Thursday, April 24, 2014

टोपी :



 राजनीति का मुहावरा या मुहावरे की राजनीति?

बनारस में भगवा टोपी पहननेवालों से पत्रकार ने ये पूछकर कि क्या ‘आपके’ सबसे प्रबल शत्रु की टोपी की नकल करते हुए अपनी टोपी पहनी है?’ टोपी को पुनः चर्चित कर दिया है।।
भगवा कार्यकत्र्ताओं ने जो उत्तर दिया वह बड़ा अटपटा था। उन्होंने अपने वर्तमान शत्रु या प्रतिद्वंद्वी का श्रेय खारिज करते हुए अपने दूसरे ‘ऐतिहासिक शत्रुया प्रतिद्वंद्वी की देन उसे बताया। ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में ख्यात गांधी के नाम से ‘एक टोपी’ सत्तर अस्सी के दशक में लोकप्रिय थी, जो  उनके पुरानी विचारधारा वाले प्रायः वयोवृद्ध अनुयायियों ने याद रखा किन्तु नयी लहर के अनुयायियों ने उपेक्षित कर दिया।
आप और बाप के बीच का यह द्वंद्व एक को अस्वीकार करने और दूसरे की लोकप्रियता का लाभ लेने का उपक्रम लगता है। मगर यह भी लगता है कि कार्यकर्ताओं को टोपी के इतिहास का पता नहीं है। उनके प्रायोजित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को भी इतिहास का कहां पता है? बिहार में विश्वविद्यापीठ आदि अनेक विषयों में इतिहासविषयक भूलें की हैं, अज्ञानता जाहिर की है।
उनके समर्थित दलों और संगठनों में टोपियां ‘दिल्ली में लोकप्रिय हुई टोपी’ के पहले से भी पहनी जाती है।
कांग्रेस के पुरखे एम. के. गांधी उर्फ ‘महात्मा गांधी’ या ‘बापू’ के नाम से विख्यात हुई ‘गांधी टोपी’ का इतिहास भी रोमांचक है। भारत में भारतीय स्वाभिामान की लड़ाई लड़नेवाले एम.के.गांधी को अंग्रेजों की जेलों में यह अनुभव हुआ कि भारतीयों के लिए जेल प्रशासन ने एक विशेष प्रकार की टोपी निर्धारित कर रखी हैं। स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा गांधी ने बाद में उसे अपने संगठन की टोपी बना ली। यही बाद में गांधी टोपी कहलायी।
सुभाषचंद्र बोस की टोपी सैनिक टोपी थी। पूर्व जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भी अपनी टोपी रही है। बजरंगियों की अपनी टोपी है। समाजवादी दल की अपनी टोपी रही है।
पिछले वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय योग एवं आयुर्वेदिक दवा उद्योग के संस्थापक ने स्वाभिमान और स्वदेशी विचाारधारा को मार्केटिंग की रणनीति के अंतर्गत जब भ्रष्टाचार और विदेशी धन को जन-आंदोलन के रूप में जिन जागृति का कार्यक्रम आरंभ किया और सांप्रदायिक तथा धार्मिक संस्थानों-राजनैतिक दलो को साथ मिलाया तब अवसर देखकर पुराने गांधीवादी सैनिक अन्ना भी मैदान में उतर आए। उनका अनुमान था कि कांग्रेस उनके हर प्रस्ताव पर अमल करेगी और इस तरह वे तीसरे गांधी के रूप में ख्यात हो जाएंगे।
पर परिस्थियां ऐसी नहीं हैं। गांधी के राजनैतिक मानस पुत्रों से एक गांधी नहीं संभलता वे दूसरे और तीसरे गांधी को कहां संभाल पायेंगे? उनके साथ सत्ता की चोट खाए अनेक आई ए एस, आई पी एस, सेना अधिकारी, एडवोकेट आदि जुड़ गए।
उन्होंने जब राजनैतिक दल बनाने की घोषणा की तो पहले गांधी बापू, दूसरे गांधी जयप्रकाश नारायण की तरह तीसरे गांधी अन्ना ने भी राजनीति के समानांतर चलकर किंग मेकर की भूमिका में आने में ही चतुराई समझी। नये भ्रष्टाचार विरोधी राजनैतिक दल का संबंध और जुड़ाव तीसरे गांधी से है यह बताने के लिए उन्होंने अन्ना की गांधी टोपी को सिर पर पहन लिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि नये दल से धीरे धीरे दूरियां बनाते हुए अन्ना ने एक और प्रयास किया और सत्ता दल की एक इकाई तृणमूल के माध्यम से पुनः लोकप्रिय होने का प्रयास किया। सत्ता तृणमूल को मूल से हटाना चाहती है ताकि वह ऐसा बरगद न बन जाए का वर्तमान वंशवृक्ष उसके नीचे दब जाए। अतः अन्ना सार्वजनिक रूप से घोषणा करने के बावजूद मुलायम सिंह की तरह तृणमूल से कट गए।
यहां यह उल्लेखनीय है कि नये दल से धीरे धीरे दूरियां बनाते हुए अन्ना ने एक और प्रयास किया और सत्ता दल की एक इकाई तृणमूल के माध्यम से पुनः लोकप्रिय होने का प्रयास किया। सत्ता तृणमूल को मूल से हटाना चाहती है ताकि वह ऐसा बरगद न बन जाए का वर्तमान वंशवृक्ष उसके नीचे दब जाए। अतः अन्ना सार्वजनिक रूप से घोषणा करने के बावजूद मुलायम सिंह की तरह तृणमूल से कट गए।
