Thursday, December 9, 2010

मुरली-चोर !


ब्रजकुमारी एकांतवास कर रहीं थीं। रात दिन राधामोहन के ध्यान में डूबे रहकर उपासना और उलाहना इन दो घनिष्ठ सहेलियों के साथ उनके दिन बीत रहे थे। भक्ति और प्रीति चिरयुवतियां निरन्तर उनकी सेवा में लगी रहती थीं।
एक दिन उन्हें ज्वर चढ़ा। यद्यपि ज्वर ,पीड़ा ,संताप ,कष्ट ,व्यवधान आदि आये दिन उनके अतिथि रहते थे। उनकी आवभगत में भी वे भक्ति और प्रीति के साथ यथोचित भजन और आरती प्रस्तुत करती थीं। आज भी वे नियमानुसार जाप और कीर्तन करने लगीं।
उनकी आरती और आर्तनाद के स्वर द्वारिकाधीश तक पहुंचे। उनके गुप्तचर अंतर्यामी ‘सर्वत्र’ और अनंतकुमार ‘दिव्यदृष्टि’ उन्हें राधारानी के पलपल के समाचार दिया करते थे।
समाचार प्राप्त होते ही तत्काल वे उनके पास पहुंच गए। भक्ति और प्रीति ने दोनों के लिए एकांत की पृष्ठभूमि बना दी और गोपनीय निज सहायिका समाधि को वहां तैनात कर दिया। उपासना और उलाहना मुख्य अतिथि के स्वागत सत्कार में लग गईं।
‘‘ कैसी हो ?’’ आनंदकंद ने चिरपरिचित मुस्कान के साथ पूछा।
‘‘ जैसे तुम नहीं जानते ?’’ माधवप्रिया ने सदैव की तरह तुनककर कहा।
‘‘ पता चला है कि तुम्हें ज्वर है।’’ हंसकर माधव ने प्रिया के माथे पर हथेलियां रख दीं। राधिका ने आंखें बंद कर लीं। एक अपूर्व सुख ने उनकी आंखों की कोरों को भिंगा दिया। मनभावन ने उन्हें पोंछते हुए कहा: ‘‘ ज्वार और भाटे तो आते रहते हैं राधे ! परन्तु समुद्र अपना धैर्य और संयम नहीं खोता। उठती हुई उद्दण्ड लहरें किनारों को दूर तक गीला कर देती हैं...फिर हारकर वे समुद्र में जा समाती हैं।’’
‘‘बातें बनाना कोई तुमसे सीखे।’’ मुस्कुराकर राधा ने आंखें खोल दीं। फिर उलाहना देती हुई बोली:‘‘हरे हरे ! बस बन गया बतंगड़....थोड़ी सी समस्या आयी नहीं कि लगे मन बहलाने। पता नहीं कहां कहां के दृष्टांत खोज लाते हो।’’ उरंगना का उपालंभ सुनकर आराध्य हंसने लगे तो आराधना भी हंसने लगीं। कुछ पल इसी में बीत गए।
थोड़ी देर में राधिका फिर अन्यमनस्क (अनमनी) हो गईं। कुछ देर सन्नाटा खिंचा रहा। उनका मन बहलाने के लिए चित्तरंजन ने फिर एक बहाना खोज लिया:‘‘ राधे ! इच्छा हो रही है कि तुम्हें बांसुरी सुनाऊं। पर कैसे सुनाऊं ? वह बांसुरी तो किसी चोर ने कब की चुरा ली।’’
राधा ने आंखें तरेरकर कहा:‘‘ तुम लड़ाई करने आए हो या सान्त्वना देने ?’’
भोलेपन का स्वांग रचते हुए छलिया ने कहा:‘‘ मैंने तो कुछ कहा ही नहीं.. तुम पता नहीं क्या समझ बैठीं...?’’
‘‘ रहने दो...जो तुम्हारे प्रपंच को न समझे ,उसे बताना ..मैं तो तुम्हारी नस नस पहचानती हूं.....बहुरुपिये कहीं के..’’ राधा के गौरांग कपोल गुलाबी होने लगे। आनंद लेते हुए आनंदवर्द्धन ने कहा:‘‘ अच्छा तो तुम सब जानती हो...?’’
‘‘हां..हां..सब जानती हूं...कोई पूछे तो ...’’ मानिनी ने दर्प से कहा।
‘‘ अच्छा ..तो बताओ...मेरी बांसुरी कहां है ?’’ त्रिभंगी ने तपाक् से पूछा।
राधा के चेहरे पर हंसी की एक लहर आई। उसने उसे तत्परता से छुपाकर कहा:‘‘ मुझे क्या पता....क्या मैं चुराई हुई वस्तुओं को सहेजती रहती हूं....कि मैं कोई चोरों की नायिका हूं...?’’
‘‘ क्या पता...तुम्हीं कह रही हो कि तुम्हें सब पता है....फिर किसी के बारे में कोई कुछ नहीं जानता...मैंने कोई गुप्तचर तो नहीं लगा रखे हैं....बस एक अनुमान से कहा कि कौन है जो मेरी प्राणप्रिय बांसुरी को हाथ लगा सकता है।’’ नटखट ने टेढ़ी मुसकान के साथ कहा तो अलहड़ ने भी कृत्रिम जिज्ञासा से कहा:‘‘ क्या अनुमान है तुम्हारा ...सुनूं तो ?’’
‘‘अब कौन छू सकता है उसे ....तुम्हारे अतिरिक्त...।’’ कृष्ण ने दृढ़ता से कहा।
‘‘मेरा नाम न लेना ...जाने कहां कहां जाते हो ..किस किसके साथ रहते हो...मैं क्या जानूं तुम्हारी घांस फूस की लकड़िया को......मेरे पास क्या कमी है ?’ फिर कनखियों से उसने मनमीत की ओर देखकर कहा ‘‘ तुम्हें ही नहीं मिलता कुछ...कहीं इसका कुछ लिया ...कहीं उसका कुछ..’’
‘‘ तुम्हारा क्या लिया ?’’ अबोध बनते हुए कृत्रिमता से कृष्ण ने कहा। राधा तमतमाकर कुछ कहना ही चाहती थीं कि कृष्ण हंसने लगे। उनका हाथ पकड़ककर बोले:‘‘ अब जाने दो प्रिये! बता भी दो ,कहां छुपाई है बांसुरी...कुछ नई तानें सुनाकर तुम्हारा ही मन बहलाना चाहता हूं...’’
बृषभानु लली ने मुस्कुराकर कहा:‘‘ तो एक शर्त है...प्रतिज्ञा करो कि अब तुम एक पल भी मेरे पास से कहीं और न जाओगे....।’’
‘‘ओहो......!!‘‘ रणछोड़ ने सिर हिलाकर कहा: ‘‘.इसे ही कहते हैं....न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी.....प्रिये! तुम तो जानती ही हो कि केवल कहने को मैं द्वारिका का अधिपति हूं....इन्द्रप्रस्थ भी जाना होता है और मथुरा भी.....जहां से भी पुकार आती है और जहां दाऊ भेजते हैं , जाना पड़ता है.....मैं तो अपना ही स्वामी नहीं हूं.....’’ सर्वेश ने अपने को सर्वाधीन होने के पक्ष में तर्क देकर बहलाने का प्रयास किया।
‘‘ बस बस .....‘‘ राधा ने कृष्ण का ध्यान उत्तरदायित्वों की ओर से हटाने का उपक्रम किया:‘‘तुम्हारे अनंत अध्याय अब यहीं रहने दो ......मैं अर्जुन नहीं हूं और ज्ञानी भी नहीं हूं......और यह तान तो मुझे मत ही सुनाओ ...... सुनानी है तो बांसुरी सुनाओ...’’
‘‘ हां..हां ...लाओ ना , कहां है बांसुरी ?’’ कृष्ण ने बड़ी तत्परता से अवसर दिये बिना कहा।
‘‘ हूउंउऊं...आ गए न अपने वास्तविक रूप पर...’’ राधा इठलाकर चिहुंकी और फिर मुकरकर बोली: ‘‘ जाओ , मुझे कुछ नहीं पता। बड़े आए छलिया छल करने......तुम्हे बांसुरी मिल जायेगी तो फिर ...तो...फिर ...तुम पलटकर नहीं आओगे...अभी बांसुरी के बहाने आ तो जाते हो..’’ उनकी पलकें गीली होने लगीं।
कृष्ण ने बात पलटकर कहा ‘‘ जाने दो...मैं अब छलिया तो हो ही गया हूं...पर सोच लो ... तुम्हें भी लोग बंसीचोर और मुरलीचोर कहेंगे..।’’
‘‘ मुझे कोई ऐसा नहीं कहेगा...तुम्हीं मुझे लांछित करने की चेष्टा कर रहे हो...है कोई , जो प्रमाण के साथ कह सके कि मैंने तुम्हारी बंसेड़ी ली है ? तुम्हीं कह रहे हो बस....किसी ने सही कहा है ...चोरों को सब चोर ही दिखाई देते हैं...’’ राधा ने ठसक के साथ कहा।
‘‘ मैं चोर ?’’ कृष्ण ने अचंम्भित होने का स्वांग रचते हुए कहा ‘‘ अब यह नया लांछन दे रही हो तुम..पहले छलिया ...अब चोर। मुझे कौन कहता है चोर ?’’
‘‘ सब कहते हैं.....क्यों , बचपन में मक्खन चुराया नहीं करते थे ? सारी ग्वालनें त्रस्त थीं तुमसे..पलक झपकते ऐसे माखन चुराते थे जैसे कोई किसी की आंखों से काजल चुराले.. ’’
‘‘ बालपन की बातें न करो...तब कहां बोध रहता है ?’’ कृष्ण मुस्कुराए।
‘‘ पढ़ने गए तो अपने सहपाठी सुदामा के चिउड़े किसने चुराए थे ? ’’ राधा आंखें नचाकर बोली।
‘‘ वह तो मित्रता थी....एक मित्र दूसरे मित्र की वस्तुएं ले लिया करता है..इसे चोरी नहीं कहते..बंधुत्व कहते हैं।’’कृष्ण की मुस्कुराहट गहरी हो रही थी।
‘‘ कपड़े चुराना तो चोरी है न ? जो तुम्हारे मित्र नहीं हैं, उनके वस्त्रों की चोरी तो की थी न तुमने ? कि वह भी झूठ है ?’’ राधा ने रहस्यात्मक स्वर में कहा।
‘‘किसके कपड़े चुराए थे मैंने ?’’ लीलाधर ने अनजान बनते हुए कहा।
‘‘अब मेरा मुंह न खुलवाओ...जैसे कुछ जानते ही नहीं....लाज नहीं आती तुम्हें ?’’ लाजवंती ने लज्जा के साथ कहा।
‘‘ अरे जब कुछ किया ही नहीं तो काहे की लाज ? तुम तो मनगढ़न्त बातें करने लगीं....न देना हो बांसुरी तो ना दो...लांछित तो न करो।’’ नटवर ने कृत्रिम रोष से कहा तो रासेश्वरी बिफरकर बोली ‘‘ झूठे कहीं के...नदी में नहाने गई गोप कन्याओं के कपड़े नहीं चुरा लिये थे तुमने.? सारा ब्रज इसका साक्षी है। जानबूझकर धर्मात्मा न बनो !’’ सांवले कृष्ण ने देखा कि हेमवर्णा माधवी उत्तेजना में लाल हो गयी थी।
यदुनन्दन हंसने लगे ‘‘ चुराए नहीं थे गोपांगने ! उनकी रक्षा की थी , सहायता की थी। नदी के तट पर खुले में रखे वस्त्र सुरक्षित नहीं थे। उन वस्त्रों को बंदर तथा दूसरे पशु क्षतिग्रस्त कर सकते थे...गौएं चबा सकती थी......’’
राधा ललककर हाथ नचाती हुई बोली ‘‘ चुप रहो...अपने तर्क अपने पास रहने दो...ज्यादा लीपा पोती न करो...गौओं की बात करते हो !....तो सुनो ...तुमको सब सम्मानपूर्वक गोपाल कहते हैं..पर गाय की चोरी का लांछन भी तो है तुम पर.....इसके उत्तर में है कोई नया कुतर्क तुम्हारे पास ?’’
‘‘ कुतर्क नहीं हैं शुभांगिनी ! एक ज्योतिषीय त्रुटी की बात है इसमें...तुम भी जानती हो..’’ राधावल्लभ ने लगभग ठहाका लगाकर कहा।
चिढ़कर राधा ने कहा ‘‘ झूठे ठहाके न लगाओ...तुम ज्योतिष को कब से मानने लगे.?..सारी मान्यताओं को झुठला देनेवाले क्रांतिकारी ! तुम किस ज्योतिष के फेर में मुझे बहका रहे हो ?’’
‘‘ बहका मैं नहीं रहा हूं ...ज्योतिष बहका रहा है ? क्या तुम नहीं जानती कि मैंने भादों की चौथ का चांद देख लिया था तो तुमने कहा था....‘ शिव! शिव !! अशुभ हो गया ...तुम पर चोरी का आरोप लग सकता है।’ घटना तो तुम्हें याद है न ......’’
राधा ने मुंह बनाकर कहा ‘‘ रहने दो , मुझे कुछ नहीं याद ..’’
मनमोहन ने इस पर फिर ठहाका लगाया और बोले ‘‘ याद तो है मानिनी , नहीं मानती तो बता देता हूं कि क्या हुआ .....कि एक बार कदंब के नीचे मैं सो रहा था...तुम्हारी ही प्रतीक्षा में नींद लग गई थी। कुछ चोर गाय चुराकर भाग रहे थे....गोस्वामियों ने उनका पीछा किया...वे गाय छोड़कर भाग गए..गाय भटककर मेरे पास आईं और पेड़ की छांह में जुगाली करने लगीं...गोस्वामी आए ..मैं कंबल औढ़े पड़ा था ...वे पहचान न पाए... उन्होंने मुझे चोर समझ लिया...सुन रही हो गोपाल को चोर समझ लिया !! बस , हल्ला मच गया...बाद में तो सत्य सामने आ गया...पर तुमने और तुम्हारी सहेलियों ने छेड़ने के लिए अब भी मुझ पर यह छाप धरी हुई है.....किन्तु ,प्रिये! .......’’ कृष्ण राधा के थोड़ा पास आकर बोले ‘‘ लांछनों का टोकरा समाप्त हो गया हो ,तो चित्त को शांति पहुंचे ,ऐसी बातें करें ?’’
‘‘ कौन से चित्त की शांति की बातें कर रहे हो चितचोर!’’ राधा की आंखें डबडबाने लगीं‘‘ चित्त होता तो शांति होती...मन है तो वह वश में नहीं है....वह भी तुम्हारा ही गुप्तचर है...आंखें भी बस तुम्हारी अनुचरी हैं...उन आंखों की नींद भी तुमने चुरा लीं हैं। रात दिन जागकर जैसे वे मुझपर ही पहरा देती रहती हैं। तुम कहते हो , चित्त की शांति की बातें करें ’...कैसे करें ?’’ कहते कहते राधा का स्वर रुंध गया...आंखों से आंसू टपकने लगे। चितचोर ने आगे बढ़कर प्रेयसी के कपोलों से बहने वाले आंसू को तर्जनी से समेटते हुए कहा: ‘‘ ओह! ये नीलमणि से अनमोल अश्रुकण !!...इन्हें व्यर्थ न बहाओ...अभी तो चौथ के चांद का एक और आरोप मुझपर शेष है....वही नीलमणि की चोरी का ..जिसके कारण जामवंत से मेरा द्वंद्व हुआ था...। फिर चित की और निद्रा की प्रसिद्ध चोरनी तो तुम भी हो.... हमारे ये दो अपराध तो समान हैं...हैं न ?’’
जगन्नाथ कुछ और कहते कि राधा ने बीच में टोक दिया -‘‘ बस ,अब चुप भी करो। ‘‘
चितचोर की चितचोरनी रोने लगीं। गौरांगी ने श्यामल की काली कंबली में अपना स्वर्णाभ मुख छुपा लिया। वेणुमाधव भी जैसे पराभूत हो चुके थे। वे अपने अंदर उमड़ते ज्वार को भरसक रोकते हुए धीरे धीरे अपनी उर-बेल के केशों को सहलाते रह गए।

