Sunday, August 28, 2011

चौराहे का गीत



बड़े शहर का चौराहा है, अब भी खड़ा हुआ।
इससे होकर जानेवाला, रस्ता बड़ा हुआ ।

आबादी बढ़ती है तो रफ्तार भी बढ़ जाती।
इसकी टोपी उड़कर उसके सर पर चढ़ जाती।
सत्ता अपना दोष प्रजा के माथे मढ़ जाती।
हर मुद्रा में झलक रहा है देश का बौनापन,
गांधीवाला नोट भी मिल जाता है पड़ा हुआ।

कंगाली के अनचाहे बच्चे हैं सड़कों पर।
चढ़ी जा रही फुटपाथों की धूल भी कड़कों पर।
तली जा रही भारत-माता, ताज के तड़कों पर।
आदर्शों के पांच-सितारा होटल में हर शाम,
हर इक हाथ में होता प्याला हीरों जड़ा हुआ।

उधर पीठ भी कर के देखी जिधर बयार बही।
उनका पानी दूध हो गया , मेरा दूध दही।
अपनी आप जानिये मैंने अपनी बात कही।
कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।


11 comments:

kshama said...

उधर पीठ भी कर के देखी जिधर बयार बही।
उनका पानी दूध हो गया ,मेरा दूध दही।
अपनी आप जानिये मैंने अपनी बात कही।
कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।
Kya baat hai!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यही सबकी पीड़ा है, जिसे आपने मुखर कर दिया.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर और सार्थक लेखन ..अच्छी लगी आपकी यह प्रस्तुति

ravikumarswarnkar said...

कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।

एक बेहतरीन गीत...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ...

वाह वाह.... खुबसूरत गीत...
सादर...

वन्दना said...

बहुत सुन्दर और सार्थक रचना।

indu puri said...

कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।
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जानती हूँ पढ़ लेंगे आप इन रिक्त स्थानों में लिखे शब्दों को.

vandana said...

कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।

बेहतरीन प्रस्तुति

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

उनका पानी दूध हो गया ,मेरा दूध दही।
अपनी आप जानिये मैंने अपनी बात कही।
कांटों पर चल-चलकर मेरे पांव कुठार हुए,
जितनी चोट पड़ी यह सीना उतना कड़ा हुआ ।।
बेहतरीन सार्थक चिंतन युक्त रचना....

अनुपमा पाठक said...

सार्थक प्रस्तुति!