एक सांस्कृतिक स्मृति लेख करार गोंदा फूल उर्फ़ त्योहारी गेंदा एक: गोबरधन का धन है गेंदा एक समय था जब दीपोत्सव और गेंदा का सम्बन्ध हम अभिन्न मानते थे। हालांकि बरसात के शुरू होते ही शालाओं के द्वार भी खुल जाते थे और तीज त्योहारों के भी। तीजा-पोला, नागपंचमी, रक्षाबन्धन, हलषष्टि, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, दुर्गापूजा आदि यादाबाद त्योहार बरसाती उत्सव ही थे। बरसाती यानी बरसात के मौसम में होनेवाले त्योहार। दुर्गापूजा समाप्त होते ही दीपोत्सव की तैयारियां आरम्भ हो जाती थी। जो कच्चे-पक्के घर, आंगन, दीवारें महाकवि वाल्मीकि के शब्दों में ‘अभीक्ष्ण-वर्षोदक-विक्षत’ यानी लगातार बरसात का पानी पड़ने से क्षत-विक्षत हो गईं थीं, उनकी छपाई, लिपाई, पुताई, जहां जो लागू हो, प्रारम्भ हो जाया करती थी। रेलवे भूमि पर साधिकृत हमारे कच्चे घर-बाड़ बने थे। दशहरा बीतते ही उनके उधड़े हुए आंगन-पार, घर के भीतर फर्श-दीवार नए ढंग से सँवारे जाने लगते। खेत-खंती की मिट्टी, इंजन के कोयले की जलन और भूसे की रांध से सांधकर छपाई और चिकनाई की कार्यवाहियां चलने...