Tuesday, December 30, 2014

खुशसुखन हम बांटते हैं।


 

मुख्यपृष्ठों! सोचना मत हासिये हैं।
हम कसीदे बुननेवाले क्रोशिये हैं।

पाट देते हैं दिलों की दूरियां हम,
खुशसुखन हम बांटते हैं, डाकिये हैं।

समन्दर हैं आंख की सीपी में सातों,
इसलिये ये अश्क सारे मोतिये है।

भ्रम न फैलाते न कोई जाल रचते,
हम खुली वादी में जीभरकर जिये हैं।

जन्में हैं हम पत्थरों में, शिलाजित हैं,
गुलमुहर से रिश्ते तो बस शौकिये हैं।

आंधियों इतराओ मत झौंकों पै अपने,
वक़्त जिसकी लौ है खुद, हम वो दिये हैं।

नाव से निस्बत रखें न हम नदी से,
साहिलों तक तैरकर आया किये हैं।

बस्तियों में रात हो जाये तो ठहरें,
मन है बैरागी तो चौले जोगिये हैं।

कब किसी अनुबंध में बंधते हैं ‘ज़ाहिद’
जिस तरफ़ भी दिल किया हम चल दिये हैं।
वीक्षकीय, 30.12.14

सुगढ़ और सुधि सुमति-समृद्ध समर्थ नेतृत्व के अभाव में वाणिज्यिक विज्ञापनी-प्रबंधन दुरभिसंधि से भरकर एक लहर और हवा की तरह सरसरा रहा है। इससे बहुत सी आत्ममुग्ध यथास्थितिवादी स्थापक शक्तियां अपनी बांबियां रचने लगी हैं। इन दीमकों की सुगमुगाहट से अकुलाकर कुछ शेर खुदबखुद उतर आये। इनका तहेदिल से इस्तकबाल है। तसलीम।
0 डा. रा.रा.वे. कुमार ‘ज़ाहिद’,

Wednesday, September 17, 2014

चिड़िया-घर में खड़ी विलुप्तप्राय हिन्दी

  

आज हिन्दी दिवस है।
सुबह आंख खुलते ही मेरे दिमाग में अलार्म की तरह यह धुन बजने लगी कि आज हिन्दी दिवस है। इसका श्रेय मैं उन तथाकथित हिन्दी-सेवकों को देना चाहता हूं जिन्होंने पत्र लिखकर या फोन करके मुझे बार-बार याद दिलाया था कि आगामी फोरटीन सितम्बर हिन्दी दिवस है। मैं हिन्दी का प्राध्यापक हूं, इस नाते प्रमुख वक्तव्य देना मेरा कत्र्तव्य है। वे मुझे आमंत्रित नहीं कर रहे थे, बल्कि मेरे हिन्दी के प्रति बाई-डिफाल्ट कत्र्तव्य की याद दिला रहे थे। उनके अनुसार, यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि मैं इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिये अवश्य टाइम निकालूं। मैं समझ गया कि न वे ऐसे छोड़नेवाले हैं, न मैं।
हिन्दी दिवस पर क्या बोलूंगा, यह मैं समझ नहीं पा रहा था। लोगों का रुझान दिवस मनाने में ही रहता है। एक कार्यक्रम हो गया, जिन्होंने मनाने के लिये कहा है, उन्हें रिपोर्ट कर दी, बस। यही आयोजकीय है। हिन्दी क्या, क्यों, कहां, कैसी, कितनी आदि का ना तो उन्हें पता है, ना वे पता करना चाहते। उन्हें या तो सब आता है, जैसा कि उन्हें मुगालता है, या हिन्दी में क्या रखा है, जैसा कि हर व्यक्ति सोचता है। हिन्दी सेवकों के नाम पर खड़े इन हिन्दी विरोधियों को भला मैं क्या बता पाउंगा।
बहरहाल, मैं तनाव में हूं कि हिन्दी-दिवस पर कुछ बोलना है, पर क्या बोलना है, नहीं मालूम। इसी बीच चाय आ जाती है और चाय के दो घूंट भरता हूं तो अखबार आ जाता है। इस क्षेत्र का सबसे ज्यादा वेल एस्टेब्लिश्ड, वेल मार्केटेड और लोकप्रिय अखबार ही मेरे घर आता है। सभी द बेस्ट चाहते हैं।
मैं हेड लाइन पढ़ने लगता हूं, बिल्कुल बीचोबीच काले अक्षरों में लिखा हैै- ‘अमित शाह के खिलाफ चार्जशीट। भड़काऊ भाषण मामला। दोषी पाए जाने पर तीन साल की हो सकती है सजा।’ इसे आज की सुर्खी कहा जा सकता है। (कहा इसलिये जा सकता है क्योंकि है ‘सुर्खी’, पर छपी काली स्याही में है।)
दूसरी हेडलाइन- ‘एक लाख जिन्दगी बचाई, पांच लाख बचाने की चुनौैती।’
तीसरी हेडलाइन-‘छत्तीसगढ़ में बनेगी देश की पहली तेंन्दुआ सफारी। सौ हैक्टेयर इलाके में फेंसिंग कर रखे जायेंगे तेन्दुए।’
मुझे जिस तरफ जाना है, वह रास्ता दिखने लगा है। मैं उत्सुकता से आगे पढ़ता हूं-‘छत्तीसगढ़ के बार-नवापारा अभ्यारण्य में देश की पहली तेन्दुआ सफारी बनाने की कवायद की जा रही है।$$वनविभाग ने सफारी का पूरा प्रोजेक्ट तैयार कर लिया है। इसे वे अक्टूबर में दिल्ली स्थित सेन्ट्रल जू अथारिटी के सामने पेश करेंगे।$$नंदनवन से 20 काले हिरण बार-नवापारा के जंगलों में शिफ्ट किये जायेंगे।
इस समाचार के नीचे ही वन विभाग के बड़े अधिकारी का बयान छपा है-‘‘बार नवापारा के जंगलों में तेंदुए बड़ी तादाद में हैं। यहां कुछ इलाकों को तेंदुआ सफारी के रूप में डेवलप करने का प्लान हैं।’’-एसएसडी बड़गैया, डीएफ।(इस अभ्यारण्य में हिन्दी के लिये भी सफारी का प्रावधान है क्या भाई?)
चलिये, मुझे वह मिल गया है जिसकी मैं तलाश कर रहा था। मैं दो और मजे़दार समाचार सुनाता हूं जिसका संबंध भी मेरे मन्तव्य से है, फिर आपको बताता हूं कि मुझे क्या मिल गया। तेंदुआ सफारी वाले समाचार के ठीक ऊपर ‘राष्ट्रीय-अस्मिता और नैतिकता’ से जुड़ा बड़ा रोचक समाचार है। हेड लाइन है-‘केरल सरकार को सुको ने बार लाइसेंस रद्द करने से रोका।
नई दिल्ली। सुको ने केरल सरकार को फिल्हाल बार लाइसेंस रद्द करने से रोक दिया है। सरकार के फैसले के मुताबिक पूरे राज्य में गुरुवार से यह लाइसेंस रद्द हो रहे थे।$$उसने सिर्फ फाइव स्टार होटलों को ही बार लाइसेंस देने का फैसला किया है। जबकि करीब 700 छोटे होटलों को गुरुवार तक उनके बार बंद करने के निर्देश दिये थे। इसके खिलाफ़ होटल मालिकों ने शीर्ष कोर्ट में अर्जी दाखिल कर तुरंत सुनवाई की मांग की थी।$$बेंच ने कहा कि उसे सरकार की नई शराब नीति में कोई तर्क नज़र नहीं आता।’
(तर्क तो शराब के लाइसेंस किसी को भी देने में नहीं है जनाब सुको बेंच साहब!) इससे ठीक बगल में राष्ट्रीय-चरित्र, सांवैधानिकता और संस्कृति पर प्रश्न-चिन्ह लगाते दूसरे समाचार पर जरा गौर फर्माएं-‘‘तेलंगाना का अपमान किया तो दफना दूंगा: सीएम।
हैदराबाद। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव ने मीडिया को धमकी दी है। राव ने कहा है कि तेलंगाना की बेइज्जती करनेवाले मीडिया कर्मियों की गर्दन तोड़ देंगे। उन्हें जमीन के 10 किमी नीचे तक दफन कर देंगे।’’(दफनाने की क्रिया और मि. राव? बात कुछ जमी नहीं। धमकी हास्यास्प्रद हो गई।)
खैर, राजनीति के महारथियों पर दो और हैडिंग देखिये-पहली-‘‘सोनिया की फोटो के खिलाफ दायर याचिका खारिज। यूपीए अध्यक्ष की हैसियत से सरकारी विज्ञापनों के जरिये प्रचार-प्रसार के आरोपों को हाई कोर्ट ने नाकाफी पाया।
दूसरी-‘मानहानि मामले में सुब्रह्मण्यम (सुब्रमणियम जी देखेंगे तो अपने अजीबोगरीब ढंग से लिखे नाम से घबरा ही जायेंगे।) स्वामी को समन। तमिलनाडु की एक कोर्ट ने भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम (सुब्रमणियम) स्वामी को समन जारी किया है। मुख्यमंत्री जयललिता की मानहानि के मामले में उनसे 30 अक्टूबर को अदालत में पेश होने को कहा गया है। जयललिता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य सेसन जज आदिनाथ ने समन जारी करने के आदेश दिए।’’ (प्रकरण श्रीलंका में बंदी तमिलियन मछुआरों के बंदी बनाए जाने का है।)
ये तो रहे राष्ट्रीय राजनीतिक समाचार। लगे हाथ दो अंतर्राष्ट्रीय हैडिंग का लुत्फ लेते चलें। तमिल सुब्रमणियम (संस्कृत ‘शुभ्रमणियम्’) स्वामी के समाचार के ठीक नीचे ये हैडिंग है-‘‘ब्रिटेन की संसद पर चर्चा, भारत ने जताया ऐतराज। मानवाधिकारों पर ब्रितानी सांसद करेंगे बातचीत।’ इसी पेज में ऊपर कोने में हमारी अंतर्राष्ट्रीय नीति पर प्रकाश डालती यह हैडिंग देखिये-‘‘याचिका-इटली जाने की इजाजत से पहले मेडिकल जांच हो नौसैनिक की। नई दिल्ली। बीमार इतालवी नौसैनिक को स्वदेश जाने की इजाजत देने से पहले उसकी मेडिकल जांच कराई जानी चाहिए।$$इतालवी नौसैनिक को 15फरवरी 2012 को की गई फायरिंग में दो भारतीय मछुआरे मारे गए थे।$$कोर्ट से नौसैनिक मैसी मिलियानो लातोरे की जांच के लिए एम्स के डाक्टरों का बोर्ड बनाने का आग्रह किया गया है।’’
इन सब समाचारों में सूचनाएं तो होती हैं, जिन्हंे हम चाव से पढ़ते हैं या पढ़कर गहरी सांस लेते हैं। परन्तु इन सब समाचारों के कुछ निहित अर्थ भी होते हैं। हम सब किसी न किसी प्रभाव को ग्रहण करते हैं, कुछ सोचते हैं, किसी न किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। मोबाइल फोन, टीवी या कम्प्यूटर से बिना देखे जाने निकलनेवाली रेडिओ एक्टिव किरणों की तरह ये लिखित समाचार भी हमारे मष्तिष्क और अवचेतन को वायरल करते हुए गुजर जाते हैं।
इसके बावजूद, हिन्दी-दिवस के अवसर पर मैं इन समाचारों को आज दूसरे ही परिप्रेक्ष्य में देख रहा हूं। हिन्दी भाषा की वर्तमान दशा और वह किस दिशा में निकल आई है, यह देख रहा हूं। अंग्रेजी और अरबी-फारसी के रक्त और मांसपेशियों से भरी-पूरी आज की  गुदाज अखबारी भाषा में हिन्दी को विलुप्त होते किसी शेर की तरह ढूंढ रहा हूं। हिन्दी के शिकार पर प्रतिबंध न होने से शिकार के शौकीन अंग्रेजी काउ-बाॅय और अरबी अजीमुश्शान शहंशाहों ने हिन्दी को पता नहीं कहां और किस प्रकार भून कर खा लिया। अब तो वह चिड़िया घरों मंे दिखाई देनेवाले सिंहों-शेरों पढ़ी और बोली जानेवाली भाषा में यदाकदा दिख जाती है। आजकी यानी 14 सितम्बर 2014 की हिन्दी ट्राई-लिंगुअल दिखाई दे रही है जिसमें अरबी-फारसी के जांबाज अलफा़जों की आन, बान और शान तो है ही, इंगलिश का ग्लैमर और ग्लोबलाइजेशन भी पूरे पावर में है। यही है महोदय आज की हिन्दी। चाहें तो एक बार फिर मेरे चयनित उद्धरणों को पढ़ ले या कोई भी हिन्दी का अखबार यानी न्यूज पेपर उठा कर देख लीजिये। समझ जाएंगे कि मैंने समाचार-पत्र उठाने की बात क्यों नहीं की।
14 सितंबर 2014 गुरुवार।
अगली प्रस्तुति:  हमारी ‘एंग्लो-अर.फार. हिन्दी’’: परिचय और प्रावधान
 

