Tuesday, April 15, 2014

मोरारी बापू का अहिंसा आन्दोलन


मोरारी बापू राम कथा के सबसे अधिक सुने और चाहे जानेवाले कथा-गायक हैं। निम्बार्क पंथ से उनका संबंध है और काले टीके के साथ काली कंबली उनकी पहचान है। पर यह काला टीका और काली कंबली उनकी शुभ्रता को कम नहीं करती बल्कि अधिक उजागर कर देती है। उनके परिधान में जो शुभ्रता है, वह उन्हें धार्मिक उन्माद से परे एक सौहार्द्र पूर्ण भक्ति आंदोलन का साधक और प्रवर्तक बना देती है।
बापू राम के समन्वयवादी स्वरूप के गायक हैं। यही वह बीज है जिसे महात्मा गांधी ने धर्म की मिट्टी में बोया और उससे अहिंसा की फसल ली। बापू इसी परम्परा को सर्वत्र बिखेरते चलते हैं। यद्यपि उन्होंने रामकथा का गुरुमंत्र अपने दादा से प्राप्त किया किन्तु रामकथा गायन में रामभक्त हनुमान उनके मार्गदर्शक परम गुरु और संरक्षक हैं। हनुमान जयंती के अवसर पर प्रत्येक वर्ष वे अस्मिता पर्व का आयोजन करते हैं और साहित्य, संगीत, नृत्य, गायन, अभिनय आदि विविध कला क्षेत्रों के शीर्ष व्यक्तित्वों को आमंत्रित कर उनकी प्रतिभा का प्रदर्शन करते है और उनका सम्मान करते हैं। इस आयोजन में मोरारी बापू केवल उत्सवधर्मिता नहीं दिखाते बल्कि उनकी वैचारिकता और चिन्तन के दर्शन भी सहज ही हो जाते हैं। वे निस्संदेह केवल प्रवचनकत्र्ता का धर्म नहीं निभाते बल्कि स्वयं अपनी कथ्य या विचारधारा पर नया क्रांतिकारी कदम उठाकर दिखाते हैं।
इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया। चारों तरफ़ जब अपनी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मार काट उठापटक और हिंसात्मक गतिविधियां, धार्मिक अपराधीकरण का उन्माद अपने चरम पर है वहीं मोरारी बापू अपने आराध्यों के हाथों से हिन्सा के सारे अस्त्र छीनकर उनमें लालित्य और प्रेम के उपकरण थमा रहे हैं। हनुमान जयंति के आयोजन की समाप्ति पर अपना प्रबोधन देते हुए मोरारी बापू ने एक उद्घोषणा की कि वे सर्वसमर्थ हनुमान को उनके जन्मदिन पर कुछ भेंट करना चाहते हैं। उनसे कुछ लेना भी चाहते हैं। भरत ने अपने भ्राता और आराध्य से उनकी चरण पादुकाएं ली थीं। मोरारी बापू ने हनुमान से उनका प्रिय शस्त्र मुदगर, उनकी गदा लेली। कुछ चैंकानेवाले अंदाज में। जहां तूम्बा होता है वहां मुदगर या गदा के प्रहारक गोलक था और जो मुख्य दण्ड होता है वह सितार थी। यह निश्चित रूप उनकी अहिंसा दृष्टि का रोमांचक पहलू था जिसे सभी उपस्थित समुदाय ने उमंग के साथ स्वीकार किया।
बापू ने कहा कि जो गदा हनुमान जी के दायें पक्ष में रखी हुई वह अत्यधिक भारी है और उसे हटाने में समय और श्रम लगेगा अतः अभी प्रतीकात्मक गदा को हटाया गया है किन्तु अगले दिन हनुमान जी सितार के साथ दिखेंगे गदा के साथ नहीं। यह मोरारी बापू के व्यक्तित्व का आंतरिक पक्ष था जिसमें उनके जीवन के तीन सूत्र सत्य, प्रेम और करुणा के की झलक आज दिखाई दी।
निश्चित रूप से बापू अपनी कथाओं और अपने आयोजनों में इस देश की धर्मप्राण किन्तु सहिष्णु स्नेहिल जनता को एक उदात्त और उदार दृष्टि दे रहे हैं। केवल पुरातन का पृष्ठपोषण ही नहीं कर रहे बल्कि जिस सहअस्तित्वपूर्ण सौहार्द्र के वातारण का सपना वे कर रहे, उसे साकार भी करते चल रहे हैं।
उन्हीं के माध्यम से पता चला कि पिछली कथाओं में उन्होंने अपने आराध्य राम के हाथों से तीर और धनुष तथा कंधे से धनुष उतार दिया था। प्रेम देवो भव का नारा देने वाला अहिंसा का गायक अपने इष्ट के पास अस्त्र और शस्त्र कैसे देख सकता है। भारत की संस्कृति और परम्परा ने तो महाभारत के सूत्रधार श्रीकृष्ण के हाथों से चक्र और अस्त्र शस्त्र पहले ही हटा दिये थे और प्रेम की धुन बजानेवाली बांसुरी वहां थमा दी थी।
बापू ने इस रोमांचक और क्रांतिकारी अवसर पर एक और सपने की घोषणा की कि  रणभूमि में अर्जुन की ध्वजा में बैठे हनुमान जी को उतारकर धरा पर लाना है। रामकथा के सतत श्रोता और संरक्षक का युद्ध की पताका में बैठने का क्या औचित्य? बापू की इस अहिंसा दृष्टि का भी अभिनंदन।

दि. 15.04.14, हनुमान जयंती, मंगलवार

1 comment:

Dr.R.Ramkumar said...

जहां एक ओर धर्म के नाम पर, मजहब के नाम पर हथियार बंद सांप्रदायिक सेना तैयार की जा रही है, आक्रामक दस्ते तैयार किये जा रहे हैं, देश की राजनीति और सेनाएं सक्रिय हैं, जातिवादी समाज संगठित हो रहे हैं वहां भारत के आराध्य राम के तीर तरकस और धनुष हटा देना, हनुमान के पास से गदा उठाकर सितार रख देना मोरारी बापू की सारे जीवन की कमाई है। एक युगांतर है। वास्तव राम कथा से जितना वे नहीं कह पाए उससे ज्यादा उन्होंने कर दिखाया।