‘जन्मना जायतो शूद्रः, संस्कारात द्विज उच्चते’-मनुस्मृति।)
भारतीय मनीषी और साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस तथ्य के परिप्रेक्ष्य में ही अश्पृश्यता के विरुद्ध ‘चंडालिनी’ नृत्यनाटिका की रचना की, जिसका देश विदेश में व्यापक पैमाने पर मंचन होता रहा। प्रसिद्ध उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने किसानों और दलितों को केन्द्र में रखकर अपनी कहानियों और उपन्यास लिखे जो हिन्दी साहित्य की धरोहर बने।
समकालीन संदर्भों में विवेकानंद आज भी इस अर्थ में प्रासंगिक हैं। साहित्य के माध्यम से प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, महादेवी, अमृतलाल नागर, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, सियारामशरण गुप्त आदि के अपृश्यता या छुआछूत पर प्रभावशाली साहित्य लिखने के बावजूद अपनी अस्मिता और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए साहित्य जगत में ही जातिवाद और जातीय वैमनस्य यथावत बना हुआ है। दलित लेखन के दो विभाग मिलते हैं। ब्राहमण एवं अन्य लेखकों द्वारा दलित विमर्श पर सहानुभूति पूर्वक लिखा ‘जागृति साहित्य’ और शूद्रों या दलित लेखकांे द्वारा लिखा गया ‘भोगा हुआ दलित साहित्य।’ भारत सरकार द्वारा बिना जातिगत भेदभाव के अंबेडकर पुरस्कार उन समस्त लेखकांे को दिया जाता है जो दलित विमर्श पर लेखन कर रहें हैं। लेकिन इसके बावजूद साहित्यकारों में आंतरिक भाव वही जातिगत अलगाववादी है।
हालांकि ऐसे भी लेखक हैं जो दलित लेखन को अन्य लेखन से विलगाकर नहीं देखते। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद द्वारा पाठकमंच को हाल ही में उपलब्ध करायी गई देवेन्द्र दीपक की पुस्तक ‘संत रविदास की रामकहानी’ अनेक अर्थों में प्रासंगिक हैं।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि विवेकानंद ने केवल जातिवाद की बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। विवेकानंद चाहते तो किसी राजनैतिक संगठन में शामिल होकर ज्वलंत मुद्दों को उछालकर जनता के विग्रह का आनंद लेते रहते। किन्तु उनका सपना तो भारत के खोए हुए आत्मस्वाभिमान और औदात्य का पुनर्जागरण था। इसके लिए भारत के मूल एकात्मिक संस्रोतों का मार्ग पकड़ा। धर्म और संस्कृति का पथ ग्रहण किया। अच्छााइयां इसी मार्ग से आती हैं और अवसरवादी मानसिकता अपने स्वार्थपूर्ति के ईंधन भी इसी में खंगालते हैं। विवेकानंद ने अध्यात्म का मार्ग क्यों पकड़ा और कैसे महात्मा गांधी के उद्देश्यों को उनके चिंतन का रचनात्मक सहयोग मिला इसका उल्लेख पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगमोहन जी अपने लेख ‘समाज सेवा, धर्म और राजनीति के संदर्भ में गांधीजी के विचारों में विवेकानंद का प्रभाव’ में किया है। वे लिखते हैं-‘‘1901 में गांधीजी कांग्रेस सम्मेलन में भाग लेने के लिए कोलकाता का दौरा किया। वह इस दौरान विवेकानंद से मिलने गए, जो उस समय वस्तुतः मृत्युशैया पर थे। दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, इसका कोई रिकार्ड नहीं है, लेकिन यह आसानी से समझा जा सकता है कि दोनों के बीच अस्पृश्यता के मुद्दे पर अवश्य चर्चा हुई होगी। हाल में जोसेफ लेलील्ड की ‘ग्रेट सोल’ शीर्षक से गांधीजी पर जो पुस्तक प्रकाशित हुई है उसमें लिखा गया है-कोलकाता में हुई मुलाकात के बाद गांधीजी ने अपने भाषणों में जब भी विवेकानंद का जिक्र किया तो अस्पृश्यता की बीमारी का उल्लेख अवश्य हुआ। विवेकानंद और गांधीजी, दोनों के पास शक्तिशाली और मौलिक मस्तिष्क था। दोनों को भारतीय संस्कृति की आत्मिक शक्ति पर अटूट विश्वास था। दोनों व्यावहारिक वेदांत पर भरोसा करते थे और उन्होंने हिंदुत्व को सेवा आधारित जीवन दर्शन के रूप में देखा, जिसमें उच्चतम स्तर की नैतिकता और आदर्श हों। दोनों ने यह सोचा कि आधुनिक व्यक्ति अपने चित्त की वृत्तियों पर बाहरी माध्यमों से जीत हासिल करने की आशा नहीं कर सकता। गांधीजी और विवेकानंद, दोनों का तर्क था कि महान सामाजिक और नैतिक व्यवस्था केवल महान व्यक्तित्वों के कंधों पर ही तैयार की जा सकती है। अगर आपके दिल में कोई शुद्धता, निष्पक्षता और न्याय नहीं होगा तो ये गुण आपके घर में नहीं आ सकते।’  
एक समय था जब राजनीति को धर्म से अलग रखा जाता था। विवेकानंद और महात्मा गांधी के प्रयासों में भी यही दिखाई देता है। लेकिन आज दोनों के बीच का यह अंतर समाप्त हो चुका है। दोनों इस तरह एक दूसरे में मिल गए हैं कि दोनों को अलग करना संभव नहीं है, पहचानना असंभव है कि कहां से धर्म शुरू होता है और कहां से राजनीति।
आज हिन्दुत्व के अर्थ में स्वामी विवेकानंद अत्यधिक प्रासंगिक हो चले हैं। इस संदर्भ में एक लेख के ये अंश बहुत महत्वपूर्ण मालूम पड़ते हैं-‘‘देश में वह हिंदुओं से अधिक घुलते-मिलते नहीं थे। जब उनके आश्रम में एक अनुयायी ने उनसे पूछा कि व्यावहारिक सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना का उनका प्रस्ताव संन्यासी परंपरा का निर्वहन कैसे कर पाएगा? तो उन्होंने जवाब दिया- आपकी भक्ति और मुक्ति की कौन परवाह करता है? धार्मिक ग्रंथों में लिखे की किसे चिंता है? अगर मैं अपने देशवासियों को उनके पैरों पर खड़ा कर सका और उन्हें कर्मयोग के लिए प्रेरित कर सका तो मैं हजार नर्क भी भोगने के लिए तैयार हूं। मैं मात्र रामकृष्ण परमहंस या किसी अन्य का अनुयायी नहीं हूं। मैं तो उनका अनुयायी हूं, जो भक्ति और मुक्ति की परवाह किए बिना अनवरत दूसरों की सेवा और सहायता में जुटे रहते हैं।’
इसका अर्थ यह है कि स्वामी विेवेकानंद ने भारत की दिशाहीनता का भरपूर अध्ययन किया था और वे जानते थे कि भारत में सिद्धांतों की तरफ़ किसी का मोह नहीं है। सभी तात्कालिक लाभ का प्रयास करते हैं। इसीलिए सामाजिक उत्थान पर उन्होंने धार्मिक उत्थान से अधिक जोर दिया। उन्होंने भारत के लोगों के आचरण पर क्षुब्ध होकर कहा था-‘‘ मुझे मनुष्य चाहिए। करोड़ों जनसँख्या के जन को देखकर मनुष्य नही लग रहा। जो भारत भक्ति अपनाता है, उसे ही मनुष्य कहने को तत्पर। भारत भक्ति अर्थात क्या? निरक्षर को देखकर उसे सुशिक्षित करने की जिसमें चाह हो, गरीबी को देखकर अपनी संपत्ति बांटने की इच्छा हो, भूखे को घर बुलाकर खाना खिलाने का भाव हो, तो ही देशभक्त। भारत का पुनरुत्थान ऐसे ही मनुष्यों के माध्यम से संभव है।’’
इन शब्दों में विवेकानंद का वास्तविक स्वरूप छुपा हुआ है। एक अन्य संदर्भ में बुद्धिविहीन कर्मकाण्ड और ढोंग में उलझे अपने एक गुरुभाई को फटकारते हुए उन्होंने कहा था कि मूर्तिपूजा से तुम्हारे आराध्य को शांति नहीं मिलेगी। वास्तविकता तो यह है कि ‘‘गरीब को संपन्न, मूर्ख को बुद्धिमान, चांडाल को अपने जैसा बनाना ही भगवान की पूजा है। इससे ही राष्ट्र निर्माण, भारत पुनरुत्थान होगा।’’
वेदांत के अन्य प्रवक्ता श्री अरबिंदो ने विवेकानंद के प्रभाव पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए  भी यही भाव प्रस्तुत किया- ‘भारत को अपने भीतर से समूचे विश्व के लिए भविष्य के पंथ का निर्माण करना है। एक शाश्वत पंथ जिसमें तमाम पंथों, विज्ञान, दर्शन आदि का समावेश होगा और जो मानवता को एक आत्मा में बांधने का काम करेगा। स्पष्ट तौर पर ‘मात्र एक भाषण ने’ ऐसी ज्योति प्रज्ज्वलित की, जिसने पाश्चात्य मानस के अंतर्मन को प्रकाश से आलोकित कर दिया और ऊष्मा से भर दिया।’
लेकिन ऐसे प्रखर भारतीयता के पक्षधर स्वामी विवेकानंद के तमाम प्रयासों का क्या हुआ? भारत में जो हिन्दुत्व के लिए काम कर रहे हैं या उसकी पुनसर्थापना का काम कर रहे हैं और उसमें विवेकानंद को प्रमुखता के साथ जोड़ रहे है, उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि वे उनके सपनों का साकार करने के लिए क्या कर रहे हैं? उन्हें समीक्षा करनी होगी कि आज इतने वर्षों बाद, डेढ़ सौ वर्षो बाद भी हमारी मानसिकता कितनी बदली?
भारतीय समकालीन साहित्य के संदर्भ पर ही बात करते हुए एक और लेख की चर्चा करना समीचीन होगा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविशालय में समाजशास्त्र के प्राध्यापक डाॅ. अमित कुमार शर्मा का हाल ही में प्रकाशित एक लेख है -‘‘हिन्दुत्व का अर्थ’’। इस लेख में हिन्दुत्व के सीमित अर्थ पर चिंता प्रकट करते हुए वे लिखते हैं-‘‘हिन्दुत्व की अवधारणा में दयानंद, विवेकानंद, तिलक, श्री अरविंद और सावरकर के बाद एक भी नया शब्द किसी ने नहीं जोड़ा है।......वैचारिक शून्यता को विचारधारा कहकर कब तक उधार की गाड़ी चलाई जाएगी? उदार हिन्दुत्व, सांस्कृतिक राष्टवाद, एकात्व मानववाद, मुस्लिम अविद्वेष, पंथ निरपेक्षता आदि कोरे कामचलाउ शब्द हैं जिनका अर्थ बीसवीं सदी के सामाजिक संदर्भों पर निर्भर था। इक्कीसवी सदी के आधुनिक भारत को परिभाषित करने में ये शब्द समर्थ नहीं हैं। किसी सफल राजनीतिक दल के पीछे कोई लौह आबद्ध विचारधारा हो यह आवश्यक नहीं है। खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में। गुलाम भारत और विभाजन के तरफ़ बढ़ते भारत में तो कई विचारधाराएं जरूरी थीं, लेकिन अब समय और परिस्थिति बदल चुकी हैं। अब युगानुकूल विचारधारा चाहिए।’’
हिन्दू धर्म के विषय में उनका अपना मत है- ‘‘हिन्दू धर्म सृष्टि के साथ तादात्म्य पर बल देने वाला धर्म है।’’ इसके पक्ष में वे आगे लिखते हैं -‘‘ हिन्दू जीवन दर्शन विशेष रूप से किसी सीधी राह की बात नहीं सोचता, वह जीवन की जटिलताओं की अच्छी तरह ध्यान में रखते हुए ही लम्बी और घुमावदार राह की परिकल्पना करता है। हिन्दू धर्म में गुरू की कल्पना परित्राता के रूप में नहीं है, नेत्र उन्मीलक के रूप में है। वह राह चलना नहीं सिखाता, राह पहचानना सिखाता है। चलना तो आदमी को स्वयं होता है। रामकुष्ण परम हंस और आनंद कुमार स्वामी इसी किस्म के हिन्दू धर्म गुरु हैं जिनकी सिखावन आज भी प्रासंगिक है।’’
विवेकानंद का नाम उन्होंने स्पष्टतः नहीं लिया है लेकिन रामकृष्ण परमहंस कहकर वे यह इंगित अवश्य करते हैं कि संदर्भ विवेकानंद ही हैं। इसीलिए निष्कर्ष में वे विवेकानंद की तरह ही चिंतित स्वरों में कहते हैं -‘‘ हिन्दू जीवनदर्शन के व्यवहार और सिद्धांत में बहुत अंतर आ गया है। इसी से हिन्दू समाज के अंग्रेजीदां लोग कोरे काम चलाउ शब्दों से अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने लगे हैं। इससे किसी का कल्याण नहीं हो सकता। हिन्दुत्व में जिनकी अब भी आस्था है, उन्हें उपरोक्त मुद्दों पर विचार करना  चाहिए।’’
कुलमिलाकर गेंद ले देकर हिन्दुत्ववादियों के घेरे में ही डाली जा रही है। इसमें कोई संदेह हैं भी नहीं कि आज जब हम स्वामी विवेकानंद के जीवन दर्शन और उनके विचारों से आंदोलित साहित्य की बात करते हैं तो हमारे हिस्से में यह सिद्ध करने का उत्तरदायित्व स्वमेव आ जाता है कि हम व्यावहारिक दृष्टि से किन धारणाओं का सामाजिकीकरण करें? किन ऐसे सिद्धांतों पर ज़ोर डाले जिससे विवेकानंद के सपनों का भारत मूर्त रूप ले सके। इस बात पर भी गौर करे कि विवेकानंद ने क्यों कहा था कि ‘‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उनका यह कथन है जो उन्होंने जीवन के अंतिम दिन शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या करते समय कहा ‘‘एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।’’
हमारा अभियान अब यहीं से आरंभ होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद की स्मृति तभी सार्थक भी होगीजब हम विवेकानंद के चिंतन को समझे, उसी दिशा में सोचे और उन मानदंडों पर काम करना अनवरत जारी रखें।