बहरहाल पिछले विधानसभा चुनावों में दिल्ली में नयी टोपी आम आदमी ने एक नया इतिहास रचा। न बनाने, बनाने और बना कर मिट जाने का। संसदीय चुनावों में जो टोपियों की बहार आयी है वह इसी कारण से है इसे सभी जानते हैं और मीडियावाले भी। राजनैतिक दलों को उल्टे सीधे तर्कों से नकारने का कूटनीतिक विशेषाधिकार प्राप्त है। पर क्या फर्क पड़ता है। जाननेवाले तो सब जानते हैं।
टोपी पहनाना, टोपी उतारना, इसकी टोपी उसके सिर रखना (इसकी टोपी उसके सर) आदि मुहावरों को अब अलग से समझााने की जरूरत नहीं है। इसी के समानांतर एक और मुहावरा है जो राजनैतिक दृष्टि से बहुत उपयुक्त है, वह है पगड़ी उछालना। इसके बिना तो राजनैतिक चुनावी अभियान शुरू ही नहीं होता। शेष सारे मुद्दे तो कहने के लिए हैं एक यही लक्ष्य राजनैतिक दल लेक चलते हैं किन किन की पगड़ी उछालेंगे तो अपनी सलामत रहेगी।
क्या जनता यही सब सुनने और देखने के लिए एकत्र होती है? क्या हमारी सामाजिक मूल प्रवृत्ति यही है कि दो विरोधियों की आपसी गुत्थम गुत्थी, गाली गलौज, निंदा और चरित्र हत्या की नयी नयी कहानियां सुनें और तालियां बजाएं? क्या हमारे समाज के भीतर भी यही सब व्यवस्था है और ऐसे ही मुंहफट और छुतहा को सम्मान दिया जाता है जो दूसरों की पगड़ी उछालता फिरता है या टोपी उतारता रहता है?
सच्चाइयों का इतिहास यह है कि पगड़ी या टोपी पहनाना एक धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था हुआ करती थी। यज्ञोपवीत के साथ सम्मान सूचक पगड़ी पहनायी जाती रही है। विवाह में पागा या पगड़ी का विशेष स्थान रहा है। अब दूल्हे बनी बनाई टोपी या टोपीनुमा पगड़ी पहन लेते हैं। वैसे यहां भी मुहावरा पगड़ी पहनाने या टोपी पहनाने का प्रयोग किया जा सकता है। बिगड़ैल अथवा लापरवाह लड़के लड़की के लिए मां बाप रिश्तेदार या समाज के लोग यही राय देते हैं कि शादी करदो तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। मतलब जिम्मेदारी आ जाएगी। और लड़के या लड़की को टोपी पहना दी जाती है। इस तरह के विवाह जो  अक्ल ठिकाने लगाने के लिए किये जाते हैं उनमें पागा नहीं पहनाया जाता या हाथ पीले नहीं होते बल्कि टोपी पहनायी जाती है। होता वही है कि हाथ पीले होते हैं पागा या टोपी पहनायी जाती है पर आशय इसी मुहावरे के आसपास घूमता है।
पगड़ी, गमछा और टोपी कुटुम्ब के व्यक्ति के मरने पर भी जीवितों के सर पर रखी- पहनायी जाती है कि अब सब आप लोगों की जिम्मेदारी है। या यह कि हमारी सहानुभूति आपके साथ है।
धार्मिक आध्यात्मिक क्षेत्र में पगड़ी या टोपी का अलग महत्व है। सबसे पहले तो धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के लिए अधिकांश समुदायों में टोपी अदब और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में पहनी जाती है। यहां टोपी पहनी जाती है। न पहनायी जाती है, न उतारी या उछाली जाती है।
राजा महाराजों में टोपी यानी मुकुट पहनाकर सत्ता का हस्तांतरण नये उत्तराधिकारी को किया जाता था। अब कुर्सी हस्तांतरित होती है। टोपी अब सीट के नीचे आ गई है।
बस अब मन भर गया। थोड़ा कहा बहुत समझियेगा।
पुनश्च - जाते जाते एक आखिरी बात। अब तो प्रत्यक्षतः टोपी और पगड़ी रही नहीं। उसके भाव के रूप में इज्जत रह गई है। मगर सावधान वह अपने ही हाथ में है। दूसरे के हाथ में उसे न जाने दें। यानी आपको कोई टोपी न पहना सके। कोई आपकी पगड़ी न उछाल सके। मनोजकुमार गोस्वामी उर्फ मि. भारत की फिल्म शहीद का यह गीत जो प्राण पर फिल्माया गया था, गुनगुनाइए-
‘पगड़ी सम्हाल जट्टा.. पगड़ी सम्हाल ओए....’’ दि. 25.04014

1 comment:

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

टोपी या पगडी पहनने को ही उम्मीदों पर खरा उतरने की पहचान मानना महज एक भ्रम है । कोरा तुष्टीकरण है । मात्र टोपी पहनने से ही कोई विश्वासपात्र नही होजाता । खैर..।
आपने मेरी कहानी पढी । और भी पढते रहेंगे । धन्यवाद