Wednesday, August 27, 2014

सांसों के विविध व्यंजन और कामचोरी की रचना धर्मिता




कामचोरी ने इस देश को ही नहीं, पूरी दुनिया को ऊंचे-ऊंचे विचार दिये हैं। कामचोरी से विचार प्रक्रिया तीव्र होती है। जितने भी नव्याचार प्रशासन द्वारा मातहतों पर थोपे जाते हैं वे सब कामचोरी की ही गाजरघास हैं, जो बड़ी तेजी से कागजी कार्यवाही के रूप में फैलती हैं और पूरे शासन तंत्र को कामचोरी के नये-नये गुर सिखाती हुई फूलने फलने लगती है।
यह उत्तम विचार भी मुझे कामचोरी के कारण आया। आज मैं गर्व से अपने पूर्वज-द्वय के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर सकता हूं। कामचोरी को सबसे पहले परखनेवाले मेरे ये पुरोधा हैं मध्यकालीन श्री मलूकदास जी, जिन्होंने ‘अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गये सबके दाता राम’ का पांचजन्य फूंककर आलसियों का मनोबल बढ़ाया। दूसरे मेरे पुरखे है श्री हरिशंकर परसाई जिन्होंने ‘निठल्ले की डायरी’ लिखकर इस परम्परा को आगे बढ़ाया। मैं यह बताकर बेकार का काम नहीं करना चाहता कि तीसरा मैं हूं।
मैं दावा कर सकता हूं कि खाली रहो तो सर्वश्रेष्ठ विचार आते हैं। इसमें कोई मतभेद हो ही नहीं सकता। ‘खाली दिमाग में खुराफात और खाली घर में शैतान रहता है’ कहनेवाले लोग ‘केवल विरोध के लिये विरोध’ करते हैं। इस देश की धार्मिक संस्कृति के खिलाफ है यह कथन। खाली जमीन देखकर ही लोगों को मंदिर बनाने का विचार आता है कि नहीं। खाली घर देखकर लोग कुछ न कुछ करने के लिए घुसपैठ कर ही लेते है। नोट छापना, शराब बनाना, बम बनाना, जैसे अनेक रचनात्मक कार्य खालीपन के ही परिणाम है।
आज मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। खाली बैठा था। पत्नी चाय परांठा ले आयी। खाते हुए चबाना खूब पड़ता है। यही श्रम मुझे भारी पड़ गया। मुझे लगा कि हम लोग कितना समय बर्बाद करते हैं। गेहूं को सीधा  नहीं खा सकते। उसका आटा बनायेंगे। फिर उसकी रोटी बनायेंगे। फिर उसे चबायेंगे। आटा बना ही लिया है तो उसे खा जाओ। चबाने में समय क्यों व्यर्थ करते हो। यह हमारा चटोरापन है। जानबूझकर अपने को चूल्हे में झौंकना है। कामचोर लोग जानबूझकर ऐसा काम पकड़ लेत हैं जिससे मूल काम से बचाा जा सके। चलो रोटियां बना ली। फिर परांठे क्यों बनाये। मोयन वाली रोंटी क्यों बनायी। फिर मसालेवाली रोटी क्यों बनायी। फिर आलू परांठे क्यों बनाये। तेली के घर तेल होता है तो पहाड़ को जाकर नहीं तेल से नहला देता। तुम्हारे यहां आधा लिटर तेल आया नहीं कि चढ़ा ली कढ़ाही और तलने लगे पूरियां। ये तो सिर्फ आटे का उदाहरण है साहब, दूसरी चीजों के साथ भी इस देश के रसोई घरों में कितने प्रयोग हो रहे हैं हम सब जानते हैं।
यह सब क्यों हो रहा है? यह सब कौन कर रहा है? यह सब कोई कर रहा है तो उसके पीछे क्या मानसिकता है? मेरे शोध का यह निष्कर्ष है मित्रों कि यह सब स्त्रियां कर रही है। ठहरिये, सुनिये जरा, समझिये पहले। एकदम से लाठी लेकर मत पिल पड़िये। मैं दोष स्त्रियों को कतई नहीं दे रहा हूं। स्त्रियां यह सब अपनी मर्जी से नहीं कर रही हैं। एक सोची समझी साजिश के तहत औरतों को चूल्हे में झौंका गया है ताकि पुरुष प्रधान समाज में वे अपना दूसरा हुनर न दिखा सके। औरतें भी क्या करें उनकी मेधा नई नई रेसिपी निकाल रही हैं और पुरुषों के मेदे में डाल रही है। आदमी औरतों को काम से लगाए हुए है, औरतें कामवाले आदमी बेकाम किये हुए हैं। इसलिये ये नकारात्मक मुहावरा बना ‘गया काम से’। यह तब बना होगा जब कामचोरों ने काम के लिये जानेवाले आदमी पर फिकरा कसा होगा।
भोजन के लिए जीने मरनेवाले विश्व में मनुष्य सुबह से उठकर केवल भोजन का चिन्तन करता है। पांच बजे से भोजन के ठेले खुल जाते हैं। रात देर तक चलते है। कहीं कहीं तो दिन रात चलते है। घर में औरतो को आराम नहीं है और बाहर होटलों को। मनुष्य हर चीज को खा रहा है। हर चीज की अलग अलग रेसिपी तैयार कर रहा है। राजनैतिक घोषणापत्रों की तरह हर रेसिपी के गुण उछाले जा रहे हैं। मार्केटिंग की जा रही है।
और तो और आदमी अपने शरीर और शरीर के अंगों तक की रेसिपी बेच रहा है। सिक्स पैक पेट बिक रहा है, जीरो साइज जिस्म बिक रहा है। सोला का डोला बिक रहा है तो छप्पन की छाती बिक रही है। खून बिक रहा है, किडनी बिक रही है। निस्संतानों को जीवन-द्रव्य बेचा जा रहा है। जमीर बेचा जा रहा है। ईमान और धर्म को बिकते हुए सदियां गुज़र गईं और ये धंधें हैं कि धड़ल्ले से चल रहे हैं।
मज़े की बात है कि सांसें भी बिक रही हैं। सांसों की अलग-अलग दूकानें खुली हुई हैं सैंकड़ों सालों से। अभी भी खुल रही है। किसी की ‘कपाल-भांति’ की दूकान चल रही है तो किसी के प्राणायाम शिविर लग रहे हैं। कोई ‘श्वांस की क्र्रियात्मक’ रेसिपी बेच रहा है तो किसी किसी का ‘सांसों का संपूर्ण कारखाना’ ही ‘योग-शाला’ के नाम से चल रहा है।
लोगों का बस चले तो सांसों में नमक मिर्च लगाकर प्लेटों में सजाने लग जायें। सर! ये तड़का सांस है, ये सांस मखनी है। इस सांस को राई जीरा से बघारा है सर!, इस सांस में शुद्ध घी है। इसे टेस्ट कीजिये, ये हर्बल सांस है। ये सांस चाइनीज है, ये अमेरिकन है। इस सांस में स्वीट-कार्न का मजा है। इस सांस में रोमांटिक फ्लेवर है। ये सांसें शुद्ध देशी हैं सर! और इन्हें जरूर नोश फरमायें, ये इंटरनेशनल है।
सांसों पर तो लोग गाने तक बनाकर बेच रहे हैं। सांसों को सांसों से मिलने दो जरा। मेरे हाथ में तेरा हाथ है...मेरी सांस से तेरी सांस आये......और इस सांस को सुगंधित बनाने के लिए कई विदेशी कंपनी  माउथ फ्रेशनर और डिओ, स्प्रे वगैरह बेच रही है।
ओह! मेरी तो सांसें फूल रही हैं। थोड़ी सांस ले लूं।
फिर एक और बात। मेरे पास तो काम नहीं है। आपको तो होगा। तो आज बस करते हैं। 27.08.14



























































Friday, June 20, 2014

कभी-कभी किसी-किसी दिन,



(गीतों की पैथालाजी मे प्यार का इ.एस.आर,)