 डाॅ.रा.रामकुमार,
    एसोसियेट प्रोफेसर,
    हिन्दी विभाग,
    शासकीय जटाशंकर त्रिवेदी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
बालाघाट. म. प्र. 481001.

मो.न. 9893993403
  ई मेल:  rkramarya@gmail.com,

Friday, June 22, 2012

श्मशान गीता-2




पूर्वकथा- तरह तरह की मनःस्थितियों के चलते चलते अंततः शववाहन में शव को डालकर शवयात्रा शुरू हुई।
              होता क्या है कि जीते जी हमें एक से अधिक शवयात्रा में शामिल होना पड़ता है। शवयात्रा में सभी को शामिल होना चाहिए। जान पहचान का हो ना हो, समय है तो किसी परिचित की शवयात्रा में शामिल हो जाना चाहिए। इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
             अच्छा आप कुछ कहना चाहते हैं?
             मानता हूं आपकी बात। इतना फालतू वक्त किसके पास है? अपनों की, अपने पहचान वालों की शवयात्रा में शामिल जोने का वक्त ही नहीं है तो फिर पराए, अनजाने लोगों की शवयात्रा में शामिल कौन बेवकूफ होगा। यह सुझाव मूर्खतापूर्ण है।
              लेकिन देखिए फिर भी कभी शामिल होकर.....सीखना तो जीवन भर चलता है सर! चलिए मैं आपको एक अपरिचित की  वयात्रा में लिए चलता हूं। आपके कीमती समय का ख्याल रखकर बहुत ही संक्षिप्त शवयात्रा में लिवाने आया हूं। मेरे साथ तो चल सकते हैं न.? जल्दी छोड़ दूंगा। ....तो फिर आइए.....


2. माया की गाड़ी

एक मुहावरा है- कोई कंधा देने वाला ना रहा।
           इसी भाव और अभाव पर ‘पानी देनेवाला’ भी एक मुहावरा है।

