Saturday, December 31, 2011

नयी सुबह का गीत

दुनिया भर के तमाम दोस्तों,
जाने और अनजाने साथियों को
नये वर्ष हार्दिक शुभकामनाएं।

नये साल में आप सारे इरादे पूरे कर डालें।


धुंध हटाकर सोने जैसी सुबह सिरहाने आयी।
अलस भोर के सपने सच होते, बतलाने आयी।।

अधभिंच आंखें याद कर रहीं, बीते कल की बातें।
भागमभाग भरे दिन को ले उड़ी नशीली रातें।
तन्य तनावों में भी कसकर पकड़ीं कुछ सौगातें।
जो पल मुट्ठी से फिसले थे, उन्हें उठाने आयी।

सपने क्या देखे मैंने, केवल अभाव फोड़े थे।
उनके अंदर स्वर्णबीज थे, वे भी फिर तोड़े थे।
गरियां कुछ उपलब्ध हुईं या तुष्ट भाव थोड़े थे।
इन मेवों का आतिथेय आभार चबाने आयी।

भले, भेदभावों का दलदल, गहरे होते जाता।
भले द्वेष, पथ पर दुविधा क,े सौ सौ रोड़े लाता।
जिसको बहुत दूर जाना है, वह तो दौड़े जाता।
कमर कटीली कसकर कितने काम कराने आयी।

अस्त-व्यस्त पीड़ाएं झाड़ीं, स्वच्छ चादरें डालीं।
धूप धुले शुभ संकल्पों वाली, आंगन में फैला ली,
नव रोपण के लिए बना ली, क्यारी नयी निराली।
नव उमंग की टोली भी उत्साह बढ़ाने आयी
धुंध हटाकर सोने जैसी सुबह सिरहाने आयी।

29.12.11





डाॅ.आर.रामकुमार,
विवेकानंद नगर, बालाघाट - 481001, मो. 89896693730, 9893993403, दूरभाश: 07632 242084,

Wednesday, November 30, 2011

फिसलनेवाले फर्स में एक शाम

पोली मेगामार्ट की वह शाम अभी भी आंखों में बसी हुई है।
हम उस शाम मार्बल सिटी में थे और मेगामार्ट के बारे में उत्साह से जानकारी देनेवाली हमारी बच्ची ही थी जो मां को मल्टीपल किचन-वेयर उपलब्ध कराना चाहती थी।
ऊमस भरी दोपहरी थकी हुई नींद से जागकर अभी अभी शाम में ढली थी। शाम का सदुपयोग हमारे तीन लक्ष्यों पर आधारित था : पहला पोली मेगामार्ट की सैर और खरीददारी, दूसरा मॉल की तफ़रीह , तीसरा चैपाटी ,सोनाली या रूपाली में किसी एक के ‘सौजन्य’ पर भोजन।
पहला नाम चौपाटी, जग जाहिर है कि चैपाटी नाम के स्थान , बम्बई उर्फ मुम्बई की तर्ज पर बड़े बड़े शहरों में लगनेवाले चटोरी चाट के शौकीन इलाके हैं। बाकी के दो नाम ; सोनाली और रूपाली हाई-स्टेडर्ड के भोजनालय हैं।
हम पहले लक्ष्य की ओर बढ़े। लक्ष्य के लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ा। पास ही था। बच्चियों का फ्लेट पॉज़ इलाके में था जो केन्द्रीय बाजार के मध्य में ही था।
मेगा मार्ट में आज काफी चहल पहल थी। आज कुछ चीज़ों पर 40 प्रतिशत का डिस्काउंट ऑफर था और चांवल के पांच किलो के एक पैक के साथ एक पैक फ्री था। किसी भी मध्यम वर्गीय परिवार को यह लुभानेवाला खेल था। हम भी इससे आकर्षित हुए लेकिन बोझ ढोने की बजाय हम रिलेक्स रहने के मूड में थे, इसलिए खरीदा वही जो इज़ीली कैरी किया जा सकता था।
पहले हमने ग्राउंड फ्लोर की जमकर तलाशी ली और फिर ऊपर की तरफ़ चढ़े जहां गृहस्थी के सारे औजार मौजूद थे। बच्चो के खेलने के खिलौनों से लेकर ग्रहणियों के उपयोग में आनेवाले सभी तरह के आईटम। ओढने बिछाने से लेकर खानेपकाने तक के। किचन में सुविधा के लिए भी और डाइनिंग टेबल पर छा जाने के लिए भी।
एक ट्राली ले आई गई, जो खास तौर पर ऐसे मौके के लिए ही उपलब्ध होती है। ट्राली का एक और मैन्युफेक्चरिंग उपयोग भी है कि उसमें बनी हुई सीट पर नन्हें मुन्नों को घुमाया जा सकता है। मां और पिता के दोनों हाथ कम से कम बच्चे को टांगने से मुक्त और सामान देखने और ट्राली में डालने के लिए फ्री।
हमने देखा कि बच्चे ट्राली में मजे के साथ बैठकर मेगा मार्ट की रंगीनियों का सैर कर रहे हैं और माता पिता को उन्हें सम्हालने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा खर्चनी नहीं पड़ रही है। ज़ाहिर है यह ऊर्जा मैनेजमेंट के सोचे समझे प्लान के अनुसार चीजें चुनने में ज्यादा लग रही है।
‘‘ बच्चों के लिए ट्राली में सीट लगाना मैनेजमेंट फंडा है जनाब!’’ मैंने अपने को ज्ञानवान बनाने के मकसद से यह जुमला मन ही मन खुद से कहा और मेगा मार्ट के जादुई वातावरण में नज़रें घुमाने लगा।
कुछ बड़े बच्चे भी थे -दस से बारह तक के। कुछ जो ट्राली में आ सकते थे वे उसमें खड़े हो गए थे और उनके उनसे बड़े भाई बहन ट्राली को पुश करते हुए आनंद ले रहे थे। मां बाप ट्राली घुमाने से भी बरी। कुछ बच्चे खली पड़ी जगह में ट्राली को लुढ़काने का आनंद ले रहे थे। उनके पीछे ‘लिटिल मास्टर्स ’ की तर्ज पर जूतों पर ही कुछ बच्चे फर्स पर फिसल रहे थे।
चिकने फर्स का फायदा और मेगा मार्ट का पल्टीपल मनोरंजन बन गया था। बड़े भी बच्चों के अंदर के बचपन को उछलता देखकर रिलेक्स हो रहे थे। कुछ न भी खरीदो तो भी कुछ तो मिल ही रहा है।
बहुत कुछ साथ ले जाने लायक दिल के अंदर फिसलती हुई ट्रालियों में डाले जा रहे थे। कोई कीमत नहीं , कोई वेट नहीं, कोई डिस्काउंट आफर नहीं। परन्तु निर्लोभ आकर्षण की एक के साथ अनेक की उपलब्धि तो मिल ही रही थी।
‘‘जिनके घरों में ये चिकने फर्स होते हैं , वहां मनोरंजन भरपूर होता होगा।’’ मेरे दिल ने उत्साह में सोचा।
‘‘ हाथ पैर और कूल्हे भी बहुत टूटते हैं..खासकर बूढ़ों के ..’’ दिमाग ने सोच की किरकिरी कर दी और मैं सम्हल कर उस चिकने फर्स पर चलने लगा।

Wednesday, November 16, 2011

हरी मिर्ची


सुबह सुबह जूते की अंतिम गांठ बांधकर मैं पूरी तरह तैयार होकर घूमने के लिए सीधा खड़ा हो गया। सुबह की हवा स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। उपयोगितावाद का यह मंत्र मैंने ऐन बचपन में ही शहद के साथ चाटा है। जब तब इसकी मिठास मेरे मस्तिष्क पर लिपट जाती है। मैं जब माथे पर हाथ फेरते हुए होंठों पर जबान फिराता हूं ,तो इसका मतलब यही होता है कि अतीत अपनी सुन्दरता के साथ मुझे याद आ रहा है।
‘‘लौटते हुए हरी धनिया और हरी मिर्च तो नहीं लानी है?’’ निकलने के पहले मैंने अंदर की तरफ़ मुंह करके आवाज़ लगाई। अब तक पत्नी जान चुकी है कि नर्मदा नगर और मोती तालाब के बीच का जो अध -उधड़ा रास्ता है, उसमें करीब आधा दर्जन सब्ज़ियों की घरेलू दूकानें हैं जो सुबह सुबह ही खुल जाया करती है। मकानों के अहातों की सफाई और छिड़काव के बाद ,सब्ज़ियों के तख़्तों का सजना ऐसा ही है जैसे आंगन में किसी ने हरी, लाल, भूरी, बैंगनी, गुलाबी, प्याजी-आलुई रंगोलियां डाल दी हों।
‘आंखों के लिए हरापन और हरियाली देखना अच्छा होता है।‘ हरी मिर्च और हरी धनिया की चटनी की तरह यह बात मां ने बचपन में कई बार मेरे अलसाए हुए सबेरों को चटाई है। मैं अक्सर धुले हुए आंगनों में सजी हुई दूकानों को देखकर इसे याद करता हूं।
प्रायः मैं गोंदिया रोड पर डा. अंबेडकर चौराहे की तरफ़ निकलता हूं। इस मुख्य रास्ते पर काफी खुलापन है। दोनों तरफ़ समृद्धियों के शिखरों और सोये हुए बाजारों के सटरों के बीच से गुजरते सैकड़ों स्वास्थ्यकामी नगरजनों को देखकर अच्छा लगता है। ऐसे वृद्धजन भी हैं, जो अपने लड़खड़ाते-लंगड़ाते साठोत्तरी शरीर को आज की हवा खिलाते हुए जीने के लिए संघर्षशील हैं।
दिन भर टनों कार्बन डायअक्साइड और गंदगी से सनी हुई धूल उड़ानेवाली गाड़ियां अभी सोई हुई हैं। इक्का दुक्का स्कूल कालेज जाती हुई स्कूटियां बगल से सर्राती हुई निकल जाती है। नयी पीढ़ी की तैयारी को देखकर मन उमंग और स्फूर्ति से भरने लगता है। ऐसा लगता है जैसे स्कूल ,कालेज और टयूशन जाते बच्चे अपने इंद्रधनुषी सपनों को पूरे वातावरण में छिड़कते हुए चले जा रहे हैं। अच्छा लगता है तो शुद्धता का आभास दिलाती आक्सीजन की कल्पना को सांसों में खींचकर मैं बड़े उत्साह से आगे बढ़ने लगता हूं।
परन्तु इस उत्साह में भी मैं सावधान हूं। काली काली चिकनी और साफ़-सुथरी सड़क पर गंदगी पैरों के नीचे ना आ जाये, इस बात का विशेष ख़्याल रखना पड़ता है। गंदगी से मन ख़राब होता है लेकिन उसे संभालना पड़ता है। पता नहीं किस बात पर, किस शिकायत से, किस गुस्से से लोग इतनी साफ़-सुथरी सड़क पर थूक दिया करते हैं। पता नहीं किसका मुंह उन्हें याद आ जाता है। पता नहीं कौन सा अन्याय या अत्याचार, कौन सा दुव्र्यवहार, किसका विश्वासघात उन्हें याद आ जाता है कि इतनी घृणा से वे थूकते चलते हैं। थूकते चलनेवाले लोगों की बीमारियों और तकलीफ़ों की याद में मैं गहरी सांस लेता हूं और उनकी थूकी हुई गंदगियों के प्रति सहानुभूति और सहिष्णुता की ख़ामोशी का रूमाल मुंह पर रखकर संभलता हुआ आगे बढ़ जाता हूं। अच्छा हुआ हमारी नागरिकता शवासन पर है और हमने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है कि सड़क पर थूकना अपराध है, वर्ना नागरिकों की यह मूलभूत स्वतंत्रता भी जाती रहती।
बहरहाल ,मैं आगे बढ़ता हूं। बायीं तरफ़ नगरपालिका का बहुउद्देशीय मैदान है। भ्रष्टाचार विरोधी कवि सम्मेलन अभी अभी यहां हुआ है और बहुत से लोगों को भले ही कविताओं की एक पंक्ति याद न हो, पर इस बात की याद है कि कैसे उनको स्पेशल पास मिले थे। सामने डाॅ. अंबेडकर चौक है जहां से एकदम बाएं जो रास्ता जाता है, वह थाना भी जाता है और मोती तालाब भी। मोती तालाब के किनारे एक गार्डन विकसित किया गया है।
इस गार्डन तक पहुंचने के दो मार्ग है। थाने की तरफ से जानेवाला रास्ता डामरीकृत है। लेकिन सरस्वती नगर की ओर से आनेवाला रास्ता चुनौती भरा है। ऊबड़-खाबड, धूल और गड्ढों से भरा। ऐसा लगता है यह हिस्सा पालिका का सौतेला बेटा है या पारिवारिक हिस्सा-बांट के झगड़े में पड़ा हुआ है या फिर किसी मजबूरी का शिकार है। खैर, इन सब पचड़ों में मुझे नहीं पड़ना चाहिए। ऐसे विचारों से संबंधितों को मिर्ची लग सकती है, मतलब खराब लग सकता है। फिर सुबह की सैर अंदर जमा विष को निकालने के लिए होती है, विष ग्रहण करने की नहीं। जिस तरह मिर्च लगे तो घी और शक्कर से उसे शांत करना चाहिए, उसी तरह धूल उड़े तो नाक में रूमाल रखना चाहिए। गंदगी दिखे तो मुंह फेर लेना चाहिए। इन सिद्धांतों पर चलकर ही बची खुची शुद्धता का आचमन किया जा सकता है।
इसी उद्देश्य से, बहुउद्देशीय मैदान के बाद यही वह गार्डन है जो सबके उपयोग के लिए चौबीस घंटों खुला रहता है। उल्लेखनीय है कि आवारा मवेशियों को रात में जितना आराम डामर-रोड पर मिलता है, उससे ज्यादा मज़ा मल्टीपरपज़ मैदान में आता है। उससे कहीं ज्यादा आनंद उन्हें गार्डन में आता लेकिन गार्डन में मवेशियों का प्रवेश वर्जित है। कारण यह है कि जो कुछ मनुष्यों को देखने में सुन्दर लगती है, उसे मवेशियां चाव से खाना पसंद करती हैं।
हालांकि कुछ मनुष्य भी ऐसे होते हैं जो फूलों की सुन्दरता को देखकर पहले आनंदित होते हैं, फिर उन्हें छूते हैं और फिर तोड़कर खेलते है ,उन्हें नोचते है और चबाकर थूक भी देते हैं। उन्हें देखकर पं. माखन लाल चतुर्वेदी की पंक्तियां याद आती हैं, ‘‘मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि को शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक।’’ लगता है फूल तोड़नेवालों ने यह नहीं पढ़ा। ऐसा मानकर कि वे पढ़े लिखे होंगे, यहां लिख दिया गया है ‘‘ कृपया फूल न तोड़े।’’ मेरे ख्याल से पश्चिमी कवि शैक्सपियर का यह कथन भी लिख देना चाहिए -‘‘ब्यूटी इज़ टू सी, नाॅट टू टच’’। शायद ये विद्वान लोग यह कहना चाहते हैं कि प्रकृति के साथ मनुष्यों की तरह पेश आओ, मवेशी मत बनो। पर लिखे हुए कौन को कौन पढ़ता है।