डॉ. आर.रामकुमार,

Thursday, November 25, 2010

बुरा न मिल्या कोय

खोजी पत्रकारिता के इस युग में केवल कबीर ही प्रासंगिक हैं। क्योंकि कबीर में भी वही आदत थी जो आज के खोजी पत्रकारों में है। बहुत खोजने के बाद कबीर कहते हैं,‘बुरा जो खोजन मैं गया’। आज के खोजी पत्रकार भी हमारे देश में बुराई को ही खोज रहे हैं। यहां कहां मिलेगी भैया ! बुराई और इस देश में। हमारे देश की एकमात्र अवधारणा है कि बुराई तो केवल विदेश में है। अब इस अवधारणा को तुम बुराई मानते हो तो मानते रहो। पर बुराई यहां कहां? यह तो ऊंची संस्कृति और नैतिकतावाला देश है। आगे जाओ और कोई दूसरा देश देखो। यहां न बुराई थी , न है , न रहेगी।
तुम्हें क्या पता नहीं कि तुम्हारी तरह पहले एक कबीर आए। खूब इधर उधर खोजते रहे। पर बुराई उन्हें भी कहां मिली ? हार कर उन्होंने कहना पड़ा -‘‘ बुरा जो देखन मैं गया , बुरा न मिल्या कोय।’’
नई मिलता न, क्या करोगे ? हमारे देश की यही बुराई है कि यहां खोजने पर भी कोई बुरा नहीं मिलता। खोजनेवाला बुरा हो सकता है, मिलनेवाला बुरा हो ही नहीं पाता। वह ले देकर अच्छा ही होता है। हमारे देश में बुरा कोई है ही नहीं । सब अच्छे हैं। वैसे सारी दुनिया में एक हमारा ही तो देश अच्छा है। हमारे देश को छोड़कर जानेवाले मोहम्मद इक़बाल को भी आखिर कहना पड़ा ‘‘ सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’’ तुम बेकार सिर मार रहे हो ,जो यहां बुराई खोज रहे हो। बुराई यहां कहां मिलेगी ?
और जब इस देश में बुराई नहीं है तो मेरे नगर में तो हो ही नहीं सकती। इस देश की पतीली के भात का एक दाना है मेरा नगर। देश को देखना है तो मेरे नगर का ‘सीता’(भात का दाना) दबाकर देख लो।
यानी जो देश में हो रहा है , वह मेरे नगर में हो रहा है। इस बात के साथ स्पष्ट कर दूं कि हो सकता है कुछ इधर का उधर हो जाए और कुछ उधर का इधर हो जाए। इसलिए निवेदन है कि मुझे पढ़ते हुए शहर सोचे कि यह देश के बारे में है और देश यह समझे कि यह इसके शहर के बारे में है। वरना मुझे जो सजा देने आएगा वह एक दूसरे को सजा देगा। क्योंकि मैं शहर का भी हूं और देश का भी। मेरे लिए दोनों प्रिय हैं। यह बात अलग है कि दोनों को मैं प्यारा हूं या नहीं यह बाकी सब जानते हैं मैं नहीं।
कभी कभी मुझे बताया जाता है कि मैं दोनो ंके लिए मूल्यवान हूं जब चुनाव होता है। मैं अपनी जिम्मेदारी दोनों के प्रति मानता हुआ दोनों को मतदान करता हूं। वैसे ये तीन हैं। नगर और देश के बीच में एक प्रांत भी है। एक व्यक्ति नगर का भी है जहां पार्षद जैसे अच्छे लोग है, प्रांत का भी है जहां विधायक जैसे नागरिकों से अच्छे लोग हैं और देश का भी है जहां सांसदों से जैसे सुशांत, संभ्रांत और संसदीय लोग हैं। तीनों के लिए मुझे दान करना पड़ता है अपने अमूल्य मतों का। तो सब आपस की बात समझते हुए खुश रहिएगा, बुरा मानने की क्या बात है।
बुरा तो हमारे आत्मानंद जी भी नहीं मानते और सदानंद भी। एक हैं वर्णानंद जी। वे पेशे से पत्रकार हैं। वे खोजखोजकर ऐसा कुछ छापते हैं कि कायदे से आत्मानंद और सदानंद को बुरा मानना चाहिए ,पर नहीं मानते। तीनों का अनन्याश्रित रिश्ता है। जो कुछ आत्मानंद और सदानंद ‘सृष्टि’ करते है , वर्णानंद उसी पर ‘दृष्टि’ करते हैं। बुरा मानने वाली बात कोई है ही नहीं।
वैसे भी सृष्टि के दो पहलू हैं। इधरवाला पहलू और उधरवाला पहलू। सृष्टि के उधरवाले पहलू में आत्मानंद हैं और इधरवाले में सदानंद। कहने की जरूरत नहीं है कि इधरवालों की उधर चलती है और उधरवाले इधर छाए रहते हैं। यही प्रजातंत्र है। हालांकि इधरवाले अपने को उधरवालों से अच्छा समझते हैं और उधरवाले इधरवालों से अपने को। वर्णानंद देश के सामने परेशान है कि देखें देश किसे अच्छा और बुरा मानता है। वर्णानंद को आत्मविष्वास रहता है कि वह जिसे भला कहेंगे देश उसे भला मान लेगा ओर जिसे बुरा बताएंगे देश उसे बुरा मान लेगा। पर देश है कि ऐन वक्त इधर का उधर कर देता है। कुछ लोग सोचते हैं कि नगरपालिका या संसद इस मामले में मदद कर सकती है। उनका ख्याल पूरी तरह गलत नहीं है। नगरपालिका ने जब आवारा कुत्तों और पालतू कुत्तों की पहचान के रिकार्ड कायम किए हैं तो उसे तो अच्छे और बुरे की तमीज़ तो होगी। यद्यपि नगरपालिका की भी कुछ मज़बूरियां हैं। वह जिस आसानी से गंदगी कूड़ा कर्कट उठवा सकती है, उतनी सरलता से अच्छे बुरे का फैसला नहीं सुना सकती। फैसला सुनाते हैं इधरवाले या उधरवाले।
हमारे नगर में जब अन्य नगरों की तरह चुनाव हुआ तो उसमें इधरवाले भी खड़े हुए और उधरवाले भी। हर मुहल्ले में ऐसा हुआ। जहां देखिए वहां इधरवाले और उधरवाले। हर एक व्यक्ति इधर भी दिख रहा था उधर भी। हर व्यक्ति अर्जुन की तरह इधर उधर के संशय से ग्रस्त हो गया था।
बारीकी से देखें तो सारी दुनिया ही इधर और उधरवालों की है। या तो आदमी उधर से इधर हो जाए या फिर इधर की उधर करे। उन दिनों भी बहुत से लोग इधर से उधर हुए और बहुत से इधर-उधर। कभी सदानंद लपेटे में आए कभी आत्मानंद। यद्वपि दोनों हे भाई भाई ही। दोनों परम्परा की धरोहरें हैं। दोनों मौसेरे ममेरे हैं। एक भी है और अलग अलग भी। वर्णानंद की यही परेशानी है कि अब क्या करें। जब वे आत्मानंदजी के बारे में लेख तैयार करते हैं तो सदानंद जी के बारे में नई बातें तैयार हो जाती है।
पिछले कितने ही सालों से यही हो रहा है। बात उन दिनों की है जब स्कूल कमेटी के चेयरमैन थे विप्रवर सदानंदजी और पण्डित आत्मानंदजी हरिजन छात्रावास के संरक्षक थे। इसके पहले कि मामला तूल पकड़ता दोनों इधर उधर हो गए। एक मंडी अध्यक्ष हो गए तो दूसरे पालिका अध्यक्ष हो गए। ‘‘खाते पीते’’ या ‘‘खाने पीने’’ वाले लोगों के भाग्य कभी मंदे नहीं होते। फिर ऐसे दो लोग साथ हों तो और बढ़िया। एक से भले दो। ऊपर से मौसेरे और ममेरे। जिन कारणों से उन्होंने हैसियत बदली वह काम भी उन्होंने कर ही दिया। मंडीवालों के पचासों ट्रैक्टरों को चूहे कुतर गए और नगरपालिकाने मुहल्ले मुहल्ले जो बोरिंग लगवाई थीं वह जमीन निगल गई या आकाश में हवा हो गईं। अब उनके स्थान पर तकरार ही तकरार है। वर्णानंद के कागज़ी घोड़े कई सौ मील निरन्तीर पार कर आए लेकिन बीच में कालपी का नाला आ गया। घोड़ा नया था और थककर चूर था अतः अंततः गिर पड़ा। वह पता नहीं कर पाया कि ट्रैक्टर कांड में कितने की दलाली हुई ? किस कम्पनी के ट्रैक्टर को कुतरने के लिए किस कम्पनी के चूहे आए थे ,यह वह पता नहीं कर सके। हालांकि किसकिसने कितना खाया और मंडी अध्यक्ष को कितना मिला ,सचिव की पाचन क्षमता कितने की थी? इस मामले की खोजबीन में इधरवाले भी शामिल थे और उधरवाले भी। दोनों को खुरचन की उम्मीद थी। खुरचन , जिसके बारे में कहते हैं कि वह असली गुड़ से मीठी होती है।
उधर बोरिंग की खोज भी जारी है। खुरचनाकांक्षी खोजी लोग पालिका अध्यक्ष की भी खुदाई कर रहे हैं। बोरिंग के लिए कितना सैंक्शन हुआ ? कितने गड्ढे खोदे गए ? कितनी बोरिंग लगी ? कितनी बोरिंगों को ऊपर के पानी से पहले चालू बताया गया और बाद में उसको बंद बताकर उसकी अंत्येष्टि कर दी गई। इसकी भी जांच के असफल प्रयास हुए कि कितने लोग इस अंत्येष्टि में शामिल हुए और कितनों ने मरी हुई बोरिंग को कंधा दिया।
जनता कभी इधर देखती है कभी उधर । वर्णानंद विश्वासमत खोकर ग्लूकोस की बोतलों में अपना भाविष्य तलाश रहे हैं। सदानंद के लोग उसे रुपया खाकर लिखनेवाला बता रहे हैं और आत्मानंद के लोग उसे ब्लैकमेलिया कह रहे हैं। ‘माल उड़ावै कोई और मार खावै कोई’ की सी हालत उसकी हो गई है। अपवाह है कि सदानंद और आत्मानंद जैसे सदाचारी मौसेर भाइयों के अनुयायियों ने मिलकर उसकी पिटाई की है। घर में उनकी खटिया खड़ी हो गई है और अस्पताल मंे बिछी हुई है। उनकी दोनों टांगे ऊपर टंगी हुई हैं। जहां पहले हाथ पैर थे अब वहां प्लास्टर दिखाई देते हैं और जहां पहले आंखें मुंह और सिर था अब वह पट्टियों का फुटबाल दिखाई देता है। लोग सहानुभूति के लिए जाते है तो कहते है ‘‘ कैसे हो वर्णानंद , आनंद मंगल तो है न ?’’ वे कराहकर कहते हैं,‘‘ हां भैया ! दिल नामक स्थान की खोज हो गई है। उसमें छः सौ साल पुराना शिलालेख मिला है , जिसमें लिखा है ‘मौं सौं बुरा न कोय’।’’
वर्णानंद अब किसी से सीधी बात नहीं करते। लोग कहते हैं उनके दिमाग पर असर हुआ है। बुद्धिजीवी लोग कहते हैं ,वह दार्शनिक हो गए हैं। धार्मिक लोग कहते हैं, वे कबीरपंथी हो गए हैं। हारे हुए , पिटे हुए , दबे-,कुचलों के लिए एकमात्र ठिकाना कबीर हैं। अक्खड़ फक्कड़ कबीर को तुम क्या पीटोगे ?
इसलिए सदानंद कबीर की साखी गाने लगे हैं। पुलिस पूछ रही है,‘‘तुम को किसी पर शक है ? किसी का नाम लेना चाहते हो। तुम कोई बयान देना चाहते हो ?’’
दर्द भरी मुसकान में वर्णानंद बयान देते हैं‘‘ आग लगी आकाश में गिरगिर पड़े अंगार।
कबीर जल कंचन भया कांच भया संसार।।’’
पुलिस समझाती है -‘‘ डरो मत। तुम तो कलम के सिपाही हो। अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करो। हमारे काम में मदद करो। हम तुम्हारे हितैषी हैं। अपराधियों के नाम पते बताओ। हम उन्हें सजा दिलवाएंगे। तुम निश्चिंत होकर कहो।’’
पुलिस के काम का अर्थ जानते है इसलिए वर्णानंद हंसकर कहते हैं -
‘‘ ऐसा कोई न मिला जासों कहूं निसंक।
जासों हिरदे की कहूं सो फिर मारे डंक।।’’
खिसियाकर पुलिस कहती है -‘‘ देखो जब तक बुराई पर पर्दा डालोगे, पुलिस बुराई को खत्म कैसे करेगी ? तुम तो बुराई को खोजखोजकर मिटानेवाले लोगों में से हो। बताओ कौन है वे बुरे लोग जो समाज को खोखला कर रहे हैं ?’’
वर्णानंद ठहाका लगाकर कहते हैं: ‘‘ बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिल्या कोय।
जो दिल खोजा आपना मांै सौं बुरा ना कोय।।’’
ठीक ही है। दूसरे बुरे नहीं हो सकते। ऋण और ऋण मिलकर धन हो जाते हैं। यह गणित छः सौ साल पहले कबीर की समझ में आ गया था। आज वर्णानंद समझ गए। कुलमिलाकर , खोजी पत्रकारिता के इस युग में केवल कबीर ही प्रासंगिक हैं।

निवेदन है कि इस लेख का संबंध कल परसों आए बिहार के नतीजे का परिणाम न मानें । यह लेख तो 'नीरक्षीर ' में, 30 अगस्त 1989 , अमृतसंदेश , रायपुर से छप चुका है। यह साभार है और पुनर्प्रकाशन है।

Friday, October 29, 2010

अपना मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश का गीत:

1 नवम्बर को मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ अपने स्थापना दिवस मना रहे है। छत्तीसगढ़ 1 नव. 2000 को अस्तितव में आया जबकि 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेष की स्थापना हुई।
इस अवसर पर मध्यप्रदेश के नाम यह गीत समर्पित है जो मेरी जन्म भूमि भी है और वर्तमान में कर्मभूमि भी। छ.ग. (पूर्व मध्यप्रदेश) में मैंने उच्च शिक्षा पाई और वहीं अपने कर्मयोग का आरंभ भी किया।


अपना मध्यप्रदेश !
विन्ध्याचल ,कैमूर, सतपुड़ा , मैकल शिखर-सुवेश ।

हरी भरी धरती के सारे सपने हरे हरे हैं।
पूर्व और पश्चिम तक रेवा के तट भरे भरे हैं।
ताल और सुर-ताल हृदय से निकले तभी खरे हैं।
भरे हुए बहुमूल्य ,अनूठे ,अनुपम रत्न विशेष।
अपना मध्यप्रदेश !

नम्र निमाड़ी, बन्द्य बुंदेली, बंक बघेली बोली,
घुलमिल गोंड़ी भीली के संग करती हंसी ठिठौली।
करमा, सैला नाच मनाते सभी दिवाली होली ।
तानसेन बिस्मिल्ला की धुन में डूबे परिवेश।
अपना मध्यप्रदेश !


तेंदू और तेंदुओं वाला हर वन अभ्यारण है।
बाघ ,मयूर , हिरण, भालू के यहां तरण-तारण हैं।
महुंआ, कांस, पलाश हमारी पूजा में ‘कारण’ हैं।
कण-कण नैसर्गिक-शुभ देता शुचिता का संदेश।
अपना मध्यप्रदेश !

अब सत्ता भी संबंधों के मुकुट पहनकर आती।
नहीं राजधानी बहनें सब भाई के घर जातीं।
बापू , चाचा , मामा , दीदी-मां अब लाड़ लड़ाती।
कर सकती है ऐसे घर में कटुता कहां प्रवेश ?
अपना मध्यप्रदेश !

Thursday, October 14, 2010

माटी के पुतले 3

स्थापना और विसर्जन

पूरे देश में मूर्तियां स्थापित हो गई हैं। हम उन मूर्तियों को स्थापित होते देख सकते हैं , जिन्हें हममें से कुछ लोग बनाते हंै और बहुत से लोग स्थापित करते हैं। क्यों बनती हैं मूर्तियां , कैसे बनती हैं मूर्तियां और क्यों और किसके लिए स्थापित होती हैं मूर्तियां ? कौन मूर्तियां बनाता है ? किसके इशारे पर बनाता है और कौन स्थापित करता है इन्हें ? इन सवालों के बारे में सोचने की ना तो हमें जरूरत हैं और ना तो कोई सोचता है। मूर्तियां स्थापित हो जाएं , उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया जाए, एक लोक आयोजन हो ,नगर और अपने सहज पहुंच में पड़नेवाले स्थानों पर अगर हम जाना चाहें तो जाकर देखकर आनंदित हो लें या श्रद्धावनत होलें। सामाजिक मनुष्य से इतनी ही अपेक्षा की जाती है और इतनी ही उसकी आवश्यकता होती है। स्थापना और प्रतिष्ठा का सुख जिन्हें मिलता है , वे उसका आनंद सप्रयास ले लेते हैं।

मैंने मूर्तियों के निर्माण का आनंद लिया। यह आनंद हमारे हाथ में होता हैं। हम ही निश्चित करते हैं कि किस चीज़ का हमें आनंद लेना है। थोपी गई भयंकर और भयानक ‘सुन्दर’ वस्तु का आनंद लेना किसी के वश की बात नहीं हैं। चाहे फिर वह अमूर्त सुन्दर वस्तु हो या मूर्त। जीवित या जड़।
मैंने जड़ मूर्ति के निर्माण को नजदीक से देखा। यह मेरे लिए सरल भी था और संभव भी।जीवित वस्तुओं के निर्माण के बारे में मैं केवल सोच सकता हूं। सोच कर लोग ज्यादा आनंदित होते हैं पर देखकर आनंदित होना सरल तो है पर कठिन भी। यह भी हमारी सोच पर निर्भर है। यदि बहुत सुन्दर की कल्पना के साथ देख रहे हैं तो दुखी हो सकते हैं क्योकि सब कुछ बहुत सुन्दर नहीं होता। ‘जो भी है ,देखते हैं कैसा है ’ इस भाव से देखते हैं तो हमारे आनंदित होने की संभावना है। मैं इसी भाव से बैठा रहा और जिज्ञासा मेरा पूरा साथ देती रही।

मैंने और मेरी जिज्ञासा ने देखा कि कैसे लकड़ी का ढांचा खड़ा किया जाता है। कैसे कीलें ठोंकी जाती हैं और कैसे सुतलियां बांधी जाती है। कैसे घास और पैरे से पेशियां गढ़ी जाती हैं। कैसे मिट्टी के ढेलों को मांस की तरह चढ़ाया जाता है। फिर महीन बुनी हुई पटसन यानी सन की फट्टि यों के टुकड़ों को निथरी हुई मिट्टी के गाढे घोल मेें लपेटकर त्वचा की रचना की जाती है और रगड़रगड़कर उसे चिकना बनाया जाता है।

फिर सांचे में ढाले गए सिर या मुखाकृति रखी जाती है। उसे मूर्ति के साथ मिट्टी से जोड़ दिया जाता है। फिर लेप। और फिर रंगकारी। और फिर श्रृंगार। ग्राहक बीच बीच में आकर देख जाते हैं कि कैसी बनी और कहां तक बनी ? बड़ी मूर्तियां आर्डर और एडवांस की ताकत से ही बनती हैं। ओर फिर गंतव्य की ओर मूर्तियां एक अनाज के बोरे की तरह उठकर चली जाती हैं। मूर्तिकार अपनी मेहनत का मुआवजा ले लेता है और प्रशंसा का बोनस भी।