              इस समय मैं ‘कंधे देने वाले’ मुहावरों को लपकते झपकते शवशायिका यानी ठठरी उर्फ अरथी को कंधा देने की होड़ में मचलते उछलते देख रहा हूं। सारा वातावरण ‘राम नाम सत्त है, सत्त बोलो गत्त है’ के नारे से गुंजायमान है। नारे लगानेवाले सभी लोग सत्यवादी व्यापारी हैं। मैं सत्य का जीवित-दर्शन तो नहीं कर सका, मरा हुआ सत्य मेरे सामने से जा रहा है। चार ही कंधों पर नहीं बल्कि कई कई धक्का मुक्की करते कंधों पर चढ़कर। ‘क्या सत्त की यही गत्त होती है?’ मेरे जिज्ञासु-मन में बिजली चमकने जैसा यह प्रश्न चमका और लुप्त हो गया। मैं अपने पर्यावरण में लौट आया।
वातावरण पर्याप्त मात्रा में सात्विक बन चुका है। लोग युक्तेश भाई के शव को शववाहन तक पहुंचाने के लिए कंधे से कंधा भिड़ाकर सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
इस दृश्य का मुझपर बड़ा क्रांतिकारी प्रभाव पड़ता है। मैं बने हुए सात्विक वातावरण की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक मात्रा में गंभीर हो जाता हूं और अपने भारतीय भाइयों की वातावरण निर्माण-कला के प्रति कृतज्ञता से भर जाता हूं। सोच रहा हूं ‘‘मैं भी कंधा दे दूं क्या?’’ पर कंधों के दर्द के ख्याल से मैं ऐसा कर नहीं पाता। भले ही व्यक्ति मर गया है उसे क्या पता चलेगा कि मैं स्वस्थ कंधे दे रहा हूं या दर्दीले कंधे। फिर सोचता हूं, दर्द भरे कंधे देकर उसे छलना ठीक नहीं, क्योंकि सत्त बोले गत्त है।
जीवन में मैंने कंधा देनेवाले कई विशेषज्ञ देखे हैं। वे अरथी भी बनाते हैं, कंधा भी देते हैं और दाहस्थल पर चिता भी सजाते हैं। लेकिन जब उनकी बारी आती है तो कई मामले में नगरपालिका से लोगों को बुलाना पड़ता है। हालांकि ऐसा एक दो मामले में ही हुआ है। इसलिए कंधा देेने वालों की मैं बहुत इज्जत करता हूं। भविष्य में ये मेरे काम आ सकते हैं।
‘राम नाम सत्य है’ का नारा शववाहन के पास आकर मौन हो गया।
शव शववाहन पर चढ़ा। अ-रथी अब रथी हो गया है। ठठरी को अरथी भी कहते हैं। चार लोगों के कंधों पर चलने पर भी अरथी इसे क्यों कहते हैं, यह प्रश्न भी कतार में खड़ा है। क्या इस शव या मुर्दे को ‘रथी’ विहीन ‘रथ’ या ‘गाड़ी’ कहने के प्रयास में ‘अरथी’ कहा गया है। यह प्रेरणा लोगों को गीता से मिली होगी। गीता में श्रीकृष्ण ने जिसे ‘माया की गाड़ी’ कहा है, क्या वह गाड़़ी यही शरीर है? आत्मा जिसका रथी है। इसलिए मुर्दा गाड़ी अ-रथी कहलाने लगी। प्रमाण के बिना जिन्हें भरोसा नहीं होता, वे अठारहवें अध्याय के इकसठवें श्लोक में इसे देख सकते हैं। महर्षि वेदव्यास कृष्ण का अर्जुन से संवाद कराते हुए लिखते हैं-  
                     ‘‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढ़ानि मायया।’’
अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी भूतों यानी प्राणियों के हृदय में रहता है और माया के यंत्र में चढ़ाकर उसे घुमाता रहता है। जैसे स्कूटर वगैरह में पापा लोग बच्चों को घुमाते रहते है। स्कूटर से लेकर वायुयान तक यंत्र हैं, गाड़ी हैं। होने को तो बैलगाड़ी और हाथ ठेला भी यंत्र हैं। बायोइंजीनियरिंग के हिसाब से शरीर भी यंत्र अर्थात् गाड़ी है, जैसा वेदव्यास कह रहे हैं। इन्हीं बातों के कारण हम कहते हैं कि बायोइंजीनियरिंग भी हमारे शास्त्रों की देन है।
खैर शास्त्रों से लौटें और इस अद्भुत दृश्य को देखें कि जो व्यक्ति जीवन भर माया की गाड़ी में चला, मरने के बाद वह सेवाभावी संस्था की गाड़ी पर सवार होकर जा रहा है।
              दाहभूमी या मरघट दूर है। गरमी का समय है। कंधों पर शव को ढोना मुश्किल है। यहां आकर यह सत्य उजागर होता है कि जीवित को तो ढोना मुश्किल है, मरे हुए को भी ढोने के लिए हम सुविधाएं जुटा लेते हैं। यही बुद्धिमत्ता है। सुविधा जुटा लेने में ही बुद्धिमानी है। जो व्यक्ति अपनी मूर्खता से मर जाता है, मृत्यु उसे भी बुद्धिमानी के वाहन पर चढ़ा लेती है।
लेकिन शववाहन में केवल शव ही नहीं चढ़ा, जो शव को कंधा देते हुए चले थे, वे भी सवार हुए और शेष शवयात्री अपने अपने वाहनों पर सवार होकर मरघट की तरफ चले। मैंने सोचा कि देखो, कितनी अजीब बात है, मरा हुआ तो आखिरी बार मरघट जाता है लेकिन जीवित व्यक्ति बार बार मरघट जाता है।
मेरे देखते देखते ही शवयात्रा वाहन-यात्रा में बदल गई। मैंने भी अपने वाहन के कान उमेठे और उसे एक जोरदार लात लगाई। वह गुर्राने लगा। अब बाईसन रूपी बाइक की पीठ पर चढ़कर मैं भी कतार में लग गया। जैसे घोड़े पर सवार होते ही जनक को तत्वज्ञान हुआ, वैसे ही मेरे कानों में कबीर बोल पड़े-
‘माली आवत देखकर कलियन करीं पुकार।
फूले फूले चुनि लिये, काल्हि हमारी बार।।’
अस्तु, मुर्दा सहित सभी सवार अपनी अपनी गाड़ियों में श्मशानभूमि चले। सभी वाहन बहुत ही अनुशासित ढंग से चल रहे थे। मेरी इस तरह की यह पहली यात्रा थी। हालांकि शव की अगुआई में चलने के अवसर अनेक मिले हैं किन्तु वे सब पैदल यात्राएं थीं। मुझे वाहनों को देखकर लगा था कि घर्राते हुए यूं निकल जाएंगे। पर जिस शालीन रफ़्तार से वाहन चल रहे थे उसकी कल्पना मुझे नहीं थी। यही वाहन अगर किसी शव के पीछे नहीं चलते तो कैसे खतरनाक़ ढंग से दौड़ते। एक दूसरे को पीछे छोड़ जाने की होड़ में कट मारकर आगे निकल भागते। मारकाट करते हुए आगे बढ़ने की हमारी रफ़्तार तब देखते भी नहीं बनती। किन्तु इस समय यूं जाने की बजाय ‘संगच्छत्ध्वम्’ की भावना से सभी धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। यही नहीं जो वाहन शवयात्रा में शामिल नहीं है, वे भी साइड से निकलते वक़्त बहुत धीरे से ग़ुज़र रहे हैं। हमारी संस्कृति की यही विशेषता है, हम शव के सम्मान में वाहनों से उतर जाते हैं और पैदल आगे बढ़कर मृत्यु को प्रणाम करते है।
मुझे लगता है, महानगरों या मायानगरों के संवेदनशील स्थानों में रफ़्तार कंट्रोल करने के लिए यातायात विभाग को शववाहन सहित शवयात्रा की व्यवस्था निरन्तर करनी चाहिए।
                                                                                                               
                                                                                                                         दिनांक 26.04.12                                                        
                                                                                                                            क्रमशः 



अगले आकर्षण:
                                       
                                1.  मृत्युंजयघाट,
                                2.  बाल की खाल,
               


Wednesday, June 13, 2012

श्मशान गीता-1




लीगल सूचना:  मृत्यु कोई भयानक हौलनाक चीज नहीं है। कम से कम दूसरों की तो बिल्कुल नहीं। मृत्यु भी एक परिवर्तन है, जिससे हम नहीं डरते। परिवर्तन तो जिन्दगी में एक नया चार्म है। गीता भी यही कहती है। एक जगह रहते हुए ऊब गए हो तो उठो, कपड़े बदलो, कहीं घूम आएं। 
किसी की मृत्यु होती है तो कुछ लोग दाह संस्कार कब्र अब्र की तैयारी करते हैं, कुछ लोग खाली होते हैं तो हंसी मजाक (धीरे धीरे ही सही) करते हैं, समय काटते हैं।
आइए, एक शवयात्रा में आपको भी ले चलें। 
भाई एक शर्त है मगर -सीरियस मत होना। मृत्यु का, यानी कपड़े बदलकर घूमने का चार्म खत्म हो जाएगा। प्लीज....