गार्डन के सामने ही एक सूचना पर मेरी नजर पड़ती है, लिखा है ‘‘मुंहपर पट्टी बांधकर आनेवालों को गार्डन में घुसने की मनाही है।’ यह सूचना जरूरी है। देशभर के बैंकों में, एटीएम में , सरकारी कार्यालयों में और सभी संरक्षित तथा सार्वजनिक स्थानों में मुंह पर पट्टी बांधकर आनेवालों की मनाही है। आनंदवादियों, आतंकवादियों और विध्वंसवादियों ने पर्दाप्रथा को फिर से जीवित करने की कोशिश की थी, जिसे कानून बनाकर समाप्त कर दिया गया है। प्रदूषण, धूप और धूल से बचने की भावना शुद्ध और सात्विक है, मगर हर शुद्धता और सात्विकता का लाभ कुछ स्वार्थी और विघ्नसंतोषी जीव ले लिया करते हैं। इसलिए समाजविरोधी गतिविधियों के लिए कानून ज़रूरी हैं।
मोती-गार्डन के अंदर घुसने लिए मुड़े-तुड़े ऐंड़े-बेड़े गेट की व्यवस्था की गई है। ऐसा नहीं है कि लापरवाही की गई है और उसे सुधारे जाने के बारे में नहीं सोचा गया है। इस संवेदनशील जिले के पास इतनी समझ तो है ही। वास्तव में आजकल एंटिक का जमाना है। पुरानी खंडहर चीजों के प्रति लोगों की रुचि है। फाइव स्टार्स होटलों में बांस के गेट और टूटी हुई दीवारें बनाकर उसे एंटिक लुक दिया जाता है। मोती गार्डन की मेंहदी की कच्ची बाड़ और लोहे के टूटे दरवाजे हमारी धरोहरवृत्ति की उद्घोषणाएं हैं। इस दृष्टिकोण का लुत्फ़ लेते हुए मैं और अंदर आता हूं।
मोती गार्डन सुन्दर है। मोती तालाब की तुलना में गार्डन बीस ही है। गार्डन यानी उद्यान तरीके से सजाया गया है। बच्चों के लिए फिसल पट्टियां, जिन्हें बालाघाटी में घिसरपट्टी कहा गया है। ये पट्टियां केवल बच्चों के लिए हैं, बड़े होते लड़के और लड़कियां, बड़ी बड़ी बातें करनेवाले सिद्धांतवादी लोग तो कहीं भी फिसलकर जिन्दगी का आनंद ले सकते है।
कुछ स्वास्थ्य प्रेमी बच्चों के लिए गार्डन में सिंगलबार और डबलबार हैं। जू के नाम पर चार पांच दड़बे और उनमें पचहत्तर के करीब खरगोश हैं। जिन्होंने अब तक कुछ नहीं देखा, उन नन्हें मुन्ने बच्चों को ‘‘देखो देखो आहा कितने सुन्दर’’ कहकर ये खरगोश दिखलाए जाते हैं। हालांकि, बालाघाट को प्रकृति ने इतना भरपूर दिया है कि अलग से उद्यान या जू की आवश्यकता नहीं है किन्तु कंक्रीट और पेट्रोल के तीव्रगति से होनेवाले विकास की खुरदुराती हथेलियों पर हरियाली की मेहंदी की टिपकियां रखने के लिए हर मोहल्ले और वार्ड में उद्यान जरूरी हैं।
गार्डन के अंदर घूमने के लिए कंक्रीट ब्रिक्स के घुमावदार रास्ते हैं। घूमकर थक जाने पर बैठने के लिए छोटे छोटे लान और बेंचेज़ भी हैं। आराम, बातचीत, चिन्तन-मनन, अध्ययन, सांठ गांठ आदि के लिए बेंच जरूरी है। यहां उपलब्ध इन बेंचों की संख्या अठारह हैं। इन्हीं में से एक बेंच पर मैं आकर बैठ जाता हूं। इस बैंचपर बैठकर किसी सभ्य व्यक्ति ने पान खाया होगा, इस बात के प्रमाण पड़े हुए लाल लाल धब्बे दे रहे हैं। मैं अपने पैरों को इन धब्बों से बचाकर संभलकर बैंच पर बैठे हुए आसपास नज़र करता हूं। अचानक सामने की बेंच पर मेरी नजर पड़ती है। मुझे देखकर आश्चर्य होता है कि उस बेंच पर तीनेक सौ पेज की एक नोटबुक रखी हुई है। नोटबुक एकदम नयी मालूम पड़ती है। किसी विद्यार्थी की होगी। वह सुबह सुबह आकर यहां पढ़ता होगा। या उसका ट्यूशन छूटता होगा तो यहां आकर नोटबुक बेन्च पर रखकर व्यायाम करता होगा।
लेकिन इस समय आसपास कोई भी विद्यार्थीनुमा व्यक्तित्व मुझे दिखाई नहीं देता। प्रायः सभी प्रौढ़ किस्म के या सीनियर सिटीजन आयुवर्ग के जर्जर व्यक्ति चारों तरफ दिखाई देते हैं। कोई सीढ़ियों के किनारे के चबूतरे पर कपालभांति कर रहा है तो कोई अनुलोम विलोम कर रहा है। कोई योगदा सत्संग के संधि -योग कर रहा है तो कोई सर्वांग आसन के माध्यम से स्टिफनेस को लचीला बनाने की कसरत में व्यस्त है। एक ओर एक गोल्डल जुबली मना चुके सज्जन हैं जो पिछले दस मिनट से शीर्षासन पर उल्टे खड़े हैं। उन्हें देखकर हर कोई हक्काबक्का है। क्या यह नोटबुक इनमें से किसी एक योगी की हो सकती है ? ऐसा अनुमान करने में मुझे दुविधा हो रही है।
अकस्मात् किसी ‘नोटबुक बाम्ब’ की कल्पना से मैं क्षणभर के लिए सिहर जाता हूं। किन्तु बहुत से लोगों को निश्चिन्त होकर उसी जगह के आसपास तीव्रगति से आवक-जावक व्यायाम करते देखकर मेरा धैर्य लौट आता है। फिर एक गुलाबी क्ल्पना से मेरी धड़कनों में पियानों सा बजने लगता है। मुंह ढंककर आने की पाबंदी लग जाने से ‘आपरेशन नोटबुक’ का उपाय युवावर्ग ने निकाल लिया होगा। अपने दिल की बात लिखकर नोटबुक में दबाकर रख दी और जिसको निकालकर जिसे पढ़नी है, उसने पढ़ ली। क्या मैं प्रतीक्षा करूं और देखूं कि कौन आता है उसके पास। पर तुरंत मुझे मेरी अंतरात्मा धिक्कारती है और कहती है -‘‘मूर्ख! तू इस तरह दरबान की तरह बैठा रहेगा तो कौन आएगा। उठकर इधर उधर घूम और झाड़ियों के पीछे से नोटबुक पर निगाह रख।’’ हां यह अच्छा आइडिया है।
अंतरात्मा की बात मानकर मैं उठने ही वाला होता हूं कि एक सज्जननुमा वृद्ध आकर बेंचपर रखी डायरी के पास चले जाते हैं। वे देखने में किसी अवकाशप्राप्त अधिकारी की तरह गर्वित और आत्मतुष्ट लग रहे हैं। मेरे देखते ही देखते वे नोटबुक उठा लेते हैं। उसमें से एक कागज निकाल कर पढ़ते हैं और उसे अपनी जेब में रख लेते हैं। उनके हाथ में एक प्लास्टिक का कैरीबैग है उसे वे नोटबुक के पास रख देते हैं और आगे निकल जाते है। मैं आश्चर्य से फिर सोचने लगता हूं। ‘‘ हे भगवान ! क्या इस शहर में बूढ़े लोग ऐसा भी करते हैं।’’ पर मेरे संस्कार मुझे धिक्कार कर कहते हैं-‘‘ नालायक ऐसा सोचते हुए तुझे शर्म नहीं आती।’’ मैं शर्माकर किसी अच्छी कल्पना करने का प्रयास करता हूं। ‘हे प्रभु! अगर इस बीच उस नोटबुक को उठाने कोई आ जाए तो मुझे उत्तर मिल जाए। कोई छोटा बच्चा, कोई बड़ा लड़का, कोई बूढ़ी औरत।’ प्रभु ने तत्काल प्रार्थना सुनी और प्रमाण भी भेज दिया।
एक नाटे कद के बूढ़े व्यक्ति लड़खड़ाते हुए वहां आये और उन्होंने नोटबुक और कैरी बेग उठा लिया और उसी अंदाज में चले गये। वे किसी स्कूल के रिटायर्ड आचार्य या किसी कार्यालय के ईमानदार बाबू की तरह गंभीर और अनुशासित लग रहे थे।
मेरे लिए नोटबुक निरन्तर रहस्य के नये-नये चक्रव्यूह रच रही है। मैं मामले को यही खत्म करने के लिए जानबूझकर इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि दोनों बुजुर्ग कभी मित्र रहे होंगे। पहले साथ साथ घूमने आते रहे होंगे। फिर दोनों में खटक गई होगी। बोलचाल बंद हो गई होगी। पुराने कुछ कर्ज रहे होंगे जिन्हें वे नोटबुक में दबाकर आदान-प्रदान कर रहे हैं। कुछ चीजें एक दूसरे के पास छूट गई होंगी जिन्हें कैरी बेग में रखकर ले दे रहे होंगे। इस तर्क से मुझे संतोष मिलता है और नोटबुक से मेरा ध्यान इस तरह हट जाता है जिस तरह कमलपत्तों पर से बिना निशान छोड़े पानी की बूंदें।
अब मैं उठकर फिर टहलने लगा हंू। टहलते हुए मैं गूलर के पेड़ के नीचे से गुजरता हुआ, फाइबर के पेशाबघर से मुड़कर तालाब की ओर मुड़ी हुई गली पर चल पड़ता हूं। देखता हूं कि उद्यान की गलियां कई स्थानों पर पतले रास्ते से निकलकर तालाब के किनारे कच्चे घाट बन गई हैं। लेकिन मुख्य द्वार कीे सीध में ही पक्का घाट है। पांच दस सीढ़ियों वाले इस घाट में खड़े होकर मैं तालाब को उसके विस्तार में देखता हूं।
पूरा मोती तालाब कमलगट्टों और सिंघाड़ों से भरा हुआ है। सिंघाड़ों के मोटे छिलके और कमल के बीज के ऊपर का कड़ा आवरण जैसे सीपियां है। सिंघाड़े के फलों और कमल के बीजों को पकाकर उनके अंदर से सफेद खाद्यान्न निकाला जाता है। पका हुआ सिंघाड़ा मीठा और कमल गट्टे से प्राप्त मखाना बेस्वाद सा होता है। सिंघाड़ा फलाहार के काम आता है और मखाना जचकी के लड्डू में पौष्टिक मेवे के रूप में डाला जाता है। दोनों शुद्ध मोती की तरह सफेद होते हैं। इन्हीं वानस्पतिक मोतियों के कारण तालाब मोती तालाब बना होगा। यह मेरा अनुमान है।
मैं देख रहा हूं कि मोती तालाब में नैसर्गिक रूप से ऐसे शैवाल भी हैं जिन्हें देखकर तुलसी के उन दुष्टों की याद आ जाती है जो बिना किसी काम के दाएं बाएं होते रहते हैं। शैवाल के अलावे प्लास्टिक , पोलीथिन, श्रद्धापूर्वक विसर्जित सामग्रियां, मिट्टी के दिये और सड़े हुए पत्ते भी मैं देखता हूं। सिंघाड़े और कमल कीचड़ में ही होते हैं इसलिए पर्याप्त कीचड़ और दलदल की व्यवस्था की गई है। प्रायः कीचड़ बढ़ाने की हर संभावना को खुला रखा गया है। पहली नज़र में तालाब की अशुद्धि को देखकर पालिका प्रबंधन को पत्र लिखने की जो इच्छा हुई थी वह, कीचड़ में कमल और सीपियों में मोतियों की तथ्यात्मकता से ध्वस्त हो गई। वैसे भी मेरा अनुभव कहता है कि व्यवस्था और प्रबंधन से जुड़े किसी भी अभिकरण को सुझाव नहीं देना चाहिए। ऐसी संस्थाओं के अंदर जो बिगड़े हुए उपकरण काम कर रहे होते हैं उन्हें मिर्ची लगती है। इसलिए हमेशा किसी मिठास की तलाश करते रहना चाहिए। मिठास के लिए मैं तन्मयता से तालाब के अंदर खड़े पेड़ों और झाड़ियां देखने लगता हूं जिनसे किसी अनाथ समुद्री टापू का भ्रम पैदा हो रहा है। अंडमान निकोबार की याद दिलानेवाले इन भ्रांतिमान टापूओं की संख्या चार है।
उधर से हटकर मैं फिर उद्यान की गलियों में घूमने लगता हूं। भांति भांति के फूलों और सजावटी पत्तियों की छटाएं मुझे गदगदा देती हैं। मोंगरों की पूरी लाॅन ही है। उद्यान की एक उत्तरी गलीं के दोनों तरफ भोर में झरे सिंन्दूरी डंठलोंवाले सफेद रंग के छोटे छोटे हरसिंगार के फूल अभी भी अपनी खुशबू बिखेर रहे हैं। यह खुशबू यूंही न बिखर जाए इस ख़्याल से मैं ज़ोर से सांस खींचकर सुगंध को जीभर कर फेफड़ों में भर लेता हूं। आजकल सुगंध मिलती कहां हैं ? वातावरण में पट्रोल, डीजल और दुनिया भर की दुर्गन्ध भरी हुई है। इसी पर्यावरणीय प्रदूषण ने अंदर के भावों और विचारो ंको भी शायद दुर्गन्ध से भर दिया है। इसलिए बहुत दिनों बाद मिले सच्चे मित्र की तरह शैफाली उर्फ हरसिंगार की उस सुगन्ध को मैं लपक कर अंजोर लेता हूं।
फिर मैं कृतज्ञता और प्रेम से झुकता हूं और पारिजात, हरसिंगार या शैफाली के नामों से विख्यात फूलों को चुनकर हथेलियों में भर लेता हूं। हरसिंगार की ये झाड़ियां तालाब के ईशान पर लगाई हैं। हरसिंगार देववृक्ष भी कहलाता है। ईशान कोण ही उसकी उपयुक्त जगह है। किसी वास्तुविद से परामर्श लेकर पारिजात का रोपण इस स्थान पर किया गया होगा। फिर मैंने बड़ी उत्सुकता से हरसिंगार की झाड़ियों को गिना। वे नौ थीं। निश्चित रूप से पालिका में कोई रसज्ञ सांस्कृतिक बुद्धिजीवी बैठा है जो इस ईश्वरीय वृक्ष को पूर्णांक ‘नौ’ में लगाकर अपनी परिमार्जित रुचि का परिचय दे रहा है। फिर परितुष्ट भाव से चलता हुआ, गेट के बाहर निकल जाता हूं। मुट्ठियों में बंद पारिजात के इन नन्हें फूलों की मीठी खुशबू के बाद मैं किसी भी तीखे-चरपरे ख्याल से अपने मस्तिष्क के पर्यावरण को खराब नहीं कर सकता था। नाक को खुश्बू लगे तो दिमाग को मिर्ची क्यों लगे।
मिर्ची से याद आया कि मुझे हरी मिर्ची लेकर लौटना है। मिर्ची सुबह के स्वाद को चटपटा कर देती है, इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए। वर्ना यह मिर्ची पांच करोड़ की सीधी चपत लगाती है। कल रात ही ‘एक करोड़’ जीतने वाले एक व्यक्ति के सामने ‘पांच करोड’ का यह सवाल आया था कि ‘‘संसार की सबसे तीखी मिर्ची कौन है।’’ विकल्प आने के पहले ही लोगों को लगा कि ऐश्वर्या, प्रियंका, कैटरीना और करीना के नाम आएंगे। मगर विकल्प में ग्लैमरस स्पाइसी हीरोइनों के स्थान पर सचमुच की मिर्चियां शामिल की गई। बिहारी प्रतियोगी ‘संसार की सबसे तीखी मिर्ची’ को नहीं पहचान पाया और पचास करोड़ जीतने से वंचित रह गया। जिस मिर्ची का नाम किसी ने नहीं सुना ....उसका नाम निकला - ‘स्कार्पियो बुच टी’....संक्षिप्त करके बोले तो- ‘एस बी टी’। एस बी टी’ बोलो तो ‘हरी मिर्ची’ सुनाई देता है।
अब चूंकि हरी मिर्ची मुझे खरीदते हुए जाना है, इसिलिए दिमाग में केवल एक ही चीज़ गूंज रही है- हरी मिर्ची।


