Monday, April 14, 2014


3.पूर्वकथा 2.
मृत्युंजय का अर्थ शाब्दिक दृष्टि से मृ्त्यु पर जय प्राप्त करना हो सकता है।
केवल महादेव या शिव ने इस असंभव को संभव कर दिखाया था ऐसी आस्थामूलक कहानी हम सुनते आ रहे हैं। वह श्मशान में रहते हैं। ऐसी जगह रहने के कारण उस बस्ती के बाकी नागरिक भूत, पिशाच, प्रेत, जिन्न वगैरह उनके मित्र, सखा, संबंधी आदि हो गए होंगे। इसमें आश्चर्य कैसा?
भाई युक्तेश राठौर तो स्वर्गवासी हुए, किन्तु उनके सौजन्य से हम ऐसी ही जगह पहुंच गए हैं। परन्तु कोई हमें मृत्युंजय नहीं कहेगा। हम यहां कोई बसने थोड़े ही आए हैैं। युक्तेश भाई की शेष देह को फूंकने आए हैं। शंकर महाकाल के लिए राख उपलब्ध कराने। 
इसे ही कहते है- मृत्युंजय साधना, जो हमने तीन चरणों में पार करनी है। दो हो गए, यह तीसरी और अंतिम है।
इसके बाद होगी आनंद-साधना। वहां न दुख है न क्लेश। न भय है घबराहट। बस अखंड मौज है। पर इस तीसरे के बाद। तीसरे चरण के बाद....पहले चरण में भाई जी मरे, शवयात्रा की तैयारी हुई, दूसरे में उनकी अरथी निकली यानी शवयात्रा और उसके संभावित फायदे।
तीसरा यह दाहकर्म, यह अग्निसंस्कार, अब जहां वे राख हो जाएंगे...
लीजिए, प्रस्तुत है ‘शवगाथा’ का यह अंतिम पुष्प.... 3. मृत्युंजय घाट।