कभी-कभी किसी-किसी दिन, सुबह रोज़ की तरह नहीं होती, सूरज आसमान से नहीं निकलता, किरणें दरवाजों से नहीं आतीं, रोशनी बाहर नहीं फैलती, गीत होठों से नहीं झरते, संगीत कानों से नहीं सुना जाता। कभी-कभी किसी-किसी दिन, कोई कोई सुबह, बिल्कुल अलग तरह की होती है, सूरज अंधेरे में खड़े, किसी मासूम बच्चे की तरह, अभी अभी जागे हुए सपनों की, आंखें मलता सा लगता है, खुशियों के फूलों को जमाने से छुपाता सा, आसमान उसकी पलकों में, दुबका हुआ लगता है, किरनें उसके होंठों में चमकती हैं, गीत उसके अंदर गूंजते हैं, संगीत उसके दिल में बजता है। कभी कभी किसी किसी दिन।
आज कुछ ऐसा ही दिन था, जो रोज की तरह नहीं था। वैसे भी रोज वही दिन कभी नहीं होता। कभी कभी पिछले दिन का कुछ छूटा हुआ रात में कुछ नया जोड़कर सुबह सुबह आ जाता है। कभी उसके पास पिछला कुछ होता ही नहीं, कुछ बिल्कुल नया सा लेकर आ जाता है जो आश्चर्य की तरह अनोखा और जानने लायक होता है।
आज सुबह वैसे ही हुआ। टेबल पर चमकता हुआ ‘स्पर्श पटलीय कोशिका चलितभाष’ (टच स्क्रीन सेल फोन) मेरा ध्यान खींचने लगा। उसे क्या हो गया है, यह देखने के लिए मैंने उसे उठा कर देखना चाहा तो वह गाने लगा। हड़बड़ाकर मैंने हाथ खींच लिया। मेरे हाथ का कोई हिस्सा उसके संवेदनशील पटल (सेंसर स्क्रीन) को छू गया होगा। रात में किसी ने गाना ‘चढ़ाकर’ (अपलोड) भेजा होगा, उसे ‘उतारने’ (डाउनलोड करने) के लिए रख छोड़ा गया था। जिस वक्त मेरा स्पर्श हुआ उस वक्त तक वह उतर चुका था और बजने के लिए मचल रहा था। गाने के लिए जो तड़प रहे होते हैं उन्से फिर कोई गधा भी कहे तो वे शुरू हो जाते हैं। यही हुआ। फोन गाने लगा।
गाना हिन्दी में था। किसी फिल्मी गाने का ‘रिमिक्स’ था। कभी कभी हिदी मेरी कमजोर हो जाती है। गीत मुझे समझ में नहीं आते। मतलब जिस अर्थ में वे लिखे गये हैं, उस अर्थ में वे मेरे अंदर नहीं उतरते। किसी और ढंग से वे मुझे बहकाने लगते हैं। अब जैसे ये जो गीत बज रहा है-‘आज फिर तुम पै प्यार आया है। बेहद और बेहिसाब आया है। जो भी इसे सुन रहा है, झूम रहा है, गुनगुना रहा है। मेर’ी हिन्दी कमजोर हो गई है। मैं कन्फ्यूज होकर इसके अर्थ में उलझ गया हूं।
मैं सोच रहा हूं - प्यार कैसे आता होगा? प्यार क्या आनेवाली चीज है? आता है तो किससे आता होगा? क्या वाहन है उसका? साइकिल से आता है या बीएमडबल्यू से? प्लेन से आता है या रेलगाड़ी से? रेल से आता है तो रिजर्वेशन करा कर आता है या जनरल में घुस घुसाकर आता है, स्टेडिन्ग में, सीढ़ी पर बैठकर या छत पर चढ़कर? आना जरूरी है तो आदमी फिर तकलीफ नहीं देखता। आने का तो यही दस्तूर यही तरीका देखा है मैंने। चलती गाड़ी में दौड़कर तो कई बार मैं भी चढ़ा हूं। टिकट खिड़की में खड़ा हूं और कतार लम्बी है, ट्रेन मेरा इंतजार किये चल पड़ी है तो मैं बिना टिकट के ही भागकर ट्रेन पकड़ता हूं। वहां मैं मान नहीं करता कि मेरा इंतजार किये क्यों चल पड़ी तू? मान करने वाले छूटती हुई ट्रेन को नहीं पकड़ पाते। मुंह फुलाकर शिकायत करते रहते है-‘‘जाने क्या समझती है अपने आपको? करोड़ों की हो गई है, एक्सप्रेस का दर्जा मिल गया है तो घमंड आ गया है। दो मिनट रुक नहीं सकती थी। ऐसा भी क्या घमंड? घमंड रावण का भी नहीं रहा।’’
जो किसी को पकड़ नहीं पाते वे ऐसे ही अनमेल उलाहने दिया करते हैं। ट्रेन के साथ रावण के घमंड का जैसे तुक नहीं बैठता ऐसे ही किसी भी आदमी के साथ नहीं बैठता। अहंकारी और असफल व्यक्ति ही दूसरे पर अहंकार का आरोप थोपता है। पर ये सब गोबर के कंडे छत पर थापने जैसे है। गोबर के लोंदे वहां ठहर नहीं पाते, थोपनेवाले मूर्ख के सर पर गिर पड़ते हैं। पर वह छत पर आरोप लगाता है कि मेरी हैकिन्तु दुश्मन से मिली हुई है। तुलसी के जीवन में ऐसे लोग बहुत थे, तभी उन्होंने निष्कर्ष निकाला-‘मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंची सम।’’ ऐसों के कोसने से चलती हुई कामकाजी ट्रैन को या छाया के महत्वपूर्ण काम में टिकी हुई छत को कोई फर्क नहीं पड़ता।
आपको गुस्सा आ रहा है? उसे ठण्डा पानी पिलाइये और शांति से बैठाइये। उसे बताइये कि उसके आने की हम बाद में मीमांसा करेंगे, थोड़ा सब्र करे, अभी प्यार आया हुआ है। ज़ोर से आया हुआ है। बे-हद और बे-हिसाब आया हुआ है। साइक्लोन या तूफान भी हमारे देश में आते है। भूकंप तक आते हैं। पर वे हिसाब से आते हैं। कोई तूफान साठ-सत्तर की स्पीड से आता है, तो कोई-कोई नब्बे या सौ की स्पीड से आता हैं। भूकंप भी ऐसे बेहिसाब नहीं आते। कोई तीन के रेक्टर में आ रहा है तो कोई पांच के रेक्टर में। पांच और छः रेक्टर के भी भूकंप हमने आते देखे हैं या महसूस किये हैं। यह भी एक हिसाब से ही आना हुआ। बेहिसाब कोई नहीं आया। हिसाब से आने-जाने वाले को समाज में ऊंची नजर से देखा जाता है। इसलिए भूकंप या तूफान को भले ही कोई पसंद न करे, पर उनका विरोध कोई नहीं करता। उनको लेकर कोई हंगामा नहीं करता। पहले से ही उनके आने की घोषणा की जाती है, उनके स्वागत की युद्ध स्तर पर तैयारी की जाती है। किन्तु प्यार के आने की कोई सूचना तक नहीं देता। वह चुपचाप, दबे पांव आ जाता है। जैसे अभी व्यास नदी में बाढ़ आ गई। कोई चौबीस युवक-युवतियां इस अचानक आई बाढ़ में बह गए। कहते हैं बांध का पानी अचानक छोड़ा गया इसलिये बाढ़ आ गई। बांध का यही रिवाज है। जहां बांध होते हैं, वहां अचानक पानी छोड़ना पड़ता है, नहीं तो बांध तोड़कर पानी के बहने का खतरा होता है। प्यार पर अक्सर इस तरह की तोड़-फोड़ का इल्जाम लगाया जाता रहा है। इतिहास गवाह है कि प्यार ने बड़े बड़े बांध तोड़े हैं। फरहाद ने पहाड़ ही काट डाला। प्यार के बारे में जरा सर्वे कराइये। उसका नाम सुनते ही सन्नाटा छा जाता है।
लेकिन जरा कमाल देखिए, सुबह सुबह बजनेवाले इस गीत में डिंडोरा पीटा जा रहा है कि आज फिर प्यार आया है। जैसे बच्चे उछल पड़ते हैं कि आइसकी्रमवाला आया, जीभ चटकारती हुई औरतें निकल पड़ती है कि चाटवाला आया, पानीपुरी वाला आया। मदारी आते हैं, बहुरूपिये आते हैं, सांप, भालू और बंदर वाले आते हैं। बच्चे बेहिसाब भागते हैं। उन्हें रोकने के लिए मां बाप कहते हैं- बच्चे पकड़नेवाला आया है, बाहर मत जाओ।’ प्यार को लेकर भी अमूमन यही होता है। ‘खबरदार जो घर के बाहर कदम रखा। प्यार का कोई हिसाब नहीं, कब क्या कर बैठे। कितना नुकसान कर बैठे।’ कुछ चीजों का हिसाब नहीं होता।
किन्तु जो चीजें खरनाक हैं, उनमें से कुछ का हिसाब होता है। बांध में कितना पानी बढ़ेगा तो पानी छोड़ा जायेगा। कितना बुखार आयेगा तो घर में क्रोसीन देकर ठीक कर लिया जायेगा। बुखार भी हमारे देश में हिसाब से आता है। एक सौ एक, एक सौ दो, एक सौ तीन। मुझे तो जब भी आया एक सौ चार आया। मेरा हिसाब यही है। जो भी आता है, अति में आता है। मरने के बिन्दु तक आता है। मेरी जिन्दगी जब से शुरू हुई है, इसी हिसाब से चली है। हर साल एक बार मैं म्त्यु के निशान को छूकर लौट आता हूं।
पर यह बेहिसाब और बेहद का प्यार मेरी समझ में नहीं आता। बेहिसाब और बेहद प्यार तो बच्चों को भी करना मना है। ज्यादा लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं, यही समाज का ‘मक्सिम’ है। परिवार में, समाज में, अड़ोस पड़ोस में व्यवहार का एक हिसाब होता है। आने और जाने का हिसाब होता है। ज्यादा आने-जाने से मान खत्म हो जाता है। बहुत जाओ या जाना छोड़ दो तो संबंध खत्म हो जाते है। तुलसी की बताई एक होमियोपैथी दवा मैं आपको बता रहा हूं--वे कहते हैं-‘आवत ही हरसें नहीं, नैनन नहीं सनेह। तुलसी तहां न जाइये, चाहे कंचन बरसे मेह।’ आने से प्रसन्नता न हो और आंखों में स्नेह के भाव न हों तो गरीब तुलसी कहते हैं कि चाहे पानी की जगह सोना भी बरस रहा हो तो भी वहां मत जाइये।
तुलसी बाबा ने कई प्रकार का आना-जाना बताया है। उसके अनेक पथ्य-अपथ्य और नुस्खे बताये हंै। उन्हें यह आजमाए हुए नुस्खे हिमालयवासी औघड़ बाबा शंकर से मिले हैं। हिमालय औषधियों का भंडार है। संसार में जो दवाई नहीं मिलती, हजारों लोग उसे घर से भागकर हिमालय में ढूंढते हैं। भीड़ की बीमारी का इलाज एकांत में मिलता है, यह कैसी अजीब बात है। क्यों न हो, भारत को अजूबों का देश यूं ही नहीं कहा जाता।
एकांत में साधना करनेवाले हिमालय के पर्वतपुत्र शंकर ने अपनी पत्नी दक्षकन्या सती को समाज का मानवीय विज्ञान समझाते हुए आने-जाने का मर्म कहा था-
जौ बिनु बोले जाहु भवानी। रहई न शील सनेहु न कानी।
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलहुं न संदेहा।
तदपि बिरोध मान जंह कोई। तहां गए कल्यानु न होई।
-सुनो सती! बिना किसी के बुलाए जाना शिष्टाचार नहीं है, ऐसे जाने से न किसी का स्नेह मिलता है, न मान ही मिलता है। हालांकि मित्रों के घर, मालिक के घर, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए निस्संदेह चले जाओ किन्तु अगर कोई मनमुटाव या विरोध चल रहा हो तो  फिर जाने में कल्यान नहीं है। आप विरोध या मनमुटाव की परवाह किये बिना सहज भाव से चले गये तो सामने वाला ठीक से बात नहीं करेगा। जैसा कि सती के आने पर पिता दक्ष ने किया।
ऐसे ही यदि आप सहज भाव से अपने परिवार सहित अपने विरोधी भाई या बंधु के चले गये लेकिन वह आपको देखकर मनमुटाव के कारण पड़ोस में क्रिकेट देखने चला जाये तो आपको कैसा लगेगा? अब रात में आप अपने छोटे छोटे बच्चों को लेकर कहां जायेंगें? अपमान का घूंट पीकर सुबह होने का इंतजार करेंगे। अरे भाई आपके जीवन में रात ही न हो अगर आप अपने विरोधी पिता, भाई, मित्र या गुरु के घर जाओ ही नहीं। सती चली गई शंकर के मना करने पर भी मगर विवाह में दक्ष ने शंकर और सती को नाराजी के कारण आमंत्रित नहीं किया था। सती गई लेकिन अपमान के कारण यज्ञ हवन कुण्ड में कूदकर जल गई। शादी विवाह में बुलाने पर जाना चाहिए। नहीं बुलाया जाता तो यह एक प्रकार आपके के स्वाभिमान की रक्षा का अवसर आपके दुश्मन ने दिया है, बुलाकर उपेक्षा करने की स्थिति से आपको उबारा है। उसका धन्यवाद करना चाहिए। ऐसों के यहां ‘ना जाने’ के निर्णय को वरदान मानना चाहिए।
मित्रों! यही समाज है। यहां आने-जानेवालों का पूरा हिसाब रखा जाता है। विवाह में तो एक आदमी आनेवालों का और व्यवहार करनेवालों का हिसाब रखता है। यही वह समाज है जहां मेहमान जीते हुए तो आते ही हैं, मरनेवाले भी आते हैं। कितने ही लोग हैं जिनके मरे हुए पिता और माता और दादा किसी बच्चे में लौट आते हैं। किसी पर बाबा आते हैं, किसी पर देवी आती है। किसी पर किसी का भूत या प्रेत आता है।
प्यार क्या इसी तरह के भूत या प्रेत की तरह आया है? मैं समझ नहीं पा रहा हूं। आज फिर तुमपे प्यार आया है’ का क्या मतलब? बाबा की तरह आया है कि देवी की तरह आया है? या किसी मरे हुए पुरखे की तरह किसी पर लौट आया है? बनिा बुलाए आ गया है या तुमने उसे बुलाया है?
मुझे ज्यादा ज्ञान तो नहीं है पर कह सकता हूं कि प्यार बिना बुलाए नहीं आता। देखा देखी के दौरान ही आंखों आंखें में प्यार को आमंत्रण के पीले चांवल डाल दिये जाते है। एक कबूतर या कौवे की तरह इन पीले दानों को चुगता-चुगता प्यार तुम्हारे आंगन में आ जाता है।
पितरों के समय देखो कैसी भेीड़ लगी रहती है। बेहिसाब कौवे तुम्हारे सम्मानपूर्वक परोसे गये पकवानों को प्रेम से खा रहे होते है। तुम्हारे अंदर भी बेहद और बेहिसाब प्यार आया हुआ होता है। किसी कौवे में मरे हुए पिता को देखकर, किसी कौवे में मरी हुई दादी को देखकर, किसी में मरे हुए नाना को देखकर, किसी में मरे हुए किसी अपने को देखकर तुम मन ही मन गदगद हो रहे होते हो। प्यार के आंसू तुम्हारी आंखों में आकर छलक रहे होते हैं।
क्या यही है इस गाने का भाव? आज फिर तुम पर प्यार आया है--ओह! गाना मुझे मजा नहीं दे रहा है, कन्फ्यूज कर रहा है। अब बस करते हैं। आपको भी त्रास आ रहा होगा। अच्छा विदा
डा. आर रामकुमार, 19-20.06.14



Wednesday, June 11, 2014

डर की सोनोग्राफी और प्रेम का आई-टेस्ट


   