1. को जाने कंह मारिसी

युक्तेश भाई राठौर नहीं रहे।
युक्तेश भाई राठौर कौन थे, यह मैं भी नहीं जानता। मैं जानता तो वे रहते, ऐसा भी नहीं है। जिनको रहना होता है, वे लाख अपरिचित होने पर भी रहते हैं। जिनको नहीं ही रहना है, उनके लाखों परिचित हो तो भी वे नहीं रह पाते। रहने और नहीं रहने का कोई बीज-गणित नहीं होता। होता तो खैर उसका कोई अंक गणित भी नहीं है। सौ साल रहें या बीच में ही चल दें, यह किसी के संज्ञान में नहीं है। उसका उत्तर कोई किताब नहीं देती। डाॅक्टर कहते हैं बस दो चार दिन और सेवा कर लीजिए, कभी भी जा सकते हैं। कब ? यह नहीं बता सकते। पक्का हालांकि यह भी नहीं है कि चले ही जाएं। जाकर भी कई मामलों में जानेवाले लौट आए हैं। इसीलिए शैलेन्द्र ने गीत लिखा है- ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना।
लौट आनेवाले एक को मैंने जीवित आंखों से देखा है। हट्टा कट्टा। तनदुरुस्त। मीलों मजे से पैदल चलता हुआ। ऐसे जाकर लौट आनेवालों की बंद मुट्ठी में कुछ न कुछ होता है। पत्नी ने सुना था कि एक बुढ़िया लौटी तो उसके हाथ में कोयले का टुकड़ा था। मेरेवाले के हाथों में तांबे का भारतीय सिक्का था। उसी सिक्के से वह बाद में लोगों का भविष्य बताता रहा। अगले और पिछले रहस्य खोलता था। पिछले में मुझे इंटेरेस्ट नहीं था, सब कुछ भोगा हुआ था, अगले की चिन्ता थी। कुछ दिनों के लिए उसने मुझे खुश कर दिया कि मुझे राष्ट्रपति पुरस्कार मिलेगा। आज तक नहीं मिला। अब आगे की उम्मीद नहीं है। मुझे तो शक है वह सही में जाकर लौटा था या वह भी सस्ती लोकप्रियता का एक किस्सा था।
बहरहाल, आने जाने की गणना केवल संभावित होती है। वेंटिंग सीट पर रिजर्वेशन मिल जाता है और कन्फर्म सीटवाले भी कई बार एडजस्टमेंट में जाते है। यात्रा यात्रा है, कुछ भी हो सकता है।
युक्तेश भाई राठौर का रिजर्वेशन कन्फर्म था। वे कोई सामाजिक मंगल-काज निपटाकर अपने शहर लौट रहे थे। निर्धारित बोगी की तरफ बढ़ने की हड़बड़ी में उनका पैर फिसला और वे गिर पड़े। गिर क्या पड़े, दुनिया से उठ गए। हार्ट अटैक या हार्ट फेल इसी तरह का कुछ घटा। सब सुनी हुई बता रहे है। पर टेक्नीकली ऐसे मौके पर जो भी होता है, उससे वे चल बसे यानी नहीं रहे।
चल बसना और नहीं रहना में विरोधाभास होते हुए भी अर्थ एक है। हर विरोधाभास में कबीर याद आते है। यहां दो वजहें हैं उनके याद आने की। राठौर भाई चल बसे और नहीं रहे, एक। दूसरी यह कि वे परदेश में जाकर नहीं रहे और चल बसे। ऐसे मौके कबीर के समय में भी आते रहे होंगे, तभी उन्होंने लिखा है-
कबीर काहे गरबसी, काल गहे कर केस।
को जाने कंह मारिसी, कै घरि कै परदेस।।
जीवन में, जीवन का और जीवन से जुड़ी अथवा जीवन में मिली चीजों का गर्व या घमंड नहीं करना चाहिए। कबीर कहते हैं कि तुम्हें पता है या नहीं, तुम देख पा रहे हो या नहीं, तुम्हारी आंखों पर भ्रम की पट्टी बंधी है या माया का चश्मा चढ़ा है, पर समझ लो तुम्हें बालों से पकड़कर काल खड़ा हुआ है। बिना टिकट चलनेवाले या अन्य मुसाफिर की जेब काटनेवाले या किसी की नजर उठाकर चीजें ले उड़नेवाले चोर उचक्के उठाईगीरों के बाल पकड़कर जैसे पकड़नेवाले सिपाही या आम नागरिक खड़े होते हैं, ठीक वैसा ही तुम्हें धर लिया गया है, तुम हो किस फेर में। कोई नहीं जानता कि ये अब तुम्हें तुम्हारे घर ले जाकर मारेंगे या थाने में ले जाकर उधेड़ेंगे। तुम्हारे ही शहर में कूटेंगे या दूसरे शहर में ले जाकर धुनेंगे। जब नीचे का यह हाल है कि किसी को पता नहीं वह कहां पीटा जाएगा तो भाई ऊपरवाले की मर्जी को तुम कहां जान पाओगे। तो सम्हलकर चलो। ये सोचकर चलो कि कोई निरन्तर तुम्हें बालों से पकड़कर चल रहा है, जहां चूकोगे वहीं पलीटने या पटीलने लगेगा। युक्तेश भाई को देख ही रहे हो, कहां जाकर पिटे।
युक्तेश भाई राठौर उर्फ गुजराती भाई का घर मध्यप्रदेश में है और छत्तीसगढ़ की राजधानी में उनका पैर फिसला था। शाम की घटना है। परदेश में उनके साथ उनकी बूढ़ी पत्नी थी। अकेली वह घबराई होगी, लेकिन स्त्रियों को इतनी तीव्रगति से हार्ट अटैक नहीं होता। फिर कुछ लोग तो छोड़ने आए ही होंगे। प्लेटफार्म में छोड़ने आनेवालों की भूमिका यहां समझ में आती है। संकट में काम आनेवाले बाकी समय में केवल भीड़ कहलाते हैं। पर इससे उनका महत्व कम नहीं हो जाता। वे अस्पताल, पुलिस थाना और चीरघर में सुविधा के अनुपात में मामले निपटा सकते हैं। हालांकि कुछ लोगों का ऐसे समय जरूरी काम निकल आता है।
इसी समय यानी मुसीबत में कानून भी जाग जाता है। बाकी समय सोते रहता है। वह उस चैकीदार की तरह है जो ड्यूटी के समय सोता है और घटना हो जाने के बाद अपना मेहताना बढ़वा लेता है कि साहब रात में खतरे बढ़ गए हैं। हम और आप कानून और गृहमंत्रालय के सौन्दर्यशास्त्र से भली भांति परिचित है। इसलिए यहां की बात यही छोड़ते हैं और आगे बढ़ते हंै।
होता यह है कि पड़ोस में रहनेवाले शांतिभाई पटेल मुझे बताते हंै कि मोहल्ले के युक्तेशभाई राठौर नहीं रहे। कैसे नहीं रहे उसका तो पक्का पता नहीं पर कहते हैं कि लौटते हुए रेलवे-स्टेशन में हार्ट-अटैक से मर गए।
  चूंकि मैं राठौर भाई को नहीं जानता तो जानकारी लेता हूं कि कहां रहते थे, कैसे थे, उम्र कितनी थी? उम्र तो खैर हो चुकी थी। पैंसठ सत्तर के बीच के थे। सीनियर सिटीजन थे। अपने घर से तीसरा घर उन्हीं का था। इतने पास थे और मैं नहीं जानता था उसका एक सीधा सा कारण है। मैं अभी अभी इस मोहल्ले में आया हूं। पड़ोसी अच्छा है। पड़ोस भी अच्छा है। कुछ लोग तो मिलकर गए। राठौर भाई सीनियर सिटीजन थे इसलिए नहीं आए। शहरों में ऐसा होता है। कुछ मिलते हैं, कुछ नहीं मिलते। राठौर नहीं मिले पर आदमी अच्छे थे। कल सुबह उनका उठावना है। रात में उनकी बाडी आ जाएगी।
सुबह आठ बजे खबर मिलती है कि जिस देह को आत्मा छोड़ गई है, वह अपना पोस्टमार्टम कराकर घर लौट आई है ताकि विधि विधान से मरघट जा सके। तैयारी चल रही है। आधेक घंटे में शवयान में  मृत्युंजयघाट के लिए निकलेगी। परिचित लोग एकत्र हो चुके हैं। समाज के टांक, गांधी, पटेल, शाह, ठक्कर वगैरह। मोहल्ले के लालवानी और मूलचंदानी वगैरह, भाटिया और बग्गा वगैरह, जैन और अग्रवाल वगैरह, सोनी और राव वगैरह मृतक राठौर भाई के घर के सामने पूरी गली में बिखरकर खड़े थे। शव वाहन गली के उस छोर में था।
जिस छोर में शववाहन खड़ा था वही से जो गली अंदर मुड़ती थी, उसी के मोड़ में राठौर भवन था। यानी राठौर भवन गली में था।
              अचानक मुझे कबीर याद आए। उनके समय में भी गलियां होती थीं और उन दिनों लोग भी गलियों में रहते थे। समानता यह भी है कि वे मरते भी थे। उनके लिए कबीर ने लिखा है-
                                                     काल खड़ा सिर ऊपरे, जाग विराने मीत।
                                                     जाका घर है गैल में सो कस सोय निचीत।
 यानी जिसका घर गेल यानी गली में है वो कैसे निश्चिंत होकर सो सकता है। कबीर की दृष्टि मानना पड़ेगा, बड़ी पैनी थी और कालजयी भी।
       खैर,गली के उस छोर पर ,  जहां शववाहन था, वही श्मसान का सीधा रास्ता था। गली जिधर मुड़ती थी और उधर से कहीं नहीं जाती थी, वहां मेरा घर था। था गली में ही। वहां जितने खड़े थे सब किसी न किसी गली में रहते थे। गली में रहनेवाला एक व्यक्ति गुजर गया तो तो विभिन्न गलियों में रहने वाले खिंचे चले आए।
 यथासमय मैं घर से निकलकर शवयात्रियों में विलीन हो जाता हूं। ऐसी कई यात्राओं में मैं विलीन होता रहा हूं। इस मोहल्ले की यह पहली यात्रा है। जिन्दगी रही तो ऐसे अवसर बार-बार आते रहेंगे। क्योंकि जीवन है तो मृत्यु भी है। जीना है, तो मरना लगा हुआ है। मरे तो फिर कहीं न कहीं जीने की ड्यूटी लगेगी। गीता में कविकुल पितामह वेदव्यास लिखते हैं-   जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
                                                            तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।। 27.2.38