3 मृत्युंजय घाट

इस तरह शालीनता से चलते हुए हम मृत्युंजय घाट के रमणीय पर्यावरण से घिरे परिसर में प्रविष्ट हुए। बैनगंगा के किनारे बने बागीचे में महाकाल म्त्युंजय की भव्य चित्ताकर्षक प्रतिमा और शिवलिंग तथा बैठे हुए नंदी (बैल) सहित विराजमान है। तरह तरह के फूल खिले हुए हंै। माली पाइप से पानी सींच रहा है। काफी बड़े क्षेत्र में फैले इस घाट को दूर से देखकर सागौन-उद्यान का आभास होता है। कतार में ऊगे हुए सागौन के पेड़ सुस्मिता सेन, युक्तामुखी, दीपिका पादुकोण, मौली दवे आदि लंबी उर्वसियों की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं। अप्रेल महीने ने उन पेड़ों से पत्ते इस तरह छीन लिए है, जैसे मार्च के बजट रूपी दुश्शासन ने आम लोगों की तरह निरीह द्रौपदी के तन से कपड़े। हालांकि विश्वसुंदरियां के लिए अप्रेल या बजट का बहाना कोई अर्थ नहीं रखता क्योंकि विश्वसुन्दरी बनने के रास्ते में, सुना है, एक राउंड कपड़े उतारने का भी होता है। यह और बात है कि जीतने के लिए उतारे गए ये कपड़े बाद में पैसों के लिए उतरते रहते हैं।
मैं विश्वसुंदरियों से ध्यान से हटाता हूं तो ध्यान आता है कि कपड़े तो मरे हुए व्यक्ति के भी उतर जाते हैं। गीता में कहा गया है-वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति नवानि देही। 22.2.35
( हिन्दी रू वस्त्र पुराने बदलकर, नये पहनते लोग।
  काया जर्जर छोड़कर, अन्य ग्रहण सुनियोग।)
कबीर ने भी कहा - जो पहिरा सौ फाटिसी, नाव धरया सो जाई।
    कबिरा सोई तत्त गहि, जो गुर दिया बताई।।
पहरे हुए कपड़े पुराने होते और फटते ही है। फट जाने पर बदल लेने की परम्परा भी पुरानी है।
केंचुली या कांचुलिया की तरह भी कबीर ने आवरण उतारने की बात कही और समझाई है। कहते हैं कबीर
कबीर काहां गरबियौ, देही देखि सुरंग।
बीछड़िया मिलिबौ नहीं, ज्यूं कांचली भुवंग।
राठौर भाई उतारी हुई कांचली की तरह पड़े हैं। कांचली उतारनेवाला चला गया है। मैं पड़े हुए शव को देखता हूं जो अपे्रल में भी श्वेतवस्त्र धारण किए हुए है। इस श्वेतवस्त्र को हिन्दी में शवस्त्राण और उर्दू में कफन कहते हैं।
श्वेतवस्त्रावृत्त शव को कंक्रीट के बने तीन दाह-मंडपों में से एक के नीचे छाया में रख दिया गया है। शवयात्री भी तीनों मंडपों में, जहां छाया मिली वहां जाकर खड़े हुए हैं। घाट से लगी हुई बस्ती में रेखा का कोई भक्त जोर जोर से ‘उमराव जान’ का यह भजन बजा रहा है-
इस अंजुमन में आपको आना है बार बार।
दीवारोदर को गौर से पहचान लीजिए।
दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए।
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए।
‘जान’ ले लेने वाला यह भजन इस माहौल को गरिमा और अर्थ प्रदान कर रहा है। मैं देख रहा हूं - कुछ लोग गोबर के उपले (कंडों) से ‘चिता’ बनाने लगे हैं। उपले या कंडों की संख्या ढाई तीन हजार से ऊपर होगी। कांक्रीट के तीन मंडपों में से प्रत्येक में तीन-तीन दाह-स्थल हैं। पहले मंडप के पहले दाहस्थल पर हमारा शव रखा हुआ है। हमारा शव से मतलब हम जिस शव को हम लेकर आए हैं, वह रखा हुआ है। इस शव के पास लकड़ी का ढेर नहीं है। केवल उपले ही उपले हैं। लकड़ी का ढेर किसी दूसरे मंडप के नीचे लगा है। कोई दूसरा शव भी आनेवाला होगा। एक मंडप के नीचे उपलो की राख, उठावने की प्रतीक्षा में है।
मैं लकड़ियों के ढेर को देखता हूं। वे सब टाल से खरीदी हुई जलाऊ लकड़ियां हैं। उनमें चंदन की एक भी लकड़ी नहीं है। मुझे लगता है इन लकड़ियों को देखकर सागौन के पेड़ कुलीनता के गर्व से भर रहे होंगे। सागौन की लकड़ियां इमारती कहलाती हैं और भारत सरकार ने उनका राष्ट्रीयकरण किया हुआ है।  कोई भी उन्हें न तो काट सकता है न जला सकता है। जलाए जानेवाली जगह में सागौन का प्लान्टेशन किस प्लान से किया गया है? क्या यह बताने के लिए कि बनना है तो सागौन के पेड़ बनो ताकि कोई तुम्हें न काट सके, न जला सके। वाह! मृत्युंजय घाट की यह अमृत-कल्पना मुझे प्रभावित करती है। मैं सोचता हूं अगर आदमी भी सागौन का पेड़ होता तो मृत्यु उसे काट नहीं सकती। कोई उसे फिर कैसे जलाता? नैनं दहति पावकः का नियम फिर आत्मा के साथ साथ शरीर को भी लागू होता।