डायरी, रपट, कहानी / 07.11.11-09.11.11

Note : मुझे जिन स्थलों को रेखांकित करने के अभिमत मिले उन्हें यथोचित रेखांकित कर दिया है। आप भी सुझाएं।

Monday, October 24, 2011

धनतेरस

दुनिया भर के तमाम मित्रों को धनतेरस और दीपावली की शुभकामनाएं।

आज धनतेरस है। दीपावली के पखवाड़े की त्रयोदशी को ही धनतेरस कहा जाता है। दीपावली लक्ष्मी पूजन की अमावस्या है , धनतेरस खरीद फरोख्त की संध्या है।
पर्वों , त्यौहारों और हमारी सामाजिकता के बनने, प्रचलित होने और विकसित होने के बहुविध आयाम हैं। बरसात हमारे रहन सहन और घरगृहस्थी पर जो कीचड़ उछालती है वह हम दुर्गोत्सव के रावणवध तक किसी तरह वैसा ही रहने देते हैं। फिर शुरू होता है साफ़ सफाई का दौर। जो प्रायः तीसरा को और उसके बाद शुद्धिकरण के साथ होता है। फिर जाते हैं गंगा , जहां दशगात्र और द्वादशी आदि तर्पणादि के क्रियाकर्म कार्यक्रम के रूप में क्रमवार निपटाये जाते हैं। फिर होती है तेरहीं जिसे गंगाजली पूजन भी कहते हैं। इस दिन समाज के साथ बैठकर खाना खाया जाता है और मृतक को बताया जाता है कि आज तुम्हारे मरने पर हमें और समाज को विश्वास हो गया और हमारे सारे रिश्ते नाते लेनदेन वाद व्यवहार सब समाप्त। तुम अब कहीं भी सुविधानुसार जन्म ले सकते हो। रावण के परिवार में इन पंद्रह दिनों में यही हुआ होगा।
किन्तु दीपावली तो राम के अयोध्या , अपनी राजधानी लौटने का उत्सव है। राम अमावस्या के दिन अयोध्या लौटे होंगे। रात को उनके लौटने की खुशी में दिये जलाए गए और खूम धूम से नगाड़े तुरही शंख आदि ध्वन्यात्मक वस्तुएं बजायी गई होंगी ताकि हर्ष दिगदिगन्त तक प्रसारित हो सके। आज इन सब का सामान्यीकरण फटाखों में हो गया है। मतलब ये हैं कि दीपावली रामागमन का हर्षोत्सव है।
धनतेरस क्या है? राम के चौदह वर्षों को रामानुयायी गिन रहे थे। पंद्रह दिन पहले से तैयारियां आरंभ हो गई होंगी। लीपना , पोतना , साज सजावट , बंदनवार , दिए पोनी सब एकत्र किये जाते रहे होंगे। दो दिन पहले ही सब काम , सारी तैयारी पूरी की जा चुकी है , इसके संकेत के लिए धनतेरस के दिए जलाए गए होंगे। बात गले नहीं उतरी न। गले के नीचे धन तेरस नहीं जाता। जाती तो दीपावली की लक्ष्मी पूजा भी नहीं है। दीपावली साधे सीधे लक्ष्मी पूजन है तो धनतेरस धन इत्यादि एकत्र करने और संपत्ति खरीदने और धान वगैरह की उगाही का दिन हो सकता है, सन्ध्या हो सकती है।
परन्तु यह धनवंतरी वैद्य महोदय की जयंती भी है। स्वस्थ ऋतु के आंरभ होने की घोषणा। स्वास्थ्य का अनुष्ठान , स्वास्थ्य महोत्सव। इन पंक्तियों के लिखने के दौरान अखबारवाला अखबारों के पुलिन्दा घर के अंदर पैठा चुका है जो मेरे पास आ चुके हैं। अखबारों के मुखपृष्ठ जनरुचि के अनुसार ‘दीपावली की शुरुआत आज से’ यानी धनतेरस से या धनतेरस आज , पूजे जाएंगे धन्वंतरी -कुबेर’ जैसी हेडलाइंस से भरे पड़े हैं। ये अखबार स्मरण करा रहे हैं कि समुद्र मंथन से आयुर्वेद के प्रणेता धन्वंतरी आज ही उत्पन्न हुए। धन्वन्तरी महर्षि ने संसार को औषधियों का अमृत दिया। अमृत के शाब्दिक अर्थ पर जाइएगा तो बहक जाइएगा। अमृत को रसायन या प्राश समझिएगा तो सम्हल जाइएगा।
सम्हलने के बाद एक दूसरे प्रकरण पर नजर जाती है। आज का दिन धन-धान्य के अधिष्ठाता कुबेर का भी अवतरण पर्व है। इस दिन कुबेर की प्रतीक बहुमूल्य सामग्रियां द्रव्य इत्यादि संग्रहित करने से वे चिरकाल तक स्थिर रहती हैं। बहुत वर्षों से प्रतीक्षित एक सोफा हम बुक कर आए हैं। आज दोपहर के पहले वह आ जाएगा। सोफा हमारे लिए बहुमूल्य सामग्री है। चिरकाल तक का तो पता नहीं पर दूकानदार कहता है कि हमारे पु़त्र-पुत्रियों के पुत्र-पुत्रियां इसपर बैठेंगे , इतना मजबूत और टिकाऊ है। दूकानदार जानबूझकर झूठ बोलता है ताकि आज का अभी चल जाए वर्ना वह जानता है कि पीढ़ियों की रुचियां बदलती हैं। और चाहता भी है कि नयी पीढ़ी आए जिन्हें फैंसी आइटम पसंद हैं। हमें भी पता है कि कल जब हम नहीं होंगे तब यह सोफा , नए सोफे में बदल जाएगा।
परिवर्तनशीलता की व्यावहारिता के चलते शाश्वत और चिरकाल जैसे मादक शब्दों पर मेरा कभी भरोसा नहीं रहा। इसलिए मैं ‘यावत जीवेत सुखं जीवेत’ को सार्थक और चारु वाक्य मानकर सोफे पर जीवन पर्यन्त बैठूंगा इतना तो तय है। कुबेर का पता नहीं , उनसे मेरी प्रायः नहीं पटी। मैं राजनीति में नहीं हू , कोई उद्योग मेरा नहीं है , मैं एन जी ओ भी नहीं चलाता।
बहरहाल , आज धनतेरस को केवल धन्वंतरी की ही नहीं , कुबेर की भी जयंती है। एक तीसरा शुभ मुहुर्त भी , कहते हैं कि आज है। श्रीवत्स योग आज ही है। इसके होने से धनतेरस का महत्व बढ़ जाता है। लक्ष्मी जी के प्रभु हैं ये। शायद यही कारण है इस वर्ष धनतेरस दो दिन मनाई जाएगी। आज और कल।
हम देख रहे हैं कि एक ही दिन कइयों का जन्म दिन हो सकता है। एक साथ कई संयोग हो सकते हैं। कई प्रसंगों के पर्व हो सकते हैं। होते ही है। कुछ लोग मनगढन्त किस्से भी गढ़ते हैं। किस्से हालांकि मनगढ़ंत ही होते हैं। आज भी होते हैं।
खोजी महाशयों में एक बहु-आशयी सज्जन हैं, उनके अनुसार धनतेरस ‘धन की तेरही’ हैं। तेरही की तरह फिजूलखर्ची है। उनके अनुसार ‘तेरहीं यानी मृतक की आत्मशांति के लिए मृत्युभोज का व्यर्थ सामाजिक आयोजन।’ इसके दो दिन बाद ‘बची खुची लक्ष्मी’ का पूजन, उससे क्षमा याचना , उससे प्रार्थना कि तुम थीं तो यह सब किया , यह सब किया ; इसलिए तुम बनी रहो। हम पर अपनी कृपा बरसाती रहो।
एक और सार्थक तर्क वे दिया करते हैं। इस स्वस्थ ऋतु में जब तुम आरोग्य के देव धन्वंतरी का जन्मोत्सव मना रहे हो और लक्ष्मी पूजन कर रहे हो तो करोड़ों के पटाखे फोड़कर वातावरण और पर्यावरण क्यों दूषित कर रहे हो ? लक्ष्मी की बर्बादी क्यों कर रहे हो ?

