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Showing posts from October, 2025

राजनांदगांव के विनोदकुमार शुक्ल के हॉस्पिटल में भर्ती होने का समाचार सुनकर..

क्यों भैया! क्या राजनांदगांव स्टेशन आ गया? इस्मिती आदबन ने  घर को हमारे कितने साल दिए होंगे? याद करता हूं तो हार जाता हूं  अपने जन्म तक भी नहीं पहुंच पाता  अपने ही जन्म का किसको पता कब शुरू हुआ? कोई बताएगा क्या? मुझे ही इस्मिती आदबन ने कभी कभी बताया था-  "इन्हीं हाथों में आंख खोली थी तुमने छोटे भैया! मैया तो बेहोश थी तुम्हें जनमते ही... सब तो उन्हें संभालने में लग गए  तुम्हें कौन संभालता? मैं ही न? और अब तुम आकाश छूने लगे!! तुम्हारा मुंह देखना हो तो गर्दन दुखती है, पर सच्ची छोटे भैया! छाती जुड़ा जाती है... खूब बढ़ो!" मां ने बताया था कि जन्म से ही उसने   मुझे बुलाया था - 'छोटे भैया!' राजनांदगांव के रानी सागर के नीचे  जो बस्ती है  बसंतपुर जानेवाली गाड़ादान को छूती यादवों की  उसी बस्ती में रहती थी वह इस्मिती मौसी.. दूध, दही सब वही लाती थी हमारे घर  और ढक्कन खोलते ही घर भर में खुशबू भर दे  ऐसा कड़काया गया घी.. एक बस्सी में मिश्री मिलाकर तो मैं ही  सबसे पहले भोग लगाता था  जब जब घी आता था 'उसकी जुबान में मक्खन था और बातों मे...

अपनी सोच, अपनी अभिव्यक्ति

अपनी सोच, अपनी अभिव्यक्ति हर किसी की अपनी सोच, अपनी फ़ितरत, अपना स्वभाव, अपनी प्रकृति-प्रवृत्ति, अपने अनुभव-प्रभाव, अपना चेतन-अवचेतन, अपना व्यावहारिक मानस मंडल होता है। उसी के अनुरोध-बल पर किसी बात के व्यक्ति अपने अर्थ लेता है, अपनी व्याख्या करता है। जोश मलीहाबादी की एक ग़ज़ल है - नक्शे ख़याल दिल से मिटाया नहीं हुनूज़।  बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हुनूज़।। रेख़्ता और कविता कोश में यह ग़ज़ल मिलती है। उस्ताद मेंहदी हसन ने इसे बहुत दिलकश अंदाज़ में गाया है। इस गाई हुई ग़ज़ल में एक अलग शे'र  है, जो दोनों स्रोतों में नहीं मिलता। वह यह है - तेरी ही जुल्फ़ेनाज़ का अब तक असीर हूं, यानी किसी के काम में आया नहीं हुनूज़। जुल्फ़ेनाज़ : ज़ुल्फ़ के नखरे, नखरीली ज़ुल्फ़। असीर : गिरफ़्तार, मुब्तिला।। हुनूज़ : अब तक, अभी तक। अर्थात तेरे जुल्फ़ों के नखरों का यानी लटों के तरह तरह से बनाने और उनको बनाकर इतराने में ही इतना गिरफ़्तार हो चुका हूं, उनका ऐसा प्रभाव हुआ है कि मन वितृष्णा, ऊब से भर गया। अब किसी की जुल्फों की जानबूझकर लटकाई गई लटों को देखकर मन मितलाता है। मेहनत कर के बिखरी छोड़ी गई लटों के हम का...

काली_पुतली_चौक_की_चौपाटी_में_भारत_माता_और_आदिवासी_अस्मिता_का_सवाल

  काली_पुतली_चौक_की_चौपाटी_में_भारत_माता_और_आदिवासी_अस्मिता_का_सवाल 6 सितंबर 2025 को बालाघाट के इतिहास में एक और पुतली स्थापित हुई। चार सिंहों के रथ पर सवार 'भारत माता' (राष्ट्र पिता के बरक्स राष्ट्र माता) की रंगीन फाइबर प्रतिमा स्थापित की गई। शरद पूर्णिमा और महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर इस प्रतिमा का स्थापित किया जाना  नगरपालिका अध्यक्ष की विशेष उपलब्धि बताया जा रहा है।  बालाघाट जीरो माइल पर स्थित 'काली पुतली' चौक हमेशा से  अपने नाम और लोकेशन (क्षेत्र स्थिति) के लिए प्रसिद्ध है। इस नामकरण का कारण इस चौक के बीचों बीच स्थापित काली प्रतिमा है। यह प्रतिमा सिर्फ कलात्मकता के कारण स्थापित की गई हो और उसका और कोई निहितार्थ हो, सामान्यतः इस पर विश्वास करना मुश्किल है।  जानकारी के अभाव में इस पर किसी प्रकार का कयास लगाना भी उचित नहीं है।  काली पुतली चौक जिस बिंदु पर स्थापित है वह छः मार्गों का संगम है।  एक बालाघाट गोंदिया मैन रोड, जो हनुमान चौक से जुड़ती है, सर्किट हाउस रोड पर स्थित अम्बेडकर चौक से आने वाली कनेक्टिंग रोड, जयस्तम्भ चौक से आनेवाली रोड, पुरानी...