पर जीवन ध्रुव सत्य है तो मृत्यु भी ध्रुुव सत्य है। ऐसा सोचकर, मरे हुए की चिता-निर्माण के अंतराल को पाटने के लिए मैं भी एक मंडप के नीचे छाया टटोलकर बैठ गया। और भी लोग बैठे थे। सब शहर के नामी गिरामी लोग थे। वे सब जिन्दा थे और शहर के मरे हुए नामी गिरामी लोगों की म्त्यु-प्रसिद्धियों की चर्चा कर रहे थे। किस किस कांड में कौन कौन था और किस किस प्रकार गया, इसका इतिहास-पाठ कर रहे थे। मेरे लिए यह सब रोचक था क्योंकि मैं कह चुका हूं कि शहर में मैं नया हूं।
सभी प्रकार की म्त्यु और सभी प्रकार से मरनेवालो की कथा का समापन संभव नहीं जान पड़ रहा था। हरि कथा की भांति म्त्यु कथा भी अनंत होती जा रही थी कि चिता धू धू कर जलने लगी। हम लोग उठकर चिता के कुछ दूर खड़े हो गए। सबने कंडे के छोटे छोटे टुकड़े उठा लिये थे। जलती हुई चिता पर समय आनेपर फेंकेंगे। जहां लकड़ी सेें जलाने की प्रथा है वहां लकड़ी के तिनके उठाकर हथेली में रख लेते हैं।इन तिनकों को ‘पंचलकड़ी’ कहते हैं। पंचों ने मिलकर जलाया का सामाजिक भाव इस प्रथा में जुड़ा हुआ है। हमारे हाथों में कंडे के टुकड़े ‘पंचकंड’े के रूप में थे। हाथ में कंडे लेने ही से तो कहीं ‘हथकंडे’ शब्द नहीं बना? मेरे भाषाविद् को मरघट में भी भाषा की व्युत्पत्ति सूझी। मैंने झट उधर से ध्यान हटाया और जलती हुई चिता पर लगा दिया। कबीर ने ऐसी ही किसी चिता को जलते देखकर लिखा था-
हाड़ जले जस लाकड़ी, केस जले जस घास।
  सब जग जलता देखकर हुआ कबीर उदास।।
कबीर संवेदनशील थे। कभी हंसते थे, कभी रोते थे, कभी उदास होते थे। वे मरघट में जलते हुए मुर्दे को देखकर भी कविता लिखते थे। इसलिए कहते हैं कि अद्भुत थे कबीर।
अंत्येष्टि की क्रिया का अंतिम दृश्य उपस्थित हो गया है। जिस बांस से अर्थी बनी थी उसके एक बांस को ऐंचवेंचकर खींचकर निकाल लिया गया है। उसके एक सिरे को फाड़ लिया गया और उसमें एक लोटा फंसाकर बांध दिया। उसमें शुद्ध घी यानी देसी घी भर दिया गया। देशी घी इस समय चार सौ रुपये किलो चल रहा है। एक किलो घी लोटे में आ गया होगा। जो अपने होते है, वे मरने वाले के पीछे पैसों की गिनती नहीं करते। मैं शवयात्री हूं और बाहरी हूं, इसलिए घी का रेट मुझे याद आ सकता है।
घी ठीक जलते हुए मुर्दे के सिर के ऊपर उड़ेल दिया गया। यह कपाल क्रिया है। इसके साथ ही अंत्येष्टि क्रिया के समस्त कर्म पूरे हो गए। अब शवयात्री जाकर बैन गंगा में  नहा सकते हैं। इसे गंगास्नान कहते हैं। यानी अभी तक का जो दायित्व था, वह हमने पूरा किया और गंगा नहा लिया। किसी शवयात्री ने ही दायित्व-मुक्ति के लिए ‘गंगा नहा लेना’ मुहावरा बनाया होगा।
मैंने बैनगंगा की तरफ देखा। नंगे और लंबे सागौन के पेड़ों के पीछे बैनगंगा बहुत ही दुबली और छरहरी दिखाई दे रही थी। जगह जगह चट्टानें चेहरे की हड्डियों की तरह उभर आयीं थीं। दूर तक रेत पिचके हुए पेट से चिपकी हुई पीली खाल की तरह लग रही थी। उनमें से भी चट्टानों के सिरे उभरकर निकली हुई पसलियों की तरह दिख रहे थे। धार धार बहता हुआ पानी मुझे रोती हुई बैनगंगा के आंसुओं के रेलों की तरह लगा। किन्तु एक रसिक की तरह करुणा की मूर्ति गौरांग बैनगंगा मुझे अच्ठी लगी। जैसे कालिदास के मुंह से व्याघ्र वाण से बिंधे क्रौंच पक्षी को देखकर कविता निकली थी, वही हालत मेरी हुई। यह मुक्तक सहसा मेरे मन में बह निकला-
      चलाचल, चल चल सदा कहती हुई अच्छी लगी।
छरहरी सी इक नदी बहती हुई अच्छी लगी।
सारे पत्ते झर गए पीपल समूचा ठूँठ था,
छाँह चुटकी भर सही, रहती हुई अच्छी लगी। (26.04.12)