डर इतना मन में भरा हुआ होता है कि भारी मन से हल्के धंुधलके में भी रस्सी को सांप समझकर लोग सहम जाते हैं, हड़बड़ाकर भागने के कारण लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। घबराहट में धड़कनें तेज हो जाती हैं, आंतें सिकुड़ने लगती हैं, पैरों में खिंचाव होने लगता है, शरीर कांपने लगता है। रक्तचाप की जांच की जाये तो वह बढ़ा हुआ मिलेगा, अल्ट्रा साउंड में हार्ट बीट की फ्रिक्वेंसी हाई होगी। सोनोग्राफी आंतों की कराई जाये तो आंतों में भय चिपका हुआ मिलेगा। मुंह सूखेगा, त्वचा जलेगी, पसीना निकलेगा। जैसा कि युद्ध भूमि में अर्जुन के साथ हुआ था। पहले तो बहादुरी के साथ कृष्ण से बोला कि दोनों सेनाओं के बीच ले चलो। फिर सशस्त्र सेना में अपने ही भाई-बंधुओं को देखकर मोह-जनित पीड़ा और क्षोभ से डर गया। डर कर कृष्ण से कहने लगा-
‘‘सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।। 29/1
डर, घबराहट, आघात जैसी उपरोक्त परिस्थितियों में सामान्योपचार या घरेलू इलाज यह है कि बड़ा हो तो पीठ थपथपा दो, छोटा बच्चा हो तो उसे सीने से लगा लो। ज्ञानवान हो तो उसे ज्ञान की बातें बताकर जागृत कर लो। कृष्ण ने अर्जुन का तीसरे क्रम का उपचार किया। यह हुआ डर का मोटा चित्र।
प्रेम में इससे उल्टा होता है। डर में जहां रस्सी भी सांप दिखाई देती है, प्रेम में सांप भी रस्सी दिखाई देता है। तुलसी के साथ यही हुआ। उनको प्रेम में मुर्दा नाव दिखाई दिया और सांप उनको रस्सी दिखाई दी। मुर्दे को नाव बनाकर उफनती नदी पार कर ली और सांप को रस्सी बनाकर रत्नावली की अटारी पर चढ़ गए। प्रेम नामक घटना का असर दृष्टि पर पड़ता है। कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है। होता कुछ है, दिखाई कुछ देता है। कुछ कुछ मामले इतने बिगड़ जाते हैं कि सबमें एक ही दिखाई देने लगता है। अध्यात्म की दुनिया में इसे बड़ी ऊंची स्थिति कहा जाता है किन्तु साधारण दुनिया के सामाजिक लोग इसे दृष्टिदोष समझते हैं। वे कहने लगते हैं कि अगले की दृष्टि यानी नज़र खराब है। तो प्रेम आंख का रोग है।
प्रश्न उठ सकता है कि डर से कूदकर मैं प्रेम की बात क्यों करने लगा? दोनों में कौन सा संबंध है? संबंध तुलसी ने बनाया है। तुलसी कहते हैं-भय बिन होंहि न प्रीति। यानी डरोगे तो प्रेम करोगे। दोनों में अन्योन्याश्रित संबंध है। प्रेम में डर सम्मिलित है। प्रेम में मन डरा डरा सा, कांपा कांपा सा रहता है। तुलसी ही के शब्दों में-‘घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रियाहीन मन डरपत मोरा।’ मन ऐसा हो जाता है कि जरा सी बात से डरता है और प्रेम की ओर भागता है। इसी प्रकार प्रेम में पड़े हुए को डराकर उसे प्रेम से दूर ले जाया जाता है। कांटे से कांटा निकालना इसे ही कहते हैं। हीरा हीरा को काटता है तो विष ही विष का उपचार करता है। डर नामक मनोरोग से प्रेम नामक मनोरोग की चिकित्सा की जाती है।
यह कहने का आधार है। प्रेम कहीं आंख का रेग हैं तो किसी किसी समाज में इसे मानसिक-रोग समझा जाता है,े मानसिक खलल या दिमाग की खराबी समझा जाता है। देखा गया है कि प्रेम के रोगी को आंख के डाॅक्टर के पास ले जाओ तो वह अक्षर पढ़ने के लिये देता है। अगला ‘ए’ को ‘एल’ पढ़ता है। सेब उसे चुनरी दिखाई देती है और तरबूज को वह कुर्ती कहता है। आंख का डाॅक्टर कहता है-‘यह मामला आंख का नहीं है। किसी अच्छे साइकियाट्रिक्स को दिखाओ।’
मनोचिकित्सक के पास ले जाओ तो वह रिपोर्ट पाजीटिव देता है। मरीज में मनोरोग के सारे लक्षण दिखाई देते हैं। बिहारी ने इस अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है-
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु हीं सब बात।।
आपको कैसा लगेगा जब आप अपने आप ही, बिना मुंह हिलाए, आंखों से किसी से कुछ कह रहे हों,   किसी बात से इंकार कर रहे हों जैसे कोई प्रत्यक्ष में छुपा हुआ है लेकिन आपके हाव भाव से लग रहा है कि वह कहीं आस पास है और आप उस पर रीझ रहे हों। फिर दूसरे ही क्षण आपके चेहरे और आंख के हाव भाव से लग रहा है कि आप किसी बात से चिढ़ रहे हो, फिर आपके चेहरे पर ऐसे भाव आये कि किसी से आप मिल रहे हांे और आप बड़े खुश हो रहे हों। फिर इस मिलने में ऐसा कुछ हो रहा है कि आप लजा रहे हो। यानी ऐसा भी हो रहा है कि भरे हुए भवन में आप अजीब अजीब सी हरकतें कर रहें हैं, आंखों आंखों में किसी से बात कर रहे हैं। लोग किसी और काम में पूरे होशेहवास से लगे हैं और आप अपनी ही दुनिया में डूबे हैं। आप ही बताइये किस बात के लक्षण हैं ये? ऐसे लक्षण को दीवानापन नहीं तो और क्या कहा जायेगा?
मीरां इस मामले में बहुत दो टूक बात करती हैं। वे कहती हैं- ‘ऐरी मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दर्द न जाने कोय।’ इस तरह के मामले की वे पहली है जिन्होंने पूरे होश में अपने को दीवानी कहा। उनकी भी खूब तरह-तरह की चिकित्सा की गई होगी। मिर्ची का धुआं दिया गया होगा, कड़वा काढ़ा पिलाया गया होगा। तभी तो परेशान होकर वे कहती हैं-‘मेरा दर्द न जाने कोय।’ पर मीरां बड़ी अदभुत थी। वे स्वयं उपचार भी बताती थीं। वे किसी घायल व्यक्ति से इसका उपचार करवाना चाहती थीं। क्यों? क्योंकि ऐसे मामले में बहुत से कबीलों में पत्थर से मार मार कर दीवाने को घायल करने की परम्परा रही है। भारत के ब्रज क्षेत्र में पूरा समाज प्रेम से लट्ठ खाने के लिए निकल पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि घायल हुए तो सारे कष्ट साफ।
             मीरां को पता था यह। तभी कहती हैं कि ‘घायल की गति घायल जाने और न जाने कोय।’ कितने साफ तौर पर कह रही हैं कि केवल कोई घायल ही इस मामले को समझ सकता है, अन्य कोई मेरे दर्द को नहीं जान सकता। फिर वे संकेत देती हैं-‘मीरां री तब पीर मिटे जब वेद सांवलिया होय।’ वे सांवले रंग के किसी वेद की तरफ़ इशारा करती हैं और जैसे कहना चाहती है कि बेकार के उपचार में मत उलझो, उस सांवले रंग के वैद्य को ढूंढकर ले आओ। मैं ठीक हो जाउंगी।’    
लेकिन दीवानों की बात कौन सुनता है? मीरां की भी किसी ने नहीं सुनी। उनके परिवार वालों को किसी ने बताया होगा कि अनेक रोगों की चिकित्सा विष से की जाती है। इतना इलाज किया है मीरां का, यह भी कर देखो।
और सबको पता है कि परिवारवालों ने मीरां को विष देकर भी ठीक करना चाहा। पर वे सफल नहीं हुए। फिर सुना है, सचमुच किसी सांवले रंग के वैद्य ने ही मीरां का उपचार किया और मीरां अपने बाहरी वस्त्र छोड़कर केवल आंतरिक दर्द से ही नहीं, इस दुनिया से भी मुक्त हो गई। हालांकि किसी को वह वैद्य दिखा नहीं, केवल मीरां ने उसे देखा।
आधुनिक युग में कोई कोई डाॅक्टर इस प्रकार के प्रकरण में इलेक्ट्रिक शाॅक देने की बात करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पद्धति से कई दीवानों के दिमाग ठिकाने आ गए है। पर लड़की या लड़के के पुराने विचारों के बाप के दिमाग में दूसरा ही इलाज चल रहा होता है। वे चिल्ला चिल्लाकर कहते हैं-‘चार जूते मारो सालों को, सारी अक्ल ठिकाने आ जायेगी, सब कुछ साफ साफ दिखने लगेगा।’’
पुराने जमाने की बात ही निराली है। जो लोग अपने पितरों का सम्मान करते हैं वे आज भी उनकी पद्धतियों को जीवित रखे हुए हैं। उसे मीडिया ने नया नाम दे रखा है-‘आनर किलिंग’। कहीं कोई जल रहा है तो कोई विष पी रहा है। किसी को पेड़ में लटकाकर फांसी दी जा रही है तो कोई जिन्दा दफनाया जा रहा है। सल्फास भी अच्छा और अधिक लोकप्रिय विकल्प के रूप में अपना लिया गया है।
एक और सस्ता और सामाजिक इलाज इस मनोरोग का किया जाता रहा है। आज भी किया जाता है। जैसे बहुत से रोगों में शरीर पर मिट्टी लपेटकर प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है, वैसे ही इस रोग में हल्दी का लेप लगाकर प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है। इस उपचार को पता नहीं क्यों हाथ पीले करना कहा जाता है, जबकि हल्दी पूरे शरीर पर लिपेटी जाती है। कुछ माामलों में यह इलाज कारगर सिद्ध हुआ है। बल्कि यही इलाज ज्यादातर मामलों में अपनाया जा रहा है। अन्तर सिर्फ इतना हुआ है कि पहले लड़के लड़की जिसका नाम सोते जागते लेते थे उसके साथ उन्हें नहीं रखा जाता था। इससे कई केस बिगड़े। अब लड़के लड़की जिसका नाम लेते हैं, उसी को साथ रखकर यह उपचार किया जाता है। अब मामले नहीं के बराबर बिगड़ते हैं।
मतलब क्या हुआ कि प्रेम का इलाज प्रेम से किया जाने लगा है। कोबरा ने काटा है तो काबरे के विष का डोज दो। संस्कृत में इसे ही 'विषस्य विषमौषधि' कहा है तो 'समं समे समाचरेत' भी कहा है। डर का भी यही हे इलाज। डा. छींक आने पर हार्ट डिसीज और टीबी होने का डर दिखाकर रोगी को भर्ती कर लेते हैं। कुछ रोगी तो बड़ी बीमारी का नाम सुनकर, यह सोचते हुए कि मरेंगे ही न? तो मरना तो है ही एक दिन, इलाज की क्या गारंटी। इलाज कराकर मरने से अच्छा है भगवान की दी हुई बीमारी से मर जाओ।
इसके आश्चर्यजनक परिणाम आए हैं। मृत्यु को समर्पित रोगी कुछ दिनों में पूरे आत्मविश्वास से घूमते नजर आने लगे। लोगों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है तो डाक्टर अधिक से अधिक शुगर पीड़ित होकर इंशुलिन की मात्रा बढ़ाकर ले रहे हैं। इसलिए कहते हैं ‘दूसरों को डराओ मत, उनका आत्मविश्वास विकसित करो, उनसे प्रेम करो। खुद भी जिओ औरों को भी जीने दो।    10/12.06.14


Sunday, May 4, 2014

विष-रस और मीरां की हंसी




रस काव्य की आत्मा है। छंद उसका शरीर है और अलंकार उसके आभूषण हैं। काव्यांग विश्लेषण और व्याख्यान में इसी दृष्टांत को वर्षों से परोसा जाता रहा है। व्यंजनों के रसास्वादन के लिए। उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए।
रस आत्मा की भांति दिखाई न देने वाला मनोभाव है। शरीर की भांति छंद के नाटे लम्बे, मोटे दुबले होने का प्रत्यक्ष हो जाता है। कुरूप और सुरूप होने का बोध भी होता है। नई लहर ने कविता आंदोलन के साथ यद्यपि कायाकल्प कर लिया है और बिल्कुल छरहरी होकर लुभाने की मुद्रा में स्थान स्थान पर खड़ी मिल जाती है। अलंकार भी रूप के अनुकूल उसने बदल लिये हैं। बिल्कुल त्यागे नहीं हैं। गद्य तक में भी अलंकरण के आधुनिक स्पर्श दिखाई दे जाते हैं। छंद की तरह अलंकार भी दिखाई देनेवाले स्थूल रूप हैं। दिखाई देने वाले के स्थान पर दिखाए जाने लायक शब्द रख देने से भी उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
हमारी प्रगति में बंधन मुक्त होने की लालसा दिखाई देती है। यह और बात है कि बंध हम फिर भी जाते हैं। यहां रूसो का कथन उदाहरण बन सकता है कि हम पैदा तो स्वतंत्र हुए हैं लेकिन सामाजिक होने से सर्वत्र जंजीरों में बंधे हुए हैं। हमारे अनुशासन को या सामाजिक अनुबंधों को समझाने के लिए आनुबंधिक समाज की परिकल्पना करनेवाले रूसो ने प्रतीकों की सहायता ली। इससे रूखे विचार की गंडेरियों में रस भर गया। आनंद आ गया। दिखाई नहीं दिया क्योंकि काव्य का रस दिखाई नहीं देता। वह चुपचाप हमारी सूखी आत्मा में रिस जाता है और वह जीवंत हो उठती है। इसलिये इसे काव्य की आत्मा कहा गया है।
जिस काव्यशास्त्री ने आत्मा कहा है वह आत्मा नामक वस्तु पर भरोसा रखता रहा होगा। प्राण भी कह सकता था। रस काव्य का प्राण है। रस हटा तो शरीर सूखे बांस की तरह नीरस हो जाता है। वह गन्ना नहीं हो सकता। घास का गन्ना होना उसकी रसात्मक क्षमता ही है। पर जो आत्मा नहीं मानते उनके लिए प्राण शब्द प्रतिनियुक्त किया जा सकता है। प्राण हैं तो हम हैं और हम हैं तो आत्मा के बिना हमारे होने का अर्थ ही क्या है? ऐसा कहनेवाले भी मिल सकते हैं। आत्मा और प्राण दोनों रसात्मक शब्द हैं। अस्तित्व दोनों का नहीं है लेकिन शरीर के अस्तित्व के लिए दोनों का अनिवार्य माननेवाालों की कमी नहीं है। आत्मा और प्राण दोनों में कौन अधिक आवश्यक है? प्राण प्रतीकात्मक है और आत्मा नैतिक-भाव है। प्रतीक और भाव दोनों स्थायी नहीं है। इसलिए रस प्रतीक और भाव दोनों नहीं है। फिर आत्मा और प्राण कहने का तात्पर्य क्या हो सकता है।
रस आत्मा है अगर यह कहते हैं तो वह क्या है जो रस ग्रहण करता हैं? शरीर रस ग्रहण नहीं करता। मन और प्राण नामक दो मायावी अभिकर्ता भी इसे ग्रहण नहीं करते। काव्य रूपी शरीर में वह कौन है जो रस रूपी आत्मा को ग्रहण करता है? क्या रस ग्रहण करने योग्य पदार्थ है? क्या रस और आत्मा का अर्थ एक ही है? रस का क्या स्वभाव है और आत्मा के क्या आचरण हैं, यह विचार करना जरूरी है तभी दोनों में अंतर्संबंध स्थापित किये जा सकते हैं।
रस का संबंध हमारी अंतर्वृत्ति से है। रस वृत्तियों को जाग्रत करता है। वृत्तियों की संख्या हज़ारों में आंकी गई है। अलग अलग उत्पादों से अलग अलग रस मिलता है। रस भी हज़ार हो सकते हैं। रस अगर आत्मा है तो रस की तरह आत्मा भी हज़ार होनी चाहिए। इस आत्मा से यह रस मिला, उस आत्मा से वह रस। पर जैसा कि भारतीय संस्कृति का विश्वास है कि आत्मा एक है, जो अलग अलग देहों में संचरण या विचरण करता है। देह आत्मा के वस्त्राभरण हंै। आत्मा वस्त्र बदलता है, यह भारतीय विचार-धारा है। आत्मा को वस्त्र में रस मिलता है। अलग अलग वस्त्रों में अलग अलग रस। इस तरह भी आत्मा का रस होना सभंव नहीं है। आत्मा जो, जैसा कि कहा जाता है, देह में स्थित है, वह रस ग्रहण करता/करती है, रस नहीं होती। देह से रस का आस्वाद नहीं हो सकता। रस सूक्ष्म है तो उसे ग्रहण करने वाला भी सूक्ष्म होना चाहिए। आत्मा जो सूक्ष्म है और स्थायी रूप से देह के भीतर रहता है, जैसा कि आत्मावादी कहते हैं, तो वह रस के आयात का सुख भोग सकता है।