अर्थात् - जन्म हुआ तो  मृत्यु   सुनिश्चित, मृत्यु सत्य तो जन्म सुसत्य।
जब अनिवार्य जन्म मृत्यु है, तब तो शोक है व्यर्थ, असत्य।।
 
                   मुझे इतना समझ में आता है कि इसका शोक नहीं करना चाहिए। ओशो तो मृत्यु का उत्सव मनाते थे। यहां ओशो का आनंदयोग किसी के पास नहीं था, अतः सब खामोश दर्शक बने खड़े थे। परिचित आते तो घटना का सुना सुनाया वर्णन होने लगता। पक्का कोई नहीं जानता था। पर सभी ज्ञानी थे। वहीं खड़े खड़े मुझे पता चला कि मृत्यु कैसे कहां किस प्रकार घटित हो सकती है। शहर में कैसे कैसे लोग चलते फिरते मर गए। खाना खाकर पान खाने निकले कोई डम्पर उड़ाकर चला गया। सड़क के किनारे किनारे चल रहे थे कोई गाड़ी बहकी और ले उड़ी। मौत का कोई ठिकाना नहीं कब कहां से आ जाए। कहां आ जाए इसका भी पता नहीं है। कहां ले जाए इसका भी पता नहीं था। अब राठौर भाई को देखो। मौत कहां छत्तीसगढ़ ले गई। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भोपाल जाकर दुर्घटनाग्रस्त हो गए। बच गए लेकिन ऐसा बचना भी किस काम का।
पास में ही कोई पचहत्तर साल के सीनियर खड़े थे। इस बात से उत्साहित होकर बोले-‘‘अब हमीं को देख लो। यहीं ...जहां वह शव वाहन खड़ा है, वहीं खाना खाकर टहल रहे थे.. एक मोटर साइकलवाला ठोंककर चला गया...चार साल से किसी काम के नहीं रह गए..चल रहे हैं घिसटघिसटकर...दोनों पैरों में राड पड़ी है और कमर बिना बेल्ट के सीधी नहीं होती। ठोंकनेवाला आज भी बाइक उड़ाता फिर रहा है। यहां गलती किसी की, भुगत कोई रहा है। इससे अच्छा तो यह ..राठौर ...गिरा तो चला ही गया..ऐसा जाना अच्छा...हंसते खेलते चले गए...घिसटती जिन्दगी से तो मौत भली।’’
हार्टअटैक को सबसे अच्छी मौत के रूप में सभी ने स्वीकार किया। गाड़ी से टकराकर, छत से गिरकर, एक्सीडेंट में पिसकर, आग में जलकर मरना जरा रिस्की है। बच गए तो घिसटते रहो। हार्ट अटैक में ना बचे तो सोने में सुहागा। बच गए तो डरे डरे रहो। पानी में डूब मरना भी अच्छा।
‘‘मगर क्या करें कि आख़रीवाला हार्ट अटैक हो ?’’ किसी ने पूछ लिया।
               इस पर सब ख़ामोश हो गये।
                दूसरे पल सब इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बेकार है सोचना। मौत भी अपने हाथ में नहीं है। ऊपरवाले ने यह पासवर्ड भी अपने पास रखा हुआ है। जब जिसकी आएगी, तभी जाएगा। जैसी लिखी है, वैसे जाएगा। उसने सारे नेटवर्क लाक कर रखे हैं। बिना पासवर्ड के आप अपनी फाइल भी नहीं खोल सकते। इसलिए हम उसके मोहताज हैं। वह हमारा नहीं।
तब तक राठौर भाई का शव निकलकर शववाहन की ओर चला।
मतलब,  लोग ठठरी उर्फ अरथी  को कंधा देकर शववाहन की ओर ले चले।
शवयात्रा शुरु हुई।

दिनांक 26.04.12
                                                                                               क्रमशः


शब्दार्थ 


1. अ.  ठठरी- बांस की बल्लियों और ठठार यानी घास के ढेर से बनने के कारण शवशाविका को ठठरी कहते हैं।
  आ. अर्थी- अब जो काया निरर्थक हो गई है और अर्थशास्त्र के अर्थ-साधन से भी उसका लेनदेन ना होने पर भी उस मुर्दे को  ढोनेवाली ठठरी को ‘अर्थी’ क्यो कहते हैं, कोई अच्छा अर्थी यानी अर्थ-शास्त्री या अर्थ-विशेषज्ञ ही बता सकता है।
  इ. अरथी - चार लोगों के कंधों पर चलने पर भी अ-रथी इसे क्यों कहते हैं, यह प्रश्न भी कतार में खड़ा है। क्या इस शव या मुर्दे को ‘रथी’ विहीन ‘रथ’ या ‘गाड़ी’ कहने के प्रयास में ‘अरथी’ कहा गया है। यह प्रेरणा लोगों को गीता से मिली होगी। गीता में श्रीकृष्ण ने जिसे ‘माया की गाड़ी’ कहा है, क्या वह श्गाड़ीश् यही शरीर है? आत्मा जिसका रथी है। इसलिए शवशायिका मुर्दे का शयनयान ‘अरथी’ कहलाने लगा।  

गीता में कृष्ण के माध्यम से अर्जुन को समझ प्राप्त कराने के लिए वेदव्यास लिखते हैं-
‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढ़ानि मायया।’’ गीता.18.61
अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी भूतों यानी प्राणियों के हृदय में रहता है और ‘माया के यंत्र’ अर्थात् माया की गाड़ी में चढ़ाकर उसे घुमाता रहता है।



अगले आकर्षण :

                        1.  को जाने कंहं मारिसी,,
                2.  माया की गाड़ी,        
                              3.  मृत्युंजयघाट,
                                 4.  बाल की खाल


चलते चलते - 
एक रियलिटी शो में किसी बच्चे ने मिथुन दादा चक्रवर्ती की किसी बंगाली फिलम का संवाद सुनाया - ‘मारोबे एइखोने, पोरबे शोवोशोयोने।’ अर्थात् मारूंगा यहां, गिरेगा शवशयन यानी श्मशान में।
इससे पता चलता है कि बंगाली में श्मशान को ‘शवशयन’ कहते हैं। ऐसी जगह जहां शव शयन करते हैं। इसी शब्द से श्मशान बना।

Saturday, May 19, 2012

दर्द के गुण-सूत्र


आपके इधर तो खैर आता ही होगा, हमारे भी आता है एक फेरीवाला.. प्लास्टिक के घरेलू आइटम लेकर. वादा करता हे कि अगली बार वह भी लेकर आउंगा जो इस बार नहीं लाया..तो फिर जरूर आता है..
लीजिए मैंने भी कहा था कि अगली बार यह लेकर आउंगा तो आया...