उधर एक आदमी सभी शवयात्रियों को एकत्रकर शोक व्याख्यान देने लग गया था। वह लच्छेदार शैली में राठौर भाई के चले जाने से स्तब्ध था। यह आदमी सोलह साल के लड़के के मरने पर भी स्तब्ध हो जाता है और सौ साल के उम्रदराज के मरने पर भी। उसे हमेशा लगता है कि हम सोच भी नहीं सकते थे कि फलां हमें इस तरह छोड़कर चले जाएंगे। पता नहीं वह किस तरह से छोड़कर चले जाने की प्रतीक्षा में रहता है। शोक व्याख्यान उसका पेशा है। व्याख्यान में वह कविताएं भी सुना रहा है जो इतनी तोड़ मरोड़ दी गई कि दौड़ दौड़कर चिता में कूद कूद कर कह रही हैं- ‘लौट आओ राठौर भाई, वर्ना यह आदमी हमारी जाने और क्या दुर्गत करे।’
वक्ता जब जी भर कर बोल लिया तो कुछ भूतपूर्व विधायक, नगरपालिका अध्यक्ष, पार्षद, प्रसिद्ध व्याापारी आदि भी बोले। बाकी सब घर जाने को उतावले थे। धूप अलग चढ़ रही थी। सब धीरे धीेरे ‘बस करो बस करो’ कह रहे थे। पर होनी को कौन रोक सकता है। वह अपनी करके ही रुकती है।
आखिर एक मिनट का मौन रखकर जेल से छूटे कैदियों की तरह सब घर की तरफ भागे। इस भगदड़ में किसी को गंगा नहाने का होश ही नहीं रहा। या सोचा होगा हमेशा नहाते हैं, आज नहीं ही सही।
मैंने देखा कि इस सब से बेखबर धूप सर पर चढ़ चुकी थी। हम अनियंत्रित गति से घर लौटने लगे। बड़ी जल्दी भूल गए कि अभी श्मशान से लौट ही रहे हैं और गली-गली से होकर गुजर रहे हैं। जरा संभलकर चलें। इति....(केवल इस आलेख की।)