आजकल कलाकार का काम उद्योग की तरह हो गया है। मिट्टी की खरीद से लेकर अन्य कच्चे माल को एकत्र कर उसको उपयोग के लायक बनाना। फिर ढांचा बनाकर उसे समुचित रूपाकार देना उसके हाथ में हैं। रंग और उसका संयोजन उसकी कल्पना और कौशल की कला है। किन्तु जिन मूर्तियों को विशिष्ट श्रंगार देना है उसके लिए पश्चिम बंगाल पटसन, कार्क , प्लास्टिक और कागज आदि से बनी सामग्रियां शेष भारत में भेजता है। इससे कलाकार का काम हल्का भी हो जाता है और तेज भी। कम समय में अधिक का उद्पादन और विपणन इससे संभव हो जाता है। समय जो है सो प्रतिस्पद्र्धा का है। जो चूका वह फिसला , पिछड़ा ,पददलित हुआ। इसलिए समय जैसा चाहे कलाकार वैसा रच दे, यही रचना का नियम है। दुनिया इसी की कद्र करती है। हमें बदले में दुनिया की कद्र करनी चाहिए। कलाकार का क्या है , उसके साथ उसका स्वाभिमान है। कला लोगों की हो जाती है, कलाकार पृष्ठभूमि में चला जाता है। जब कोई नहीं होता तो वह अपनी कल्पना और स्वाभिमान के साथ फिर नये सृजन में जुट जाता है। हर व्यक्ति कलाकार नहीं ोता पर कला की प्रशंसा वह कर सकता है। यही सरल है। कलाकार पैदा होते हैं। प्रशंसक भी पैदा ही होते हैं। कला बहुमूल्य होती है। प्रशंसक अपनी प्रशंसा की कीमत लगाते हैं और उसी के अनुकूल आयोजन इत्यादि करते हैं। संगठन खड़ा करते हैं। स्थापित और विस्थापित करते हैं।
कबीर कहते हैं-
माटी के हम पूतरे मानुस राखा नाम।
चार दिवस के पाहुने बड़ बड़ रूंधहिं धाम ।
और यह भी कहते हैं-
माटी एक भेस धरि नाना सबमें एक समाना
कह कबीर भिस्त छिटकाना दोजग ही मन माना ।
कहते हैं कि एक ही मिट्टी के हम बने हैं। बस अलग अलग रूप ले लिया हैं। नाक नक्श बदले होने से क्या होता है। रा-मटेरियल एक ही है। इस बदले हुए रूप के कारण बहिश्त (भिस्त) और दोजख (दोजग) तुमने अलग अलग खड़े कर लिए। एक जायेगा बहिश्त और दूसरा जलेगा दोजख की आग में । दूसरा कौन ? वही जिसे एक गरियाते हुए काफिर कहता है। यह कबीर कह रहे हैं।
बहादुर शाह ज़फ़र इसी का अनुवाद करते हैं -
उम्रेदराज़ मांगकर लाए थे चार दिन
दो आरजू़ में कट गए दो इंतज़ार में।
यानी मनुष्य चार दिन का गणित है। दुर्गोत्सव या गणेशोत्सव भले ही वह दस दस दिन का मनाए ,यह उसकी उम्र बढ़ाने की कोशिश हो सकती है, मगर मध्यकाल और आधुूनिक काल के पास चार दिन का ही हिसाब है। हम इसी सूत्र से स्थापना और विसर्जन करते हैं। विसर्जन के बारे कबीर पूछते हैं, अपनी साखी में कि -
माटी मे माटी मिली , मिली पौन में पौन
हौं तौं बूझौं पंडिता दो में मूआ कौन।
कबीर पूछते हंै कि भाई यह जो चार दिन का आयोजन है और यह जो स्थापना का तांडव है उसके बाद तो अनिवार्यतः विसर्जन है। विसर्जन में क्या होगा कि मिट्टी जाकर मिट्टी में मिल जायेगी और पवन पवन में मिल जायेगा। पांचों तत्त (तत्व) ...जल, छिति ,पावक ,गगन ,समीरा .. ये पांचों भी मिल जायेगें अपने अपने संस्रोतों में। तो मरा कौन ?
कबीर ने केवल दो के उदाहरण से पूछा कि मिट्टी और हवा में कौन मर गया ? मरता तो केवल रूप या फार्म है। जीते जी बस इसकी नाटकीयता के दर्शन का सुख हमें मिलता है। यही हमारे बस में हैं बाकी सब बेकार की बातें हैं। बस! अब चेतो और बेकार की बातें छोड़ो। यह कबीर कह रहे हैं।
-13.10.10

Wednesday, October 6, 2010

काग के भाग बड़े सजनी



पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’
कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’
सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’
कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’
खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।
दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया। मैंने दो एक बार सातवें दशक की किसी हीरोइन की तर्ज पर ‘और लताजी की आवाज मंे ‘ चल कान न खा’’ कहा भी । पर वह कहां माननेवाला था। पित्पक्ष चल रहा है और वह मेरे किसी पुरखे की भूखी आत्मा की तरह मेरे पीछे मुक्ति के लिए पड़ा था। मगर मुक्ति अगर मिलनी होती तो एक ही पित्पक्ष में मिल जाती , पितृपक्ष बार बार क्यों आता। फिर वही पितृ , फिर वही तर्पणकर्ता ?...फिर वही कौवे...कौवे......!? इतने में फिर एक कौवा आया और मेरे कान के पास आकर जोर से चिल्लाया‘‘कांव कांव !!’’
मैंने झल्लाकर कहा -‘‘क्या है यार! बोर क्यों कर रहे हो। जाओ यहां से। मैं तुम्हे दाना नहीं डालनेवाला। न पूरी , न खीर...हमारे सारे पितृ खा पीकर मरे हैं। सब इतने चलते पुरजे थे कि एक जगह बैठकर नहीं रहते थे। अब तक तो दो तीन बार पैदा होकर स्वर्गीय हो चुके होंगे। जवान होकर किसी पर मर जाने की उनकी बुरी आदत थी। कोई कौवा नहीं बना होगा। क्या बने होंगे यह तुम नहीं समझोगे।’’ इतना कहते हुए मैं अंदर आ गया। दिमाग में मगर बचपन में पढ़ी कविता गूंजने लगी-
आज गई हुति नंद के भौनहि ,भोरहिं ते रसखान बिलोकी
धूर भरे अति सोभित स्यामजु ,तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी
खेलत खात फिरे अंगना ,पग पैंजनिया ,कटि पीरी कछौटी
काग के भाग बड़े सजनी! हरि हाथ सौं लै गयो माखन रोटी।

-अर्थात् एक सखि दूसरी सखि से कहती है कि हे सजनी! आज सुबह सुबह ही मैं नंद महाराज के घर चली गई और वहां मैंने रसखान को देखा। यहां रसखान में श्लेष अलंकार है। रसखान यानी रस की खान ..रस का भंडार। दूसरा अर्थ कवि का नाम ..रसखान..। खैर सजनी! मैंने क्या देखा कि रस-सागर धूल से भरे और सने हुए हैं ,मगर बहुत सुन्दर लग रहे हैं। उनके बड़े बड़े बालों की चोटी भी बड़ी सुन्दर लग रही है। वे खेल-खेल में खा रहे हैं और खा-खा कर खेल रहे हैं। सजनी! मेरा ध्यान उनके पैरों में की पैंजनियां पर है जो बज रही हैं और कमर पर भी है जिसमें पीले रंग की कछौटी यानी हगीज़ बंधी हुई है। हे सखी ! इसी समय वह घटना घटी, जिसका इतना हल्ला हो रहा है। यानी वही कौवे की हरकत...अच्छे भले खेलते हुए कन्हैया के हाथ से वह रोटी छीनकर एक कौवा ले उड़ा ,जिसमें मक्खन लगा हुआ था। रसखान कह रहें कि कौवा बड़भागी है जिसने हरि के हाथ से मक्खन-चुपड़ी रोटी छीन ली।
ठीक कह रहे हैं रसखान। मैं आह भरकर सोच रहा हूं। छीननेवाले बड़े भाग्यशाली होते हैं। बड़े भी और भाग्यशाली भी। मैं तो उस भुच्च संस्कारों का पालतू जीव हूं जिसमें छीनना पाप है। छीननेवालों को अपनी हिस्सा दे देना पुण्य है। ‘देनेवाला हाथ हमेशा ऊपर होता है’, इस आत्मघाती संस्कृति के हम चराग पुरुष हैं। चराग होने के चक्कर में अपना ही घर फूंककर फुटपाथ पर बैठे आल्हा गाते रहते हैं। कबीर भी उकसाते रहते हैं-चलो हमारे साथ। हम कटोरा लेकर उनके पीछे हो लिए।
इधर रसखान खुश हो रहे हैं कि कौआ हरि के हाथ से रोटी ले गया। टीवी में आ रहा है कि कौआ हमारे पूर्वज हैं। शास्त्रों में लिखा है। पंडित ने पहले कहा त्रेता से यह परम्परा चल रही है। किसी ने उसे बताया कि त्रेता के पहले सतयुग होता है , शास्त्रों में लिखा है तो उसने सुधार लिया। कहने लगा ,सतयुग से कौआ हमारे पितर हैं। डार्विन ने शास्त्रों की दुर्गत कर दी। उसने कहा -हम बंदरों से विकसित हुए हैं। बंदर हमारे पितर थे। ले भई ! हम उसके विकासवाद की लाज रखने के लिए कौओं की बजाय बंदरों की औलाद बन गए। हमारी वल्दियत बड़ी साफ्ट किस्म की है। समय पड़ता है तो हम गधे को भी बाप बना लेते हैं। बंदर और कौआ क्या चीज़ है।
फिल्हाल हम पितृपक्ष मना रहे हैं। कौओं को अपना पितर मानकर उन्हें खाना खिला रहे है। एक ही कोआ मुहल्ले के कई घरों में घूम रहा है। शुक्ला , खान , डेनियल ,अरोरा .. वह सबका पितर है। कईयों का आजा दादा है। तभी हम एक दूसरे को भाई कहते हैं और हमारा भाईचारा बना रहता है। हमारी संस्कृति विश्वबंधुत्ववाली है। हमारी दृष्टि की दाद दीजिए। कबूतरों को हम पोस्टमैन बनाते हैं और कौओं से कहते हैं पिताजी ! जाइये ! पूरी दुनिया को हमारा भाई बनाइये ! ये कौअे विदेश भी जाते होंगे। कई एंडरसन ,एनरान , बारबरा , स्वेतलाना वगैरह हमारे पितरों की हींग और फिटकरी लगे बिना हमारे वंशज हो गए हैं। भारत बहुत उदारवादी देश है। मेरा भारत महान है।
कहते हैं -देवता लोग आदमी बनने के लिए तरसते हैं। खासकर भारत का आदमी। पर मेरे पास प्रमाण है कि देवता लोग कौआ बनने के लिए भी तरसते हैं। स्वर्ग के राजा इंद्र का बेटा जयंत कौआ बनकर माता सीता के पास आशीर्वाद लेने आया था। उनके पैर पड़ने आया था। श्री राम गलत समझ गए। उन्होंने गलतफहमी में उसकी एक आंख फोड़ डाली।
उधर कौओं के हाई ब्रीड चीलों ने श्री राम का बड़ा साथ दिया। जटाऊ रावण से भिड़ गया और घायल होकर मर गया। बाद में उसके जुड़वा भाई संपाती ने आकाश में उड़कर देख दिया कि अपहृत माता सीता कहां हैं। बंदर, भालू , गिलहरियां , मगरमच्छ और मच्छर तक को गोस्वामी जी ने रामचरित में मित्रवत्-भूमिकाएं (फ्रेंडली एपीयरेन्स) दी हैं। कौअे को तो ऋषि भुशुण्डि की चरित्र भूमिका दी है। भगवान विष्णु के वाहन-सह-चालक गरुण उनके प्रिय श्रोता हैं।
देखिए , धीरे धीरे कौअे का व्यक्तित्व कैसा खुलते जा रहा है।
मुझे याद है कि आठवीं में मैं संस्कृत का बड़ा मेधावी छात्र था। भार्गव गुरुजी अब नहीं रहे वर्ना वे इसका प्रमाण देते। खैर जाने दीजिए...यही क्या कम है कि एक श्लोक मैंने तब पढ़ा था और वह आज भी याद है। श्लोक है-
काक-चेष्टा, वको-ध्यानं ,श्वान-निद्रा तथैव च ,
अल्पाहारी, गृहत्यागी विद्यार्थीं पंच लक्षणम् ।।

-अर्थात् कौअे जैसी कोशिशें करते रहो कि बार बार भगाए जाने पर भी उड़-उड़कर आओ या जाओ , बगुले जैसा ध्यान करो कि जैसे ही मछली सीमा में आई कि मारा झपट्टा। कुत्ते की नींद यानी सो रहे हैं मगर जरा सी आहट हुई कि लगा ,कहीं ये वो तो नहीं। अल्पाहारी यानी अपने घर में कम खाना और गृहत्यागी यानी अपना घर छोड़कर दूसरों के घर में कम्बाइंड स्टडी करना। ये पांच लक्षण बहुतों के बहुत काम आते रहे हैं। मुझे यह बड़ा व्यावहारिक श्लोक मालूम पड़ता है। एकदम प्रेक्टीकल। दुनिया का खूब अध्ययन करके किसी विद्वान ने यह श्लोक गढ़ा होगा। यहां उल्लेखनीय यह है मित्रों ! कि कौआ अंकल (पुरखे ) इस श्लोक में भी सम्मानपूर्वक फ्र्रंट सीट पर बैठै हैं। श्लोक उन्हीं से शुरू हुआ- ‘काक चेष्टा.......।’
कौआ मीरां बाई को भी प्रिय था। उसपर उन्होंने कविता लिखी। दोहा है-
कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन चुन खइयो मास
दो नैना मत खाइयो जामे पिया मिलन की आस।

यहां कागा यानी काक.. कौआ। पहले काक का काका हुआ होगा, बाद में अपभ्रंश के नियम से कागा हो गया होगा। काका पिता के छोटे भाई को कहते हंै। पंजाब में तो बेटे को काका कहते हैं। साई लोग तो बात-बात पर एक दूसरे को काका कहते है। अब तो साई का पर्याय ही काका हो गया है।
कुलमिलाकर ,काका यानी कागा यानी कौआ हमारी सांस्कृतिक पहचान है। गंदी संदी चीजें खाना उसका स्वभाव है। हम उससे सालभर घृणा करते हैं और फिर सोलह दिन उसकी पूजा करते हैं। किसी पक्षी को यह स्थान प्राप्त नहीं है। कोई हमारा पुरखा या पूर्वज नहीं है। बंदर को चिड़ियाघर और तीर्थ स्थलों पर जरूर हम केला और चना देते हैं।
कौआ हमारे प्रेयसियों का प्रिय रासिद है। रासिद यानी रहस्य की बातों को चिट्ठी में लिखनेवाला, पोस्टमैन ,संवदिया। एक गीत है- ‘भोर होते कागा पुकारे काहे राम , कौन परदेसी आएगा मोरे गाम।’
-एक सखी डॉ.रामकुमार से पूछती है कि हाय राम ! सुबह सुबह यह कौआ क्यों चीख रहा है। बताइये न कौन परदेशी हमारे नगर आनेवाला है।’
राम जब जनक-ग्राम पहुंचे थे तो जानकी के कमरे के सामने कई कौअे ऐसे ही चिल्लाए होंगे। तब यह गाना बना। एक दूसरा गाना भी बना। विवाह योग्य कन्या चुपके-चुपके योग्य वर मिल जाने पर अपनी मां को इशारे से बता रही है- माई नी माई , मुंडेर पै मेरे , बोल रहा है कागा
जोगन हो गई तेरी दुलारिन मन जोगी संग लागा।

- इस कविता में थोड़ा कन्फ्यूजन जरूर है कि जोगन हुई तो जोगी से मन लग गया कि जोगी से मन लग गया तो जोगन हो गई। हालांकि ले दे के बात तो एक ही घटित हुई। यानी छोरी का लम्पट जोगी से मन लग गया क्योंकि मुंडेर पर कागा बोल रहा है।
इसीलिए गांव में कौओं को भगाने के लिए बिजूका लगाया जाता है जिसे अन्य शब्दों में कागभगौड़ा भी कहते हैं। कौओं को भगानेवाला झूठमूठ का आदमी। आगे चलकर इसी झूठ से दूसरा किस्सा बना। लोगों में ‘झूठ बोले कौआ काटे ’एक कहावत बन गई। यानी कौअे इस झूठ को समझ गए और आदमियों को काटने लगे।
और भी बहुत सी बातें हैं जो आपसे शेअर करनी है मगर नौकरी में जाने का वक्त हो गया है। देखूं कहीं घरवालों ने सारा खाना इन कौओं को तो नहीं खिला दिया। यह आशंका अभी और दस ग्यारह
दिन रहेगी। फिर निश्चिंतता से लिख सकूंगा कि मैं अकेला कौआ होउंगा जो मजे से पेटभर कर खा सकूंगा और सरकारी कार्यालय में जी भर ऊंघ सकूंगा। तब तक आप भी अपने अपने कौओं को निपटाइये, इस संस्कृत-निष्ठ निवेदन के साथ कि-
काक चंचु मार मार क्षीर में सुहास के ,
फिर अमा शिविर लगाने आ गई खवास के ।

शब्दावली:
काक - कौआ ,
चंचु - चोंच ,
क्षीर - खीर ,
सुहास - हंसी खुशी ,
अमा - अमावस्या,
शिविर - कैंप ,
खवास - खाने की घोर इच्छा। अघोरी।

26.9.10/7-10-10

Tuesday, October 5, 2010

माटी के पुतले -2



2. एसराम उइके पेन्टर

आदिजन बहुल क्षेत्र के एक सामान्य परिवार से संबद्ध श्री एसराम उइके रेलवे मुलाजिम हैं। यद्यपि यह कलाकार रेलवे में पेन्टर के रूप में 1985 से पदस्थ है ; लेकिन अरविंद आश्रम के अनुयायी एक कांक्रीट कलाकार श्री अनादि अधिकारी के साथ संपर्क होने से कैनवास पेन्टिंग में इनकी प्रतिभा अद्भुत रंग उभारती रही है। भविष्य में इस श्रमजीवी कलाकार की कण कण में निखरी चित्रकला और रंग-रचनाओं के साथ साथ अरविन्द-आश्रम के सिद्धहस्त रंगशिल्पी और मूर्तिकार अनादि अधिकारी के
शिल्प का परिचय देने का प्रयास करूंगा।
बहरहाल श्री एसराम ने अपनी अक्षर पेन्टिन्ग के साथ साथ इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बाघ या टााइगर के तैल चित्रों से रेल सूचना पटलों को पूरे संभग में रंगा डाला है और अपन अभीश्ट प्रभाव छोड़ा है। एक और आदिमजन छिंदवाड़ा में पतालकोट का मूर्तिशिल्प रचने और कपड़े के थान के थान को अािदवासी संस्कृति का कैनवास बनाकर प्रस्तुत करने के लाइव प्रदर्शन कर चुके हैं। छिंदवाड़ा में उनके जीवंत मूर्तियों को आदिवासी संग्रहालय में देखा जा सकता है।


श्री एसराम ने यद्यपि इस विशाल और वृहद स्तर पर अपने शिल्प को प्रस्तुत नहीं किया है लेकिन अपने विविधता से भरे मूर्तिशिल्प और रंगसंयोजन को लेकर इस क्षेत्र में अपने पहचान जरूर बनाई है। कागज और केन्वास पर इनकी तूलिका ने अनेक मौलिक रचनाओं को जन्म दिया है। रेलवे के बोर्डों और होर्डिंग पर लेखन के साथ-साथ प्रमुख रूप से कान्हा के सौन्दर्य और बाघों के जीवित चित्र इस संभाग में देखे जा सकते हैं।
दुर्गा प्रतिमाओं को कला के साथ प्रस्तुत करने के लिए श्री एसराम दूर-दूर तक विख्यात हैं। एक समग्र कलाकार के रूप में इनकी पहचान है। इनकी कलाकृतियां इनके दृष्टि-विस्तार की परिचायक हैं। जब तक यानी 7 अक्टोबर तक इन मूर्तियों रंगा जाता है, तब तक इन मूर्तियो ंके निर्माण को हम देखें। अगले दो दिनों में इन माटी के पुतलो को रंगीन देख सकेंगें
2.10.10
क्रमशः

Monday, October 4, 2010

माटी के पुतले 1


पूरे भारत में हिन्दू आस्था और विद्या की प्रतीक गजानन गणपति की मूर्तियों का विसर्जन किया जा चुका है। यह भाद्र मास था। अश्विन-मास के साथ ही पितृ मोक्ष पखवाड़ा प्रारंभ हुआ। पितृमोक्ष अमावस्या के देसरे दिन अष्विन शुक्ल की प्रतिपदा से शक्ति की प्रतीक देवी दुर्गा की प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और पूजन का होगा।

गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं का वृहदस्तर पर निर्माण किया जाता है। जो भी मृदाशिल्प में रुचि रखता है और इसमें पारंगत है वह व्यापारिक दृष्टि से मूर्तियों का निर्माण करता है और मांग के अनुसार उनका व्यापार करता है। रक्षाबंधन और दीपावली में उत्सब के अनुकूल राखियों और पटाखों का निर्माण अधिकांशतः मुस्लिम मतावलंबी करते हैं। मूर्तियों का निर्माण भी अनेक स्थानों में विभिन्न समुदायों के लोग करते हैं ,जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी हैं। इन दिनों मंदिर मस्जिद के तथाकथित विवादों और तनावों का चर्चा गर्म है। इसलिए ऐसे समाचार चित्र सहित अखबारों में आते रहते हैं।

मेरे शहर में पिछले बीस बाइस सालों से दो विविध कलाकार मूर्तियों का व्यवसाय कर रहें है। व्यावसायिक स्तर पर किये जाने के कारण और उसमें स्वरुचि का रंग होने से ये मूर्तियां विशिष्ट रंग-रूप में आकर्षण का केन्द्र होती हैं। मैं बहुत वर्षों से प्रभावित हो रहा हूं और स्वांतः सुखाय जो रस मिल रहा है उसे पर्याप्त मान रहा हूं। इस बार ऐसा लगा कि इसकी चर्चा अपने ब्लाग के माध्यम से की जाए। शायद शिल्प पे्रमियों को पसंद आए।
मेरे मन में ये सवाल थे: -
1. कैसे बनती हैं मूर्तियां ? 2. किन चीजों से बनती हैं ? 3. अपने प्रारंभिक निर्माण के दौरान कैसी दिखती हैं ? 4. कैसे धीरे धीरे विकसित होती हैं और कैसे रंग वस्त्र शस्त्र और श्रृंगार के बाद इनका रूप निखरता है ?
इन सवालों के जवाब ये मिले:-
आवश्यक सामान: 1. पैरा : धान की बालियां निकलने के बाद शेष सूखे पौधे , 2. घास , 3. भूसा: गेंहू के पौधे से बालियां निकालने के बाद उसका मिंजा हुआ अवशेष , 4. लकड़ी और पट्टे ,5. कीलें , 6. सुतली (पटसन) और नारियल-बूच की रस्सी , 7. बीड़ी की फट्टियां , 8. मिट्टी विशेष तौर पर बंजर के कछार से बुलवाई गई , 9. चाक मिट्टी , 10. रंग: सभी प्रकार के - फेब्रीकिल, आइल पेंट, वाटर कलर , फ्लोरोसेंट ,लेककलर इत्यादि, 11. कपड़े ,साड़ी, ब्लाउस ( मांग के अनुसार ) 12. पटसन और केले के रेशों के कलकतियां केश ,बाल , 13. टिन के पत्तरों , कार्क , सोलम्सेट ,केला और थर्मोकाल से बने अस्त्र-शस्त्र , मुकुट, श्रृंगार आदि , 14. स्वयं शिल्पकार अपने सहयोगियों श्रमिकों और पारिवारिक सदस्यांे सहित।
ये हैं कलाकार - 1. चक्रवर्ती परिवार :

चक्रवर्ती परिवार के सुभाष (55) और रेवा (45) प्रमुख रूप से अपने पुस्तैनी मिट्टी के काम को करते हुए इस शिल्प की तरफ बढ़े। पांच भाइयों के इस परिवार में ये दो मुख्य रूप से इस काम में जुड़े हुए हैं। 1960 से इनके पिता श्री हरिप्रसाद चक्रवर्ती भी मूर्ति का काम करते थे। पूरे परिवार के साथ इसे विस्तार देने का काम इन भाइयों ने किया।
चक्रवर्ती और प्रजापति आदि कुंभकार समुदाय के लोग हैं , जिनका मुख्य काम रसोई घर के लिए मिट्टी के भांड़े बनाना था। दीपावली के दीपक , पोला के घुड़ले, लक्ष्मी -महालक्ष्मी , होलिका , काली , सरस्वती आदि की मूर्तियां भी प्रारंभ में इसी समुदाय ने बनाई। बाद मे ंअन्य कलाकार भी इस तरफ़ आकर्षित हुए। सभी वर्ग के व्यापारी इनकी बनाई हुई गणेश की छोटी छोटी मूर्तियां दूकानों में बेचते हैं। अधिकांश घरों में छोटी मूर्तिया स्थापित करने का चलन हिन्दू परिवारों में है।
अन्य संप्रदाय के लोग भी गणपति रखा करते हैं। प्रायः सामूहिक तौर पर गणेश स्थापित किये जाते रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में एकता के लिए प्रारंभ इस आंदोलन को शुरुआती दौर में सामूहिक रूप से ही आयोजित किया गया। बाद में व्यक्तिगत आस्था और सुरक्षा के तौर पर घरो में स्थापित किया जाने लगा। हालांकि भारत में हिन्दू-मुस्लिम एक्य के प्रतीक गणेशोेत्सव की अनेक कथाएं जीवित हैं।
दुर्गा अपेक्षाकृत वृहदस्तर पर सामूहिक तौर पर स्थापित की जाती है। अतः मुहल्लों में सहयोगात्मक तरीके से इनकी पूजा होती है। सभी वर्गों के लोग इसमें शामिल होते हैं।

क्रमशः

Thursday, September 30, 2010

और मेरा आगे निकल जाना

पड़े रह जाना तीन लेखकों का
फुटपाथ पर
और मेरा आगे निकल जाना


तीन लेखक फुटपाथ पर पड़े हैं। सोचता हूं कि उन्हें उठा लूं। मगर मेरी खुद की हालत खस्ता है। लोग देख रहें है कि मैं भी फुटपाथ पर खड़ा हुआ हूं। फुटपाथ के साथ मैं इस कदर तदाकार हो चुका हूं कि उससे मेरा तादात्म्य स्थापित हो चुका है। संतों ने इसे ही पहुंची हुई स्थिति कहा है। मगर मैं संतों को कहां ढूंढूं कि वे मेरी इस स्थिति को देख सकें। फलस्वरूप मैं मनमारे फुटपाथ पर खड़ा बेचैनी से उसका इंतजार कर रहा हूं। मेरे हाव भाव से ही लग रहा है कि मैं जिसका इंतजार कर रहा हूं उसके लिए किसी भी स्थिति से गुजर सकता हूं। उसे देखकर मैं बावरा सा दौड़ सकता हूं ,बिना यह सोचे कि पागलों की तरह दौड़नवाली गाड़ियों के नीचे आ भी सकता हूं। यही आदर्श लगाव और प्रतीक्षा है।
मैं जब अपनी बेसब्री नहीं संभाल पाता तो पास खड़े एक अजनबी से पूछता हूं:‘‘ वह कब आएगी।‘‘
अजनबी उपेक्षा से कहता है:‘‘ वह आधा घंटा बाद आएगी। मैं भी उसका इंतजार कर रहा हूं।‘‘
मैं समझ जाता हूं कि एक तो यही प्रतियोगिता में है जिसे पछाड़कर मुझे उस तक पहुंचना है।
मैं तनाव में आ जाता हूं। ध्यान बंटाने के लिए फिर उन तीन लेखकों की तरफ देखने लगता हूं जो फुटपाथ पर पड़े हुए हंै। उनके सिर पर खड़ा एक उठाईगीर जैसा आदमी मुझसे पूछता है:‘‘ क्या सोच रहे हो ?’’
‘‘ सोचता हूं इन्हें उठा लूं !?‘‘
‘‘ तो उठा लो ,किसने रोका है ? ये पड़े ही इसलिए हैं कि कोई तो इन्हें उठाए।‘‘
आखिर मैं हिम्मत करता हूं और तीनों को एक साथ उठा लेता हूं। तीनों इस कदर मेरे हाथ में आ जाते हैं जैसे घर से निकाले गए वे बच्चे जिन्हें कोई दयालु पालनहार मिल गया हो। उन्हें हाथ में लेकर मैं फिर सड़क की तरफ देखता हूं कि शायद वह आ जाए , शायद किसी की नजर मुझ पर पड़ जाए और उसे पता चल जाए कि मैंने कितना बड़ा काम किया है। यानी फुटपाथ पर पड़े तीन लेखकों को मैंने उठा लिया हैं। मगर गिरे हुए लेखकों को देखने की फुर्सत किसे है ? अगर मैं किसी लड़की को उठाता...........फालतू की बात कर रहा हूं मैं ! लड़की गिरती भी नहीं कि उसे उठाने कितने ही लोग लपक पड़ते ?मुझे तो अवसर ही नहीं मिलता।
मैं अंदर ही अंदर अपनी उत्साह से भरी गलत सोच से शर्मिंदा हो जाता हूं। झेंप मिटाने के लिए फिर इधर-उधर देखता हूं। मैं इस समय भरी-दोपहर मून-लाइट के ठीक सामनेवाले फुटपाथ पर हूं। यह सड़क जो सामने से सर्र-सर्र भागी जा रही है ,वह पागलखाने होते हुए डिफेंस की तरफ जाती है। मैं चाहता तो कह सकता था कि यह सड़क रिजर्व बैंक या लाइफ इंशुरेंस होकर डिफेंस की तरफ जाती है। मगर मेरी हालत ऐसी नहीं है कि मैं रिजर्व-बैंक या लाइफ-इशुरेंस के बारे में सोच भी सकूं। मेरा रिजर्व बैंक और लाइफ इंशुरेंस तो डिफेंस रोड में रहनेवाला वह व्यक्ति है ,जिससे मदद मिलने की उम्मीद अंसभव है , मगर है तो। अंसभव होने पर भी उम्मीद की साख प्रजातंत्र में बहुत ऊंची है। मदद मिली तो कुछ मिलेगा ही , नहीं मिली तो पास से क्या गया ? सोचेंगे ,घूमने निकले थे। मैं महान साम्यवादियों का तुच्छ-सा लक्ष्यबिंदु हूं । मुझसे ही प्रेरित होकर उन्होंने कहा था ,‘‘पाने के लिए पूरी दुनिया, खोने के लिए कुछ भी नहीं। यही सर्वहारा की क्रांति है।’
यह विचार आते ही मैं फिर प्रगतिशील हो जाता हूं। उठाए गए लेखकों को दुर्गति से उठाकर संघर्ष के रास्ते पर धकेलने की कार्ययोजना बनाने लगता हूं। तभी लेखकों के सर पर खड़ा उठाईगीर बोलता हैः‘‘ देख क्या रहे हो.....ये तीनों बड़े महान लेखक हैं।‘‘
‘‘ तो फुटपाथ पर क्यों पड़े हैं ?‘‘ आदतन मैंने शंका की।
'‘यही दुनिया की रीत है...हर महान आदमी को पहले फुटपाथ पर पड़ना होता है फिर वह सुपर स्टार होता है।’’
मुझे हंसी आ गई। वह फिल्मी लोगों के बारे में कह रहा था। मैंने फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ीं हैं।
‘‘हंसते क्या हो ? इन्हें अपने घर में रखोगे तो तुम्हारी इज्जत बढ़ जाएगी।‘‘ वह बोला और तरतीब से रखे गए किताबों के ढेर पर कपड़ा मारने लगा।
मैंने किताबों पर नजर डाली और उन लेखकों के नाम पढ़े जो सड़क पर पड़े थे । आगे चलकर यही मेरी इज्जत बढ़ानेवाले थे। उनमें एक का नाम था हरिशंकर ,दूसरा शरद था और तीसरा रवीन्द्रनाथ। तीनों नाम कुछ जाने-पहचाने से लगे। रवीन्द्रनाथ टैगोर को कौन नहीं जानता... जन गण मन अधिनायक वाले। शरद चंद्र को भी लोग जानते ही होंगे...देवदास वाले। तीसरा नाम मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा था...हरिशंकर या हरिश्चंद्र ....। एक भारतेंदु हरिश्चंद्र का हास्य प्रहसन ’अंधेरनगरी ,चौपट राजा ’ बचपने में हमने पढ़ा था। मुझे वह नाटक याद आया तो हंसी आ गई। आदमी बोला:‘‘ देखा ,अभी तुमने सिर्फ नाम ही पढा़ है और तुम्हारी हंसी छूट गई। बड़े कार्टून लेखक हैं ये......घर ले जाकर पढ़ोगे तो हंसते हंसते तुमको बड़ा मजा आएगा।’’
‘‘ डुप्लीकेट तो नहीं हैं।‘‘ मैंने उन कार्टून लेखकों के नाम ठीक से देखते हुए प्रश्न किया। आजकल सेम नाम से डुप्लीकेट माल बहुत बिकता है। मेरा अनुमान सही था। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से मिलता जुलता नाम हरिशंकर परसाई था। शरदचंद्र बंधोपाध्याय के नाम की नकल पर शरद जोशी छपा हुआ था। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाम की कापी करते हुए रवीन्द्रनाथ त्यागी लिखा हुआ था। अच्छा ,तभी वह जल्दबाजी कर रहा था कि मैं बिन देखे उठाऊं और चल दूं। मगर मैंने भी घास नहीं छीली !
प्रगट में मैं उस फुटपाथिये से कुछ नहीं बोला। मूर्खों से क्या उलझना। मैंने तय कर लिया था कि डुप्लीकेटों के चक्कर में मैं नहीं आउंगा। फिर भी समय काटने के लिए यूहीं पन्ने उलटने पलटने लगा।
पढ़ते पढ़ते मुझे फिर बौद्धिक गुस्सा आया। गधों को शीर्षक रखना भी नहीं आया। एक ही शीर्षक दिए थे तीनों को..‘ मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं ’। एक यदि धोके से हिट हो जाए तो लोग शीर्षक देखकर ही दूसरी और फिर तीसरी ले जाएं।
परन्तु नकल में उनकी अकल की दाद देनी पड़ेगी। भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक तो था ही हास्य व्यंग्य का। शरद बाबू ने भी देवदास में सामंतवादियों ,उनकी संतानों और समाज के ठाकुरों पर जी भर कर व्यंग्य किया है। इसी प्रकार बीस तीस सालों से रवीन्द्रनाथ जैसे गंभीर लेखक की रचना जनगणमन को भी विद्वानों ने सम्राट् जार्ज पंचम की स्तुति के बहाने उनपर व्यंग्य किया जाना सिद्ध कर दिया है। यानी मूलतः ‘ जनगणमन ’ एक नोबल प्राइज विनर सटायर है। इतने भारी और महान लेखकों की नकल पर इन तीन लेखकों को फुटपाथ पर बेचा जा रहा है।
‘‘तो ले रहे हो ? आधी कीमत पर !‘‘ फुटपाथिये ने कहा।
मैंने सोचा ‘देखो...कितनी हड़बड़ी है इसको नकल बेचने की..अब तो नहीं ही लूंगा जा...’
इसके पहले कि मैं कोई जवाब देता मेरे साथ खड़े रकीब ने मुझे बताया:‘‘ आ गई , चलो‘‘
मैंने देखा कि डिफेंस की ओर जानेवाली बस आ गई थी। मैंने उठाए हुए लेखकों को वही फुटपाथ पर डाला और लपका।
आपने देखा कि किस तरह महान लेखक फुटपाथ पर पड़े रह गए और मैं आगे बढ़ गया।
240709


समर्पण: एक बहुत महत्वपूर्ण रचना उपेक्षित हो रही थी। मेरी प्रिय रचनाओं में से यह एक है। आपकी भी यह प्रिय बने इस सद्भावना से इसे पूर्ण संकोच , संपूर्ण नादानी और व्यापक विनम्रता के साथ आपके हाथों में सौंप रहा हूं। कृपया प्यार से इसे देखें और औरों को भी दिखाएं। अब यह आपकी है।
जिन मित्रों को पढ़कर गुस्सा आए वे कृपा पूर्वक इसे ‘एक गधे की आत्मकथा’ समझ लें। जिन्हें मजा आए वे अपनी बौद्धिक उपलब्धि मानकर इसे हरिशंकर परसाई जी या शरद जोशी जी की रचना मान लें। मान लेने में क्या जाता है? वैसे भी जहीं भर को पनाह देनेवाले जहांपनाहों ! मैंने आपकी खुशी के लिए ही यह ‘राग-दरबारी’ गाया है। मैं तो अदना लोक-सेवक हूं आपका।