हमारी सामान्य जनता इस पचड़ और उधेड़बुन में नहीं पड़ती। क्या , क्यों, किसलिए , कबसे , कैसे , इससे किसको लेना देना ? कौन करता है इसकी फिक्र ? ये सब खुचड़ खाली बैठे बैठेठाले निठल्लों की है। जिन बुद्धुओं को लगता है कि उनके पास बुद्धि है वे ये सब बोदी जुगालियां करते हैं। बाकी लोग डूबकर आनंद लेते और देते हैं।
एतदर्थ, आस्थावान और उत्साह-समर्थ जनता के लिए एक समय सारणी प्रकाशित की गई है। पंडितजन कार्यक्रम अधिकारी के रूप में यह समय सारणी या कार्यक्रम बनाते और संचालित करते हैं। व्यापारी लोग लेनदेन के मुख्य अंको में अपनी अपनी भूमिका का निर्वहन यानी रोल प्ले करते हुए प्रभावशाली अभिनय करते हैं।
समय सारणी निम्नानुसार है-

धनतेरस के दिन

सुबह 9 बजे से 10.45 तक इलैक्ट्रानिक्स , भूमि , भवन की खरीद ;
दोपहर 1.36 से 3.01 तक सभी प्रकार के चैपहिए या दुपहिए ;
अपरान्ह 3.01 से 4.27 तक स्वर्ण , भूमि , भवन ;
शाम 4.27 से 5.55 तक रासायनिक , सजावट , मनोरंजन की वस्तुएं ;
शाम 5.55 से 7.28 तक वाहन की खरीद।
इस बीच 10.30 से 136 का समय शायद भोजन वगैरह के लिए हो सकता है। इसी प्रकार सन्ध्या 7.28 के बाद का समय ग्राहकों की समझदारी पर छोड़ दिया गया है।

हमारा त्यौहारिक वाणिज्य प्रबंधन भी कितना चौकस है जरा देखिए। बस देखते रहिए और कुछ न कहिए। आप देखेंगे कि हमारे अभावों और हमारे सामर्थ्य ने कई किस्से गढ़े हैं , कई कहानियां बुनी हैं। हमारी पीढ़ियों ने ये कहानियां अपनी अपनी रुचि से सहेजी और चुनी हैं। नई पीढ़ी इसे परम्परा के रूप में याद करती है और मनाती है। इसमें नयी झारलें लगाती है , नये रोगन करती है। यही उत्सव है। उत्सव से उत्साह का सीधा संबंध है। हम सब यही करते रहे हैं यही करे। इसलिए ..शुभ धनतेरस , शुभ दीपावली।
24.10.11

Wednesday, September 21, 2011

स्टेचू: अब कुछ नहीं बदलेगा

बच्चा है एक। इसी देश का है। इस देश में करोड़ों बच्चे हैं। ये करोड़ों बच्चे टीवी देखते हैं। टीवी में इन करोड़ों को हम क्या सिखा रहे हैं - स्टेचू ? स्टेचू बच्चों और बचकाने नवयुवकों का एक खेल है।
पिछली पीढ़ियों के सैकड़ों बच्चे यही खेल खेलकर बड़े हुए है। खेल बुरा नहीं हैं। इस खेल का आविष्कार सैनिक शिविरों में हुआ होगा। आर्डर हुआ - ‘स्टेचू’ ..तो चलता हुआ सैनिक प्रतिमा की तरह स्थिर हो गया। आर्डर हुआ ‘गो’ तो वह फिर हलचल में आ गया। इससे हमें अपने ऊपर नियंत्रण रखने का अभ्यास कराया जाता है। ओबेडियेन्स या हुक्मउदूली अथवा आज्ञाकारिता सिखायी जाती है। हम सीखने के लिए ही पैदा हुए हैं और बड़ी जल्दी आज्ञाकारिता या हुक्मउदूली अथवा ओबेडियेन्स को हम सीख जाते हैं। अपने अपने दलों में, वर्गों में ,जाति और संप्रदायों में , प्रार्थना समूहों में ,अपनी अपनी संस्कृति की भाषा मे , बस एक ही खेल खेला जा रहा है-अटेन्शन और रिलेक्स...सावधान और विश्राम, दक्षः और आरंभः ...
स्टेचू का यह खेल उस दिन मैंने किसी कार्यक्रम के बीच विज्ञापन सेशन में देखा...एक बच्चा अपनी हर मनपसंद चीज़ को स्टेचू करता आ रहा है। मुझे याद तो नहीं हैं किन किन चीजों को उसने स्टेचू किया पर वे सभी ऐसी चीजें रहीं होंगी जिन्हें आम तौर पर बच्चे पसंद करते हैं..चाइल्ड साइकोलाजी का दोहन विज्ञापन बनानेवाले न करें ऐसा हो नहीं सकता। बच्चा पसंदीदा चीजों को स्टेचू कर रहा है कि बाप की नजर उस पर पड़ती है। उसे हैरानी होती है कि केवल आदमियों को स्टेचू किया जाता है..यह चीजों को, वातावरण को स्टेचू क्यों कर रहा है? पूछता है बाप -‘ये क्या कर रहे हो ?’ बच्चा कहता है- ‘अब कुछ नहीं बदलेगा’’।
बच्चे हैं ऐसा सोच सकते हैं कि अब कुछ नहीं बदलेगा। कोई नहीं चाहता कि कुछ भी बदले। पर बदलना हकीकत है। तो क्या किया जाए कि कुछ न बदले? लाइफ इंश्यूरेन्श की पालिशियां ली जाएं। ताकि बदले हुए वक्त के हिसाब से हम अपने को एडजस्ट कर सके। बीस साल बाद जो वक्त आएगा वह एल आई सी से पूछकर आएगा। एलआईसी रिस्क लेता है कि बीच में मर जाओगे तो हम आकर्षक राशि देने का वादा करते हैं। हर साल तुम अपना वर्तमान काटकर भविष्य के घोड़े पर बेट लगाओ। लंगड़ा होने के बावजूद घोड़ा तुम्हें लक्ष्य तक पहुंचाएगा। हार भी गया तो तुम्हें तुम्हारी रकम वापस मिलेगी।
देखने में यह खेल बच्चे से शुरू हुआ है पर है यह बड़ों के लिए। बड़े सोच में पड़ जाते हैं कि कितने की लें। एक सीमा के बाद इंकम टैक्स के हिसाब से एलआईसी नकारा सिद्ध हो जाती है किन्तु भविष्य के भूत के लिए वह एक तुरुप का पत्ता तो है ही। यह पत्ता आरबीआई के हाथ में है।
इस विज्ञापन को देखकर मैं टेंशन में आ जाता हूं। अटेन्शन मेरा लाइफ के प्रति है पर लाइफ है कि उंगली उठाकर कह रही है ‘स्टेचू...मुझसे कुछ उम्मीद न करो।’ लाइफ सबकी उम्मीद तो होती है पर लाइफ से उम्मीद नहीं की जा सकती। लाइफ के लिए बस रातदिन दौड़ा जा सकता है, अपने को घैंका जा सकता है समस्याओं के भाड़ में..समस्याओं की आग से जब तुम संकटों की ज्वालाओं में घिर जाओंगे और जिन्दगी की तरफ दौड़ लगाना चाहोगे तो जिन्दगी कहेगी -‘‘स्टेचू....माफ करना मुझे केवल चक्रव्यूह बुनना आता है , निकलने के उपाय तो मैं भी नहीं बता सकती। बच्चे पूछते होंगे अपने अपने बाप अभिमन्युओं से कि डेड! क्या सचमुच एलआईसी ले लेंगे तो कुछ नहीं बदलेगा। बाप गहरी सांस खीचते होंगे और बच्चे की आंखों में देखकर चुप हो जाते होंगे। जो भविष्य बच्चे बुन रहे हैं ,उसका कोई सिरा किसी भी बाप के हाथ नहीं आ रहा है। एक जमाना था जब बीवियां स्वेटर बुनती थी और ऊन उलझ जाता था तो वे पतियों को चिल्लाती थीं...‘‘दुनिया भर की समस्याएं सुलझाते फिरते हो...ऊन सलझाओ तो जानूं।’’ मेरे जैसे समझदार पति आधा घंटा का समय मांगते थे और उलझे हुए ऊन को स्कूटर की डिक्की में डालकर आधा घंटे में उसे सुलझा देते थे। उसी तरह का दूसरा गोला बाजार से खरीदकर पत्नी की फटी हुई आंख के सामने रख देते थे। क्या होगा ,फिजूलखर्ची के विरोध में पत्नी के कुछ बेलनछाप भाषण होंगे पर वह कुछ देर की फजीहत ऊन सुलझाते बैठने के घंटों से ज्यादा झेलनीय है। पर बच्चों का क्या करें जो पूछ रहे हैं कि क्या अब कुछ नहीं बदलेगा। बदलने की शर्त एलआईसी है। किन्तु एलआईसी ऊन का दूसरा गोला नहीं है। दूसरा गोला अन्ना हजारे और बाबा रामदेव भी नहीं है। वे भी बस एलआईसी की तर्ज पर ‘योग क्षेम वहाम्यहम्’ हैं।
‘योग क्षेम वहाम्यहम्’ जीवनबीमा का अंबेसेडर-वाक्य है। यह अद्धाली गीता से उठायी गई है। जीवन की समस्याओं को गीता में एलोपैथिक टेक्नीक से सुलझाया गया है। गीता पढ़ने से समस्याओं के फलस्वरूप उत्पन्न रोगों के लक्षण दब जाते हैं। फलस्वरूप शब्द से याद आता है कि गीता कहती है.-‘मा फलेषु कदाचनः ’ फल का ख्याल मत कर। पर फल चाहिए सबको। सोना पहनना है पर सोना कै़द है बड़ी तिजौरियों में तो आम जनता क्या करती है कि ‘सोनास्वरूप’ ज़ेवर बाजार से खरीद लाती है। ऐसे जे़वर बाजार में बहुताअत से हैं। बिल्कुल सोने की तरह चलते फिरते उठते बैठते हैं। यानी चमक फीकी पड़ जाये या नया लेना हो तो बाजार में ले जाओ कुछ परसेन्ट काटकर नये दाम में नयी चीज आपकी। इस ‘सोनास्वरूप’ शब्द की तरह ही फलस्वरूप शब्द की रचना हुई है। आराम फल है पर लक्षणों का दब जाना भी आरामस्वरूप है। आराम नहीं है। गीता के वाक्य फल नहीं देते कर्म देते है। निरन्तर कर्म की प्रेरणा देते है। गीता आराम से पढ़ने का सद्ग्रंथ है। इसलिए एलआईसी ने इसे अपना लिया। श्रीकृष्ण की तरह वह कहती है ‘कर्म करो ..पालिसीज़ लो... फल की चिन्ता मत करो..वह हमारे पास सुरक्षित है।’
योग का अर्थ बीमा कंपनी के अनुसार ‘जोड़ना’ है- जोड़ने में ही कुशलता है। आम जनता योग- संयोग के अर्थ बुन लेती है..जब संयोग होगा, जब योग बनेंगे तब अपने भी दिन फिरेंगे..उनके लिए योग का अर्थ भाग्य है...उसका विश्वास है कि एक दिन घूरे के दिन भी फिरते हैं। किन्तु अभावों के ऋणों को जोड़कर धन नहीं किया जा सकता। ऋणों का अंबार धनात्मक नहीं हो सकता। यह गणित का सिद्धांत है। भारत को गणित में शून्य के आविष्कार का श्रेय प्राप्त है। जेल की कोठरी में गीता का अघ्ययन और गीता रहस्य लिखकर गांधी जी इसी नतीजे पर पहुंचे की शून्य ही सत्य है। उन्होंने उद्घोषणा की ‘ मैंने अपने को शून्य कर लिया है।’ आई रिड्यूस्ड माई सेल्फ टू ज़ीरो....उनके नाम पर शासन करनेवाले लोग इसी शून्य को बढ़ाते जा रहे हैं...महंगाई के एक ओंकार सतनाम के आगे शून्यों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं...विधायकों और सांसदों के वेतन के आगे और शून्य हर दूसरे तीसरे साल लग जाते हैं...जनता के शून्य का विस्तार हो रहा है। गणित के इसी शून्य-सिद्धांत के कारण अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब और अधिक शून्य होते जा रहे हैं। आपको आश्चर्य होना तो चाहिए कि गीता दोनों पढ़ रहे हैं...गरीब इस उम्मीद में कि आएगा आनेवाला...कहा है उसने कि आउंगा..और दुखों से ,समस्याओं से मुक्ति दिलाउंगा... गरीब समस्याओं से मुक्ति की उम्मीद में गीता पढ़ रहे हैं ओर राजनेता ओर अमीर कोई मुसीबत न आ जाए इस उम्मीद में गीता पढ़ रहे हैं।
अब क्या निष्कर्ष निकाला जाए ? क्या होगा ? क्या कुछ भी नहीं बदलनेवाला ? किसे स्टेचू किया जा रहा है..? समस्याओं को ? मंहगाई को ? सत्ता के छलावों को ? खुशहाली को तो किया नहीं जा सकता। कहां है वह खुशाहाली जिसे स्टेचू किया जा सके। ‘योगक्षेम वहाम्यहम्’ के छूछ में रस मीठा होगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। छूछों के बीच आकर भी ‘योगक्षेम वहाम्यहम्’ के प्रबंधक कहते हैं कि जोड़ों ताकि कल अभाव न हो। पर जोड़ो क्या ? मैंने सड़कों के किनारे गन्ने का रस निकालनेवाले देखे हैं। वे गन्ने के छूछ को तब तक पेरते रहते हैं जब तक कि छूछ के रेशे टूटकर न बिखरने लगें। कुछ लोग तो घानी यानी पेरनेवाली चरखियों के ऊपर बर्फ के ढेले रख देते हैं ताकि उससे पिघलकर बहनेवाले पानी में घुलकर रेशों में छुपी हुई मिठास निकल आए। शोषण का सिद्धांत किस मुस्तैदी के साथ इन चरखियों में चल रहा है। परन्तु छूछ में रखे-रखे रस नहीं आता। रसदार गन्ने तो पेरे जा चुके हैं या खांडसारी में जा चुके हैं। चतुर व्यापारी छलावे का , भ्रम का, भ्रांति का खेल खेल रहे हैं..अब तो बस पूर्णाहुति का मंत्र शेष है.
अस्तु ओम भ्रांति।