दर्द की चर्चा चल निकली।
चार लोग बैठते हैं तो कुछ न कुछ चल निकलता है। चलते पुरजों से काम की बातें आप चाहे न निकाल पाएं, यह निष्कर्ष जरूर निकाल लेते हैं कि किसी के पेट में क्या है।
मुझे लगता है कि यह कहावत ‘‘किसी के पेट में क्या है, कोई नहीं जानता’’, जरूर किसी दाई ने बनाई होगी। जचकी से संबंध बैठता है इसका। किसी दाई (मेटरनिटी मेड एक्सपर्ट) ने लक्षण देखकर बताया होगा कि लड़का होगा। हो गई होगी लड़की। भद्द हुई होगी तो झल्लाकर उसने कहा होगा-‘‘ अब किसी के पेट में क्या है, कोई थोड़े जानता है।’ लड़का होता तो वही शेखी बघारती और ईनाम लेती। कैसी अजीब बात है, जिस लड़की को लेकर दुनिया में इतनी मारकाट मची है, उसे ही लोग पैदा होने से रोकते है, भ्रूण में मार डालते हैं।
खैर, चलते पुरजे अपना काम जिस खूबसूरती से निकालते हैं उसे कोई पा नहीं सकता। ये सारे निष्कर्ष पहले से निकले रखे हैं। लेकिन जिस प्रकार पुराणों, कथा-कहानियों, सरकारी गोदामों में सड़ते अनाजों, वन विभाग की घुनती गलती लकडियों, रेलवे यार्डों में जंक खाकर धूल होते लोहे की तरह सारी ठोस बातें धरी रह जाती हैं  और आदमी वही करता है जो तत्काल उसे मजे़दार लगती हैं, भले ही वह पर्दे पर चलती मायावी तस्वीरें ही क्यों न हो।
समय के रुपहले पर्दों पर बुद्धिजीवियों की बातें एक रोचक और तथाकथित गंभीर मायावी संसार की रचना करती रहती हैं। समाज के रूट लेवल पर सक्रिय संसार को इन बातों में हवा-हवाई दिखाई देती है। बुद्धिजीवी देश नहीं चलाते। देश चलानेवाले लोग चलते-पुरजे़ हैं। वे ही बुद्धिजीवियों को चलाते हैं। अपने हिसाब से।
इसी गुणसूत्र के चार बुद्धिजीवी वहां बैठे थे। अर्थशास्त्र, विधिशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र और साहित्य ही उन चारों की अपनी अपनी आजीविका थी। प्रसंग निकला कि वन विभाग के लिए वनरक्षकों की परीक्षा का समन्वयन इसी महाविद्यालय से होना है। हिन्दी साहित्य के अट्ठावन वर्षीय शिक्षक ने कहा कि इतने युवाओं में मुझ बुजुर्ग को क्यों शामिल किया गया?
            ‘‘आप कहां बूढ़े हैं? आपक कहां से बूढ़े हैं?’’ एक व्यक्ति मेरी सूरत को देखकर कहते हैं ‘‘आप 45 वर्ष के लग रहे हैं।’’
वे अर्थशास्त्र के अध्यापक हैं। अक्सर अनुमान गलत लगाते हैं। इस देश के प्रधानमंत्री भी अर्थशास्त्र के डाक्टर हैं। फिर भी देश की अर्थव्यस्था चरमरा रही है।
पर मेरे देश के अर्थशास्त्र से ज्यादा यह सवाल महत्वपूर्ण लग रहा है कि लोग बूढ़े कहां से होते है? किस जगह से बूढ़ा होना शुरू करते हैं और सिक जगह पर अंत करते हैं। बाल से या खाल से? भाल से या गाल से? चाल से या ढाल से? तन से या मन से?  शरीरविज्ञान के पास इसका कोई जवाब हो सकता है। वही बताएगा कि बूढे़ होने के क्या गुणसूत्र  हैं  ?
पिछले दिनों मैंने ब्लड टेस्ट कराया। रिपोर्ट देखकर कहा गया कि मैं एकदम फिट हूं। लेकिन यह डायगनोसिस गलत है। मैं दमा से पीड़ित हूं। बीस सालों से कंधे के दर्द से परेशान हूं। नागपुर, रायपुर, भिलाई आदि एडवांस्ड जगहों में मैंने दर्द की जांच कराई। दर्द का फिजीकल एक्सिस्टेंस नहीं मिला। हर बार डाक्टर ने लिखा ‘नो फिजिकल एक्सिसटेंस’। अब क्या करूं? अरे भाई फिजिकली ही हो रहा हैं दर्द, मालिश करवा रहा हूं। दर्द उठता है तो आंखें वाष्पीभूत हो जाती हैं। तुम्हें उसका अस्तित्व दिखाई नहीं दे रहा है।
दर्द की एक्सरे रिपोर्ट नहीं बनती।मशीनें  दर्द का चित्र खींचने में असमर्थ है। पैथालाजिकल लैब चिकित्सा विभाग का मजाक उड़ा रही हैं । दर्द ठठाकर हंस रहा है-‘‘ खोजो, खोजो। खोज लो तो मुझे भी बताना। मैं भी देखना चाहता हूं कि कैसा दिखता हूं मैं।’’
दर्द ठठाकर हंसता है तो मारे दर्द के मैं रो पड़ता हूं। मैं उसे ढूंढ कर मार डालना चाहता हूं। पेन किलर उतने कुशल हत्यारे नहीं हैं। उनका मारा हुआ दर्द चौबीस घंटे में उभर आता है। रक्त बीज की तरह उसकी एक एक बूंद हजार हजार दर्द को जन्म देती हैं।
कंधे में होते होते अब  दर्द मेरी पीठ में होने लगा है। कमर भी कई बार ऊपर वाले माले यानी धड़ का बोझ नहीं संभाल पाती। दर्द से सन्ना जाती है। पर ये सारे दर्द कैसे दिखाऊं? कोई चित्र उनके नहीं मिले। कोई चित्रकार इन दर्दों का चित्र नहीं बनाता। किसी फोटोग्राफर ने उसरी फोटों नहीं खींची। प्रसिद्ध कलाकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने ऐसे तो सारी नग्न तस्वीरें बनाकर करोड़ों अरबों कमाए, लेकिन एक दर्द को वह नहीं साध सका। वे मजे़ का सौदा करते रहे और दर्द कराहता रहा। कला के नाम पर मजे़ के सौदे व्यापारी-जगत करता रहा, पर दर्द के वाणिज्य की चित्रात्मक झांकी वह नहीं खींच सका।
कैसे कहूं कि मुझे दर्द है। कैसे यकीन दिलाऊं कि यह दर्द हैं, देख लो। दर्द का विज्ञापन नहीं किया जा सकता। बस, चुपचाप सहा जा सकता है।
दर्द चिकित्सा विज्ञान का विषय नहीं है। दर्द का कोई विधिशास्त्र भी नहीं है। कोई दर्द लीगल है या इल्लीगल, कानूनविद् इस तथ्य को नहीं जानते। वनस्पतिशास्त्र कहता है कि शरीर प्राणीविज्ञान का विषय है। वनस्पतिशास्त्र पेड़ पौधों के बारे में बताता है। बताता है कि पेड़ पौधों को दर्द नहीं होता।
दर्द केवल साहित्य का विषय है। कवियों ने उसे देखा सुना है। उससे बातें की है। सच्चा साहित्य दर्द से निकलता है।
एक कवि ने लिखा है ‘‘विरही होगा पहला कवि, दर्द से निकला होगा गान।’’
अद्भुत साहित्य-संसार है। दर्द होता है तो कराह नहीं निकलती, गान निकलता है। क्या इन्ही उल्टी बातों के आधार पर साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है? दर्द को ज़रा दर्पण दिखाओ। मैंने सुना है भूत दर्पण मे नहीं दिखते। दर्पण में इच्छाधारी नाग-नागिन दिखते हैं। वर्तमान मंे ना दिखाई देने वाले ग़ायब कल्पनापात्र लाल कांच में दिख जाते है। एक्सरे में भी ना दिखनेवाला दर्द भूत नही हो सकता। वह भूत है भी नहीं। दर्द तो हमेशा वर्तमान होता है। दर्द को क्या दर्पण दिखाऊं?  फिर दर्पण में तो वर्तमान ही उल्टा दिखता है। इसीलिए शायद दर्द को आईना दिखाओ तो वह रोने की बजाय गाने लगता है। तभी पहले कवि ने दर्द के सापेक्ष गान लिखा। कवि लोग भी पता नहीं किस दुनिया से आते हैं।
एक दूसरे कवि आर. रामकुमार हैं ।  उनका प्रसिद्ध गीत है-‘‘न चिल्लाऊं चीखूं , न दुखड़े सुनाऊं। बहुत दर्द जागे तो चुपके से गाऊं।’’
अजीब कवि है। सब दर्द में चीखते चिल्लाते हैं, दुनिया भर के दुखड़े सुनाते फिरते हैं, यह कवि गीत गा रहा है। गा भी रहा है तो चुपके से। इसका मतलब है कि दर्द का बाईप्रडॅक्ट, गीत है। वाह! क्या दर्द है।
     