Wednesday, September 15, 2010

चुहिया बनाम छछूंदर



डायरी 24.7.10

कल रात एक मोटे चूहे का एनकाउंटर किया। मारा नहीं ,बदहवास करके बाहर का रास्ता खोल दिया ताकि वह सुरक्षित जा सके।
हमारी यही परम्परा है। हम मानवीयता की दृष्टि से दुश्मनों को या अपराधियों को लानत मलामत करके बाहर जाने का सुरक्षित रास्ता दिखा देते हैं। बहुत ही शातिर हुआ तो देश निकाला दे देते हैं। आतंकवादियों तक को हम कहते हैं कि जाओ , अब दुबारा मत आना। इस तरह की शैली को आजकल ‘समझौता एक्सप्रेस’ कहा जाता है। मैंने चूहे को इसी एक्सप्रेस में बाहर भेज दिया और कहा कि नापाक ! अब दुबारा मेरे घर में मत घुसना। क्या करें , इतनी कठोरता भी हम नहीं बरतते यानी उसे घर से नहीं निकालते अगर वह केवल मटर गस्ती करता और हमारा मनोरंजन करता रहता। अगर वह सब्जियों के उतारे हुए छिलके कुतरता या उसके लिए डाले गए रोटी के टुकड़े खाकर संतुष्ट हो जाता। मगर वह तो कपड़े तक कुतरने लगा था जिसमें कोई स्वाद नहीं होता ना ही कोई विटामिन या प्रोटीन ही होता। अब ये तो कोई शराफत नहीं थी! जिस घर में रह रहे हो उसी में छेद कर रहे हो!? आखि़र तुम चूहे हो ,कोई आदमी थोड़े ही हो। चूहे को ऐसा करना शोभा नहीं देता।
हालांकि शुरू शुरू में वह सात्विक प्रवृत्ति का मालूम पड़ता था। पत्नी रामायण पाठ करती तो वह आसपास मंडराया करता। पत्नी समझती सुधर रहा है। रामायण के प्रति उसकी श्रद्धा बढ़ने लगी। एक दिन उसने रामायण की जिल्द का कोना कुतर लिया। यह बर्दास्त के बाहर था। पत्नी की श्रद्धा रामायण से तो कम न हुई लेकिन चूहे की औकात समझ आ गई जो रामायण सुनकर भी संत नहीं हो पाया था। मैंने सुना है कि कई आदमी मरते समय यह ग्रंथ सुनकर स्वर्ग पहुंच गए। यह कमबख्त चूहा हमारे घर में ही घूमता रहा। नहीं , मतलब .....यूं ... हमारा घर हमारे लिए स्वर्ग से कम नहीं है। चूहे के लिए भी स्वर्ग ही होगा तभी तो वह टिका हुआ है। इस बात पर देखो ,जितना सोचो उतना चूहे के पक्ष में जाता है ; इसलिए मैंने सोचना छोड़कर पत्नी की ‘चूहा मुक्ति योजना’ पर अमल का रास्ता खोजना शुरू कर दिया।
चूहा हमारे सोचने से बेपरवाह था। जब सब सो जाया करते थे तब वह ‘नाइट वाचमैन’ की तरह चुपचाप दबे पांव निकलता और वही जानता है कि किन-किन चीजों पर अपनी थूथनी आज़माता। कभी कुछ कुतरा हुआ मिलता ,कभी कुछ। वह जैसे जानबूझकर हमें आतंकित करने का प्रयास कर रहा था। खाद्य-अखाद्य सब पर थूथनी मार रहा था।
टमाटर कुतरा , चलो खाने की चीज है। चप्पल क्यों कुतरा ? मैं फिर सज्जनतापूर्वक चूहे से पूछना चाहता हूं -‘क्या तुम आदमी हो ? चप्पल तो तुम्हारे खाने की चीज़ नही है।’
आलू कुतरा तो हम शांत रहे कि चलो खाने की चीज़ कुतरा। साड़ी क्यों कुतरा ? यह चूहे की हरकत तो नहीं है ? ऐसे गंदे काम तो ‘विलेन’ करते हैं , दुश्शासन जैसे आदमी करते हैं।
शिमला मिर्च कुतरी तो हमें बुरा जरूर लगा ,पर उतना नहीं लगा कि चलो भाई चूहा है। पर 'डव' साबुन कुतर डाली...चूहा क्या खुद को कैटरीना कैफ या एंजेलिना जोली समझता है ....हीरोइन बनना चाहता है?
परन्तु चूहा हीरोइन कैसे बन सकता है ? चूहा तो पुल्लिंग है , पुरुषवाची है। चूहा का स्त्रीलिंग चुहिया है। अब कैसे पता चले कि कौन चूहा है ,कौन चुहिया !! क्या उन्हें आइना दिखाएं ?..इसका आशय समझ लें।
आचार्य रजनीश ओशो ने एक कथा बुनी कि एक दार्शनिक के पास शिष्यों ने समस्या रखी: गुरुदेव बताएं कि कैसे पता चले कि कोई मक्खी स्त्री है या पुरुष। दार्शनिक ने कहा - उन्हें आइना दिखाओ। आइना देखे ,मटके और उड़ जाए तो पुरुष । और आइने से चिपक के घंटों बैठे तो समझो स्त्री। अगर यह तार्किक-प्रमाण स्वीकार कर लिया जाए तो निश्चित रूप से यह पुरुष चूहा है। ड्रेसिंग टेबल के आइने के पास वह कभी नहीं दिखा।
मैंने अधिकतर लोगों को पुरुषों के लिए चूहा शब्द का इस्तेमाल करते ही सुना है। मगर सबसे सच्चा प्रमाण मेरी पत्नी है। वह सभी चूहों को पुरुष मानती है। उसकी नजर में चुहिया केवल छछूंदर है। वह छछूंदर को ही चुहिया कहती है। दोनों की शारीरिक बनावट में अंतर हैं। चूहा गोल मटोल होता है। छछूंदर ....पत्नी के शब्दों में चुहिया ,... आगे के पैरों और पीछे के पैरों के बीच लम्बी होती है।
एक कहावत है कि जहां छछूंदर होती है वहां चूहे और सांप नहीं आते। इस दृष्टि से 'चूहों का नीतिशास्त्र' आदमियों से बेहतर है। आदमी रूपी चूहे या सांप तो वहीं मंडराते हैं जहां स्त्री रूपी छछूंदर ..पत्नी के शब्दों में .चुहिया होती है। यानी चूहों की दुनिया शरीफों की दुनिया है। तभी शरीफ आदमी को आदमी लोग चूहा कहते हैं। इसलिए जहां चूहे होते हैं ,वहां सांप आ जाते हैं। चूहे बिल बनाते हैं और सांप उन्हीं रास्तों से शरीफ चूहों तक पहुंच जाते हैं, उन्हे अपना शिकार बनाते हैं। विश्वास के रास्ते पर ही विश्वासघात के सांप दिल पर मार करते हैं।
बहरहाल ,छछूंदर जहां होती हैं ,वहां सांप नहीं होते ; यह एक उत्साहवर्धक सूचना है। सूरदास को जब पहले पहल यह सूचना मिली तो वे गा उठे थे-‘ भई गति सांप छछूंदर जैसी’। मेरे अंदर का सूरदास भी गा उठा। यह तो एक तीर से दो शिकार करने जैसा उपकरण मिल गया था। सोच रहा हूं छछूंदरों को बुलाने के उपायों पर विचार किया जाए। एक साथ दो फायदे उठाए जाएं- सांपों को भी दूर रखा जाए और चूहों को भी। जिन्दगी इन दो प्राणियों से घिरी न रहे इसका कितना सुन्दर उपाय हाथ लगा है। छछूंदर की एक खासियत है ,जो हमें अपने अनुभव से समझ आई है ,वह यह कि वह बहुत नमकहलाल किस्म की होती है। दिन भर घर के कोने कोने में दौड़ती रहती है। जितना खाती है उतना दौड़ दौड़कर वह घर के कोने कोने की चौकसी करती है कि किसी कोने से सांप या चूहा न आ जाए। उसकी इसी प्रवृति के कारण पत्नी उसे चुहिया कहती है। अब पत्नी के मन की पत्नी जाने। (सुना है और कोई नहीं जानता। ईश्वर नामक सर्वज्ञ भी नहीं। नोट करें कि इस रहस्य को ,जिसे सब जानते हैं ,मैं गोपनीयता की दृष्टि से ‘कोष्ठक’ में दे रहा हूं।)
परन्तु ,छछूंदर में एक ही बुरी बात है कि वह हर कोने में खाया पिया पचाकर निकालती रहती है। इससे घर बदबूदार हो जाता है। हमको चूहों और सांपों से भरी सुरक्षित जिन्दगी चाहिए तो बदबू बर्दास्त करनी पड़ेगी। देखिए प्रकृति के भी कितने कठोर नियम है। इसीलिए शायद समझदार और प्रेक्टीकल लोग बदबूदार जिन्दगी को स्वीकार करते हुए दौड़े जा रहे हैं , खूब खा रहे हैं....खूब कर रहें हैं(भागमभाग)... और हर कोने में बदबू फैला रहे हैं। कुलमिलाकर छछूंदर यानी पत्नी के शब्दों में चुहिया , हमारा वर्तमान आदर्श है।
एक और बात। जितना खाती है छछूंदर ,उतना दौड़ती है और उतनी जल्दी मर भी जाती है। सुना है मुफ्त का सूंटने और खानेवाले भी ब्लड प्रेशर , ब्रेन हैमरेज , शुगर , हार्टअटैक नामक इम्पोर्टेड इंगलिश बीमारियों से मर जाते हैं। हालांकि 'राष्ट्रीयता' नामक देशी बीमारी भी है। इस बीमारी का यह लक्षण है कि जिसे होती है वह बात बेबात दंगे फैलाया करता है। दंगों में फैलानेवाले तो नहीं मरते ,मासूम लोग मर जाते हैं। इसलिए बुद्धिमान लोग कहते हैं , बीमारी चाहे देशी हो या इम्पोर्टेड ..जहां तक बने , बचे रहो। यही कारण है कि चूहे से बचने के हम बहुत से उपाय करते रहे। पिंजरा रखा। कैक रखा , काला पावडर सफेद आटे में मिलाकर रखा। मगर चूहे से हम घिरे रहे। चूहे को हम किसी भी उपाय से घेर नहीं पाए। किसी चूहदानी में उसे फंसा नहीं पाए। मगर...

एक रात की बात है। पत्नी किचन समेटकर बैठकखाने में आराम से बैठकर टीवी देखने आ गई। नियमानुसार आधे घंटे में पानी पीने किचन में गई। चूहे को पता ही नहीं था कि आम भारतीय स्वास्थ्य-सतर्क व्यक्ति खाना खाने के आधा घंटे बाद पानी भी पीता है। वह समझा कि खाने के साथ ही पानी को भी निपटा दिया गया होगा। यहीं वह फंस गया। फंस क्या गया घिर गया साहब!
पत्नी ने किचन के दरवाजे पर सैनिक की तरह डटकर मुझे आवाज दी... ‘‘पति नामक प्राणी ! आइये...वह किचन में है...’’ वह यानी चूहा ..मैं तुरंत लपका। पत्नी के हाथ में फूलझाड़ू थी। फूलझाड़ू को कौन नहीं जानता ? पत्नियां तो अवश्य। कुछ नब्बे प्रतिशत पति भी इसे पहचानते हैं। मैंने भी लपककर खरेटा उठा लिया। खरेटा झाड़ू का पुल्लिंग है। यह मोटी सीकों से बनता है। इसका उपयोग पत्नियां प्रायः कम करती हैं। जब कोई कचरा बहुत मोटा , भारी और अड़ियल होता है ,तब पत्नियों को खरेटा का इस्तेमाल करना होता है। आप समझ ही गए होंगे कि खरेटा मैंने क्यों उठाया। मोटा अड़ियल शत्रु हमारी घेरेबंदी में आया था। किचन मे रखी क्राकरी , बर्तन , खाने पीने की सामग्रियों के डिब्बों को बचाते हुए हम पूरे सुरक्षात्मक आक्रमण के मूड में आ गए। इधर मैं खरेटे से कोंच रहा था। पत्नी उधर चीखकर और उछलकर खुद को डरा रही थी। स्त्री जब डरकर चीखती है तो हमलावर अपने आप डर जाता है। पत्नी चीखकर उछलती तो चूहा घबराकर मेरी तरफ भागता। मानो मैं उसे बचाने खड़ा था। मैं इत्मीनान से उस पर खरेटे का वार करता जो कभी उस पर नहीं पड़ता। आखि़र वह दौड़-दौड़कर और पत्नी की चीखों से घबराकर अधमरा हो गया। घबराहट में वह यह भी नहीं देख पाया कि बाहर निकलने के लिए हमने किचन के कोर्टयार्डवाला दरवाजा खोल रखा है। जब वह बिल्कुल डगमगाने लगा और दौड़ने लायक भी नहीं रहा तो मैंने उसे खरेटे से बाहर उलीचना शुरू कर दिया। पांच छः बार खरेटे से उछालने पर उसे आंगन तक पहुंचा दिया गया। गिरता पड़ता चलकर वह अंधेरे में गुम हो गया।
‘‘अब वह इतना पिट चुका है कि दुबारा नहीं आएगा।’’ मैंने बुरी तरह हांफते हुए दीवान पर बैठते हुए कहा। पत्नी की सांसे भी उखड़ी हुई थी इसलिए वह केवल सिर हिलाकर रह गई।
यह था एक शुद्ध भारतीय चूहे का विशुद्ध भारतीय एन्काउन्टर।
इस घटना के दसेक दिन बाद , यानी इन पंक्तियों को अंतिम रूप देने तक एक विलायती समाचार छपा। मैं पढ़कर हैरान रह गया कि यार! ब्रिटिश चूहे तक स्मार्ट होते हैं कि वे चीनियों को चूना लगाकर ड्रेन पाइप से निकल जाएं। कि ब्रिटिश ड्रेन पाइप से ही क्यों भागते हैं......आई मीन ब्रिटिश चूहे !!!
लीजिए , आप भी पढ़िये और हो सके तो हैरान हो जाइये.........

एक समाचार: चूहे ने रेस्त्रां मालिक को मुश्किल में डाला !गाना चूहे का रेस्त्रां में परोसे जानेवाले सॉस में डुबकी और मिलना रेस्त्रां मालिक को अदालत की घुड़की । पस्त हो गई हिम्मत ,चुकानी पड़ी लापरवाही की किम्मत।
बात ब्रिटेन में स्थित एक चीनी रेस्त्रां की है। रेस्त्रां की रसोई में चूहे अक्सर उछल कूद मचाते रहते हैं। लेकिन उस दिन चूूहों की इस मस्ती को रेस्त्रां का निरीहक्षण करने आए स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने देख लिया। चूहा तो निकल गया अपने रास्ते, गाज गिरी रेस्त्रां के मालिक पर। उसे तीस हजार पाउंड ( करीब 21 लाख रुपये) के जुर्माने के साथ आठ महीने जेल की निलंबित-सजा भी भुगतनी होगी। स्वास्थ्य अधिकारी लंदन के ‘क्वीन्सवे’ में स्थित चीनी रेस्त्रां ‘केम टोंग’ का औचक निरीक्षण करने आए। जैसे ही वह रसोई में पहुंचे , उन्होंने देखा कि पूरी रसोई गंदी पड़ी है। कॉकरोच के अंडे और झींगा मछली के टुकड़े यहां वहां बिखरे हैं। एक चूहा तो ग्राहकों को परोसे जानेवाले सॉस के कटोरे में कूदकर निकला और ड्रेन पाइप के रास्ते बाहर चला गया। अधिकारियों ने इसका फोटो खींच लिया। (एजेन्सी.)