रस आंतरिक भी सकता है। लेकिन जिस रस को काव्यात्मा कहा जा रहा है वह बाहर से आयातित है। काव्य के माध्यम से एक विशेषीकृत रस का संपे्रषित किया जा रहा है। जिस जिस आत्मतत्व के द्वारा वह ग्रहण किया जा रहा है, वहां वहां आनंद का उत्पन्न कर रहा है। रस आनंद रूप है या रस आनंद है। आत्मा आनंदरूप नहीं है। वह रस की तरह किसी अन्य को तृप्त नहीं कर सकती। वह तृप्त हो सकती है। रस आत्मा की प्यालियां भर सकता है। दोनों अलग अलग अस्तित्व हैं। इसलिए रस काव्य की आत्मा नहीं है। रस काव्य का उत्पाद है और जैसा कि होता है हर उत्पाद का अलग अलग प्रयोजन होता है, रस का भी प्रयोजन होता है। काव्य में रस होना स्वाभाविक है। बिना रस के काव्य नहीं हो सकता। काव्य रस के साथ ही जन्म लेता है। रस काव्य का स्वभाव है। रस ही काव्य के जन्म का कारण भी है। रस काव्य की प्रेरणा भी है। रस ही काव्य को उन स्थानों की सैर कराता है जहां उस रस के ग्राहक होते है। इसलिए रस व्यवसन भी होता जाता हैं। वीररस, वीभत्सरस, रौद्ररस, करुणरस, भक्तिरस1, श्रृंगाररस, हास्यरस, अद्भुतरस, वात्सल्य आदि अपनी अधिकता के कारण व्यसन की श्रेणी में आते ही रहे है।
आज हम उस रस की चर्चा करेंगे जिसकी प्रायः उपेक्षा हो गई है। वह रस है ‘विष-रस’। यह रस कबीर के ‘रामरस’ से भिन्न है। कबीर के ‘रामरस’ की विशेषता है कि उसे पीते ही खुमारी आ जाती है। पिवत रामरस लगी खुमारी’। सोम-रस’ की जाति का कोई रस वह होगा।
कबीर के युग के संत रविराय या रैदास की शिष्या मीरां के अनुसार, ‘विष का प्याला भेज्यो राणाजी पीवत मीरां हांसी रे।’ विष का प्याला पीकर मीरां का हंसना बताता है कि विष में हंसाने का गुण होता है।
  कबीर के बाद की भक्त परम्परा के कवि तुलसी ने मीरां को भेजे गए प्याले की धातु का वर्णन किया है। मेवाण के राणा की सामथ्र्य के अनुसार यह विष का प्याला सोने का था। तुलसी ने अयोध्या के राजकुमार लक्ष्मण के बहाने से बताया कि ’विष रस भरे कनक घट जैसे।’ तुलसी कहते हैं कि विष रस कनक यानी सोने के घट अथवा पात्र यानी प्याली में भरा हुआ है।
यह हमारी मानवीय वृत्तियों का सर्वाधिक शक्तिशाली रस है। अज्ञेय जैसे आधुनिक प्रयोगवादी ने भी इसका स्वाद चखा था और उल्लेख किया था। दुनिया में विष उत्पादन के लिए जाने जानेवाले सांप से सीधे ही वे प्रश्न करते हैं-‘सापं तुम शहरों में नहीं रहे, फिर यह डसना कहां से सीखा और विष कहां से पाया। अज्ञेय के अनुसार शहरों में विष बहुतायत से मिलता है और डसने की विद्या भी। जिन्हें शहरों में रहने का सौभाग्य मिला है उन्हें सरलता से डसना भी आ गया है और विषवमन करना भी।
सांप का विष अगर सीधे सांप से प्राप्त होता है तो मृत्यु हो जाती है और डाक्टर उसे प्रोसेस करके इन्जेक्शन से देते हैं तो जीवन मिलता है। विष मृत्यु का प्रतीक है तो जीवन का भी। वैसे मृत्यु को कबीर और मीरां का संत-दर्शन दूसरा जीवन कहता है। इस प्रकार मृत्यु ही जीवन है और जीवन ही मृत्यु है। यही बात थी जिससे सोने के प्याले में राणा के द्वारा भेजे गए प्याले का देखकर मीरां हंस पड़ी।
मीरां को एक पल लगा ‘ऐ री माई मरी री!’ फिर दूसरे ही क्षण लगा मरी तो प्रियतम से मिली और प्रियतम से मिली तो जी उठी।’’ यह समझते ही मीरां खिलखिलाकर हंसने लगी-‘‘अब बताओ यार राणा! मार रहे हो कि जिला रहे हो।’’
इस प्रकार सिद्ध हुआ कि विषरस करुण रस नहीं है, हास्य रस है।
             
पुनश्च 1. भक्तिरस को अन्यत्र शांतरस भी (अज्ञानवश) कहा गया है। रस भी कभी शांत रहा है? रस अत्यधिक सक्रिय होता है। वह रसिक को निरंतर अनुकूलरूपेण सक्रिय करता है। रामरस या सोमरस पीकर शांत दिखनेवाले क्या रस के सक्रिय प्रभाव का उदाहरण नहीं है? रस अपने स्वभाव के अनुसार सक्रिय होकर दूसरों को शांत या उत्तेजित करता है। शांतरस जिसे कहते हो, वहां ‘शांति’ प्रतिक्रिया है रस की तीव्रतम क्रिया की। पीकर घुत्त पड़े व्यक्ति को मोटे तौर पर शांत कह सकते हो, मगर जब उसके थोड़ा बहुत होश में आते ही पता चलता है कि उसे शांति कहां? निर्वेद को स्थायी भाव कहने से उसका आशय परिणाम स्वरूप भक्ति हो जाता है इसलिए इसे यहां लेखक अपने मतानुसार ‘भक्तिरस’ कह रहा है।)

                                                                                          दि. 5.5.14,


Friday, May 2, 2014

तेरा दिल या मेरा दिल


 पाठकीय किंवा पठनीय

               

कुछ मामलों में आचार संहिताएं काम नहीं करती। जैसे मामला ए प्रेम या फिर वारदाते भोगविलास, या फिर माले मुफ्त और दिले बेरहम। सारा कुसूर दिल का है। कवि शैलेन्द्र ने स्पष्टतः कहा है- दिल जो भी कहेगा मानेंगे, दुनिया में हमारा दिल ही तो है। समकालीन युग में प्रेम और श्रृंगार के स्टार-कवि के रूप में आत्म-ख्यात कुमार विश्वास ने भी उनके स्वर में स्वर मिलाकर गया है-
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है।
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है।
मैं तुझसे दूर हूं कैसा, तू मुझसे दूर है कैसी-
ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है।
ये पेशे से प्रोफेसर हैं। इनकी इन पंक्तियों ने इन्हें रातों रात स्टार कवि बना दिया। मंचीय कवियों के इतिहास में यह एक क्रांतिकारी के रूप में उभरे जिसने मानदेय के सारे रिकार्ड तोड़ दिये। नीरज तक नीरस हो गए। इसके पीछे कारण मात्र दिल का है। लाखों युवाओं के दिल की बात इन्होंने कह दी। अब हंगामा तो होना ही था जैसा बिहार के प्रोफेसर के समय हुआ। उन्होंने ग़ालिब के प्रसिद्ध ‘प्रमेय’  ‘‘इश्क पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब, कि जलाए न बने और बुझाए ना बने.’’ को प्रायोगिक तौर पर सिद्ध करते हुए अपनी एक सुन्दर शिष्या के साथ बुढ़ापे में प्रेम विवाह कर लिया।
सारे सामाजिक हिन्दुस्तान में हंगामा हो गया। एक प्रोफेसर को यह शोभा नहीं देता। यानी ऐसे मामले शोभा तो देते हैं मगर एक प्रोफेसर को नहीं। प्रोफेसर तो समाज को मार्ग दिखानवाली मोमबत्ती है। किसी ने यह भी कहा है कि शिक्षक वह मोमबत्ती है जो दोनों सिरे से जलती है। उसे जल जलकर मिट जाना चाहिए। बुझकर बचने का उपाय उसके लिए निन्दा का कारण बनता है।
कुमार विश्वास ने हंगामे के बाद भी उनके दर्द पर मरहम बनकर एक और मुक्तक कहा।उनका आशय यह था कि शिक्षक भी इंसान है सिर्फ राजनेता नहीं।
राजनीति में ऐसा है कि कवि जगनिक के अनुसार ‘जेहि कि बेटी सुन्दर देखी तेहि पर जाय धरी तरवार।’
ताजा उदाहरण देख लीजिए। एक राजा राजनीतिक ने सत्तर के आसपास पहुंचे अपने विधुर दिल के कहने पर उम्र के चैथे दशक को छूती हुई जर्नलिस्ट से प्रेम कर लिया। चलता है। उनके दल के ही एक हेण्डसम मंत्री ने जीवित और सुन्दर पत्नी के होते हुए एक सुन्दर पाकिस्तानी जर्नलिस्ट से संबंध बनाकर अपने दिल की सुनी। दिल की सुनना चाहिए यही तो हमारे बुजुर्ग कहते हैं। एक जर्नलिस्ट की पिछले दिनों दिल्ली में हत्या हुई जिसका संबंध एक राजनीतिक से था। भंवरी बाई नामक एक नर्स की लाश तक नहीं मिली क्योंकि वह कुर्सी के लिए खतरा थी।
दिल के मामले में इन दिनों राजनीति सबसे आगे है। जिधर भी दृष्टि उठाइये राजनीति में आपको प्रेम संबंधों की बहार दिखेगी। केन्द्र का वर्तमान भी इन्हीं सुवर्ण पथों से होकर आया है। कहीं कहीं तो यह वंश-परंपरा के रूप में है। राजा महाराजाओं में यही चलता था। अकबर जोधा सीरियल और फिल्म देखिए। प्रेम ने दो देशों की दूरियां कम की हैं। इतिहास गवाह है और वर्तमान उसका अनुसरण कर रहा है। अंग्रेजी कहावत है कि रोम रातोरात नहीं बनता। भारत भी रातों रात नहीं बना। पिछले सड़सठ साल लगे हैं उसे बनने में। प्रेम से बनने में। ब्रिटिश से भारत होने के लिए प्रेम ही काम आया।
राजा ने तो प्रेम के लिए मध्यप्रदेश से केवल उत्तरप्रदेश तक की यात्रा की है। भोपाल से दिल्ली जाने पर बीच में उत्तर प्रदेश पड़ता है। शरीर के मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच में दिल पड़ता है। अब कोई क्या करे?
आचार संहिता चल रही है और संबंधित लोग कह रहे हैं कि यह व्यक्तिगत मामला है इस पर नहीं बोलना चाहिए। ‘जनप्रतिनिधि व्यक्तिगत होता है’ यह अब पता चल रहा है। रायबरेली में तो एक परिवार बोल रहा है कि वे जनता की आवाज हैं, उनका कुछ भी व्यक्तिगत नहीं। राजनीति भी बहुत जटिल चीज है भाई। कौन मगज मारी करे। करने दो जिसका जो दिल कहे। वैसे भी प्रेम की कोई आचार संहिता नहीं होती। कहते भी हैं ‘एवरी थिंग इज फेअर, इन वार एण्ड लव।’
शनि, प्रातः, 3.5.14

Thursday, April 24, 2014

टोपी :



 राजनीति का मुहावरा या मुहावरे की राजनीति?