    31.03.12/2.5.12

Wednesday, May 9, 2012

विवाह की वर्षगांठ: गांठ-विज्ञान के विशेष संदर्भ में।




आज मेरे विवाह की वर्ष-गांठ है।
जयंती और दिवस जो होते हैं, वो मरणोपरांत मनाए जाते हैं। हमारे देश में प्रसिद्ध दिवस और जयंतियां हैं- बाल दिवस, शिक्षक दिवस, सदभावना दिवस, रजत जयंती, हीरक जयंती, प्रेमचंद जयंती, निराला जयंती।
दिवस ‘मृत्यु का दिन’ और जयंती ‘जन्म लेने का दिन’ है। जैसे एक होती है प्रेमचंद-जयंती और दूसरा होता है प्रेमचंद दिवस। गांधी जी ने जन्म लिया तो गांधी जयंती दो अक्टोबर। जिस दिन उन्हें गोली मारकर मार डाला गया, वह मृत्यु का दिन हुआ। उस 31 जनवरी को, उनकी मृत्यु की याद में, हम ‘शहीद-दिवस’ कहते हैं। इस प्रकार दो दिन प्रसिद्ध हैं एक जयंती और दूसरा दिवस।
जी! कुछ कहा आपने? आप पूछ रहे हैं कि बाल-दिवस और शिक्षक-दिवस किसकी मृत्यु के दिन है? पता नहीं। शायद बालमृत्यु की याद में बाल दिवस मनाया जाता है और भारत में किसी शिक्षक नामक मरे हुए व्यक्ति की याद में शिक्षक दिवस मनाया जाता होगा। मैं कुछ दावे से नहीं कह सकता। जी! क्या कहा आपने? अरे तो प्यार से बताएं न, इस तरह गाली गलौज क्यों करते है।
जी! मैं समझ गया, बालदिवस हमारे प्रथम प्रधानमंत्री का जन्म दिन है और शिक्षक दिवस हमारे दार्शनिक शिक्षक राष्ट्रपति जी का जन्म दिवस है। इन दोनों जन्म दिनों को ‘दिवस’ कहना लिपिकीय भूल है, यह भी मान लेता हूं।
जी! जी! बिल्कुल मैं आपसे सहमत हूं कि किसी लिपिकीय भूल को सुधारना कलेक्टर के पिताजी के हाथों में भी नहीं है। सत्यनारायण जगदीश की श्रीमती लक्ष्मी अगर इंटेरेस्ट लें तो यह भूल सुधर सकती है। पर वे देवता लोग है, मनुष्यों के मामले में क्यों और किसलिए दखलंदाजी करें। अगर कर सकते हों तो मैं सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाने को तैयार हूं।
खैर, कैसे मौक़े में हम यह क्या अटर-सटर गिटर-पिटर करने लगे।
जी,जी! धन्यवाद! आपको याद है कि आज मेरे विवाह की वर्ष-गांठ है। चूंकि यह विवाह-जयंती या विवाह -दिवस नहीं है, इसलिए लगता है कि हमारा विवाह अभी भी जीवित है। अगर विवाह जीवित न होता तो गांठ नहीं होता। विवाह का नियम ही गांठ है। बच्चों का जनम दिन मनाते हैं तो कहते हैं पहली वर्षगांठ, तीसरी वर्षगांठ, पाचवीं वर्षगांठ।
जरा सोचूं कि इस ‘जन्म और स्थापना’ की वर्षगांठ मनानेवाले ‘वर्षगांठ’ का जन्म कब हुआ?
मुझे लगा है, जब गिनती का जन्म नहीं हुआ था। अक्षर और अंक नहीं बने थे। जब जमीन पर या दीवार पर या किसी पर्सनल पेड़ की पीड़ पर लकीरें खींचकर हिसाब किया जाता था। इंतज़ार किया जाता था कि अब आएगा। और इतना रह गया है।
एक तरीक़ा महिलाओं ने यह भी निकाला कि पांच हाथ की जो वे साड़ियां पहने रहती हैं, उसमें एक एक गिनती को गांठ बांधकर याद रख लें। साड़ी नहीं पहनती तो रूमाल को गांठ लगा ली और फुसफसाकर कहा- ‘देख बहना! भूल न जाना। मेरी ज़िन्दगी का सवाल है। गिनती इधर से उधर हो गयी तो ज़िन्दगी का हिसाब ही बिगड़ जाएगा।’ साड़ी के पल्लू और रूमाल के छोर पर बांधी गई गांठ याद रखती थी कि हिसाब क्या है।
गांठें हमेशा याद रखने का मनोवैज्ञानिक उपाय रहीं हैं। दार्शनिक तर्कशास्त्री मनोविश्लेषणत्मक व्याख्या कर सकते हैं कि मन की गांठें ज्यादा याद रहती है। छोटी मोटी खुशियां और छोटे मोटे दुख आदमी भूल जाता है। बड़ी गांठें याद रह जाती हैं।
बच्चों का जन्म बड़ी खुशी है मां बाप के लिए। इसलिए वर्षगांठ के रूप याद है। ‘‘तुम जिओ हजारों साल। साल के दिन हो पचास हजार।। जनम दिन आया, आया। ममता के फूल जागे।। हैप्पी बर्थ डे। मैनी मैनी हैप्पी रिटन्र्स आॅफ द डे।’’ ये वो शुभकामनाएं हैं जो गा गाकर दी जाती हैं। खुशी खुशी दिये जलाए जाते हैं। मोमबत्तियां बुझाई जाती हैं। केक काटे जाते हैं।
विवाह की वर्षगांठ भी एक प्रकार की गिनती ही है। जिस प्रकार बच्चों के जन्मदिन मां बाप के लिए आनंदोत्सव, उसी प्रकार मां-बाप के विवाह की वर्ष-गांठ बच्चों के लिए स्पेशल सेलेब्रेशन। हज़ारों गांठें इस दिन आनंद की गति में फिसल कर पार हो जाती हैं। बस एक बात याद रहती है-यह गांठ आज ही बंधी थी। दूल्हे के दुपट्टे से दुल्हन के दुप्पट्टे में आज ही बांधी गई थी यह गांठ। इस गांठ के आगे दुनियां की सारी गांठें गठान हैं। यह भुचाल का दिन है। एक नये मौसम के सूत्रपात का दिन है। बच्चे लगे हैं अपने अपने ढंग से सेलीब्रेट करने। नये कपड़े नया कुछ कुछ। नयी नयी सरप्राइज़ेस।
सुना है कभी सात गांठे बांधी जाती थीं। हर फेरे पर एक। बनती हुई पत्नी से कहा जाता है-‘गांठ बांध लो, अब यही तुम्हारा पति है और यही तुम्हारा परमेश्वर!’ होते हुए पतियों के अंगोछे में पड़ती है गांठ कि-‘‘ पत्नी तुम्हारी अद्र्धांगिनी है, लक्ष्मी है।’’  पति और परमेश्वर ? पत्नी यानी लक्ष्मी? पड़ गई न यह गांठ। पत्नी जीवन भर पति में परमेश्वर तलाशती रहती है और पति कभी झूठा सिद्ध होता है, कभी मक्कार,। कभी लम्पट निकलता है, कभी बदकार। पति ढूंढता रहता कि लक्ष्मी ने अब अमीर बनाया..अब बढ़ा बैंक बैलेन्स...अब आयी गाड़ी..अब आई इंडस्ट्री। ऐसा होता है या नहीं होता है तो किसी ने किसी कारण से पड़ती रहती हैं गांठें। हर दिन हर पल कोई न कोई गांठ। पी रहे हैं तो गांठ, खा रहे हैं तो गांठ। खाते पीते हंसते बोलते उठते चलते कोई न कोई न गांठ। पुरुष इस गांठ को रोड़ा और बाध समझते हैं और चतुराई से इसका हल निकालते हैं। वे समझते हैंअक्ल के मामले मे औरतें पीछे हैं। यह भी एक गांठ है जो सदियों से पुरुषों के मन का ट्यूमर बनी हुई है। कुछ समझदार पुरुष भी होते हैं जो इसे पतंग वाली घिर्री में मंजा किया हुआ धागा समझते हैं तथा खेंचने और ढील देने के संतुलन के साथ संभालकर लपेटते रहते हैं। भारतीय पत्नियां इस गांठ को सिलाई का धागा समझती है और तरीके से सुलझाने का प्रयास करती हैं। ऊपर धागे की मूल गिड्डी लगाकर नीचे कुछ धागा बाबिन नामक बाॅबी टाइप के यंत्र में नीचे लगाकर तरीके से सिलाई करती रहती हैं।
पर सब कुद इसी तरह आसान हो जाए तो फिर जिन्दगी का सौन्दर्य, जिन्दगी का मज़ा, जिन्दगी का स्वाद, जिन्दगी का लुत्फ़ ही चला जाए, खत्म हो जाए। (कृपया कुछ पर्यायवाची शब्द आप भी जोड़ लें।) । गांठ होने और उसे सुलझाने का मतलब आम भारतीय महिलाएं समझती हैं और मन में कोई अन्य गांठ पड़ने नहीं देंती। पड़ती हैं तो उन्हें वे सरपूंद बांधती हैं ताकि एक झटके से खोली जा सकें। अक्सर कुछ गांठे आंसुओ से खुल जाती हैं। कुछ गांठे मैके जाने के धौस से फिस्स हो जाती हैं। बाक़ी, अगर विवाह की वर्षगांठ निरंतर मनाना हो तो गांठ-शास्त्र को समझना बहुत जरूरी है।
  आज मेरे उसी विवाह की वर्षगांठ है। मौसम अच्छा है। कल तेज आंधी चली थी। थोड़ी बूंदाबांदी भी हुई थी। गर्मी में थोड़ी राहत मिली। मई में ऐसा कहां होता है। मई की गर्मी के बढ़ते तेवर को देखकर और विवाह की वर्षगांठ का तालमेल नहीं बैठा पाने पर तैयारियों में लगी लाड़ली पूछती है-‘‘दिसम्बर, जनवरी या ज्यादा हुआ तो फरवरी में क्यों नहीं बांध ली यह गांठ...मई का महीना ही मिला था आपको?’’ पंचांग का मुंह देखकर शादी करने वाले एक दूसरे का मुंह देखते और झुका लेते हैं। किस मुंह से कहें और क्या कहें? अब जो हुआ सो हुआ। डेट आफ बर्थ नहीं है कि कुछ ले देकर हलफ़नामा बनवाकर बदल दी जाये। विवाह है भाई! विशेष रूप से वहन किया जाने वाला परिवाह है यह विवाह।
आज सुबह से फोन आ रहे हैं। फोन यानी मोबाइल, सेल फोन..। जिस नाम से भी आधुनिकता बोध हो वह समझ लें। आधी रात को बच्चों के फोन आ चुके थे। नई तारीख लगी नहीं कि हैप्पी मेरिज एनीवर्सरी कहने का मोह वे टाल न पाए। जिन लोगों ने रात की भरपूर नींद ली भरे पूरे सुबह उनकी बधाइयां आई। कुछ खास ही निकट के लोग हैं। वर्ना कौन याद रखता है। याद भी रखे तो कौन लेता देता है। खास लोग हैं जो खास तरह से याद रखते हैं।
राजस्थान से फोन आया है कि उधर भी बारिश हुई है। भोपाल से भी फोन आया है कि उधर भी बारिश हुई हैं। रायपुर में बादल तो हैं पर बरसने से हिचक रहें हैं। इंन्वर्टर से चलनेवाले पंखें गरम हवा फेंक रहे हैं। इधर ठीक है। जापान दिल्ली की दिशा से पास पड़ता है। पड़ता तो चीन ज्यादा पास है। पर जापान की चीजे़ं और घटनाएं हमेशा विश्वव्यापी रही हैं। वहां आए चक्रवात ने काफ़ी तबाही मचायी है। चक्रवात का जन्म ही तबाही मचाने के लिए हुआ है। हमारी सभ्यताएं प्रार्थना नहीं कर सकतीं कि हे चक्रवात इस बार तू नवनिर्माण लेकर आ। हम विनाश को भी नई शुरुआत बनाकर देखते हैं। जापान ने तो खास इस विद्या में महारत हासिल की है। मैं जापान की बहुत सी चीज़ों को प्यार करता हूं। बहुत सी मज़ेदार चीज़े हैं जापान की मेरे पास। टोकियो को मैंने नहीं देखा पर बहुत प्यार करता हूं उसे। दुनियां में बहुत सी चीज़ें हमने नहीं देखीं पर लगातार उनसे प्यार करते हैं। आनेवाले कल को भी। आशाओं को। अब तक न मिले किसी खास मिलनेवाले पल की। राष्ट्रपति पुरस्कार, पद्मभूषण, बहुत सा धन, असाधारण सुविधाएं...इन सब को हमने नहीं  देखा पर इन्हंे बहुत प्यार करते हैं। मिलने की उम्मीद भी नहीं रखते पर प्यार करते हैं। यही सच्चा प्यार है।
ऐसा ही प्यार मैं मनोविनोद से भी करता हूं। मेरा ऐसा है कि हंसने की शायद कमी पड़ गई थी पूर्व में ...तो बहाने ढूंढता हूं हंसने के। जीवन में वैसे भी कथ्यात्मक और तथ्यात्मक हंसी खुशी के अवसर कम ही हैं। भावुक होना एकांतसुख है। ‘स्वांतःसुखाय’ भी आंसू ही बहते हैं। इसलिए लोग पब्लिक में ओव्हर एक्टिंग और अतिउत्साह दिखाते पाए जाते हैं। निश्चित रूप से वे खोखले हैं। मैं संतुलन बनाने का प्रयास करता हूं। कहीं कहीं फिसल जाता हूं पर संभल जाता हूं। मुझे जाननेवाले जानते हैं जो नहीं है उसी के ग़म गलत करने के कारण यह बिना पिये लड़खड़ाया है। मैं खुशियों के लिए ग़म गलत करने का सबसे अच्छा पेय गेय कविता और प्रेय आलेखों को मानता हूं। पीकर भी सुना है कि झूठा और कुछ देर का भुलावा मिलता है। लेखन भी कौन सा कल सच होने वाला है। यह भी ग़म ग़लत करने का एक तरीका मात्र है।
मैं जानता हूं मैं कुछ नहीं कर सकता तो लिखने बैठ गया हूं। उधर टीवी चल रही है। बीवी का काम भी चल रहा है। उसे गृहकार्य नहीं छोड़ते।  मेरे लिए तैयारी करती हुई वह प्याज काट रही है। टीवी पर एक गीत आ रहा है- ‘बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है।’ मैं पत्नी की तरफ देखता हूं। वह मेरी तरफ। उसकी आंखें आंसुओं से भरी हुई हैं। ये प्याज के आंसू हैं यह बताने के लिए वह मुस्काराती है। फिर कटी हुई प्याज लेकर वह अंदर जाते हुए कहती है- ‘‘चीले बना रही हूं..प्याज पालक और बेसन के। दस मिनट में तैयार हो जाओ।’’
मैं तैयार ही तो नहीं हो पाता। मेरे मन में यह गीत कुछ ऐसे बजने लगता है-जो धीरे धीरे कागज में उतरने लगता है। मैं इस गीत को आज का उपहार दूंगा। आप भी सुनेंगे?