Friday, July 23, 2010

मार्बल सिटी का माडर्न हॉस्पीटल

उर्फ
मरना तो है ही एक दिन

इन दिनों चिकित्सा से बड़ा मुनाफे़ का उद्योग कोई दूसरा भी हो सकता है, इस समय मैं याद नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता यह कहना ठीक नहीं। शिक्षा भी आज बहुत बड़ा व्यवसाय है। बिजली, जमीन, शराब, बिग-बाजार आदि भी बड़े व्यवसाय के रूप में स्थापित हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य आदमी की सबसे बड़ी कमजोरियां हैं, इसलिए इनका दोहन भी उतना ही ताकतवर है। हमें जिन्दगी में यह सीखने मिलता है कि बलशाली को दबाने में हम शक्ति या बल का प्रयोग करना निरर्थक समझते हैं, इसलिए नहीं लगाते। दुर्बल को सताने में मज़ा आता है और आत्मबल प्राप्त होता है, इसलिए आत्मतुष्टि के लिए हम पूरी ताकत लगाकर पूरा आनंद प्राप्त करते हैं।
मां बाप बच्चों के भविष्य के लिए सबसे मंहगे शैक्षणिक व्यावसायिक केन्द्र में जाते हैं। इसी प्रकार बीमार व्यक्ति को लेकर शुभचिन्तक महंगे चिकित्सालय में जाते हैं ताकि जीवन के मामले में कोई रिस्क न रहे। इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाना चाहते हैं और उनकी इसी कमजोरी को विनम्रता पूर्वक स्वीकार करके चिकित्सा व्यवसायी बड़ी से बड़ी कीमत लेकर उनके लिए चिकित्सा को संतोषजनक बना देते हैं।
माडर्न सिटी हास्पीटल में सारी सुविधाएं हैं। सभी प्रकार की बीमारियों के लिए स्पेशलिस्ट सामने की दीवार पर एनलिस्टेड हैं। उनके कक्ष क्रमांक है। उनके ‘स्पेशल रिसेप्सनिस्ट’ है जो चिकित्सा को इतनी गंभीरता से लेते हैं कि सीधे मुंह बात नहीं करते। अच्छी सूरत देखकर उसका रजिस्ट्रेशन खुद करते हैं वर्ना दूसरे रिसेप्सनिस्ट के पास भेज देते हैं। बीमार आदमी और उसके शुभचिन्तक ऐसे मजबूर ग्राहक हैं, जो आए है तो कहां जएंगे? यहां स्वाभिमान की रक्षा और अच्छे व्यवहार की उम्मीद अठारवीं सदी की मूर्खता है। इस माडर्न हास्पीटल में मेरी सूरत रिसेप्सनिस्ट लड़के को पसंद नहीं आई तो उसने मुझे दूसरे रिसेप्सनिस्ट के पास भेज दिया। वह लड़की थी। उसे भी मेरी सूरत पसंद नहीं आई। उसने फिर उसी लड़के के पास जाने के लिए कहा। मैंने कहा: ‘‘उन्होंने ने ही आपके पास भेजा है।’’ लड़की ने लड़के को प्यार से घूरकर देखा और मुझसे बोली:‘‘ स्लिप किसके नाम से बननी है?’’ ऐसा कहकर उसने फिर लड़के को देखा जो अब मुस्कुरा रहा था। मैं समझ गया मामला क्या था । लड़की अपने पास आनेवाली खडूस औरतों को लड़के की तरफ सरका दिया करती होगी और लड़का अपने पास आए खड़ूस लोगों को लड़की की तरफ। सुन्दर चीजों को वे खुद ही निपटाया करते होंगे और इस प्रकार एक दूसरे के साथ बीमारी से भरे माहौल में भी वे दिल बहलाने का मनोरंजक खेल खेल रहे हैं। परेशान मरीजों के सहयोगी उनके लिए प्राथमिक नहीं हैं।
खैर मैं स्लिप बनवाकर अपनी पत्नी को लेकर डाक्टर से मिलने गया तो पता चला कि वे उस केबिन में नहीं हैं, जहां उनका नाम चिपका है। वे ओटी में हैं। ओटी ऊपरी मंजिल में है। वहां जाने के लिए लिफ्ट है। हम लोग लिफ़्ट की तरफ़ बढ़े। लिफ़्ट में पहले से इतने लोग थे कि हम मुष्किल से आए, मगर आ गए। लिफ्ट में हमने जो नम्बर दबाया था वह वहां नहीं रुकी। आखिरी मंजिल में पत्नी और बेटी उतरे ही थे कि लिफ्ट का दरवाजा बंद हो गया और लिफ्ट नीचे की तरफ चल पड़ी। मैं ग्राउंड फ्लोर पर था। मैं परेशान हो गया जिसे देखकर बाकी लोगों के चेहरे पर हंसी आ गई। मुझे अच्छा लगा। दूसरों को हंसता देखकर मुझे अच्छा लगता है। मैंने मुस्कुराकर पत्नी को फोन लगाने की कोशिश की जो नहीं लगा। मैं फिर लिफ्ट की तरफ बढ़ा तो किसी ने कहां:‘ आप को कहां जाना है ? ’ मैंने कहा:‘फस्र्ट फ्लोर।’ उसने कहा: तो सीढ़ियों से चले जाओ। हार्ट ट्रबल तो नहीं है। हो भी तो धीरे धीरे चले जाओ। इस लिफ्ट का की बोर्ड खराब है, एक में जाना हो तो तीन दबाना पड़ता है।’
मैं सीढ़ियों से ऊपर भागा। सीढ़ियां चढ़ने से कुण्ठा और अवसाद दूर होते हैं, ऐसा योग की किताबों में लिखा है और मैंने भी अनुभव किया है। सीढ़ियां चढ़कर जाने से मेरी कुण्ठा और अवसाद दूर हो गये।
जहां वे सीढ़ियां खत्म होती थीं, वहीं लिफ्ट का दरवाजा खुलता था। मेरे पहुंचते ही लिफ्ट का दरवाजा खुला तो उसके अंदर से मेरी पत्नी बेटी के साथ बाहर आईं। उन्हें देखकर मेरा अवसाद दूर हो गया और उनका भी। बहुत से लोगों की मानसिक परेशानी तो इस लिफ्ट से ही दूर हो जाती होंगी। पत्नी ने इसी आशय से भरी हुई टिप्पणी मुझसे की:‘‘ इस लिफ्ट का सेन्स आफ ह्यूमर तो गजब का है......एक दबाओ तो चार पर ले जाता है और तीन दबाओ तो पांच पर ’’
‘‘ लिफ्ट करा दे लिरिक इसी लिफ्ट पर तैयार हुआ होगा ’’लड़की ने कहा।
‘‘ इस लिफ्ट पर आकर जावेद अख़्तर को ‘लिफ्ट है तो लाफ्टर है’ का कांसेप्ट मिलेगा....मैनेजमेंट को उनको ब्रांड अंबेसेडर बनाना चाहिए.....’’ हम लोग इस पर हंसे कि कुछ हंसने लायक बात हमें इस बीमार माहौल में मिली। मुझे लगा हास्पीटल वालों ने जानबूझकर ऐसी व्यवस्था की है ताकि परेशान लोग हंस सकें।
‘‘अब कहां चलें ?’’ लिफ्ट के लाफ्टर चैलेन्ज में हम अपना मकसद भूल गए थे मगर फिर पटरी पर आकर सोचने लगे। हमें बताया गया था कि अपने कैबिन में प्राप्त न हो सकने वाली डॉक्टर ओटी में मिलेंगी। ओटी का नम्बर है चौदह। चौदह नम्बर का कमरा हमारी दाहिनी तरफ खड़ा खड़ा चुपचाप मुस्कुरा रहा था। वो तो अच्छा हुआ कि हमें पढ़ना आता है वर्ना पता ही नहीं चलता कि ओटी नंत्र चौदह कहां है। हरे कपड़े से मुंह बांधे हुए एक आत्मा से हमने पूछा तो उसने बताया कि डॉक्टर अंदर हैं।
डॉक्टर ने न मुंह बांधा था, न एप्रान। उसके गले में दो मुंहवाले सर्प की वह माला भी नहीं थी जिसे मेडीकल टर्म में स्टेथिस्कोप कहतें हैं। उसे डॉक्टर के ‘मैकप’ में न देखकर मैंने उसी से उसी के बारे में पूछा, ‘‘ डॉ. सुफला मेम से मिलता है।’’
‘‘मै ही हूं .... कहिए...’’उसने कहा। मैंने अब पत्नी को आगे करते हुए कहा: ‘‘यह कहेंगी।’’ ऐसा कहकर मैं बाहर निकल आया क्योंकि मामला दो औरतों के बीच का था ...गाइनीक था।
करीब आधा घंटे बाद पत्नी बाहर आकर बोली:‘‘सोनोग्राफी करानी है।’’
इस बार हमने लिफ्ट की तरफ देखा ही नहीं। सीढ़ियों से ही नीचे आए।
सोनोग्राफी के लिए फिर स्लिप बनवानी थी। फिर रिसेप्सनिस्ट ने यहां से वहां किया.....सोनोंग्राफी के लिए पुनः 1100 की स्लिप बनी । स्लिप लेकर हमने फिर कक्ष ढूंढा और ..उस पुर्जी को लेकर हम सोनोग्राफी के चैम्बर की तरफ चले। लिफ्ट से चूंकि हमारा मोहभंग हो चुका था, इसलिए सीढ़ियों से ही चले। आश्‍चर्यजनक ढंग से चेम्बर जल्दी ही मिल गया। फिर हमने अपनी बारी का इंतजार किया.
सोनोग्राफी के लिए बेसिक शर्त थी कि चाय नाश्‍ता के बाद ‘स्माल-नेचुरल-काल’ को एवाइड करना था। प्रेशर के लिए दो तीन लीटर पानी भी कम पड़ गया था। हम लोग समय काट रहे थे, जिसे अन्य शब्दों में सही समय की प्रतीक्षा कहते हैं।
हमें लग रहा था कि कितना बोरडम है स्वास्थ्य परीक्षण भी। लाख साफ सफाई के बावजूद गदी चीजों की दुर्गन्ध को सुगन्ध में नहीं बदला जा सका था। रोजी रोटी और पैसों के आकर्षण में मेडीकल जैसे निरन्तर मुद्रा प्रवाही पेशे में जुड़े तकनीशियन और वार्ड बाय और नर्स वगैरह रोबोट की तरह काम कर रहे थे। उनके इन्सान होने का पता तब चलता था था जब वे परेशान मरीज से उनके सहयोगियों को सहयोग पहुंचाने की बजाय आपस में गपियाने और उनकी उपेक्षा करने में दिलचस्पी दिखाते थे। वे तब भी इन्सान लगते थे जब चिड़कर बात करते थे। रोबोट को इतनी समझ कहां ?
हम देख रहे थे कि रेडियेशन रूम के दरवाजे खेले थे और एक्स-रे तकनीशियन महिलाओं के पैर और बाकी लोगों के शरीर का दरवाजा खेलकर एक्स-रे ले रहा था। लोग क्या चलचित्र का आनंद ले रहे थे? ऐसा मैंने सोचा क्योंकि मैं ऐसा ही सोचता हूं। जिन मामलों में समझदार लोग यूंह जाने दो कहकर दिमाग फिरा लेते हैं मैं नहीं सोचने दो कि जिद लेकर अपना दिमाग खराब करते रहता हूं। लोगों को मुझसे यही शिकायत है कि मैं बहुत सोचता हूं। मैं क्या करूं, मेन्युफेक्चरिंग डिफेक्ट है।
हमने देखा कि एक अस्सी के आसपास के दुबले पतले इन्सान को एक बार्ड बॉय व्हील चेयर में बैठाकर लाया। वह खेल रहा था। बाइस तेइस साल के उस बाय में गजब की फुर्ती थी। दो दरवाजों में कभी इस दरवाजे और कभी उस दरवाजे पर वह व्हील चेयर को चकरी की तरह घुमा देता था। बूढ़े में सिर्फॅ हडिडयां थीं और हर हालात से समझौता कर लेनेवाली मिंचमिंची आंखें थीं। सी टी स्कैन वाले रूम का दरवाजा खुला तो उसने बुड्ढे को अन्दर लुढ़का दिया। व्हील चेयर अपनी गति से अंदर दौड़ गई जिसे अंदर खड़े दूसरे वार्डबाॅय ने हंसकर लपक लिया। हास्पीटल की नीरस जिन्दगी में कितने मज़े से ये लोग रस घोल रहे हैं । मरीजों का क्या, अच्छे हो गए तो घर लौटेंगे वर्ना मरना तो है ही एक दिन। बेहतर है वार्डबाॅय का मनोरंजन करते हुए मरें।
कुछ देर बाद एक्स-रे तकनीशियन ने एकस-रे मशीन को कमरे के बाहर निकाला। मशीन मूवेबल थी और व्हील होने के कारण किसी भी दिशा में घूम सकती थी । उसने उसे रजनीकांत षैली से लुड़काया। एक्स-रे कक्ष के सामने काफभ् लम्बा गलियारा था और दोनों तरफ डॉक्टर और लैब रूम थे। करीब सौ डेढ सौ फीट का लम्बा गलियारा चिकनी टाइल्स का था। उसपर भारी, भरी पूरी करीब सात आठ फुट ऊंची मशीन को लुढकाने का मज़ा ही कुछ और था। जिसने देखा दंग रह गया। एक्स रे कक्ष से लिफ्ट की दूरी करीब साठ सत्तर फीट तो होगी। उस मौजी तकनीशियन ने उसे वहीं से पुश कर दिया तो मशीन तेजी से लिफ्ट की तरफ दौड़ पड़ी। वहाँ एक वार्ड बॉय खड़ा था उसने हंसते हुए कैच ले लिया। हमारी जान में जान में जान आई। अगर इस बीच कोई मरीज या उसका परिजन बीच में आ जाता तो? फिर मैं अपनी इस मूर्खतापूर्ण सोच पर शर्मिन्दा हो गया। मैंने अपने को समझाया: यह हॉस्पीटल है भैये, दुर्घटना से कैसा डर? अस्पतालवालों को दुर्घटना का अगर इलाज पता है तो दुर्घटना घटित करने का भी गुर आना चाहिए।
मेरी पत्नी इस खेल से उकता गई। वह गुस्से में उठी और बोली, ‘‘अगर होता है तो देखते हैं, नहीं तो चलते है। हम क्या यह तमाशा देखने आए हैं।’’
मैंने मनाया कि हो जाए वर्ना पत्नी अगर सही में वापस हो गई तो 1100 तो वापस होने से रहे। फिर चिकित्सा का क्या होगा। मैंने उसे समझाया, ‘अरे अपने साथ थोड़े ही कुछ हो रहा है..’ पत्नी ने मुझे घूर के देखा और पूछा: ‘‘तो ?’’
अब इस ‘तो’ का जवाब मेरे पास हो तो दूं। मेरे जवाब का पत्नी को इंतजार भी नहीं था। वह कक्ष के अंदर चली गई।
पत्नी को सोनोग्राफी कक्ष में समय लग रह था इसका मतलब काम हो रहा था। करीब आधेक घंटे में पत्नी लौटी और बोली: ‘दो घंटे बाद रिपोर्ट मिलेगी।’
बहुत समय था। हम लोग टाइम-पास करने के लिए केन्टीन में घुस गए, जो संयोग से काफी मनोरंजक थी। सिटी के टाप-मोस्ट हास्पीटल की आलीशान बिल्डिंग के आहाते में बनी वह ‘गाय के कोठेनुमा केन्टीन’ झोपड़पट्टी का अहसास दिलाती थी। भव्य कामर्शियल फिल्मों में सत्यजीत रे की आर्ट फिल्मों की तरह...। हमें टाइम ही तो काटना था। जितना काट सकते थे उतना समय हमने केन्टीन में काटा मगर वहां की मक्खी और मच्‍छर हमें बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहे थे इसलिय उन्होंने युद्धस्तर पर हमें काटना शुरू किया तो हम मजबूरी में फिर सोनोग्राफी कक्ष की तरफ लौट आए। फिर प्रतीक्षा के बीच बीच में रिपोर्ट के लिए बार बार अंदर गए ।
कोई तीन चार घंटे बाद जब हमें रिपोर्ट मिली तो पता चला कि डॉक्टर घर या कहीं और जा चुकी हैं, अब कल आना होगा। हमने कहा:‘‘ हम बाहर से आए हैं, दूर से आए हैं।’’
जवाब बहुत दमदार मिला:‘‘ सभी दूर से आते हैं। चिकित्सा कराने आए हो कि सत्यनारायण का प्रसाद लेने ?...एक हफ्ते का समय लेकर आना चाहिए..’’
‘चाहिए’ के आगे तमाम लिफ्ट बंद हो जाती हैं। वहां सीढ़ियां भी नहीं होतीं। हम धड़ाम से धरती पर थे और अपना लटका हुआ मुंह लेकर अस्पताल की सीढियां उतरकर किराए के फ्लेट की तरफ़ लौट रहे थे।
हमारे साथ एक दो वर्ष का एक सीरियस बच्चा भी नीचे उतारा जा रहा था। मजे की बात है या आश्‍चर्य या दुर्भाग्य की यह कहना अब मुश्किल है मगर सच यह है कि सीढ़ियों से ही वह उतारा जा रहा था। उसकी युवा मां एक खिलौने की तरह साथ में चल रही थी। उसके आंसू सूख चुके थे। उसकी ममता और घबराहट पर अनहोनी की खामोशी थी। दो लोग आक्सीजन सिलिण्डर को किसी तरह संभाले हुए उतर रहे थे। हालांकि एमरजेन्सी के लिए लिफ्ट थी, ट्राली थी ... स्ट्रेचर थे......पर शायद इन चीजों पर से उन लोगों का भी विष्वास उठ चुका था।
हम लोग एक तरफ हट कर खड़े हो गए ताकि उन्हें बाधा न हो। वे हमारी आंखों के सामने से एक भयानक दृश्‍य की तरह जा रहे थे।
बड़ी करुणा से, दुख से, अफसोस से उन लोगों को देखकर हम फिर हताश हुए, कुंठित हुए अवसाद से भर गए। मगर ....‘चलना ही जिन्दगी है’ के भाव से हम फिर चल पड़े।


Note : 2
मैं अपने निवेदन को...‘‘ ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए’’..इस विचार से नहीं हटा रहा हूं..कृपया इसे चाहें तो पढें और तकनीकी परेशानी को समझें ,जो सुधार दी गई है।..चाहे तो ना पढ़ें..'क्या फर्क पड़ता है' के भाव से..आपके विवेक पर छोड़ रहा हूं..
नोट:1 मित्रों फॉर्मेट कराने के बाद ऑपरेटर ने जो फॉन्ट कृतिदेव के डाले हैं उसमें श और ष की बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है। श तो आता है कितु लाख चाहने पर भी ष नहीं आता जबकि यूनी कोड कनवर्सन में यह हो जाता हे। दिक्कत यह है मूल पाठ में के 11 से लेकर ष डालने से वह कृति देव यूनीकोड में श और श ष हो जाता है । जहां हम परंपरा से ष और श पढ़ते रहे हैं कृपया वैसा पढ़कर मुूझे कृतार्थ करें। ऑ महादय फॉ बदलने जैसे ही फुर्सत मिलेगी आएंगे. महीने भर से प्रतीक्षा में हूं। ‘अभी आ रहा हूं’ के उनके आश्वासन को बड़े सब्र से बर्दास्त कर रहा हूं। धन्यवाद!!