बनारस में भगवा टोपी पहननेवालों से पत्रकार ने ये पूछकर कि क्या ‘आपके’ सबसे प्रबल शत्रु की टोपी की नकल करते हुए अपनी टोपी पहनी है?’ टोपी को पुनः चर्चित कर दिया है।।
भगवा कार्यकत्र्ताओं ने जो उत्तर दिया वह बड़ा अटपटा था। उन्होंने अपने वर्तमान शत्रु या प्रतिद्वंद्वी का श्रेय खारिज करते हुए अपने दूसरे ‘ऐतिहासिक शत्रुया प्रतिद्वंद्वी की देन उसे बताया। ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में ख्यात गांधी के नाम से ‘एक टोपी’ सत्तर अस्सी के दशक में लोकप्रिय थी, जो  उनके पुरानी विचारधारा वाले प्रायः वयोवृद्ध अनुयायियों ने याद रखा किन्तु नयी लहर के अनुयायियों ने उपेक्षित कर दिया।
आप और बाप के बीच का यह द्वंद्व एक को अस्वीकार करने और दूसरे की लोकप्रियता का लाभ लेने का उपक्रम लगता है। मगर यह भी लगता है कि कार्यकर्ताओं को टोपी के इतिहास का पता नहीं है। उनके प्रायोजित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को भी इतिहास का कहां पता है? बिहार में विश्वविद्यापीठ आदि अनेक विषयों में इतिहासविषयक भूलें की हैं, अज्ञानता जाहिर की है।
उनके समर्थित दलों और संगठनों में टोपियां ‘दिल्ली में लोकप्रिय हुई टोपी’ के पहले से भी पहनी जाती है।
कांग्रेस के पुरखे एम. के. गांधी उर्फ ‘महात्मा गांधी’ या ‘बापू’ के नाम से विख्यात हुई ‘गांधी टोपी’ का इतिहास भी रोमांचक है। भारत में भारतीय स्वाभिामान की लड़ाई लड़नेवाले एम.के.गांधी को अंग्रेजों की जेलों में यह अनुभव हुआ कि भारतीयों के लिए जेल प्रशासन ने एक विशेष प्रकार की टोपी निर्धारित कर रखी हैं। स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा गांधी ने बाद में उसे अपने संगठन की टोपी बना ली। यही बाद में गांधी टोपी कहलायी।
सुभाषचंद्र बोस की टोपी सैनिक टोपी थी। पूर्व जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भी अपनी टोपी रही है। बजरंगियों की अपनी टोपी है। समाजवादी दल की अपनी टोपी रही है।
पिछले वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय योग एवं आयुर्वेदिक दवा उद्योग के संस्थापक ने स्वाभिमान और स्वदेशी विचाारधारा को मार्केटिंग की रणनीति के अंतर्गत जब भ्रष्टाचार और विदेशी धन को जन-आंदोलन के रूप में जिन जागृति का कार्यक्रम आरंभ किया और सांप्रदायिक तथा धार्मिक संस्थानों-राजनैतिक दलो को साथ मिलाया तब अवसर देखकर पुराने गांधीवादी सैनिक अन्ना भी मैदान में उतर आए। उनका अनुमान था कि कांग्रेस उनके हर प्रस्ताव पर अमल करेगी और इस तरह वे तीसरे गांधी के रूप में ख्यात हो जाएंगे।
पर परिस्थियां ऐसी नहीं हैं। गांधी के राजनैतिक मानस पुत्रों से एक गांधी नहीं संभलता वे दूसरे और तीसरे गांधी को कहां संभाल पायेंगे? उनके साथ सत्ता की चोट खाए अनेक आई ए एस, आई पी एस, सेना अधिकारी, एडवोकेट आदि जुड़ गए।
उन्होंने जब राजनैतिक दल बनाने की घोषणा की तो पहले गांधी बापू, दूसरे गांधी जयप्रकाश नारायण की तरह तीसरे गांधी अन्ना ने भी राजनीति के समानांतर चलकर किंग मेकर की भूमिका में आने में ही चतुराई समझी। नये भ्रष्टाचार विरोधी राजनैतिक दल का संबंध और जुड़ाव तीसरे गांधी से है यह बताने के लिए उन्होंने अन्ना की गांधी टोपी को सिर पर पहन लिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि नये दल से धीरे धीरे दूरियां बनाते हुए अन्ना ने एक और प्रयास किया और सत्ता दल की एक इकाई तृणमूल के माध्यम से पुनः लोकप्रिय होने का प्रयास किया। सत्ता तृणमूल को मूल से हटाना चाहती है ताकि वह ऐसा बरगद न बन जाए का वर्तमान वंशवृक्ष उसके नीचे दब जाए। अतः अन्ना सार्वजनिक रूप से घोषणा करने के बावजूद मुलायम सिंह की तरह तृणमूल से कट गए।
यहां यह उल्लेखनीय है कि नये दल से धीरे धीरे दूरियां बनाते हुए अन्ना ने एक और प्रयास किया और सत्ता दल की एक इकाई तृणमूल के माध्यम से पुनः लोकप्रिय होने का प्रयास किया। सत्ता तृणमूल को मूल से हटाना चाहती है ताकि वह ऐसा बरगद न बन जाए का वर्तमान वंशवृक्ष उसके नीचे दब जाए। अतः अन्ना सार्वजनिक रूप से घोषणा करने के बावजूद मुलायम सिंह की तरह तृणमूल से कट गए।
बहरहाल पिछले विधानसभा चुनावों में दिल्ली में नयी टोपी आम आदमी ने एक नया इतिहास रचा। न बनाने, बनाने और बना कर मिट जाने का। संसदीय चुनावों में जो टोपियों की बहार आयी है वह इसी कारण से है इसे सभी जानते हैं और मीडियावाले भी। राजनैतिक दलों को उल्टे सीधे तर्कों से नकारने का कूटनीतिक विशेषाधिकार प्राप्त है। पर क्या फर्क पड़ता है। जाननेवाले तो सब जानते हैं।
टोपी पहनाना, टोपी उतारना, इसकी टोपी उसके सिर रखना (इसकी टोपी उसके सर) आदि मुहावरों को अब अलग से समझााने की जरूरत नहीं है। इसी के समानांतर एक और मुहावरा है जो राजनैतिक दृष्टि से बहुत उपयुक्त है, वह है पगड़ी उछालना। इसके बिना तो राजनैतिक चुनावी अभियान शुरू ही नहीं होता। शेष सारे मुद्दे तो कहने के लिए हैं एक यही लक्ष्य राजनैतिक दल लेक चलते हैं किन किन की पगड़ी उछालेंगे तो अपनी सलामत रहेगी।
क्या जनता यही सब सुनने और देखने के लिए एकत्र होती है? क्या हमारी सामाजिक मूल प्रवृत्ति यही है कि दो विरोधियों की आपसी गुत्थम गुत्थी, गाली गलौज, निंदा और चरित्र हत्या की नयी नयी कहानियां सुनें और तालियां बजाएं? क्या हमारे समाज के भीतर भी यही सब व्यवस्था है और ऐसे ही मुंहफट और छुतहा को सम्मान दिया जाता है जो दूसरों की पगड़ी उछालता फिरता है या टोपी उतारता रहता है?
सच्चाइयों का इतिहास यह है कि पगड़ी या टोपी पहनाना एक धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था हुआ करती थी। यज्ञोपवीत के साथ सम्मान सूचक पगड़ी पहनायी जाती रही है। विवाह में पागा या पगड़ी का विशेष स्थान रहा है। अब दूल्हे बनी बनाई टोपी या टोपीनुमा पगड़ी पहन लेते हैं। वैसे यहां भी मुहावरा पगड़ी पहनाने या टोपी पहनाने का प्रयोग किया जा सकता है। बिगड़ैल अथवा लापरवाह लड़के लड़की के लिए मां बाप रिश्तेदार या समाज के लोग यही राय देते हैं कि शादी करदो तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। मतलब जिम्मेदारी आ जाएगी। और लड़के या लड़की को टोपी पहना दी जाती है। इस तरह के विवाह जो  अक्ल ठिकाने लगाने के लिए किये जाते हैं उनमें पागा नहीं पहनाया जाता या हाथ पीले नहीं होते बल्कि टोपी पहनायी जाती है। होता वही है कि हाथ पीले होते हैं पागा या टोपी पहनायी जाती है पर आशय इसी मुहावरे के आसपास घूमता है।
पगड़ी, गमछा और टोपी कुटुम्ब के व्यक्ति के मरने पर भी जीवितों के सर पर रखी- पहनायी जाती है कि अब सब आप लोगों की जिम्मेदारी है। या यह कि हमारी सहानुभूति आपके साथ है।
धार्मिक आध्यात्मिक क्षेत्र में पगड़ी या टोपी का अलग महत्व है। सबसे पहले तो धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के लिए अधिकांश समुदायों में टोपी अदब और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में पहनी जाती है। यहां टोपी पहनी जाती है। न पहनायी जाती है, न उतारी या उछाली जाती है।
राजा महाराजों में टोपी यानी मुकुट पहनाकर सत्ता का हस्तांतरण नये उत्तराधिकारी को किया जाता था। अब कुर्सी हस्तांतरित होती है। टोपी अब सीट के नीचे आ गई है।
बस अब मन भर गया। थोड़ा कहा बहुत समझियेगा।
पुनश्च - जाते जाते एक आखिरी बात। अब तो प्रत्यक्षतः टोपी और पगड़ी रही नहीं। उसके भाव के रूप में इज्जत रह गई है। मगर सावधान वह अपने ही हाथ में है। दूसरे के हाथ में उसे न जाने दें। यानी आपको कोई टोपी न पहना सके। कोई आपकी पगड़ी न उछाल सके। मनोजकुमार गोस्वामी उर्फ मि. भारत की फिल्म शहीद का यह गीत जो प्राण पर फिल्माया गया था, गुनगुनाइए-
‘पगड़ी सम्हाल जट्टा.. पगड़ी सम्हाल ओए....’’ दि. 25.04014