18.09.11

Sunday, August 28, 2011

चौराहे का गीत



बड़े शहर का चौराहा है, अब भी खड़ा हुआ।
इससे होकर जानेवाला, रस्ता बड़ा हुआ ।

आबादी बढ़ती है तो रफ्तार भी बढ़ जाती।
इसकी टोपी उड़कर उसके सर पर चढ़ जाती।
सत्ता अपना दोष प्रजा के माथे मढ़ जाती।
हर मुद्रा में झलक रहा है देश का बौनापन,
गांधीवाला नोट भी मिल जाता है पड़ा हुआ।

कंगाली के अनचाहे बच्चे हैं सड़कों पर।
चढ़ी जा रही फुटपाथों की धूल भी कड़कों पर।
तली जा रही भारत-माता, ताज के तड़कों पर।
आदर्शों के पांच-सितारा होटल में हर शाम,
हर इक हाथ में होता प्याला हीरों जड़ा हुआ।

उधर पीठ भी कर के देखी जिधर बयार बही।
उनका पानी दूध हो गया , मेरा दूध दही।
अपनी आप जानिये मैंने अपनी बात कही।
कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।


Wednesday, June 29, 2011

मेरा मुंह

मित्रों !
इन दिनों आपने भी देखा होगा कि जिसके जो मुंह में आ रहा है बोले जा रहा है। जिसको जहां जगह मिल रही है वहां मुंह मार रहा है। किस मुंह से लोग भ्रष्टाचार के विरोध में बोल रहे हैं और किस मुंह से लोग भ्रष्टाचार विरोधियों को पीटकर अपने मुंह से उसे उचित बता रहे हैं , यह समझ में नहीं आ रहा है। कौन सा मुंह लेकर कौन आएगा और आपके मुंह पर किसका मुखौटा चिपका जाएगा ,यह सोचकर ही झुरझुरी आ जाती है।
इसी झुरझुरी को मिटाने के लिए मैंने अपने ही मुंह को टटोलकर देखने की कोशिश की है। ‘ये मुंह और मसूर की दाल’ की तरह ‘छोटे मुंह बड़ी बात’ शायद कह रहा हूं और ‘मुंह उठाए’ आपके पास चला आया हूं। मैं आपका ‘मुंह इस उम्मीद में देख रहा हूं’ कि आप ‘मुंह बनाते है’ या मुस्कुराते हैं।