सबेरे से बिना मुंह धोये गहरी सांस भरता है।
बनाकर चाय मुंह में डाल दूं, यह आस करता है।

वही है गैस की किल्लत, वही बिजली की बदमाशी।
वही बुढ़िया की किचकिच है, वही बुड्ढे की हैं खांसी।
वहीं खूसट सजन बेकार की बकवास करता है। सबेरे से ....

मैं जब से आई हूं तब स,े घुसी रहती रसोई में।
सदा बर्तन, बुहारा, कपड़े करती बाई कोई मैं।
मुझे घर मालकिन कहकर जगत उपहास करता है। सबेरे से...

मुझे कहकर ‘मुसीबत’, जब पिया करता है रुसवाई।
‘मुसीबत लेने तुम आए थे, मैं चलकर नहीं आई।’
पलटकर कहती हूं ,तो हंसके वो, शाबाश करता है। सबेरे से...

‘‘हो गए तैयार?’’ पत्नी आकर पूछती है।
‘‘ हां हो गई तैयार...सुनो क्या लिखा है।’’ मैं उत्साह में कहता हूं तो खीझकर पत्नी कहती है।‘‘ ओफ्फो... तुम और तुम्हारी कविताएं......तुम्हीं लिखो और तुम्हीं सुनो...’’ वह बेसनपालक के चीले मेरे सामने धरकर चली जाती है। टीवी अभी भी चल रहा है। इस बार एक ग़ज़ल आ रही है। ‘‘दरोदीवार पर शकलें सी बनाने आई। फिर ये बारिश मेरी तनहाई चुराने आई।’’
मैं चीले खाते हुए ग़ज़ल का लुत्फ लेता हूं। मगर अपने गीत की उपेक्षा उस ग़ज़ल को भी विकृत कर देती है- मैं चीले के हर कौर के साथ एक एक शेर पढ़ता हूं।
मेरी बीवी है वो ये मुझको बताने आयी।
दिल जलाकर मेरा वो चाय चढ़ाने आयी।

लिखती रहती थी वो पन्नों में ख़र्चे दुनिया के,
दाल आटे का मुझे भाव बताने आयी।

                       
मेरी हर इक ग़ज़ल को सौत कहकर आह भरती है,
‘ये डायन कलमुंही घर मेरा जलाने आयी।’

‘मैं सब कागज उठाकर डाल दूं चूल्हे में अब के अब’,
ये कहती आई जब खाने को बुलाने आयी।

‘किसी को ऐसी किस्मत अय खुदा देना नहीं अब तू,
मैं दुल्हन बनके क्या बस जल्वे दिखाने आयी।’

ग़ज़ल की चटनी के साथ चीले खाकर मैं खत्म कर चुका हूं। अब पानी पीकर चाय का इंतज़ार करने लगता हूं। अंदर अंदर सुलगती हुई पत्नी चाय बड़ी ज़ायकेदार बनाती है। बस इसी कारण तो हमारी गांठ इतनी मज़बूत बंधी हुई है। अस्तु, अत्र कुशलं तत्रास्तु।
बुधवार, 09.05.12





अगले आकर्षण हैं- 
  1. दर्द के गुणसूत्र
   2. श्मशान गीता (तीन भाग)

Thursday, April 26, 2012

कुछ गर्मी खाए दोहे




मित्रों! 
कुछ गर्मी से बचाए हुए फूल प्रस्तुत हैं, उम्मीद है आप तक आते आते इनकी खुष्बू बरकरार रहेगी....


लिखकर बताइये कि
आप के उधर गर्मी के क्या हाल हैं।
इधर तो ये हैं..........


नदियां छूकर जल मरीं, तले अतल सब ताल ।
वह भागे चारों तरफ़, पहन कांच की खाल ।।

लपट झपटकर लूटता, उड़ता ले आकाश ।
खींच दुपट्टे फाड़ता, धूल झौंक बदमाश ।।

होंठ फटे, सूखे नयन, संदेहों में नेह ।
हरे दुपट्टे से ढंकी, बिखरी धूसर देह ।।

वृक्षों से टकरा गिरी, भरी जवानी धूप ।
उनकी बांहों में पड़ा, सांवल शीतल रूप ।।

गर्मी के उपकार को, भूल सकेगा कौन ।
फिर प्यासों के होंठ तक, गागर आई मौन ।।

बढ़ता जाता ताप है, घटती जाती भाप।
धरा निर्जला कर रही, मृत्युंजय का जाप।।

जलती धरती, जल रहे जलाशयों के घाट।
पनघट मरघट हो गए, बस्ती सन्न सनाट।।
 (सन्न सनाट- मूच्छित)

आंखें पथराई हुई, पपड़ाए हैं होंट।
भट्टी सी निकली हवा, दम जाएगी घोंट।।

नागिन सी लू लपकती, हवा हुई है व्याल।
हर पल अब लगने लगा, आग उगलता काल।।