Sunday, April 20, 2014

किन्नर






बात कोई साल भर पहले की है।
मैं शाम की गाड़ी से नैनपुर से बालाघाट लौट रहा हूं। जंगल की रमणीय वादियों का लुत्फ़ लेता हुआ मैं इस कदर खुश हूं जैसे हवाएं अपनी नरम और ठण्डी हथेलियों से मेरा दुलार कर रहीं हों।
नगरवाड़ा से नैरोगेज पैसेन्जर आगे बढ़ी। मैंने देखा कि डिब्बे में एक किन्नर चढ़ गया है। उसकी उम्र कोई बीस पच्चीस की होगी। पुता हुआ चेहरा, लिपस्टिक और मुड़े निचुड़े से सलवार कुर्तें में उसने अपने को आकर्षक बनाने का भरपूर प्रयास किया है। स्लिम होने से इस प्रयास में वह काफ़ी हद तक सफल भी है।
उसने अपने बाल संवारे और अपने बाएं हाथ की उंगलियों में दस दस कि नोट फंसाकर प्रति व्यक्ति दस के हिसाब से वसूली करने लगा। यहां मुझे गरम हवा का पहला झौंका लगा।
अक्सर किन्नर किसी त्यौहार के बाद साल में एक दो बार घर घर उगाही, जिसे सांस्कृतिक तौर पर बिरत कहते हैं, में निकलते हैं। किन्तु पिछले अनेक सालों से ब्राडगेज में पैसों की वसूली का यह जबरिया खेल शुरू हो गया था। हफ्ता वसूली पहले ठेकेदारों के नाम पर हुआ। फिर ठेकेदारों के स्थान पर उनके नुमाइंदे ये काम करने लगे। बाद में उनकी तर्ज पर गुण्डों ने धौंस के दम पर यह काम किया और जैसा कि सुनते हैं और फिल्मों में देखते हैं कि सुरक्षा के नाम पर पुलिसवालों ने हफ्ता वसूलना शुरू किया।
बड़े शहरों से यह बीमारी छोटे कस्बों में फैली और सारा देश इसकी गिरफ्त में आ गया।
किन्नरों का जीवन भी समाज के इसी देय पर चलत रहा है। इस देश में कमजोरों, निर्धनों, दरिद्रों, भिक्षुकों, असहाय, अपाहिजों, वक्त के मारों और प्रकृति के मारों का समाज ऐसे ही मदद कर पुण्य कमाते रहा है।
किन्नर वह स्त्री अथवा पुरुष जिस पर प्रकृति ने पूरा योगदान नहीं किया है। अंधे, लंगड़े, लूले, कोढ़ी, अविकसित हाथ पैरों आदि के साथ साथ अद्धविकसित या अविकसित मनमस्तिष्क वाले लोगों की भांति किन्नर भी विकलांग कोटि के ‘व्यक्ति’ हैं।
कहते हैं प्रकृति किसी को अधूरा या अनाथ नहीं छोड़ती। जिन्हें विकलांग बनाती हैं, उन्हें कोई ना कोई हुनर वह अवश्य दे देती है। ऐसे अनेक उदाहरण समाज में देखने मिल जाते हैं।
किन्नरों ने नाच गाकर समाज की सहानुभूति और दानवृत्ति के माध्यम से अपनी रोजी रोटी चलानी शुरू कर दी। पहले पहले समाज के साथ इनका रवैया बड़ा उत्सववादी रहा। जब जब किसी के घर खुशी का माहौल बनता ये बधाइयां देते और उपहार पाते। शादी विवाह, जन्म के प्रसंग, दीपावली होली आदि के प्रसंगों में लोग हंसी खुशी इन्हें पैसे कपड़े इत्यादि देकर अपनी संभ्राति का परिचय देते।
परन्तु परम्परा और मानवीयता को अक्सर लोभ और मुनाफ़े के लिए कुछ नकारात्मक और नकारा लोगों ने अपना अधिकार समझ लिया तथा जबरिया वसूली को अपना धंधा बना लिया। बाहुबलियों और नकारा लोगों ने मानव-दयालुता को कमाई का जरिया बना लिया और उन्होंने इन ‘विशेष व्यक्तियों (special person ) के माध्यम से अपना नेटवर्क चलाना आरंभ कर दिया। समाज की दया-वर्ग के सरदार हो गए और अपने अपने क्षेत्र हो गए।
पिछले बीस तीस सालों में किन्नरों का संगठन लगातार गतिशील हुआ है। समाज के कतिपय भाव भीरू और धर्मभीरू लोगों ने किन्नरों के बारे में यह धारणा बना रखी है कि यदि इनका दिल दुखाया तो ये श्राप दे देंगे, जो खाली नहीं जाएगा।
इसी भयादोहन के कारण ये हावी हैं। मैं देख रहा था कि बिना ना नुकुर के हर पुरुष चुपचाप दस दस के नोट उस किन्नर को दे रहा था। वह किन्नर स्त्रियों से वसूली नहीं कर रहा था। वह हर युवा पुरुष से हंसी मजाक कर रहा था और रुपये लेकर हाथों में सजा रहा था।
मैंने अपने बगल बैठे लोगों से पूछा:-‘‘आज क्या है? यह किस बात के पैसे ले रहा है?’’
‘‘रोज का काम है साब! हम तो रोज ही देखते हैं।’
‘‘ये अकेला है या टीम है इनकी।’’
‘‘अकेला है। बालाघाट का है। नैनपुर कमाने जाता है। लौटते में उगाही। आना जाना फ्री। ’
‘‘कोई कुछ कहता नहीं?’’
‘‘कौन इनके मुंह लगे? बड़ी ग्रदी गंदी बातें कहते हैं साब! कौन सुने और मन खराब करे।’’
मैंने अनुमान लगाया कि आठ दस डब्बे तो ट्रेन में होते ही है। हर डिब्बे में तीस चालीस पुरुष होते ही होगे। चलिये पच्चीस मान लेते हैं। यानी ढाई सौ रुपये प्रति डिब्बे के हिसाब से दस डिब्बे के ढाई हजार रुपये। यह केवल नैनपुर से बालाघाट के बीच की कमाई है, एक तरफ की, एक ट्रिप की।  यह काम बिना रेलवे कर्मचारियों और आर पीएफ की मिली भगत के संभव नहीं है।
मैंने तय कर लिया कि मैं इसकी तह तक जाउंगा। मेरे साथ उसकी हुज्जत हुई। उसने मेरे साथ बदतमीजी की और अश्लील बातें कही। पर मैं डटा रहा। मैंने उससे कुछ तार्किक बातें जिसका उसने गालियां देकर गला घोंटना चाहा। मगर मेरी बातें कुछ लोगों की समझ में आई और उन्होंने मेरा साथ दिया। इससे उसका साहस कम हुआ।
वह चला तो गया मगर दूर खड़ा बड़बड़ाता रहा। गालियां भी देता रहा। किसी ने उससे बहस नहीं की ना उसे रोका। मुझे लगा अगले स्टेशन में वह अपनी टीम के लोगों को लाएगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैंने दूसरे दिन एक पत्रकार को ये बाते बताईं और उसे हिसाब समझाया। मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि इसका कुछ परिणाम निकलेगा मगर दूसरी बार जब मैं फिर सफर में गया तो वह किन्नर नजर नहीं आया। मैंने लोगों से पूछा कि आजकल वह किन्नर नहीं आता क्या? पता चला कि कुछ दिनों से वह दिखाई नहीं दे रहा हैं।
यह मेरे लिए सुखद था। हर यात्री जो नैनपुर से बालाघाट के पन्द्रह रुपये किराया देता है, उसकी यात्रा पच्चीस रुपये प्रति ट्रिप हो गई थी। उसने राहत की सांस ली होगी। मैंने गालियां खाई, मेरे साथ बदसलूकी हुई उसका जो दुख हुआ वह आज राहत बनकर लौट आया था।

आज ही समाचार-पत्र में एक समाचार पढ़ा -‘‘किन्नर परेशान करें तो डायल करें 18002330473’’ यह समाचार अहमदाबाद का है। यह टोलफ्री नम्बर आरपीएफ की ओर से है। आर पी एफ की सीनियर डीएसपी सुमति शांडिल्य ने कहा कि ट्रेन में मुसाफिरों को किन्नरों द्वारा परेशान किए जाने की शिकायत रोजाना मिलती है। विशेषकर अहमदाबाद, मेहसाणा और मुम्बई रूट पर। यात्रियों से जबरदस्ती पैसों की मांग करना और अश्लील हरकतें कई बार विवाद को बढ़ा देती हैं किन्तु जब तक आरपीएफ पहुंचता है वे भाग जाते हैं। इसलिए यह टोल फ्री नम्बर पर समय रहते सूचना मिलती है तो समय रहते किन्नरों को पकड़ा जा सकता है।
यह समाचार सुखद है। उम्मीद है आरपीएफ और रेलवे कर्मचारी अपने यात्रियों के हित में मुस्तैदी से इस योजना को क्रियान्वित करेगे और किन्नरों से भी आशा की जा सकती है कि जिस समाज ने भावनात्मकता के कारण उसकी मदद का बीड़ा उठा रखा है उसके साथ वे बदसलूक़ी नहीं करेंगे।


दिनांक: 20.04.14, रविवार

Tuesday, April 15, 2014

मोरारी बापू का अहिंसा आन्दोलन


मोरारी बापू राम कथा के सबसे अधिक सुने और चाहे जानेवाले कथा-गायक हैं। निम्बार्क पंथ से उनका संबंध है और काले टीके के साथ काली कंबली उनकी पहचान है। पर यह काला टीका और काली कंबली उनकी शुभ्रता को कम नहीं करती बल्कि अधिक उजागर कर देती है। उनके परिधान में जो शुभ्रता है, वह उन्हें धार्मिक उन्माद से परे एक सौहार्द्र पूर्ण भक्ति आंदोलन का साधक और प्रवर्तक बना देती है।
बापू राम के समन्वयवादी स्वरूप के गायक हैं। यही वह बीज है जिसे महात्मा गांधी ने धर्म की मिट्टी में बोया और उससे अहिंसा की फसल ली। बापू इसी परम्परा को सर्वत्र बिखेरते चलते हैं। यद्यपि उन्होंने रामकथा का गुरुमंत्र अपने दादा से प्राप्त किया किन्तु रामकथा गायन में रामभक्त हनुमान उनके मार्गदर्शक परम गुरु और संरक्षक हैं। हनुमान जयंती के अवसर पर प्रत्येक वर्ष वे अस्मिता पर्व का आयोजन करते हैं और साहित्य, संगीत, नृत्य, गायन, अभिनय आदि विविध कला क्षेत्रों के शीर्ष व्यक्तित्वों को आमंत्रित कर उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन करते है और उनका सम्मान करते हैं। इस आयोजन में मोरारी बापू केवल उत्सवधर्मिता नहीं दिखाते बल्कि उनकी वैचारिकता और चिन्तन के दर्शन भी सहज ही हो जाते हैं। वे निस्संदेह केवल प्रवचनकत्र्ता का धर्म नहीं निभाते बल्कि स्वयं अपनी कथ्य या विचारधारा पर नया क्रांतिकारी कदम उठाकर दिखाते हैं।
इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। चारों तरफ़ जब अपनी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मार काट उठापटक और हिंसात्मक गतिविधियां, धार्मिक अपराधीकरण का उन्माद अपने चरम पर है वहीं मोरारी बापू अपने आराध्यों के हाथों से हिन्सा के सारे अस्त्र छीनकर उनमें लालित्य और प्रेम के उपकरण थमा रहे हैं। हनुमान जयंति के आयोजन की समाप्ति पर अपना प्रबोधन देते हुए मोरारी बापू ने एक उद्घोषणा की कि वे सर्वसमर्थ हनुमान को उनके जन्मदिन पर कुछ भेंट करना चाहते हैं। उनसे कुछ लेना भी चाहते हैं। भरत ने अपने भ्राता और आराध्य से उनकी चरण पादुकाएं ली थीं। मोरारी बापू ने हनुमान से उनका प्रिय शस्त्र मुदगर, उनकी गदा लेली। कुछ चैंकानेवाले अंदाज में। जहां तूम्बा होता है वहां मुदगर या गदा के प्रहारक गोलक था और जो मुख्य दण्ड होता है वह सितार थी। यह निश्चित रूप उनकी अहिंसा दृष्टि का रोमांचक पहलू था जिसे सभी उपस्थित समुदाय ने उमंग के साथ स्वीकार किया।
बापू ने कहा कि जो गदा हनुमान जी के दायें पक्ष में रखी हुई वह अत्यधिक भारी है और उसे हटाने में समय और श्रम लगेगा अतः अभी प्रतीकात्मक गदा को हटाया गया है किन्तु अगले दिन हनुमान जी सितार के साथ दिखेंगे गदा के साथ नहीं। यह मोरारी बापू के व्यक्तित्व का आंतरिक पक्ष था जिसमें उनके जीवन के तीन सूत्र सत्य, प्रेम और करुणा के की झलक आज दिखाई दी।
निश्चित रूप से बापू अपनी कथाओं और अपने आयोजनों में इस देश की धर्मप्राण किन्तु सहिष्णु स्नेहिल जनता को एक उदात्त और उदार दृष्टि दे रहे हैं। केवल पुरातन का पृष्ठपोषण ही नहीं कर रहे बल्कि जिस सहअस्तित्वपूर्ण सौहार्द्र के वातारण का सपना वे कर रहे, उसे साकार भी करते चल रहे हैं।
उन्हीं के माध्यम से पता चला कि पिछली कथाओं में उन्होंने अपने आराध्य राम के हाथों से तीर और धनुष तथा कंधे से धनुष उतार दिया था। प्रेम देवो भव का नारा देने वाला अहिंसा का गायक अपने इष्ट के पास अस्त्र और शस्त्र कैसे देख सकता है। भारत की संस्कृति और परम्परा ने तो महाभारत के सूत्रधार श्रीकृष्ण के हाथों से चक्र और अस्त्र शस्त्र पहले ही हटा दिये थे और प्रेम की धुन बजानेवाली बांसुरी वहां थमा दी थी।
बापू ने इस रोमांचक और क्रांतिकारी अवसर पर एक और सपने की घोषणा की कि  रणभूमि में अर्जुन की ध्वजा में बैठे हनुमान जी को उतारकर धरा पर लाना है। रामकथा के सतत श्रोता और संरक्षक का युद्ध की पताका में बैठने का क्या औचित्य? बापू की इस अहिंसा दृष्टि का भी अभिनंदन।

दि. 15.04.14, हनुमान जयंती, मंगलवार

Monday, April 14, 2014


3.पूर्वकथा 2.
मृत्युंजय का अर्थ शाब्दिक दृष्टि से मृ्त्यु पर जय प्राप्त करना हो सकता है।
केवल महादेव या शिव ने इस असंभव को संभव कर दिखाया था ऐसी आस्थामूलक कहानी हम सुनते आ रहे हैं। वह श्मशान में रहते हैं। ऐसी जगह रहने के कारण उस बस्ती के बाकी नागरिक भूत, पिशाच, प्रेत, जिन्न वगैरह उनके मित्र, सखा, संबंधी आदि हो गए होंगे। इसमें आश्चर्य कैसा?
भाई युक्तेश राठौर तो स्वर्गवासी हुए, किन्तु उनके सौजन्य से हम ऐसी ही जगह पहुंच गए हैं। परन्तु कोई हमें मृत्युंजय नहीं कहेगा। हम यहां कोई बसने थोड़े ही आए हैैं। युक्तेश भाई की शेष देह को फूंकने आए हैं। शंकर महाकाल के लिए राख उपलब्ध कराने। 
इसे ही कहते है- मृत्युंजय साधना, जो हमने तीन चरणों में पार करनी है। दो हो गए, यह तीसरी और अंतिम है।
इसके बाद होगी आनंद-साधना। वहां न दुख है न क्लेश। न भय है घबराहट। बस अखंड मौज है। पर इस तीसरे के बाद। तीसरे चरण के बाद....पहले चरण में भाई जी मरे, शवयात्रा की तैयारी हुई, दूसरे में उनकी अरथी निकली यानी शवयात्रा और उसके संभावित फायदे।
तीसरा यह दाहकर्म, यह अग्निसंस्कार, अब जहां वे राख हो जाएंगे...
लीजिए, प्रस्तुत है ‘शवगाथा’ का यह अंतिम पुष्प.... 3. मृत्युंजय घाट।