अगले आकर्षण हैं-
1. बाल की खाल
2. सूर्य का गणितीय वाणिज्यिक अनुष्ठान। (डायरी से)
3. तुम मुझे यू भुला न पाओगे। (डायरी से)
4. भगवान होने की सुविधा और असुविधा, आदमी की दुविधा (डायरी से)

7 comments:

Rakesh Kumar said...

आपने इतना कुछ लिख दिया है कि गुनगुनाने के लिए
कुछ बचा ही नही है.रोचक धाराप्रवाह दार्शनिक लेखन के लिए आभार डॉ. साहिब.

समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा.

हरकीरत ' हीर' said...

@ कतार में ऊगे हुए सागौन के पेड़ सुस्मिता सेन, युक्तामुखी, दीपिका पादुकोण, मौली दवे आदि लंबी उर्वसियों की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं।

क्या बात है आपका तो हिरोइन ज्ञान भी लाजवाब है ...इतने नाम तो मुझे भी याद नहीं ......:))

@यह और बात है कि जीतने के लिए उतारे गए ये कपड़े बाद में पैसों के लिए उतरते रहते हैं।

सोच रही हूँ व्यंग लिखने के लिए शायद सबसे ज्यादा ज्ञान की जरुरत है ......

(ठीक करें - पहरे हुए कपड़े)
@ शवस्त्राण- नया शब्द सिखने को मिला ...

@ हमारा शव रखा हुआ है।...लो जी हम तो घबरा ही गए कि फिर ये पोस्ट किसने लिखी .....:))

@ जो अपने होते है, वे मरने वाले के पीछे पैसों की गिनती नहीं करते। मैं शवयात्री हूं और बाहरी हूं, इसलिए घी का रेट मुझे याद आ सकता है।

हा...हा...हा.......ऐसा नहीं है कि अपनों को याद नहीं होता पर वहां मज़बूरी होती है या दिखावा होता है पितृ प्रेम का ....

@ घी ठीक जलते हुए मुर्दे के सिर के ऊपर उड़ेल दिया गया। यह कपाल क्रिया है
कपाल क्रिया में तो खोपड़ी फोड़ी जाती है शायद .....?

@ दौड़कर चिता में कूद कूद कर कह रही हैं- ‘लौट आओ राठौर भाई, वर्ना यह आदमी हमारी जाने और क्या दुर्गत करे।’

aapko nman .....!!

हरकीरत ' हीर' said...

हाँ मोबाईल पर मेसेज आपने ही भेजा था न .....??

अगर आपका ही था तो खुशी और हैरानी दोनों हुई .....

Dr.R.Ramkumar said...

हरकीरतजी,
हातिम ताई के आठ सवालों के जवाब इस प्रकार हैं...

1.पता नहीं किस अज्ञात दुर्घटना के बाद से मुझे सुन्दर स्त्रियां सुन्दर लगने लगती हैं।
क्या करूं?
2.बुंदेलखंडी पढ़ालिखा आदमी भी पहने हुए को ‘पहरे’ हुए कहता है। पहरे हुए ही में उसका सौंदर्य है।
3. ‘सीखने’ शब्द भूल से ‘सिखने’ लिख गया है आपके प्रेषण में ..कोई बात
नहीं...
4. इसकी व्याख्या या हास्यसुधार लेख में ही है।
5. जी..जी.. जिज्जी!..‘जिज्जी’ बुंदेली शब्द है और अपने से सम्माननीय महिलाओं के प्रति आदर के साथ प्रयुक्त होता है।
6.खोपड़ी फूटने के बाद ही घी डाला जाता है। यही कपाल क्रिया है। मेरी इसमें मास्टरी है। जीते आदमी का कपाल फूट जाता है तो उसे भी घी और प्याज हल्दी के साथ लगाई जाती है। देहरादून में क्या करते हैं?..मेरे लायक कोई सेवा हो तो अवश्य कहें!
7. आप स्नेहपूर्वक आयीं..इसकी कृतज्ञता कैसे ज्ञापित करूं। हार्दिक अभिनंदन।

8. आपका फोन नं. नहीं है जी! दें तो मैं आभार मानूंगा..

सादर.

Dr.R.Ramkumar said...

My Cellullar N is 9893993403

Dr.R.Ramkumar said...

आपका यह कथन...
@यह और बात है कि जीतने के लिए उतारे गए ये कपड़े बाद में पैसों के लिए उतरते रहते हैं।

सोच रही हूँ व्यंग लिखने के लिए शायद सबसे ज्यादा ज्ञान की जरुरत है .....
ण्ण्ण्ण्ण्(ठीक करें . पहरे हुए कपड़े)

जीतने के लिए उतारे गए ये कपड़े ..यानी पहले जीते के लिए उतारे फिर पहने और फिर
पैसों के लिए उतारे ..मेरा यह आशय था...कहीं चूक रह गई...सुधार के लिए धन्यवाद!

alka sarwat said...

सन्नाटा टूटता ही नहीं ,चाहे जितनी कोशिश कर लो