स्थापना और विसर्जन पूरे देश में मूर्तियां स्थापित हो गई हैं। हम उन मूर्तियों को स्थापित होते देख सकते हैं , जिन्हें हममें से कुछ लोग बनाते हंै और बहुत से लोग स्थापित करते हैं। क्यों बनती हैं मूर्तियां , कैसे बनती हैं मूर्तियां और क्यों और किसके लिए स्थापित होती हैं मूर्तियां ? कौन मूर्तियां बनाता है ? किसके इशारे पर बनाता है और कौन स्थापित करता है इन्हें ? इन सवालों के बारे में सोचने की ना तो हमें जरूरत हैं और ना तो कोई सोचता है। मूर्तियां स्थापित हो जाएं , उन्हें प्रतिष्ठित कर दिया जाए, एक लोक आयोजन हो ,नगर और अपने सहज पहुंच में पड़नेवाले स्थानों पर अगर हम जाना चाहें तो जाकर देखकर आनंदित हो लें या श्रद्धावनत होलें। सामाजिक मनुष्य से इतनी ही अपेक्षा की जाती है और इतनी ही उसकी आवश्यकता होती है। स्थापना और प्रतिष्ठा का सुख जिन्हें मिलता है , वे उसका आनंद सप्रयास ले लेते हैं। मैंने मूर्तियों के निर्माण का आनंद लिया। यह आनंद हमारे हाथ में होता हैं। हम ही निश्चित करते हैं कि किस चीज़ का हमें आनंद लेना है। थोपी गई भयंकर और भयानक ‘सुन्दर’ वस्तु का आनंद लेना किसी के वश की बात नहीं हैं।...