मेरा मुंह

मेरे पास एक मुंह है। किसी किसी के पास दो होते हैं। किसी के पास तीन होते हैं। चार मुंह वाले भी सुने हैं। पांच मुंह वाले एक मृत्युंजय के बारे में भी सुना है। उन्हीं का एक पुत्र छः मुंह वाला है। बात बढ़ी है तो दस मुंह वाले तक पहुंची है। एक समय ऐसा भी आया कि अलग अलग मुंह लेकर प्रकट होनेवाले एकमुखी ने पिछले सारे पिद्दियों के रिकार्ड तोड़ते हुए सहस मुंह वाला एक रूप भी प्रत्यक्ष किया। यह सब मेरी क्षमता के बाहर की बात है। इसलिए मैं अपने एक ही मुंह से संतुष्ट हूं।
संतोष इस बात का है कि यह मेरा अपना मुंह है। किसी किसी के पास तो किसी दूसरे का मुंह होता है जिसे लेकर वे बड़ी बड़ी बाते करते हैं। आजकल इस तरह की बातें बहुत हो रही हैं। एक ही आदमी कई आदमियों का मुंह लेकर बातें कर रहा है तो कोई अपना मुंह लीज पर उठाए हुए हैं। किसी के मुंह का उपयोग अमेरिका कर रहा है तो किसी का इटली। किसी के मुंह को किसी ने किराए पर ले रखा है तो किसी के मुंह से किसी और के मुंह की गंध आती है।
शुक्र है कि मेरे पास मेरा अपना मुंह है। हाथी ,घोड़े ,सुअर या सिंह का नहीं। अपने मुंह के बारे में दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि इस पर कोई लीपा पोती मैं नहीं करता। जैसा है वैसा ही रहने देता हूं। मेरा मुंह मौलिक , प्रायः प्रकाशित और प्रायः प्रसारित है। इसका प्रयोग अन्यत्र नहीं किया गया है। अगर इसकी नकल किसी ने की हो तो यह उसकी जिम्मेदारी है। इसके लिए मुझे दोषी न ठहराया जाये। इससे संबंधित सभी मुकदमें कहीं भी नहीं किये जाएंगे।
जैसा कि मैं निवेदन कर रहा था कि मेरा मुंह बिना लीपा पोती के मेरा अपना मौलिक मुंह है। जो मुझे जानने का दावा करते हैं उन्होंने मेरा मुंह देखा होगा और इसकी ताकीद कर सकते है कि इसमें कोई मिलावट नहीं की गई है। जो मेरा मुंह ही नहीं देखना चाहते उनसे मेरी कोई शिकायत नहीं है। ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें मेरे मुंह देखने की कोई इच्छा नहीं है। मुझे भी कहां है। मैं कह चुका हूं कि मैं अपने इकलौते मुंह से संतुष्ट हूं।
मेरे अपने एक मुंह की विशेषता यह है कि इसमें दो आंखें हैं। इससे मुझे यह सुविधा प्राप्त है कि इससे मैं दो दृष्टिकोण वाला हो जाता हूं। एक दृष्टिकोण मेरा अपना होता है और दूसरा सामनेवाले का। अपने दृष्टिकोण को मैं सामनेवाले पर नहीं थोपता और सामने वाले के दृष्टिकोण को जानता समझता हूं और अपने पर हावी नहीं होने देता। ऐसे लोग होते होंगे जिनके एक ही दृष्टिकोण होता है। ऐसे लोगों को कहनेवाले 'काना' कहते हैं। राजनीतिक दल इन्हें निष्ठावान और प्रतिबद्ध जैसे भारी भरकम नामों से संबोधित करते हैं जो हाजमोला के बाद भी चिपकू कब्ज की तरह उनके दिमाग में मरणोपरांत भी जमा रहता है। मैं तो भाइयों और बहनों! एक कामन मैन हूं , एक साधारण सा आदमी हूं। हालांकि वाद विवाद में अक्सर इस पर भी आपत्ति हो सकती है। प्रायः आश्चर्य से कहा जा सकता है-‘‘ यह आदमी है ? आदमी ऐसे होते हैं ?’’
आदमी कैसे होते हैं ,मैं सच कहता मुझे कुछ पता नहीं। बहुत से लोग मुझे आदमी कहते हैं तो मान लेता हूं कि मैं आदमी हूं। इसमें मेरी कोई हेकड़ी नहीं है। कोई मोह भी नहीं है। आप अपनी सुविधानुसार मुझे जो कहना है कह सकते हैं। मैं अपना दृष्टिकोण क्यों आप पर थोपूं ? मेरे दृष्टिकोण से हर आदमी को यही करना चाहिए। अपनी सीमाओं में सबको सब कुछ अपनी मर्जी से करना चाहिए और अपनी मर्जी किसी पर थोपनी नहीं चाहिए।
अस्तु मेरे अनुसार मेरे मुंह तो एक ही है और अद्भुत रूप से दो आंखें हैं जिसमें दो दृष्टिकोण हैं। एक मेरा है, जिसे मैं ओढ़ाता बिछाता हूं। यही मेरा किचन है, स्टडी रूम है। मैं इसी में सोता और जागता हूं। दूसरा मेहमानखाने की तरह है जो अतिथियों के लिए खुलता और बंद हो जाता है। झाड़ू देकर और दरियां झटकारकर मैं तहा देता हूं ताकि आने जाने वालों को बैठने और खासकर उठने में सुविधा रहे। क्षमा करे मैं इसे किराए पर नहीं उठाता। मुझे जमने और जम जाने वालों से एलर्जी है।
एलर्जी तो मुझे अपने मुंह पर ठीक आंख की हदों से ऊगनेवाली अनचाही और अनुपयोगी खरपतवार से भी है। मेरे मुंह की चमड़ी इनका तो तत्काल विरोध करती हैं। दो चार दिन अगर मैं आपत्ति नही उठाता तो चमड़ी उठाती है। वह दाढ़ी-क्षेत्र में फुंसियों की सेना भेजकर मेरे मुंह पर हमला करती है। नतीजें में मुझे दाढ़ियों का समूल सफाया करना पड़ता है। मित्रों ! मैं आज तक नहीं समझ पाया कि मुंह पर ऊगनेवाली खरपतवार का उद्देश्य क्या है ? दाढ़ियां बिना अनुमति के इस प्रकार जो मुंह के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण कर रही हैं , उससे वे बताना क्या चाहती हैं ? क्या वे यह कहना चाहती है कि इस देश जो जिसके मन में आए कर सकता है ? जहां चाहे वहां अपना कब्जा जमा सकता है ? कालिख मल सकता है ? अच्छे खासे सुदर्शन चेहरे को बिगाड़नेवाली अरी शूर्पनखाओं ! बंद करो यह जबरदस्ती की घुसपैठ। यह मुंह मेरा है, तुम पाक और अमेरिका की शह पर आतंक मचानेवाले अपराधियों की तरह इसे क्यों बिगाड़ रही हो ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? मैंने तुम्हें कभी आमंत्रित भी नहीं किया। मैं 'क्लीन' परिवार का आदमी हूं। मुफ्त की झंझट मैं कभी नहीं पालता।
हे दाढ़ी! मैं तुम्हारी और तुम्हारे सहोदर मूंछ की अवमानना नहीं कर रहा हूं , निवेदन कर रहा हूं कि आइ डोंट लाइक इट कि कहीं भी ठस जाओ। तुमसे मुझे कभी कोई लाभ नहीं मिला। लोग कर्ज लेने के लिए मूंछ के बाल रखते हैं ,ऐसा मैंने सुना है। मुझे कर्ज की जरूरत नहीं रहती। कितनी सी जरूरत है मेरी ? रोटी और मिल जाए तो दाल ,वर्ना चुटकी भर नमक भी रोटी के साथ बिना हील हुज्जत के पेट में आराम से उतर जाता है। हां ,कुछ लोग मूंछ पर ताव देकर अपना झूठा अहंकार दिखाते फिरते हैं ,यह मैंने भी देखा है। पर बहनजी ! मैं तो इस तरह का गुण्डा भी नहीं हूं। और ना ही मुझे अपनी दाढ़ी पर हाथ फेर कर संतुष्ट होने की आदत है। यह अश्लील कर्म मैं कर ही नहीं सकता। दाढ़ी व्याकरण के हिसाब से स्त्रीलिंग है और मैं स्त्रियों का बहुत सम्मान करता हूं। दाढ़ियों ! बाबाओं के पास जाओ। उन्हें दाढ़ियां रखने और उन पर हाथ फिराते बैठे रहने का अच्छा अभ्यास है। इस कर्म में उन्हें आनंद भी आता है और उन्हें ही लगता है कि इसमें उनकी गरिमा है। शायद उन्हें पता नहीं है कि दाढ़ियां खींचकर आनंद लेने वालों की कमी नहीं है। वे अपनी पराई दाढ़ियों का लिहाज नहीं करते हैं। बस खींच लेते हैं। (दाढ़ी मूंछ के शौकीन कृपया क्षमा करें। मुझे पसंद नहीं है तो क्या करूं ? इस मामले में मनमोहन सिंह जी अच्छे इंसान हैं। वे दाढ़ियां रखते तो हैं ,पर बांधकर रखते हैं।)
मित्रों ! इस अप्रिय प्रसंग को यहीं छोड़कर मैं अपने मुंह की सबसे अधिक मूल्यवान और उत्कृष्ट चरित्रवाली उपलब्धि पर आता हूं। यह मेरे मुंह की सबसे ऊंची चीज है। यह कोई हिमालय का एवरेस्ट नहीं है कि जिस पर कोई हिलेरी और त्वेन सेंग चढ़ उतर सके। इसकी ऊंचाई तक हम स्वयं भी कभी नहीं चढ़ सकते। जितना हम चढ़ते हैं, उतनी ही इसकी ऊंचाई बढ़ती जाती है। इसकी बढ़ती हुई ऊंचाई पर हमें अतिरिक्त सावधानी रखनी पड़ती है कि हम कहीं फिसल न जाएं। फिसले तो गए और दुखद है मित्रों कि इसका सारा खामियाजा भुगतना पड़ता है उसी को। फिसलते हम हैं ,कट वह जाती है। जी जी ..मैं अभी तक नाक की ही बात कर रहा था।
मैं बताना चाहता था कि मेरे मुंह पर एक सर्वोत्तम नाक भी है। इसमें दो छेद हैं जो अनुलोम और विलोम के काम आते हैं। विज्ञान का मुझे पता नहीं पर मेरा आत्मज्ञान कहता है कि एक छेद से आक्सीजन अंदर जाती है और दूसरे से कार्बन डाई आक्साइड बाहर आती है। आक्सीजन जलाने का काम करती है और कार्बन डाइ आक्साइड बुझाने का। जलाने वालों को अंदर किया जाता है और बुझानेवालो को बाहर का रास्ता दिखाया जाता है। यह बात मेरी कभी समझ में नहीं आयी। पर कुदरत का दस्तूर है ऐसा मानकर मैं कार्बन डाइ आक्साइड के पक्ष में ठण्डा पड़ा रहता हूं। कमाल है कि जलानेवाली आक्सीजन से विवाह के बाद जलने वाला बेचारा कार्बन अपने स्वभाव की ठण्डक के कारण बर्फ जमाने के काम आता है। जी नहीं मैं पति को कार्बन और पत्नी को आक्सीजन नहीं कह रहा हूं। आपकी मर्जी है आप जो चाहे समझ ले। मैं तो केवल नाक की बात कर रहा था। अपनी नाक की बात जो पोर्टेबल नहीं है। मैंने सुना है कुछ लोग नाक लगाते रहते हैं। मोबाइल फोन और लैपटाप के जैसे कवर लोग चेंज करते हैं शायद ऐसे ही नाक के कवर होते होंगे। जिस जगह जैसी जरूरत पड़ी वैसी नाक लगा ली। कुछ नाक कटती रहती हैं। नाक रिप्रडक्शन नहीं करती इसलिए हैण्डी प्लास्ट की तरह उस पर रेडी मेड कवर चढ़ा लिये जाते होंगे। कई धार्मिक संस्थान इस तरह के नोजोप्लास्ट बनाते हैं जो उन लोगों को राहत पहुंचाते हैं जिनकी नाक बड़े पैमाने पर कटती है। कटी हुई नाक के लिए ही जैसे ये संस्थान बनाए गए हैं। मैं साधन सम्पन्न व्यक्ति नहीं हूं इसलिए एक छोटी सी सावधानी बरत लेता हूं...भीड़ में और भाड़ में चलते समय रूमाल से नाक को ढंक लेता हूं। नाक पर तानकर घूंसा मारने वालों से भी इस तरह सुरक्षा मिल जाती है। हैंडीप्लास्ट और हैंडकरचीफ का आविष्कार करने वालों का धन्यवाद।
मेरे मुंह में दो कान भी हैं जो प्रायः घर और स्कूलों में खींचने के काम आते रहे हैं। इन्हें खींचकर खुद को बड़ा करनेवाले कई बौनों को मैं अपने कान दान में देना चाहता हूं। जब जब किसी ने मेरे कान खींचे हैं , मेरे दिल में यही ख्वाहिस हुई है कि ये कान इसी को दे दूं। खींचते रहेगा मनचाहे ढंग से और बड़ा होता रहेगा। मैं कोई बूचा नहीं हूं ,मेरे दो कान हैं। एक स्कूल में दान कर दूंगा और एक घर में टांग दूंगा। ऐसा मैं प्रायः सोचता था पर कर नहीं पाया। जीवन में बहुत सी बाते हम सोचते हैं ,कर नहीं पाते। जैसे मेरे मुंह में दो कान हैं ,दोनो से एक साथ सुनना चाहिए। पर मैंने क्या किया ...एक से तो सुनने का काम लिया और दूसरे से सब कुछ बाहर निकाल दिया। मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि अगर मैंने ऐसा न किया होता आज बुद्धिमान होता। कुछ अधिक अक्ल मेरे हिस्से में होती। अब मित्रों को क्या कहूं। क्या उन्हें बता दूं कि जितनी अक्ल मेरे पास है ,मैं उसी से परेशान हूं। अधिक होती तो दूसरे परेशान हो जाते। हम देख तो रहे हैं --अमेरिका और रूस और जर्मनी और ब्रिटेन और चीन और भारत...इन सबके पास कितनी अक्ल है। इस अक्ल से ये अपना कुछ भला नहीं कर पा रहे हैं। सिर्फ दूसरों को परेशान कर रहे हैं । आए दिन कोई न कोई राजनीतिज्ञ ज्ञान बांटने विदेश जाते रहता है। ज्ञान बांटने का जन्म सिद्ध अधिकार संतों बाबाओं और प्रवचन कर्ताओं को मिला हुआ है। जाते हैं आए दिन विदेश। सारी दुनिया एटम बम और न्युक्लिर बम और हाइड्रोजन बम और दूसरे अन्य उन्नत बमों से उतनी परेशान नहीं है जितनी इन भारतीय ज्ञानियों से है। अच्छा हुआ मैं ज्ञानी नहीं हुआ। गालिब के शब्दों में ‘मै न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।’ कभी कभी सुविधानुसार कबीर की भी मैं सहायता ले लेता हूं और अपने को संतुष्ट रखता हूं कि ‘ मौं सौ बुरा न कोय ।
कुलमिलाकर सब छोटे मुंह बड़ी बातें हैं। मेरा मुंह भी ऐसा ही है। मित्रों ! एक राज की बात कर के अपनी बात समाप्त करने की आज्ञा चाहूंगा। ऐसा ही होता है - बोलने की आज्ञा कोई नहीं लेता ,न बोलने की आज्ञा सभी लेते हैं। बहरहाल , मुंह को लोग होंटों के अंदर छुपे दांतों और जुबान के गठबंधन के रूप में भी जानते हैं। जुबान चलती है बहुत। दांत बहुत चाबते हैं। दोनों के संयोग से जो बातें निकलती हैं ,जिनसे इंसान के व्यक्तित्व की उदघोषणा होती है ,वही वास्तव में मुंह की शान भी हैं और अपमान भी। आए दिन ऐसा होता है कि जिसके मुंह में जो आता है कह जाता है। मेरे मुंह का मामला इस मामले में 'हां हूं 'तक सीमित है। पर मैं अपने अंदर के दांतों से परेशान हूं। इन घर में छुपे गद्दारों से मैंने गालों की दीवालों और जीभ पर इतने घाव खाए है कि क्या बताऊं। ये घाव कहते हैं कि मैं कुछ बोलूं। मैं हूं कि अक्ल की दाढ़ का इंतजार कर रहा हूं वह निकले तो मैं नकली दांत लगवाऊं। वे अगर चोट करेंगे तो उन्हें तुरंत बाहर निकालकर दुरुस्त कर लूंगा। दांतों से मैंने यह सीखा है कि ये खाने के दूसरे ही होते है। दूसरों के दांत तो दूसरों का खाकर खुश हैं। मेरे दांतों के पास दूसरों का नहीं पहुंच पाता तो वे मुझ पर ही आक्रमण करते हैं। दातों से मैंने यह भी सीखा है कि दुश्मन बाहर नहीं अंदर ही होते हैं। आप चाहें तो मुंह फाड़कर मैं दांतों के हमलों से विदीर्ण अपनी जीभ और गाल दिखा सकता हूं। दिखाऊं ? हां जी ,हां जी , फिर कभी , जब आप चाहें।
29.06.11

Saturday, May 7, 2011

अमर घर चल

कहानी
आज 'मदर्स डे' है ..यह कहानी शायद 'मां' के सम्मान में कुछ कहने का एक प्रयास हो !!!
अमर का बस्ता टूटी हुई बद्धियोंवाला झोला है। कहीं कहीं से फटा भी है। टूटी बद्धी उसने दूसरी साबुत बद्धी से बांध ली है। हाथ में उसे लेते ही वह स्कूल जाने के लिये तैयार हो जाता है।
स्कूल जाते समय उसे अपेक्षा रहती है कि एक ताजा रोटी और चाय मिल जाये। उसका मौन आरोप यह है कि सौतेली भाभी ने उसे काली चाय दी है और बासी रोटी दी है। सौतेली भाभी के बच्चों की चाय में दूध भी है और उनकी रोटी से भाप निकल रही है।
अमर जानता है कि विधवा मां दिन निकलने के पहले से मवेशियों की सेवा कर रही है। सौतेले बेटे के घर में अपने रहने लायक वातावरण बनाए रखने के लिए और अपने अमर को बासी रोटी के जुगाड़ के लिए उसे जानवरों को संभालना लाभ का सौदा लगता है। अमर ने देखा कि जिस समय उसके हाथ में बासी रोटी और काली चाय आई उस समय भी मां उपले थाप रही है।अमर की इच्छा में कई बार यह ख्याल हमारी मांग है कि तरह यह आया है कि मां सौतेली भाभी के स्थान पर रोटी बनाए ताकि भाप उड़ाती रोटियों और बासी रोटी के बीच कोई भेदभाव और ईष्र्या न रहे। मगर होता यह यह है कि हर इच्छा की तरह इस इच्छा की भी उपेक्षा हो जाती है।
हाथ आई बासी रोटी और उदासी को वह काली चाय के घूंट की तरह पीता है और उठकर आंगन में आकर दूर से ही मां को उपले थापते हुए देखता है। मां दसे नहीु देखती। मां उसकी उपेक्षा नहीं कर रही है बल्कि उसकी अपेक्षाओं से सामना नहीं कर रही है। मां उससे नहीं पूछती कि वह तैयार हो गया है और स्कूल जा रहा है। मां यह भी नही पूछती है उसने कुछ बासा-कूसा खा लिया या नहीं और दोपहर में खाने के लिए रोटी और अथानों रख लिया या नहीं। वह जानती है कि उसका हर सवाल बासी रोटी की तरह बासा और अथानों की तरह खट्टा है।
अपनी हर उपेक्षित अपेक्षाओं से उठती ऊब को वह उछाल देता है और टूटी हुई बद्धियों को हाथ में फंसाकर स्कूल की तरफ भाग लेता है।