3 मृत्युंजय घाट

इस तरह शालीनता से चलते हुए हम मृत्युंजय घाट के रमणीय पर्यावरण से घिरे परिसर में प्रविष्ट हुए। बैनगंगा के किनारे बने बागीचे में महाकाल म्त्युंजय की भव्य चित्ताकर्षक प्रतिमा और शिवलिंग तथा बैठे हुए नंदी (बैल) सहित विराजमान है। तरह तरह के फूल खिले हुए हंै। माली पाइप से पानी सींच रहा है। काफी बड़े क्षेत्र में फैले इस घाट को दूर से देखकर सागौन-उद्यान का आभास होता है। कतार में ऊगे हुए सागौन के पेड़ सुस्मिता सेन, युक्तामुखी, दीपिका पादुकोण, मौली दवे आदि लंबी उर्वसियों की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं। अप्रेल महीने ने उन पेड़ों से पत्ते इस तरह छीन लिए है, जैसे मार्च के बजट रूपी दुश्शासन ने आम लोगों की तरह निरीह द्रौपदी के तन से कपड़े। हालांकि विश्वसुंदरियां के लिए अप्रेल या बजट का बहाना कोई अर्थ नहीं रखता क्योंकि विश्वसुन्दरी बनने के रास्ते में, सुना है, एक राउंड कपड़े उतारने का भी होता है। यह और बात है कि जीतने के लिए उतारे गए ये कपड़े बाद में पैसों के लिए उतरते रहते हैं।
मैं विश्वसुंदरियों से ध्यान से हटाता हूं तो ध्यान आता है कि कपड़े तो मरे हुए व्यक्ति के भी उतर जाते हैं। गीता में कहा गया है-वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देही। 22.2.35
( हिन्दी रू वस्त्र पुराने बदलकर, नये पहनते लोग।
  काया जर्जर छोड़कर, अन्य ग्रहण सुनियोग।)
कबीर ने भी कहा - जो पहिरा सौ फाटिसी, नाव धरया सो जाई।
    कबिरा सोई तत्त गहि, जो गुर दिया बताई।।
पहरे हुए कपड़े पुराने होते और फटते ही है। फट जाने पर बदल लेने की परम्परा भी पुरानी है।
केंचुली या कांचुलिया की तरह भी कबीर ने आवरण उतारने की बात कही और समझाई है। कहते हैं कबीर
कबीर काहां गरबियौ, देही देखि सुरंग।
बीछड़िया मिलिबौ नहीं, ज्यूं कांचली भुवंग।
राठौर भाई उतारी हुई कांचली की तरह पड़े हैं। कांचली उतारनेवाला चला गया है। मैं पड़े हुए शव को देखता हूं जो अपे्रल में भी श्वेतवस्त्र धारण किए हुए है। इस श्वेतवस्त्र को हिन्दी में शवस्त्राण और उर्दू में कफन कहते हैं।
श्वेतवस्त्रावृत्त शव को कंक्रीट के बने तीन दाह-मंडपों में से एक के नीचे छाया में रख दिया गया है। शवयात्री भी तीनों मंडपों में, जहां छाया मिली वहां जाकर खड़े हुए हैं। घाट से लगी हुई बस्ती में रेखा का कोई भक्त जोर जोर से ‘उमराव जान’ का यह भजन बजा रहा है-
इस अंजुमन में आपको आना है बार बार।
दीवारोदर को गौर से पहचान लीजिए।
दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए।
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए।
‘जान’ ले लेने वाला यह भजन इस माहौल को गरिमा और अर्थ प्रदान कर रहा है। मैं देख रहा हूं - कुछ लोग गोबर के उपले (कंडों) से ‘चिता’ बनाने लगे हैं। उपले या कंडों की संख्या ढाई तीन हजार से ऊपर होगी। कांक्रीट के तीन मंडपों में से प्रत्येक में तीन-तीन दाह-स्थल हैं। पहले मंडप के पहले दाहस्थल पर हमारा शव रखा हुआ है। हमारा शव से मतलब हम जिस शव को हम लेकर आए हैं, वह रखा हुआ है। इस शव के पास लकड़ी का ढेर नहीं है। केवल उपले ही उपले हैं। लकड़ी का ढेर किसी दूसरे मंडप के नीचे लगा है। कोई दूसरा शव भी आनेवाला होगा। एक मंडप के नीचे उपलो की राख, उठावने की प्रतीक्षा में है।
मैं लकड़ियों के ढेर को देखता हूं। वे सब टाल से खरीदी हुई जलाऊ लकड़ियां हैं। उनमें चंदन की एक भी लकड़ी नहीं है। मुझे लगता है इन लकड़ियों को देखकर सागौन के पेड़ कुलीनता के गर्व से भर रहे होंगे। सागौन की लकड़ियां इमारती कहलाती हैं और भारत सरकार ने उनका राष्ट्रीयकरण किया हुआ है।  कोई भी उन्हें न तो काट सकता है न जला सकता है। जलाए जानेवाली जगह में सागौन का प्लान्टेशन किस प्लान से किया गया है? क्या यह बताने के लिए कि बनना है तो सागौन के पेड़ बनो ताकि कोई तुम्हें न काट सके, न जला सके। वाह! मृत्युंजय घाट की यह अमृत-कल्पना मुझे प्रभावित करती है। मैं सोचता हूं अगर आदमी भी सागौन का पेड़ होता तो मृत्यु उसे काट नहीं सकती। कोई उसे फिर कैसे जलाता? नैनं दहति पावकः का नियम फिर आत्मा के साथ साथ शरीर को भी लागू होता।
पर जीवन ध्रुव सत्य है तो मृत्यु भी ध्रुुव सत्य है। ऐसा सोचकर, मरे हुए की चिता-निर्माण के अंतराल को पाटने के लिए मैं भी एक मंडप के नीचे छाया टटोलकर बैठ गया। और भी लोग बैठे थे। सब शहर के नामी गिरामी लोग थे। वे सब जिन्दा थे और शहर के मरे हुए नामी गिरामी लोगों की म्त्यु-प्रसिद्धियों की चर्चा कर रहे थे। किस किस कांड में कौन कौन था और किस किस प्रकार गया, इसका इतिहास-पाठ कर रहे थे। मेरे लिए यह सब रोचक था क्योंकि मैं कह चुका हूं कि शहर में मैं नया हूं।
सभी प्रकार की म्त्यु और सभी प्रकार से मरनेवालो की कथा का समापन संभव नहीं जान पड़ रहा था। हरि कथा की भांति म्त्यु कथा भी अनंत होती जा रही थी कि चिता धू धू कर जलने लगी। हम लोग उठकर चिता के कुछ दूर खड़े हो गए। सबने कंडे के छोटे छोटे टुकड़े उठा लिये थे। जलती हुई चिता पर समय आनेपर फेंकेंगे। जहां लकड़ी सेें जलाने की प्रथा है वहां लकड़ी के तिनके उठाकर हथेली में रख लेते हैं।इन तिनकों को ‘पंचलकड़ी’ कहते हैं। पंचों ने मिलकर जलाया का सामाजिक भाव इस प्रथा में जुड़ा हुआ है। हमारे हाथों में कंडे के टुकड़े ‘पंचकंड’े के रूप में थे। हाथ में कंडे लेने ही से तो कहीं ‘हथकंडे’ शब्द नहीं बना? मेरे भाषाविद् को मरघट में भी भाषा की व्युत्पत्ति सूझी। मैंने झट उधर से ध्यान हटाया और जलती हुई चिता पर लगा दिया। कबीर ने ऐसी ही किसी चिता को जलते देखकर लिखा था-
हाड़ जले जस लाकड़ी, केस जले जस घास।
  सब जग जलता देखकर हुआ कबीर उदास।।
कबीर संवेदनशील थे। कभी हंसते थे, कभी रोते थे, कभी उदास होते थे। वे मरघट में जलते हुए मुर्दे को देखकर भी कविता लिखते थे। इसलिए कहते हैं कि अद्भुत थे कबीर।
अंत्येष्टि की क्रिया का अंतिम दृश्य उपस्थित हो गया है। जिस बांस से अर्थी बनी थी उसके एक बांस को ऐंचवेंचकर खींचकर निकाल लिया गया है। उसके एक सिरे को फाड़ लिया गया और उसमें एक लोटा फंसाकर बांध दिया। उसमें शुद्ध घी यानी देसी घी भर दिया गया। देशी घी इस समय चार सौ रुपये किलो चल रहा है। एक किलो घी लोटे में आ गया होगा। जो अपने होते है, वे मरने वाले के पीछे पैसों की गिनती नहीं करते। मैं शवयात्री हूं और बाहरी हूं, इसलिए घी का रेट मुझे याद आ सकता है।
घी ठीक जलते हुए मुर्दे के सिर के ऊपर उड़ेल दिया गया। यह कपाल क्रिया है। इसके साथ ही अंत्येष्टि क्रिया के समस्त कर्म पूरे हो गए। अब शवयात्री जाकर बैन गंगा में  नहा सकते हैं। इसे गंगास्नान कहते हैं। यानी अभी तक का जो दायित्व था, वह हमने पूरा किया और गंगा नहा लिया। किसी शवयात्री ने ही दायित्व-मुक्ति के लिए ‘गंगा नहा लेना’ मुहावरा बनाया होगा।
मैंने बैनगंगा की तरफ देखा। नंगे और लंबे सागौन के पेड़ों के पीछे बैनगंगा बहुत ही दुबली और छरहरी दिखाई दे रही थी। जगह जगह चट्टानें चेहरे की हड्डियों की तरह उभर आयीं थीं। दूर तक रेत पिचके हुए पेट से चिपकी हुई पीली खाल की तरह लग रही थी। उनमें से भी चट्टानों के सिरे उभरकर निकली हुई पसलियों की तरह दिख रहे थे। धार धार बहता हुआ पानी मुझे रोती हुई बैनगंगा के आंसुओं के रेलों की तरह लगा। किन्तु एक रसिक की तरह करुणा की मूर्ति गौरांग बैनगंगा मुझे अच्ठी लगी। जैसे कालिदास के मुंह से व्याघ्र वाण से बिंधे क्रौंच पक्षी को देखकर कविता निकली थी, वही हालत मेरी हुई। यह मुक्तक सहसा मेरे मन में बह निकला-
      चलाचल, चल चल सदा कहती हुई अच्छी लगी।
छरहरी सी इक नदी बहती हुई अच्छी लगी।
सारे पत्ते झर गए पीपल समूचा ठूँठ था,
छाँह चुटकी भर सही, रहती हुई अच्छी लगी। (26.04.12)

उधर एक आदमी सभी शवयात्रियों को एकत्रकर शोक व्याख्यान देने लग गया था। वह लच्छेदार शैली में राठौर भाई के चले जाने से स्तब्ध था। यह आदमी सोलह साल के लड़के के मरने पर भी स्तब्ध हो जाता है और सौ साल के उम्रदराज के मरने पर भी। उसे हमेशा लगता है कि हम सोच भी नहीं सकते थे कि फलां हमें इस तरह छोड़कर चले जाएंगे। पता नहीं वह किस तरह से छोड़कर चले जाने की प्रतीक्षा में रहता है। शोक व्याख्यान उसका पेशा है। व्याख्यान में वह कविताएं भी सुना रहा है जो इतनी तोड़ मरोड़ दी गई कि दौड़ दौड़कर चिता में कूद कूद कर कह रही हैं- ‘लौट आओ राठौर भाई, वर्ना यह आदमी हमारी जाने और क्या दुर्गत करे।’
वक्ता जब जी भर कर बोल लिया तो कुछ भूतपूर्व विधायक, नगरपालिका अध्यक्ष, पार्षद, प्रसिद्ध व्याापारी आदि भी बोले। बाकी सब घर जाने को उतावले थे। धूप अलग चढ़ रही थी। सब धीरे धीेरे ‘बस करो बस करो’ कह रहे थे। पर होनी को कौन रोक सकता है। वह अपनी करके ही रुकती है।
आखिर एक मिनट का मौन रखकर जेल से छूटे कैदियों की तरह सब घर की तरफ भागे। इस भगदड़ में किसी को गंगा नहाने का होश ही नहीं रहा। या सोचा होगा हमेशा नहाते हैं, आज नहीं ही सही।
मैंने देखा कि इस सब से बेखबर धूप सर पर चढ़ चुकी थी। हम अनियंत्रित गति से घर लौटने लगे। बड़ी जल्दी भूल गए कि अभी श्मशान से लौट ही रहे हैं और गली-गली से होकर गुजर रहे हैं। जरा संभलकर चलें। इति....(केवल इस आलेख की।)


अगले आकर्षण हैं-
1. बाल की खाल
2. सूर्य का गणितीय वाणिज्यिक अनुष्ठान। (डायरी से)
3. तुम मुझे यू भुला न पाओगे। (डायरी से)
4. भगवान होने की सुविधा और असुविधा, आदमी की दुविधा (डायरी से)