Wednesday, June 30, 2010

प्रेतवाला पीपल

स्कूल ग्राउंड में अंधेरा है।
अंधेरे में स्कूल ग्राउंड मे खड़ा प्रेतवाला पीपल का पेड़ और भी भयानक लग रहा है।
उसी भयानक पेड़ के नीचे बने ,टूटे फूटे चबूतरे पर संता गुरुजी चैन की नींद सो रहे हैं।
संता गुरुजी का मन जब जब खराब होता है , तब तब प्राइमरी स्कूल के खुले ग्राउंड के एक कोने में खड़ा पीपल का पेड़ ही उनको शांति देता है। शांति के लिए तो सभी जीनेवाले बुरी तरह मरते रहते हैं। लोगों का कहना है कि जो लोग बुरी तरह मरते हैं , वे लोग प्रेत बनकर इसी पीपल के पेड़ में रहने लगते हैं। आदमियों के मरने से बननेवाले भूत , प्रेत , बेताल वगैरह प्रायः पेड़ में ही रहते हैं। इसका कोई पौराणिक कारण होगा। गुरुजी उस कारण पर नहीं जाते और परंपरा के अनुसार अन्य लोगों की तरह जब तक सांस है , पेड़ के नीचे रहते हैं। मरने पर पेड़ पर तो रहना ही है।
ऐसा विश्वास है कि इस स्कूल ग्राउंड वाले पीपल के पेड़ पर भूत रहते हैं। जब-जब किसी बच्चे की स्कूल में तबीयत खराब हो जाती है , तब-तब पूरे गांव में फुसफुसाहट फैल जाती है कि पीपलवाले प्रेत ने सताया है। बच्चे के परिवारवाले तब छोटी-मोटी पूजा करके पीपल के प्रेत को मनाया करते हैं। उस पूजा के लिए गांव के ‘शनीचर महाराज’ या ‘प्रेत पंडा’ ही भूतों के एकमात्र पुरोहित हैं। नक्षत्र खराब होने से समस्याओं से मुक्ति के लिए जब वे शनीचर की पूजा करवाते हैं तो शनीचर महाराज हो जाते हैं। भूतबाधा से मुक्त कराते समय वही शनीचर महाराज ‘प्रेत पंडा’ कहलाने लगते हैं। लोगों की आस्था ने उन्हें बहुरूपिया बना दिया है।
पर संता गुरुजी न प्रेत बाधा को मानते हैं न शनिचर के क्लेष को। न मानने के दो कारण हैं।
एक बार किसी ने पूछा ‘‘संता गुरुजी! आप शनिचर को क्यों नहीं मानते ?’’
‘‘क्यों मानूं ?’’ पलटकर संता गुरुजी ने पूछा -‘‘ आज तक जिस जिस को माना है , उसी ने सताया है। आदमी हो कि देवता। प्रेत हो कि दुष्टग्रह। मान देने पर सभी ऐंठते हैं। वोट मांगने आते हैं तो बड़े-बड़े वादे करते हैं। जीत जाते हैं तो अकड़कर कहते हैं-‘वोट देकर खरीद लिया है क्या मास्टर !’ लोग माननेवालों को दुत्कारते हैं। काम उसका करते हैं जो विरोधी है। क्योंकि विरोधी खुष हुआ तो वोट देगा। जब वोट दे देगा तब ठेंगा दिखाएंगे। मान-मनौवल भी सताने की योजना है। आज शनि इसलिए दुख दे रहा है कि उसकी पूजा की जाए। पूजा करवाउंगा तो बिजली का कनेक्शन और पाइप लाइन कटवा देगा। फिर मैं उसी पार्षद के पास जाउंगा जो पूछता है -‘खरीद लिया है क्या मास्टर ?’ सब दुष्ट लोग मिले हुए हैं भैया.....दुष्ट मनुष्य हो कि दुष्टग्रह। मैं नहीं मानता किसी को।’’
पूछनेवाले ने अविश्वास से सहमकर कहाः-‘‘गुरुजी! सच कह रहे हो कि व्यंग्य कर रहे हो ?’’
संता गुरुजी बिफरकर बोले:‘‘ सच बोल रहा हूं। हमेशा बोलता हूं। लाग लपेट करनी होती तो चुनाव लड़ता, मास्टरी क्यों करता ? तुमको लगता है कि व्यंग्य कर रहा हूं! देख नहीं रहे हो कि मैं इस डरावने पेड़ के नीचे मज़े से बैठा हूं। तुम लोग हंसते हो कि मैं जीते जी प्रेत हो गया हूं। हां, हो गया हूं। मक्कार आदमी होने से अच्छा कि प्रेत हो जाओ। न दिन की परवाह न रात की चिंता। सुबह शाम घूमने के बहाने यहां आ जाता हूं तो ताजा हवा मिल जाती है। लोगो से मिलता हूं तो दम घुटता है। लोग डरते हैं कि यहां आने से प्रेत बाधा होगी। मैं सालों से यहां आ रहा हूं। मुझे शांति मिलती है। अच्छा , मुझे बताओ ! प्रेत बाधा से क्या होता है ? आदमी मर जाता है ? मरना तो है ही एक दिन। मरेंगे तो प्रेत बनेंगे और मज़े से रहेंगे इसी पीपल पर ...जब मरने के बाद यहीं रहना है आकर , तो जीते जी आकर अपनी जगह क्यों न घेर लें...लोगों की नज़र वैसे ही नज़ूल की फालतू पड़ी ज़मीन पर लगी रहती है। किसी दूसरे ने घेर लिया तो उसे किराया देना पड़ेगा। देखते नहीं एक-एक आदमी दस-दस आदमियों की जगह घेरे हुए है। रहता खुद कहीं और है, घेरी हुई जगह को किराए से उठा देता है। मैं अपनी जगह खुद घेर रहा हूं और खुद ही रहूंगा।’’ सुननेवाला आदमी हंसने लगा तो संता गुरुजी ने आश्चर्य और तिरस्कार से उसकी तरफ़ देखा। गुरुजी के चेहरे पर हास्य या विनोद का भाव नहीं था। हंसनेवाला सकपकाकर बोला:‘‘ नई , मेरा मतलब था कि ... मतलब प्रेत तो वो बनते हैं न जो मरने के पहले ही मर जाते हैं..यानी आयु से पहले मर जाते हैं...दुर्घटना से , हत्या या आत्महत्या से , .. आप क्या सोच रहे हैं ?’’
‘‘ मैं क्या सोचकर मरूंगा ?’’ गुरुजी झल्लाए-‘‘ सोचकर कोई नहीं मरता । दुर्घटना बिना सोचे होती है। हत्या जिसकी होती है अगर सोचने का अवसर पा जाए तो हत्यारों से बच जाए। कुछ हत्यारे तो साधुता ओढ़कर आते हैं। आत्महत्या भी कोई तभी करता है जब सोचने समझने वाली बुद्धि काम करना बंद कर देती है। समझे..?’’
‘‘ आप तो बहुत बढ़िया ढंग से सोचते हैं गुरुजी !’’ सामनेवाले के पास समय ज्यादा था शायद। वह गुरुजी को उकसाने लगा था ,‘‘ इतना बढ़िया सोचनेवाला आदमी अकाल मौत कैसे मरेगा गुरुजी ? कैसे वह प्रेत बनेगा ? कैसे इस पीपल पर रहेगा ?’’
गुरुजी ने गहरी सांस भरकर कहा ,‘‘ तुम मेरे मरने की आयु को क्या जानो ? फिर तुम लोगों के लिए मरना लुढ़क जाना भर नहीं है। जलाते हो , अंत्येष्टि करते हो , गंगा में राख बहाते हो। दुनिया भर के कर्म कांड करते हो कि मरनेवाले की कोई इच्छा अधूरी न रह जाए वर्ना वह प्रेत हो जाएगा। जीते जी उसे जिन बातों के लिए जानबूझकर तरसाते हो , मरने पर उसके शव को चुटकी भर देकर उसके प्रेत बनकर सताने के डर से मुक्त होने की कोशिश करते हो ? पर मुझ जैसे आदमी की तरफ नहीं देखते जो जीते जी मर चुका है। मैं कब का और कितनी मौत मर चुका हूं कभी सोचा है.. तुम्हारे धर्म ने, तुम्हारी दोगली नैतिकता ने , तुम्हारे ताकतवर स्वार्थों ने , तुम्हारे छल , कपट , प्रपंचों ने मुझे दौड़ा दौड़ाकर मारा है। मेरा शरीर तो सिर्फ कर्तव्यों की ठठरी पर बंधा हुआ चल रहा है। तुम इसे जीना कहते हो ? मुझसे कहते हो कि मैं जब मरूंगा... अब और क्या मरूंगा..मैं..?’’ इतना कहकर तथा एक और गहरी सांस लेकर गुरुजी चुप हो गए। घनीभूत पीड़ा उनके चेहरे पर छाने लगी। प्रश्नकर्ता सहम गया। शब्दों की मौत मरनेवाला यह गुरु कहीं शारीरिक मौत अभी मर गया तो उलझ जाऊंगा। जल्दी से हाथ जोड़कर बोलाः‘‘ अच्छा गुरुजी ! एक जरूरी काम याद आ गया। बाद में मिलूंगा।’’
गुरुजी नमस्ते का जवाब नहीं देते। सिर्फ मुस्कुरा देते हैं। मुर्दा नमस्ते की तरह एक मुर्दा मुस्कान उनके चेहरे पर छा जाती है। जुड़े हुए हाथ ही कब ज़िन्दा होते हैं। बनावट होती है उनमें। बनावट का जवाब गुरुजी बनावट से देते हैं। गुरुजी के वास्तविक दुखों ने उन्हें वास्तविक जगत से भिन्न और निराला कर दिया है। अभाव ने उनके भावों को सांसारिक भावों से जुदा कर दिया है। वे हटकर दिखाई देते हैं और हटकर ही चलते हैं। चलते पुरजे , राजनैतिक और बुद्धिमान लोग उनकी बात चलते ही कहते हैं-‘‘अरे उसकी बात मत करो।’’
मगर गुरुजी की बात होती रहती है। बात होती है कि आखिर कुछ तो है कि अकेला वही निर्भीकतापूर्वक प्रेतवाले पीपल के पेड़ के नीचे लेटा हुआ शांति पा रहा है। यह वह व्यक्ति है जो भूतों से नही डरता पर अपनी खस्ता हाल जिन्दगी की सड़ी गली उपलब्धियों के आगे सहमा हुआ खड़ा रहता है। अपने आसपास फैले अभाव , अन्याय , अनचार , झूठ , छल , दिखावे और धोके से चिढ़ता है। अपने कद से ऊंची समस्याओं और पत्नी द्वारा परोसे गए अपने से ज्यादा भारी उलाहनों के आगे झुकता है , दबता है। बार बार उसे कहना पड़ता है ‘‘ मुझे माफ करो.....सब मेरी गलती है.....मैं पैदा हुआ मेरी गलती
है...तुम्हारा पति बना, तुम्हारे बच्चों का पिता बना..मेरी गलती है... कायर हूं..कर्तव्यों के हिजड़े तर्कों के पीछे खड़ें होकर मरने से बच रहा हूं , मर नहीं रहा हूं ....मेरी गल्ती है.....जब तक जी रहा हूं तब तक इस बात
के लिए माफ कर दो कि पूरी तनखा घर ला रहा हूं....अब तनखा कम है तो इसलिए माफ करो कि इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है..’’
इस तरह के दैनिक दृश्य प्रायः घटते और गुरुजी इसी प्रेतवाले पीपल के नीचे आकर बैठ जाते।
आज भी वही हुआ था। गुस्से और हताशा में गुरुजी ने फिर ब्याज-क्षमावाणी की उद्घोषणा की थी और अवसाद का प्याला पीते हुए पीपल के नीचे आकर बैठ गए थे। एक एक चीज़ किसी तेज घूमते चक्र की भांति उनके मस्तिष्क में घूमने लगी थी। वे हर बात को याद करते हुए पहलू बदलने लगे और तनाव के महीन बुने गए मकड़जाल में अपने को उलझता देखने लगे।

हमेशा की तरह तनाव में भरे संता गुरुजी अपेक्षाकृत खाली पास बुक को पंचाग की तरह खोलकर बैठे बड़बड़ा रहे हैं-‘‘ लोग समझते हैं ..मास्टरों को बहुत पैसा मिलता है...काम कुछ नहीं है.. दिख नहीं रहा किसी को कि काम दुनियाभर का मास्टरों के सर पर ऐसे लाद दिया गया है कि जैसे वह गधा हो.. जोत देते हो यहां वहां..फिर भी कहते हो काम नहीं है... ऊपर से लड़को का कोर्स...मक्कार साले...झूठे..धोकेबाज..इधर उधर से कर्ज करके घर की गाड़ी खिंच रही है..कर्ज़ लेकर दो कमरे बनवाए हैं ...पार्ट फाइनल...टेंपरेरी..पर्सनल...थोड़ा थोड़ा सब बाबुओं को चटकारा चटाकर लिया है ...वह सब कट जाता है...तनखा पूरी कभी मिलती नहीं...कुछ बचता नहीं ..अब किससे कहूं ..किसे बताऊं ..कौन समझता है...????’’
वे किसी से कह नहीं रहें थे। किसी से कहने की उनकी आदत थी भी नहीं। अपना दुख अपने को ही सुनाकर हल्का कर रहे थे। मगर भूल गए थे कि खाली जगह में भी हवा होती है। हवा उनकी बड़बड़ाहट सुन रही थी। उसने चुगली कर दी। पत्नी अचानक तमतमाकर सामने आ गई । पूछने लगी -‘‘ किसे सुना रहे हो ? मुझे ?’’
संता गुरुजी अकबकाकर उसका मुंह देखने लगे। सहज होकर बोले-‘‘तुझे नहीं सुना रहा हूं..खुद ही कुढ़ रहा हूं।’’
‘‘ किस पर कुढ़ रहे हो ?’’ पत्नी बिफरी।
गुरुजी ने होंठ पर जीभ फिराई और चश्मा उतार कर बोले ,‘‘ किस पर कुढ़ूंगा ! अपनी किस्मत पर कुढ़ रहा हूं।’’
‘‘ अपनी किस्मत पर कुढ़ रहे हो ? हूं...?? मैं खूब समझती हूं.. तुम्हारी किस्मत को.....बड़ी देर से सुन रही हूं.....बातें बनाकर समझते हो कि बच जाओगे ? बच्चों की नजर में ऊंचे हो जाओगे.... नहीं हो सकता तो नहीं बोल दो ..बहाने क्यों बनाते हो ? लड़के भी समझते हैं कि चाय का ठेला चलानेवाले के लड़के भी बाहर पढ़ रहे हैं और हम यहीं सड़ रहे हैं..’’ पत्नी रोने लगी।
गुरुजी को भी गुस्सा आ गया -‘‘ तुम नहीं जानती कि क्यों यहां पढ़ रहे हैं , सड़ रहे हैं...?? तुमको नहीं पता कि वे पढ़ते कितना हैं ? तुम नहीं जानती कि खर्च कितना है... कि घर कैसे चलता है ? कि पिछले कई सालों से घर कौन चला रहा है ? कि मेरे पास तो एक पैसे का हिसाब नहीं है । कि पाई पाई का हिसाब तो तुम्हारे पास है , तुम ही बताओ कि कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है ?’’
‘‘ सब मैं लुटा रही हूं.....फेंक रही हूं घूरे में...’’मास्टरनी फफककर रोने लगी,‘‘ आई हूं तब से देख रही हूं ..पैसे पैसे को मोहताज हूं..पाई भर का सुख नहीं है.. एक छदाम अपने या अपने बच्चों पर नहीं उड़ा रही.तुम भी सब जानते हो.....पर कभी ढंग से चार दिन नहीं रहे..जी चाहा तो हंस बोल लिए नहीं तो चौबीस घंटे मुंह उतारकर बैठे हैं..डूबे है किताबों में..पता नहीं ऐसा क्या मिलता है किताबों में...किताबे साथ देंगी तुम्हारा.....अरे मैं सब समझती हूं...’’
‘‘ पता नहीं क्या समझती है तू.....खोपड़ी तो खाली पड़ी है तेरी..भेजा हो तो समझदारी हो.....बड़ी आई है सब समझनेवाली..’’ मास्टर ने उसे धमकाया तो बात बढ़ गई। न मास्टर कुछ समझा पाए न मास्टरनी को कुछ समझ में आया कि मास्टर को आखिर क्या तनाव है ...घर का , बाहर का , छुटभैयों का , सहकर्मियों की उठापटक का। सीधासादा आदमी क्या कर सकता है ? सोच में डूबा रह सकता है, बड़बड़ा सकता है ,होश में बातें नहीं कर सकता । मगर मास्टरनी यह नहीं समझती। डांटने पर आक्रामक हो जाती है। जबकि सत्संग और पूजा पाठ भी करती है।
मास्टर ने देखा कि बात बढ़ रही है और मास्टरनी बिगड़ती जा रही है...हाथ पांव पटकना..सिर पटकना.. रोना झींकना...चीखना ..चिल्लाना... तो झगड़े का मुंह काला करने के उद्देश्य से अपना गुस्सा पीते हुए मास्टर ने आखिर हाथ जोड़ लिए..‘‘ अच्छा मुझे माफ़ कर ...गुस्से में कुछ बोल दिया तो भूल..आइन्दा ख्याल रखूंगा..’’ टाक्सिन मास्टरनी का भी रोने से पतला हो गया था। वह कुछ नहीं बोली। चुपचाप रोती रही। मास्टर ने अपना मुंह उठाया और बाहर का रुख किया।

बाहर निकलते ही मास्टर के पैर अपने आप स्कूल के मैदान में खड़े प्रेतवाले पीपल की तरफ ऐसे उठ गए जैसे बैल हल में जुतते ही खेतों की तरफ चल पड़ते हैं।
बुदबुदाते चलते मास्टर कभी पत्नी की नासमझी पर कुढ़ रहे थे तो कभी अपनी दयनीय हालत पर। अचानक उनके मुंह से निकला-‘‘ मौत भी नहीं आती साली!’’
यह वह आत्मतोषी वाक्यांश है जो अधिकतर बड़ी स्वाभविकता के साथ हर पराधीन के मुंह से निकल जाता है। मास्टर परिस्थियों के अधीन थे। यह राहत भरा वाक्य मुंह से निकला तो वे रुक गए। उनके हाथ अपने आप जेब में जा चुके थे और फिर उनके हाथ में बीड़ी और माचिस थी। उन्होंने खड़े खड़े बीड़ी सुलगाई ओर जोर का एक कश लिया जो सीधे फेफड़ों में उतर गया। धुआं छोड़ते ही उनकी समझ में यह बात भी आ गई कि मौत क्यों नहीं आती। वे बुदबुदाए-‘‘ मौत भी कैसे आएगी बेचारी! मर गया तो फायदा कहां किसी का है..कौन उनके पीछे घर संभालेगा ? अरे नुकसान तो बीवी और बच्चों का ही है.... कहां जाएंगे ? क्या करेंगे ? कौन उनकी मदद करेगा ? यही सोचकर किसी तरह घर बनवा लिया था कि अगर मर भी गया तो छाया रहेगी बच्चों के सर पर। मगर सर पर छाया खड़ी करते करते पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। क्या ज़िन्दगी है साली..एक जांघ ढंको तो दूसरी नंगी हो जाती है। कर्ज इतना है कि यदि आज मरता हूं तो जीपीएफ बैंकवाले और दूसरे लोग हथिया लेंगे। जी रहा हूं तब तक तन्खा से कटेगा धीरे धीरे। यही सब मौत भी देख रही होगी इसलिए तरस खाकर नहीं आती।
मास्टर को फिर लगा कि मौत तो तरस खा रही है मगर..दुख को दया नहीं आती। पत्नी को क्या कहें ? उसका दुख भी तो सही है। बच्चों को लेकर उसके कुछ सपने हैं। पर मैं क्या करूं ? भाग्य को मानू कि किस्मत को रोऊं ? मेरी हालत को समझनेवाला कोई नहीं है।
सोचते सोचते झींखते कुढ़ते संता मास्साब प्रेतवाले पीपल के नीचे आ गए। ..पीपल पूजकों ने या प्रेतपूजकों ने पीपल के आसपास चबूतरा उठा दिया है। पत्थर की चीप लगवा दी हैं। संता मास्साब धम से उसी पर बैठ गए।
घर अभी भी घूमते हुए सर के साथ घूम रहा था-‘‘ क्या जिन्दगी है ससुरी! आदमी जिनके लिए जीता है , वही दो बातें नहीं सुन सकते। गुस्सा करो तो दुगुने गुस्से से टूट पड़ते हैं। जैसे मैं उनका दुश्मन हूं। आखिर मैं जी किसके लिए रहा हूं। वे मुझे यह सहयोग दे रहे हैं ? थोड़ी सुविधाएं कम पड़ी , एक आध सपना टूट गया..या दो एक निवाले कम पड़े तो मुझे ही खाने लगे। सच कहते हैं बुजुर्ग कि सब देखी सुने की माया है...मुफ्त में दिल भरमाया है। ’’ संता मास्साब का चेहरा चूल्हे की तरह दहक उठा। दोनों हाथों से थामकर वे कुछ देर सामने झुक गए। थोड़ा शांत होने पर वे चबूतरे पर लेट गए।
पीपल का ऊंचा और घना विस्तार उनकी आंखों में फैल गया। मास्टर ने देखा कि पीपल के पेड़ पर सैकड़ों हंडियां लाल कपड़े में बंधी हुई टंगी हुई थीं। उनमें मृतक के घरवालों ने दाहसंस्कार के तीसरे दिन बुझी और ठंडी राख में से चुनकर कुछ विशेष हड्डियां...दांत...अंगुलियां आदि हंडी में रख ली थीं कि कभी जब प्रयाग जायेंगें तो संगम में विसर्जित करेंगे। इससे मरी हुई आत्मा को शांति मिलेगी। मास्टर को हंसी आई। गीता कहती है कि आत्मा अमर है और गीता का पाठ करनेवाले,उसकी पूजा करनेवाले मानते हैं कि मरे हुए , जले हुए शरीर की बची हुई हड्डियों को संगम में सिराने से शांति मिलती है। बताइये , मरने के बाद भी आदमी को शांति की तलाश रहती है। यह साली शांति ही परले सिरे की धोकेबाज है। है कहीं नहीं , मिलती किसी को नहीं पर मिलने की आस सबको बंधाए रखती है। मैं साला मरने के बाद पक्का भूत बनूंगा और मेरी हड्डियां चुनने वालों के हाथ पकड़पकड़कर झटक दूंगा कि यह बकवास मेरे साथ नहीं चलेगी। मुझे प्रयाग क्या शांति देगा जहां लोगों की इसलिए हत्या कर दी जाती है कि उनकी गांठ का सारा पैसा हड़प लिया जाए।
गुरुजी ने हंडियों को अफसोस के साथ देखा और उनमें जिनकी हड्डियां थी उनपर तरस खाया कि बेचारे मरने के बाद भी हंडियों में कैद हो रहे हैं। अब उन्होंने अपना ध्यान हंडियों से हटा लिया।
पीपल के पत्ते हवा में धीरे धीरे हिल रहे थे..जैसे वे उनमें रहनेवाले भूतप्रेतों की हथेलियां थीं जो या तो मास्साब का अभिवादन कर रही थीं या हौले हौले उनको हवा कर रही थीं। कितनी ठंडक थी उनमें...गर्मी में तो यहां मजा आ जाए। लोग बेकार में प्रेतों से डरकर इतनी बढ़िया हवादार जगह को छोड़ देते हैं। अच्छा है ...डर अच्छा है...वर्ना इतनी सी जगह के लिए ही दंगे हो जाएं। इस सद्विचार और ठंडी हवा से मास्साब के मन को थोड़ी सी शांति और मिली। उन्होंने पैर तानकर लेटे-लेटे ही एक मस्त और बेफिक्र अंगड़ाई ली।
थोड़ी देर बाद जब अंधेरा बढ़ा और सन्नाटा खिंचा तो दूर कहीं से संगीत-मंडली की आवाज़ मास्साब के कानों में आने लगी। ‘रामायण मंडली बैठी है कहीं।’ मास्साब बुदबुदाए। पहले कितनी मंडलियों में बैठते थे वे। अब कहीं मन नहीं लगता। रामायण गाने से उतनी देर मन बहला रहता है फिर वही चौकी चक्की..नून तेल..रामायण रचनेवाले तुलसीदास का तो गुजारा गृहस्थियों के दान से चल जाता था। हमें तो खुद मरना पड़ेगा तब साकेत दिखेगा।’’
तुलसीदास की याद आते ही मास्टर के चेहरे पर विद्रूप मुस्कान फैल गई ,‘ अच्छा हुआ तुलसी महाराज ! तुम गृहस्थ नहीं थे और सरकारी नौकर नहीं थे। रत्नावली को बिना किसी ऊहापोह के तुम छोड़ सकते थे। यहां तो रोज सैकड़ों लोग तुलसीदास होना चाहते हैं मगर परामर्श केन्द्रों के डर से संता मास्साब ही बने रहते हैं।’ मास्साब को तुलसी के लगे-लगे बाल्मीकि भी याद आए-‘‘ क्या हुआ उनके साथ...डाकू रत्नाकर ..पाप बांटने पहुंचे घर.. घर में जितने थे सबने कहा..पाप करो ...डाका डालो... चोरी करो ..मर जाओ.. मगर हमारी व्यवस्था कर जाओ। रत्नाकर को जीवन की , प्रेम की , संबंधों की निस्सारता समझ आ गई और चट से ऋषि हो गए।’’
मास्टर के मुंह से छूट गाली निकली ‘‘ साले संता ! तेरी बुद्धि क्यों बाल्मीकि और तुलसी बनने का नहीं सोचती। चिपका हुआ है अपनी टुटपुंजिया गृहस्थी और बंधुआगिरी से ...मास्टरी है कि बंधुआ मजदूरी है यह ! बताओ ।’’ पता नहीं मास्टर ने किससे पूछा। जब किसी ने जवाब नहीं दिया ; यहां तक कि जिन प्रेतों के घर आज फिर वे अतिथि हुए थे , उन्होंने भी नहीं ; तो मास्टर ने एक जंभाई ली और आंख मूंदकर सोने की भूमिका रचते हुए बोले:‘‘ चल यार संता ! अपन तो कर्तव्यों की मौत मरेंगे। सुबह होते ही फिर घर चलेगे।’’
थोड़ी देर में ही संता की नाक बजने लगी। वह गहरी नींद में समा गए। अलबत्ता अंधेरा, प्रेत और पीपल उनकी हिफ़ाजत में जागते रहे। (19.08.05, रक्षाबंधन, शुक्रवार)