फट्टी हुई फट्टी पर पालथी मारकर बैठे अमर ने देखा कि नंगे पांव चलते चलते उसकी एड़ियां फट गई हैं। मैल भर गया है उनमे। दुखती हैं। कभी कभी खून निकल आता है उनमें। वह एड़ियां दबाने लगा तो पढ़ने से चूका। तभी बेंत बरसी..सड़प..
अमर को ऐनक के पीछे से दो आंखें घूर रही थीं। वे आंखें ऐंठती एड़ी की पीड़ा से ज्यादा पीड़ाकारी थीं। पलटकर वह पढ़ने लगा....अ अनार का.. आ आम का...इ इमली का ...ई ईख का ...उ उल्लू का ..ऊ ऊंट का...... ए एड़ी का ...ऐ ऐनक का......ऐनक पर पहुंचते ही ऐनक के पीछे से शिक्षक की घूरती आंखें सनसनाने लगीं.....वह फिर पलटकर अ अनार में आ गया।
अनार उसने नहीं देखे। अनारी का उल्टा अनार होता होगा। उसने ‘नार’ भी सुना है। न होना ‘नार’ का भी अनार हो सकता है। सुना है एक अनार सौ को बीमार कर सकता है.....कोई विषैला फल होता होगा...ऊंह..उसे क्या ..वह आ आम पर पहुंचा...आम उसने खूब देखे और खूब खाए हैं...उसके मुंह में रस घुल गया..उसे गुटककर वह इ इमली पर आया...खट्टी मीठी गदराई पकी इमलियों के गुच्छे उसकी आंखों में झूलने लगे। स्कूल के दक्षिण में एक लाल मुरम की रोड चांद की तरफ़ जाती है..सुना है चांद नाम का गांव कोई बीस मील पर है..उस रोड के दोनों किनारे दूर तक इमली के झाड़ों से भरे हुए हैं....पेशाब-पानी की छुट्टी में ढेर सारे लड़के उन्हीं पेड़ों पर पत्थर मार मारकर इमली टपकाया करते हैं....नत्थू बनिया की दूकान से नमक की डलियां पार करके मजे से इमलियां खाते हैं...इमलियों की याद आते ही अमर की लार टपकी। जैसे तैसे उसे सुड़ककर वह ई ईख पर पहुंचा. ईख यानी गन्ना... जब गुड़ बनता है तो मां ईख काटने जाती है..कभी कभी वह भी जाता है और गन्ने बटोरकर घाने के पास ढेर करता है..घानेवाला उसे चूसने के लिए गन्ना दे देता है और घाने तथा उबलते कढाव से से दूर रहने की हिदायत भी देता है। उन हिदायतों को बिछाकर वह पेड़ के नीचे बैठ जाता है और ईख चूसता है।
बेंत फिर बरसी ..‘‘उल्लू के पट्ठे...ध्यान कहां है तेरा ?’’
होश आते ही अमर पीठ सहलाकर पढ़ने लगा-उ उल्लू का। ऊ ऊंट का......
बहुत देर से पालथी मारने से घुटने उसके दुखने लगे थे। ऊंट पर पहुंचकर उसने पैर को सीधा करना चाहा तो शिक्षक , ऐनक , आंख और बेंत उसके मस्तिष्क में चमक उठीं....‘‘ ऊंट पर टांग धरकर बैठेगा बे! उल्लू के पट्ठे...ढंग से बैठ।’’ एक बार उसकी इसी कोशिश पर शिक्षक ने फटकार लगाई थी। वह सहमकर अपने घुटने सहलाने लगा और आगे बढ़ा.....ओ ओढ़नी का.... ओढ़नी!!!....ओढ़नी पर पहुंचा तो जीभ दिखाकर और फिर ओढ़नी में मुंह छुपाकर भाग जानेवाली पड़ोस की लड़की उसकी आंखों में लहराने लगी। उससे जल्दी नजरें हटाकर वह एकदम औ औरत पर आ गया। औरत उसकी विधवा मां है। औरत सौतेली भाभी भी है। वह दोनों को याद करता है तो कांप जाता है। वह घबराकर घर की याद और औ औरत के पाठ को ऐसे उछाल देता है जैसे मटर छीलते वक्त मां उसमें से निकल आई इल्लियों को दूर उछाल देती है...अमर को इल्लियों से नफ़रत है। वह फिर अ अनार पर आ जाता है। हुंह..विषैला फल..सौ को बीमार करनेवाला..अच्छा हुआ उसने अनार नहीं देखे...

अक्षर अक्षर लिखना पढ़ना सीखने के बाद अमर ने पहला पाठ पढ़ा-अमर घर चल। मात्राविहीन अक्षरों का पहला गठजोड़........अ म र - घ र - च ल ।
इस पाठ को पढ़ते पढ़ते अमर रुआंसा होने लगा। आवाज़ उसके दिल के साथ साथ कांपने लगी। गला पैरों की लय में थरथराने लगा। किताबों के पन्ने पर लिखे अक्षर आपस में गुत्थम गुत्था हो गए....अमर घर चल....घर चल अमर....चल घर अमर....पूरी कक्षा में पूरे ज़ोर और शोर के साथ यही पंक्तियां गूंजने लगीं। अमर की आवाज़ ही गले में फंस गई थी। उसकी आंखों में उसका.....!..? ..नहीं ,नहीं .....उसके सौतेले भाई और उसकी सौतेली भाभी का घर घूमने लगा....
दिन भर घर की साफ़ सफ़ाई करती उसकी अपनी मां ..कभी मवेशियों के कोठे में उपले थाप रही है..कभी खेत के कुएं से पानी ला रही है..कभी घास ढो रही है..कभी लीप रही है..कभी पोत रही है..इसके बावजूद भी वह उसकी मां का घर नहीं है...और कभी कभी तो लगता है वह उसकी मां भी नहीं है...बस जब रात में कथरी में उसे पास सुलाकर उसके बालों में हाथ फिराती हुई सुबकती है और उसका माथा चूमती है..तब कहीं जाकर वह मां उसकी मां लगती है...कुलमिलाकर मां केवल रात की कालिख को आंसुओं से धोती हुई मां है..दिन में तो.......
नहीं..... अमर घर नहीं जा सकता...।
इस निश्चय तक पहुंचते पहुंचते आंसूं की बूंदे उसके गालों में फिसल आई। धीरे धीरे वे खाक में मिलकर धूसर हुई उसकी खाकी कमीज़ में आ गईं। कुछ बूंदें उसके खाकी पेन्ट में समा गईं। कुछ बूंदें फटी हुई खाकी फट्टी से झांकती धूल में मिल गयीं।
गहरी सांस लेकर उसने हाथों से छूटती किताब को संभाला ही था कि शिक्षक ने कड़ककर कहा-‘‘अमर पढ़।’’
चैंककर अमर पढ़ने लगा-अमर घर चल।

मध्याह्न भोजन की घंटी बज गई। सब लड़के अपनी अपनी गिलास और थाली लेकर भोजन कक्ष के सामने खड़े हो गए। अमर के पास भी थाली थी। वह उसे पेट से लगाकर भागा। पकानेवाली बाई दो पतीले दरवाजे पर रखकर बैठ गई थी। एक से वह भात निकालकर थाली में डालती थी और दूसरे से दाल उड़ेल देती थी।
अपनी अपनी थाली मे दाल-भात लेकर बच्चे मैदान में फैल गए......पेड़ के नीचे...दीवार की छांव में...फिसलपट्टी के नीचे...जिसकी जहां जगह बन गई थी वहां बैठ गए। कौन कल कहां बैठा था ,सब जानते थे। थाली में दाल भात आते ही जगह के झगड़े फीके और अलौने पड़ गए थे।
अमरूद के पेड़ के नीचे अमर की जगह थी। वहीं थाली रखकर वह बैठ गया। बासी रोटी से उकताया हुआ पेट भाप उड़ाते भात और दाल के लिए उतावला हो रहा था। उसने जल्दी भात दाल मिलाकर निवाला बना लिया। अभी पहला निवाला उठाया ही था कि दाल के पानी में तैरती हुई सफेद इल्ली पर अमर की नज़र पड़ी। निवाले के लिए खुला उसका मुंह खुला रह गया और हाथ मुंह के पास आकर ठहर गया...फटी हुई आंखें इल्ली पर जम गईं। फिर उसकी नज़र ने भात को टटोला। भात में सफेद इल्लियां बहुत ध्यान से देखने पर दिखाई देती थीं। दाल के पीले पानी में वे अलग दिख जाती थीं।
अमर के हाथ का निवाला थरथराकर फिसल गया। उसने घबराकर आसपास देखा। सारे बच्चे सड़सड़ दाल भात सुड़प रहे थे। अमर के खाली पेट में उमेठ सी हुई ..थाली लेकर वह पानी टंकी की तरफ भागा। उबकाई और थाली उसके हाथ से एक साथ छूटीं। खाली पेट से केवल पानी निकला।
चारों तरफ की हलचलें जैसे थम गयी। बाई आयी। शिक्षक आए।
‘‘ क्या हुआ ? तबीयत खराब है तेरी ?’’ शिक्षक ने घुड़ककर कहा। अमर की आंखें झपकीं..सर भन्नाया। वह कुछ बोल नहीं पाया।
‘‘ इसको पानी पिलाओ।’’ शिक्षक ने कहा तो बाई ने टंकी के नल से निकालकर पानी के दो घूंट पिला दिए। बाई ने पूछा-‘‘ ठीक लगा ?’’
‘‘ चलो बस्ता उठाओ और घर जाओ।’’ शिक्षक ने उसे छुट्टी देकर जैसे खुद मुक्ति पायी हो।

स्कूल के दरवाजे़ पर खड़ा अमर सोचने लगा कि अब वह कहां जाए ? शिक्षक ने कह दिया कि घर जाओ। अमर घर नहीं जाना चाहता। घर में उपले, बासी रोटी ,काली चाय.....कुड़कुड़ाती चीखती झींकती सौतेली भाभी...कुढ़ती बड़बड़ाती मां....स्कूल की तरफ़ देखता है तो दिखाइ्र देती हैं.....दाल में तैरती इल्लियां....वह गहरी सांस लेकर मुंह में हाथ फेरता है और चल पड़ता है...शाम होने तक घर लौटने के पहले उसे कहीं तो जाना पड़ेगा।

रेलवे लाइन के किनारे किनारे चलते हुए अमर वहां पहुंच गया है जहां खेत की मेड़ में एक घना बेर का पेड़ है। वह दौड़कर बेर के पेड़ के नीचे पहुंच जाता है। पूरे पेड़ में हरी ,पीली और लाल बेरों के गुच्छे झूल रहे हैं। वह टूटी हुई डाल फेंक फेंककर बेर गिराने लगता है।
अमर जानता है कि पत्थर मारने से चार छः बेर गिरती हैं जबकि डाल फेंकने से पचीस पचास बेर एक साथ गिर जाती हैं। मार के इस विस्तार को वह अच्छी तरह समझता है। इस प्रणाली से गिराई हुई पीली गदराई और पकी लाल बेर बीनकर वह कमीज की झोली में इकहट्ठा कर लेता है। फिर पेड़ के तने से पीठ टिकाकर वह एक एक बेर बड़े चाव से खाने लगता है। पेट की ऐंठन धीरे धीरे खत्म होती है। मुंह स्वाद से गीला हो जाता है। आज मां को भी वह मीठी गदरायी बेर खिलाएगा। मां कितनी खुश हो जाएगी।
वह पेड़ की तरफ देखता है। एक बड़े से गुच्छे में लटकी लाल पीली बेर ऐसे मुस्कुराती हैं जैसे वे मां की हंसती हुई आंखें हों। वह हंसने लगता है। उत्साह में डाल उठाकर वह फिर पेड़ की तरफ़ फेंकता है। ढेर सारी बेर जमीन पर गिरकर खिलखिलाने लगती हैं। वह दौड़ दौड़कर उन्हें उठाने लगता है। तभी एक आवाज़ आकर उससे लिपट जाती है-‘‘ ओरे अमर....कहां रे ? इस्कूल नइ गया का ?’’
यह ढोर चरानेवाले लखन की आवाज़ है..अमर की उमर का लखन उसका सबसे अच्छा दोस्त है। अमर के पलटते पलटते वह उसके पास आ जाता है। कुछ डालें और फेंकी जाती हैं। ढेर लग गया बेरों का। अमर का बस्ता और लखन का गमछा भर गया।
बेर खाते खाते अचानक लखन कहता है -‘‘होला खाएगा..?’’ अमर के नथुने में भुने हुए चने की गंध जैसे भर जाती है। वह आसपास देखता है। खेत में गेहूं और चने लहलहा रहे हैं। अमर हंसने लगता है। लखन भी हंसता है। फिर लखन उठकर अमर से कहता है-‘‘तू घास और तेवड़इया के झंखाड़ उखाड़ ला ,तब तक मैं चने और गेहूं उखाड़ लाता हूं।
‘‘और माचिस ?’’ अमर पूछता है।
‘‘ है मेरे पास..’’लखन कहता है और आंख मारकर अमर से पूछता है -‘‘ बीड़ी पीएगा..?’’
‘‘हाट्’’ अमर उसे हड़काता है तो हंसता हुआ लखन खेत में घुस जाता है।

‘‘ओहो...कितना मीठा है होला!’’ अमर चने और गेहू के होले को चबाता हुआ कहता है-‘‘ लखन मैं कुछ होला मों के लिए ले जाउंगा...।’’
‘‘ ले जा ..किसके बाप का है..न तेरा , न मेरा..’’लखन कहता है तो दोनों बापमुए इस बात पर हंसते हंै।
‘‘लखन!’’ अमर कुछ देर बाद बोलता है-‘‘ ढोर चराने का पैसा मिलता है ?’’
‘‘ पता नहीं...मुझे तो रात को रोटी दाल मिल जाती है..बस।’’ लखन बोला।
‘‘ दाल भात में इल्लियां होती हैं ?’’ अमर सहमकर पूछता है।
‘‘ नहीं....पागलक....दाल भात में भी कहीं इल्लियां होती हैं?’’ लखन ने हंसकर उसके सर पर चपत जड़ दी।
अमर बताना चाहता था कि स्कूल में होती हैं , पर वह सिहरकर चुप रहा। थोड़ी देर की कसमकस के बाद अमर ने हसरत से पूछा-
‘‘ लखन ! कल से मैं तेरे साथ आऊं ?’’
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Monday, February 21, 2011