Sunday, May 23, 2010

बिल्ली का भाग्य


डर्टी ,डफर ,चीटर कैट !
आई हेट यू!
अपने पीले गंदे दांत मत निपोरो । आई रियली हेट यू। मेरे सामने बिल्कुल म्यांऊं मत करो। मैं तुमसे नफ़रत करता हूं और नम्बर एक में नफ़रत करता हूं। नंबर दो में नहीं ..जहां आई हेट यू का मतलब आई लव यू होता है। आजकल युवाओं में प्रेम के मामले में इन्नोवेशन के चलते नये नये संप्रेषण के तरीके निकाले जा रहे है। मुझे कम से कम तुम युवा मत समझना। आज मैं गुस्से में हूं और चाहता हूं कि तुम पक्के तौर पर मुझे खड़ूस समझो। गुस्से में मुझे अपनी इमेज नही दिखाई दे रहीं ;केवल दिखाई दे रहा है वह पतीला जिस में शाम को फ्राई होने के लिए रखा गया भात था और तुमने उसे गिरा दिया । मुझे दिखाई दे रही है दूध से भरी हुई वह पतीली जिसमें मलाईदार दूध अभी भी रखा हुआ है और जिसे तुमने ..अरी चटोरी ,चालू ,चालाक, चोर , भड़ियाई बिल्ली ! लपलप सड़पसड़पकर जूठा कर दिया। तुम्हें पता है कि अब वह किसी इंसान के काम का नहीं रहा ? तुम्हें क्या पता ! तुम्हें तो मुंह डालने के पहले यह भी पता नहीं था कि इतना एक लीटर दूध तुम पी भी पाओगी या नहीं। बस मुंह डाल दिया।
इसके पहले तो तुम ऐसी नहीं थी। तुम सिर्फ चूहों के पीछे भागती थीं। छोटी सी प्यारी सी चितकबरी तुम हमें कितनी अच्छी लगती थीं। यह बात और है कि तुम्हारे नानवेजीटेरियन होने के कारण हम तुम्हें हाथ नहीं लगाते थे। दूसरे ...तुम्हारे बालों से मुझे एलर्जी है और तुम्हारे गंदे दांतों से घृणा। यही नहीं तुम्हारे नाखूनों से भी मुझे नफरत है, जिसके लग जाने से रेबिज का खतरा होता है। तुम रेबीज का भंडार हो। दांत, लार, नाखून। कैसे लोग तुम्हे मुंह लगाते है? मौका देखकर घर में घुस जानेवाली और खानेपीने की चीजों को खराब कर देने वाली कबरी कैट! तुम्हारे बारे में कम से कम मेरी राय तो अच्छी नहीं है। तुम्हारे कारण मेरी लाडली बच्ची कई बार डांट खा चुकी है। अगेन आई हेट यू!
यह क्या ? मुझे लग रहा है तुमने फिर दांत निपोरे। तुम मेरे गुस्से को मजाक समझ रही हो ? या फिर कैटरीना कैफ की तरह तुम केवल मुस्कुराते रहने का अभिनय कर रही हो। लगता है,यह बात तुम्हें पता चल गई है कि कैटरीना को लोग ‘कैट’ कहते हैं। अपने मतलब की चीजें सूंघने या ताड़ने में तुम बिल्लियों का जवाब नहीं। शायद यही वजह है कि पिछले कई दिनों से तुम्हारे हाव-भाव बदले हुए है। पहले तुुम आहट सुनकर भाग जाती थी। अब ‘कैटवाक’ करती हुई चली जाती हो। पहले हमें देखकर थोड़ी देर टकटकी लगाए देखती रहती थीं। आजकल यूं गुजर जाती हो जैसे देखा ही नहीं है। सचमुच ! तुम अपने को कैटरीना कैफ उर्फ ‘कैट’ समझने लगी हो। मगर डर्टी कैट ! तुम्हारे समझने से क्या होता है। तुम कैटरीना की तरह हीरोइन तो नहीं हो जाओगी। वैंप हो तुम वैंप। रामू और रामसे कैंप की वैंप। तुमने इन हारर लोगों की फिल्में देखी होगी तो देखा होगा कि तुम्हारा फ्रेम वे कैसा तैयार करते हैं। ..अंधेरी रात है..हवा चल रही है ..खिड़कियां अपने आप बंद हो रही है..खंढर हवेली में अजीब अजीब सी चीखें आ रही है... नीले लाइट में धबराई हुई हीरेाइन ऐसे मौके के लिए खास तौर से बनवाए गए पारदर्शी गाउन पहनकर ..‘‘कौन ! कौन !!’’ कहकर इधर उधर भाग रही है... क्या होने वाला है कोई नहीं जानता ...जिस रूप में लड़की को फोकस किया जा रहा है उससे कुछ चटोरे किस्म के दर्शकों को लग रहा है कि कोई विलेन टाइप का आदमी आएगा और पारदर्शी गाउन में लिपटी हुई लड़की .... बस ,एक गलतफहमी दर्शकों की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है ..मगर अचानक तुम ..कबरी कैट! तुम म्यांऊ करती हुई कूद जाती हो.....तुम्हारे कूदते ही कुछ फेमिनाइन चीखें निकल जाती हैं......कुछ मैस्कुलाइन गालियां हवा में तैरने लगती है......दोनों का कहना यही होता है कि बेवकूफ डायरेक्टर ! जब बिल्ली ही कुदवानी थी तो हीरोइन को सादे कपड़े पहना देते। पर दूसरी बार फिर वे टिकट विंडों में दिखाई देते हैं कि कुछ भी कहो, गाउन में हीरोइन लग अच्छी रही थी। एक बार और देखते हैं। देख लो , तुम साइउ में हो। फिर भी तुम अपने को ‘कैट’ समझ रही हो ..यानी कैटरीना कैफ....खैर , गलतफ़हमी तो अच्छे अच्छों को हो जाती है। तुम तो फिर भी बिल्ली हो।
तुम यह मत समझना कि कैटरीना की बात करने लगा हूं तो मैं बहक गया हूं। कैट की बात करते हुए भी मैं तुमसे हैट कर रहा हूं। बिल्लो रानी ! मैं अपनी चाय के लिए रखे गए दूध को किसी ‘कैट’ या ‘बिप्स’ के साथ अदल बदल नहीं सकता। वे दूर का ढोल हैं। चाय यथार्थ की प्याली है ,जो मेरे होंठों से ,मैं जब चाहूं ,लग सकती है।
तो मैं कह रहा था मनहूस बिल्ली! कि तुम हारर फिल्मों की वैंप तो हो ही , मानव जीवन की भी वैंप हो। जिस रास्ते से तुम गुजर जाओ ,उससे आदमी नहीं गुजरते। रुक जाते है कि बिल्ली रास्ता काट गई। और यह देखते हैं कि कोई दूसरा गुजर जाए ,जिसने बिल्ली को रास्ता काटते नहीं देखा है। बिल्ली का रास्ता काटना अपसगुन है। बनते काम बिगड़ जाते हैं। मगर मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा। मैंने कभी दूसरे आदमी का इंतजार नहीं किया क्योंकि इस अंधविश्वास पर मैं नहीं पड़ा। मगर आज तुमने मेरी चाय का रास्ता काट दिया।
अभी अभी पत्नी मुझे परेशान देखकर यह कह गई है -‘‘ जाने दो ना। आज का दूध-चांवल बिल्ली के भाग्य का था। जाओ, दो पैकेटस जाकर ले आओ। इतना दुखी होने की जरूरत नहीं है।’’
बताओ ! मैं गुस्से में दिखना चाह रहा हूं और पत्नी मुझे दुखी समझ रही है। सारी तैयारी पर पानी फेर रही है। गुस्से में दिखना और दुखी दिखने में अंतर है भाई ! अब पत्नी को कैसे समझाऊं।
पर एक चीज़ मेरी समझ में आ रही है कि बिल्ली का भी भाग्य होता है। मैंने सुना है कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाते हैं। आजकल तो खैर छींके नहीं होते। फ्रीज होते हैं और जालियां होती हैं। मगर कभी रहे होंगे। यह मेरा अनुमान है। प्रमाण इसका नहीं है। मुझे लगता है किसी गलतफहमी की वजह से यह बात बनी होगी। माखन और दही चोर श्रीकृष्ण छींके तोड़कर भाग जाते रहे होंगे। जब छींके की मालकिन आती होगी तो रामसे और रामू कैंप की बिल्ली वहां अचानक कूद जाती होगी। लोग समझते होंगे कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया होगा। बिल्ली तो तोड़ नहीं सकती। यही सही है । यह मैं मान सकता हूं परन्तु मैं नहीं मान सकता कि बिल्ली के भाग्य से छींका कभी टूटा होगा। ऐसा मान लेने से बिल्ली की बच्ची! तुम्हारा चोट्टापन कम हो जाता है। और मैं ऐसा होने नहीं दूंगा।
नहीं ,बिल्ली के भाग्य नहीं होता। होता तो सूरदास या रसखान लिखते। कहां किसी चोट्टी बिल्ली के भाग्य के बारे में उन्होंने लिखा ? कौए के भाग्य के बारे में जरूर रसखान ने लिखा है कि काग के भाग बड़े सजनी ,हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी।
रसखान क्यों इतने खुश हुए ? कृष्ण ने उनके छींके में कब हाथ डाला ? जैसे बिल्ली ने मेरे घर में डाला। मेरा अपना मत है कि अगर ऐसी बात थी तो रसखान को दुखी होना था या गुस्सा करना था। इतने आनंदित क्यों हुए। क्योंकि कौए ने रोटी उनके हाथ से नहीं छीनी थी न! कहते हैं किसी की रोटी नहीं छीननी चाहिए। किसी के पीठ पर मार लो , पेट पर कभी नहीं मारना चाहिए। अब बिल्ली और कौओं को कौन तहजीब सिखाए ? ठीक है ,उस समय के लोग भाग्यवादी थे। उनका मानना रहा होगा कि दाने दाने पर खानेवाले का नाम लिखा होता है। मैं नहीं मानता।
मुझे लगता है कि ‘यही ’ मानना ठीक नहीं है। क्योंकि यह मान लेने से गुस्से की जगह शांति मिलती है। मैं गुस्सा करना चाहता हूं। किन्तु हम हर जगह कहां गुस्सा कर पाते हैं?
पिछले दिनों मेरे साथ ‘दाने दाने में खानेवाले का नाम’ विषयक हादसा हुआ। जिस ज़मीन की रजिस्ट्री मैंने पत्नी के नाम कराई थी ,उसमें उसके अलावे पचीसों गैर और अजनबी लोगों के नाम भी लिखे महसूस हुए थे। वे रजिस्टर्ड तो खैर नहीं हुए पर स्टाम्प की खरीदी से लेकर डाइवर्सन ,पंजीयन, अभिलेख , नामांकन आदि-आदि में उनके हिस्से का दाना-पानी उनको दिये बिना रजिस्ट्री की न्यायमूलक कानूनी गाड़ी आगे नहीं बढ़ी। बाद में बात-बात पर कई लोगों के नामों के दाने बांटे गए, बांटे जा रहे हैं और अनंतकाल तक बांटे जाते रहंेगे। गृहप्रवेश से लेकर त्यौहारों में ,उसके बाद, बाल-बच्चों के होने पर तथा बेहद निजी क्षणों के सार्वजनिक होने के सामाजिकीकरण के सभी मामलों में दाने-दर-दाने अनेक प्रकार के लोगों ,जातियों और प्राणियों को गए हैं।
मैंने देखा है कि आज भी रसोई में रोटी बनती है तो गाय, कुत्ते , भिखारी और मेहमानों के लिए एक या दो रोटियां सुरक्षित रखी जाती हंै। गाय ,कुत्ता और भिखारी तो खैर नियमित रूप से दरवाजे पर आकर अपनी रोटी ले जाते हैं। अतिथियों की रोटी प्रायः हमीं लोग शाम को सेंककर खा जाते हैं। ऐसा तो है नहीं कि अतिथियों को कोई काम ही नहीं है और वे टाइम देखकर बस टपक पड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। हां ,कई बार और बनानी पड़ती है,जब सचमुच जरूरतमंद अतिथिगण या परिचित लोग आकर ,नहा-धोकर हमारी कुटिया को देवता की तरह कृतार्थ करने लगते हैं। हम धन्य होने के हाव-भाव से भर जाते हैं। ये सब संचारी या व्यभिचारी भाव न होकर ,‘संस्कारी-भाव’ हैं । कुलमिलाकर गाय, कुत्ता, भिक्षुक और अतिथि ,किसी गृहस्थ के हिस्से के वे पुण्य हैं ,जिनके न करने से उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।
इस पूरी सूची में बिल्लो! तुमने देखा कि तुम्हारा यानी बिल्ली का कहीं जिक्र नहीं है। तुम तो झपट्टा मारनेवाले वर्ग की हो। शेरसिंह वगैरह तुम्हारी बहन के बेटे कहलाते हैं। तुम उनकी मौसी हो। चोर चोर मौसेरे भाई की कहावतें तुम्हीं लोगों को देखकर बनी होगी। मुफ्तखोरों! तुम इसे बहादुरी समझते हो ? धिक्कार है!! मेरे प्रिय महाकवि कबीर ने तुम्हारी बड़ी बुरी भद्द की है। उन्होंने लिखा है-‘‘ जब लगि सिंह रहै बन माहिं। तब लगि वह बन फूलै नाहिं।’ सुन रही हो , इतने मनहूस हो तुम लोग। यही नहीं कबीर ने इस समस्या के उन्मूलन का उपाय भी बताया है। कहते हैं-‘उलट स्यार जब सिंहहिं खाय। तब वह बन फूलै हरियाय।।’’ वाह! वाह!! इसे कहते ईंट का जवाब पत्थर से। निकृष्ट से उत्कृष्ट की कैसी दुर्गति हो रही है, कुटिला कैट! देख रही हो?
तुम लोगों की मक्कारी पर एक कहानी मैंने पढ़ी है। भगवतीचरण वर्मा ने ‘सोने की बिल्ली ’नामक कहानी में तुम्हारी और तुम्हारे मौसेरे-चचेरे भाइयों की अच्छी कलई खोली है। एक बहू ने तुम्हारी जैसी चोर बिल्ली को फेंककर कुछ मारा। अच्छा किया। चटोरी बिल्ली बेहोश हो गई । उसके मौसेरे रिश्तेदारों यानी पंडितवर्गीय लोगों ने ‘सोने की बिल्ली’ दान करने का प्रपंच रचा। परिवार पर बला टूटने का भय दिखाया। चलिये साहब सोने की बिल्ली तैयार हुई। कहानी में हो जाती है इतनी जल्दी। और जब दान का वक्त आया तो बिल्ली उठकर भाग गई। चूंकि वह कहानी भगवती चरण की थी ,इसलिए बिल्ली भाग गई। किसी बिल्ली की कहानी होती तो शायद दंड भी निर्धारित कर देती कि हजार बिल्ली को दूध पिलाओ तो पाप कटे। हो सकता है जीवन भर रोज दस बिल्लियां दूध पीकर जाती।
बिल्लो ! मुझे एक और कहानी याद आ रही है जो मुझे ज्यादा सुकून दे रही हैगी। तुम्हें पता है- बंदरबांट की कहानी? दो बिल्लियां आपस में इसलिए लड़ पड़ी कि उन्होंने एक साथ एक ही रोटी पर झपट्टा मारा था। अब बंटवारा कैसे हो? झपट्टा मारनेवाले प्रायः बंटवारे में कमजोर होते हैं। तब एक बंदर आया। वह चालाकी से रोटी बांटने लगा। कभी एक तरफ की रोटी ज्यादा कर देता और कभी दूसरी तरफ की। जितना हिस्सा ज्यादा होता उससे ज्यादा तोड़कर खा जाता। आखिर में जब कुछ न बचा तब बिल्लियों को समझ में आया कि बंदर ने क्या किया। मुझे आज यह कहानी अच्छी लग रही है। तब अच्छी नहीं लगी थी। धोकाधड़ी मुझे कभी अच्छी नहीं लगी। पर आज चूंकि मेरा नुकसान हुआ है तो मुझे तुम्हारे पुरखों का नुकसान अच्छा लगा। शायद यहीं से चोर का माल चंडाल खाए का मुहावरा बना होगा। ओर जाके पैर न फटे बिंबाई का भी । खैर ! अब मैं थक गया हूं। अब और गुस्सा नहीं हो सकता। तुमसे अब मैं बाद में निपटूंगा।
आज इतनी ही घृणा...शेष घृणा फिर कभी ....
तब तक याद रखना-आई हैट यू! डर्टी कैट!!
तुम्हारा -
कुछ नहीं ,कोई नहीं
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