बांझ आम इस बार बहुत बौराया ।।

कुदरत ने दिल खोल प्यार छलकाया
बांझ आम इस बार बहुत बौराया ।।

देख रहा हूं नीबू में कलियां ही कलियां ।
फूलों से भर गई नगर की उजड़ी गलियां।
निकले करते गुनगुन भौंरे काले छलिया।
उधर दबंग पलाशों ने भी अपना रंग दिखाया।।
बांझ आम इस बार बहुत बौराया ।।

खुसुर फुसुर में छुपे हुए फागुन के चरचे।
नमक तेल के साथ जुड़े रंगों के खरचे।
मौसम ने खोले रहस्य के सारे परचे।
कठिन परीक्षा है फिर भी उत्साह समाया ।
बांझ आम इस बार बहुत बौराया ।।

लहरायी बाली गेहूं की चने खिले हैं।
मिटे मनों के मैल खेत फिर गले मिले हैं।
बंधे जुओं के बैल चैन से खुले ढिले हैं।
गीत हवा ने लिखे झकोरों ने हिलमिलकर गाया।
बांझ आम इस बार बहुत बौराया ।।


17.02.11
गुरुवार

Thursday, February 3, 2011

लोभ की सृजन-धर्मिता

लोभ सृजन का मूल तत्व है। ‘एको अहं बहुस्यामि’ महावाक्य में एक से बहुत होने का लोभ छुपा हुआ है। लीपापोती करनेवाले औदात्त्य-लोभी इस ब्रह्म-सत्य को झुठला नहीं सकते।
लोभ में गहन आकर्षण का ‘सेब’ होता है जो न्यूटन जैसों के सामने ही पेड़ से टपकता है। ‘सत्य क्या है’ इस जिज्ञासा का लोभ उसे गुरुत्वाकर्षण की क्रेन्द्र-भूमि तक ले जाता है।
मेरी लार जिस सुन्दर वस्तु को देखकर टपकती है , उसे पाने के लिए मैं उतावला हो पड़ता हूं ,टूट पड़ता हूं। गिरता भी हूं और जिसे हम किस्मत कहते हैं उस ‘असफलता की राजकुमारी’ ने हमारी तरफ़ यदि ध्यान नहीं दिया तो पड़ा भी रह जाता हूं।
मानलें कि यह एक से दो होने का प्राथमिक-लोभ अगर फलीभूत हो गया तो दूसरा लोभ सताने लगता है , जिससे तीन होने का लोभ जागृत होता है। कभी-कभी दो और दो चार हो जाने के गणित से दो से चार हो जाते हैं। यही सृजन-धर्मिता है। इससे संगठन बनते हैं। अनुयायी 'बंधते' हैं और 'उन्माद की बंधुआगिरी' में लिप्त हो जाते हैं। संन्यासी लोग प्रतिक्रियावादी हैं जो प्रकृति की सृजन-शक्ति को अपनी उदासीनता से नष्ट कर रहें हैं, ऐसा कहना सत्य को एक तरफ से जानना है। दरअसल संन्यासी होकर ज्यादा विन्यास का सूत्रपात होता है। संन्यासी बड़ी असंख्य भीड़ का संगठनकर्ता होता है।। इन तमाम लोभों के पीछे सबसे 'शक्तिशाली लोभ' सक्रिय है जिसे 'मुद्रा-लोभ' कहते हैं। मुद्राएं हमारे तमाम लोभों की पालनहार हैं। विशाल घर, गाड़ी , व्यवसाय , विलास के सभी साधन , लोगों की भीड़, पार्टी, मौज़ और मज़े.....यानी 'रहिमन मुद्रा राखिए' क्योंकि 'बिन मुद्रा सब सून'।
इन दिनों हम विश्व के वाणिज्यिक वातावरण में 'मौद्रिक सांसें' ले रहे हैं। वैश्विक बाज़ार में ललचाने वाली चीजें रोज़ रूप बदलकर आ रहीं हैं। इन्हें हम अपने लिए चाहते हैं , अपने बच्चों के लिए चाहते हैं और अपने पड़ोसियों के लिए चाहते है। अपने और अपने बच्चों के गर्व के लिए चाही गई हर चीज़ पड़ोसी को जलाने के लिए होती है। यह मैंने टीवी विज्ञापन से जाना। टीवी में एक अप्राकृतिक आदमी लम्बे कान और पूंछ से हमें भयभीत करता हुआ उस वस्तु के दर्शन कराता है जिसे अपनाकर हम पड़ोसी को जला सकें। जलन की चूंकि पोल खुल गई इसलिए छुपछुपकर जलने का मज़ा लेने वालों ने उस टीवी को नकार दिया।
नकारने की जहां तक बात है तो मनुष्य हर उस चीज़ को धीरे धीरे नकार देता है ,जिसे प्रारंभ में वह बहुत प्यार करता है। नकारना भी नये सृजन का मूल तत्व है। यह दूसरा तत्व है।
लोभ का बाई प्रडक्ट है ताव। किसी के मौलिक सृजन से जल जानेवाला कहता है ‘अच्छा यह बात है ,मैं अभी इससे ज्यादा महंगा लाकर दिखाता हूं।’ चूंकि यह मौलिक रूप से घटित नहीं होता , इसलिए यह बाई-प्रडक्ट है।
कुलमिलाकर लालच या लोभ मनुष्य को उकसाकर कुछ करवाने का मूल प्रेरक है। इसीलिए बड़ी बड़ी कम्पनियां लोभ और लालच के बड़े बड़े ज़ाल फेंकती हैं। मनुष्य को चूंकि अपने द्वारा निर्मित किसी वस्तु की सुन्दरता पर उतना भरोसा नहीं है इसलिए वह हर प्रडक्ट के साथ ‘नैसर्गिक-लोभ’ की ‘प्रेरक-शक्ति’ के रूप में निर्मित एक स्त्री की तस्वीर चिपका देता है।
मेरे पास एक ऐसा ही लिफ़ाफ़ा आया है।
हम लोग बहुत दिनों से एक अच्छी कार लेने के चक्कर में हैं। यह बात पता नहीं कैसे दुनिया भर को सैकड़ों सालों से छापकर सपने बेचने वाली कंपनी को पता चल गई। उसे यह भी पता चल गया कि हम मीडियम प्राइज़ की कार लेने का ही मन बना रहे हैं इसलिए उसने साथ में लाखों रुपये नकद और गिफ्ट के रूप में देने का भी लालच लिफाफे में बंद कर भिजवाया है।
मैंने लिफाफा खोलकर देखा तो क्या देखता हूं कि एक रंगीन कागज पर तीन कारों के चित्र हैं। अलग अलग ब्रांड की इन कारों में सबसे सस्ती कार लोकप्रिय स्विफ्ट है जिसकी कीमत चार लाख है। सिटी है जिसकी कीमत आठ नौ लाख है। एक अफोर्डेबल एकर्ड है जो अछारह लाख की है। प्रत्येक कार का एक कोड है। उस कोड की एक 'की ' है जो संलग्न है। मुझे लिफाफे में जो 'की' मिली है, उसका कोड अठारह लाख की सबसे मंहगी कार से मिल गया है।
एक स्क्रेच कार्ड है जिसमें जितने सितारे निकलेंगे उतने गिफ्ट के हमदार हम हो जाएंगे। हमने स्क्रेच किया और अधिकतम तीन स्टार हमारे हाथ लग गए। यानी तीन गिफ्ट हमारे। मुझे तो उछल पड़ना था। परन्तु मैं खूसट आदमी प्रलोभनो से सावधान होता हूं , उछलता नहीं। जगत-भाषा में इस प्रवृत्ति को ‘बोरिंग’ कहते है।
मेरे पास अब बत्तीस लाख के मुख्य ईनाम के साथ सुपर बोनस तीन लाख कैश का प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव के नकाब में लोभ हंस रहा है। उसे ऐसा लग रहा है कि मूर्ख आदमी फंस रहा है।
मुझे सलाह मिलती है कि भेज तो दो। किस्मत का क्या भरोसा ,बुढ़ौती में खुल ही जाए। मैं आपस में नहीं उलझना चाहता इसलिए भेज देता हूं। मगर मेरे अंदर एक उजड्ड आदमी रहता है जो प्रलोभनों के ज़ाल में फंसने से कतराता है। वह ऐंठ रहा है कि जरूर दाल में काला है। मैं जाकर पहले सभी कागजों की फोटो कापी करवाता हूं और बिना टिकट लगाए लिफ़ाफा़ पोस्ट कर देता हूं। लिफ़ाफ़ा ही ऐसा है, जिसमें टिकट लगाने की जरूरत नहीं है। मैं जानता हूं कि रेतनेवाले सिंदूर का खर्च स्वयं उठाते हैं और चाकू तेज़ कराने का पैसा बकरे से नहीं लेते।
मैंने जब ध्यान से पढ़ा तो लोभ की कलई खुल गई। सयाने लोग कहते हैं कि उतावलेपन में हमेशा नुकसान होता है।
नुकसान क्या होगा कि अब तीन गिफ्ट पैक के साथ एक वी पी पी आएगी जिसकी कीमत पांचेक सौ होगी जो एक रंगीन मासिक पत्रिका के वार्षिक मूल्य का साठ परसेन्ट है।
फिर होगा एक ड्रा। जिस कार की चाबी मेरे पास भेजी गई है , ऐसी लाखों चाबियां दुनिया भर में भेजी गई हैं। जिनके नाम की चिट निकलेंगी वह ईनाम पाएगा। बाकी लोग साल भर पत्रिका पढेंगे और रोयेंगे..हाय कार.. हाय पैंतीस लाख का नकद रुपया। मैं इस प्रलोभन को रचनेवालों की सृजनधमिता का कायल हो जाता हूं। अपने को समझाता हूं-
‘‘ मूर्ख ! तू जब विद्यार्थी था तब इसी पत्रिका का वार्षिक ग्राहक था न। चल समझ ले कि तेरा विद्यार्थी काल फिर शुरू हो गया।
वैसे पत्रिका बुरी नहीं है। मध्यमवर्गी परिवारों में इसका क्रेज है। बौद्धिक नहीं है पत्रिका तो क्या हुआ। बुद्धि को व्यापार की दुनिया में वैसे भी पसन्द नहीं किया जाता।
मूर्ख बनने में विद्वान बनने की अपेक्षा कम तनाव और जोखिम हैं। मूर्खों की दुनिया में गलाकाट प्रतियोगिता नहीं है। ग्यारह रुपयों का चंदा देकर मूर्ख बनना सबको फायदे का सौदा लगता है। होली आ रही है। ग्यारह रुपये से लेकर एक सौ एक रुपये अलग रखकर झूमकर आनेवाली चौकड़ी का इंतजार कीजिए या करिए।


मित्रों! वसंत पंचमी पास है। सरस्वती पुत्रों के माध्यम से लक्ष्मीपुत्रों को फल देनेवाले इस मादक उत्सव की आप सभी को बधाइयां।

3.2.11,गुरुवार

Thursday, January 13, 2011

तीन मुक्तक

जिन्हें मोती ही भाते हैं , हन्स वोही कहाते हैं।
जहां गहरा मिले पानी , वहीं हाथी नहाते हैं।
जो उथले कीचड़ों में कूदकर फैलाते हैं दहशत ,
वो इकदिन अपने ही दलदल में गहरे डूब जाते हैं।
08.44 प्रातः ,13.1.11

कहीं ताना , कहीं निन्दा ,कहीं अलगाव फैलाते।
अगर बढ़ता है आगे कोई तो ये बौखला जाते ।
जो देता साथ कोई सच्चे दिल से ,सच्चे इन्सां का ,
ये उसको भी बुरा कहते ,स्वयं को ज्ञानी बतलाते ।
10.45 प्रातः ,13.1.11

कोई अमरीका जाता है ,किसी को रूस भाता है।
किसी को तेल अरबी तो किसी को चीन भाता है।
कोई जापान, स्विटजरलैंड,या आशिक है इटली का,
किसे है देश प्यारा ? किसको अपना देश भाता है ?
08.47 सायं 13.01.11

Saturday, January 1, 2011

नववर्ष की शुभकामनाएं







01. 01. 2011 , शनिवार*

एक एक दो भी , ग्यारह भी , यही बताने आया ,
नये साल संबंधों पर हो , इसी गणित की माया ।
नयी घटाएं लेकर मौसम दुनिया भर में छाया
आज नहीं , अब कल सोचेंगे-क्या खोया क्या पाया ?


*2011 का अंतिम दिन 31.12.2011 भी शनिवार है

शनीवार आरंभ है , शनीवार ही अंत
आते जाते एक हो , वही कहाता संत
एक नजर हो, एक हो बोली , भले अलग हो भाषा
एक हृदय की नेक भावना , फूले फले अनंत ।
0 डॉ. रामार्य