Skip to main content

चूहों की प्रयोगशाला

( चींचीं चूहे से रेटसन जैरी तक )

मेरे प्रिय बालसखा ,
बचपन के दोस्त ,
चींचीं !
कैसे हो ?
तुम तो खैर हमेशा मज़े में रहते हो। तुम्हें मैंने कभी उदास ,हताश और निराश नहीं देखा। जो तुमने ठान लिया वो तुम करके ही दम लेते हो। दम भी कहां लेते हों। एक काम खतम तो दूसरा शुरू कर देते हो। करते ही रहते हो। चाहे दीवार की सेंध हो ,चाहे कपड़ों का कुतरना हो , बाथरूम से साबुन लेकर भागना हो। साबुन चाहे स्त्री की हो या पुरुष की, तुमको चुराने में एक सा मज़ा आता है। सलवार भी तुम उतने ही प्यार से कुतरते हो , जितनी मुहब्बत से पतलून काटते हो। तुम एक सच्चे साम्यवादी हो। साम्यवादी से मेरा मतलब समतावादी है, ममतावादी है। यार, इधर राजनीति ने शब्दों को नई नई टोपियां पहना दी हैं तो ज़रा सावधान रहना पड़ता है।
टोपी से याद आया। बचपन में मेरे लिए तीन शर्ट अलग अलग कलर की आई थीं। तब तो तुम कुछ पहनते नहीं थे। इसलिए तुम बिल से मुझे टुकुर टुकुर ताकते रहे। मैं हंस हंस कर अपनी शर्ट पहनकर आइने के सामने आगे पीछे का मुआइना करता रहा। ‘आइने के सामने मुआइना’ , अच्छी तुकबंदी है न!
तुम्हें याद है ,तुम्हारी एक तुकबंद कविता किताबों में छपी थी और हम लोगों को पाठ्यक्रम में लगाकर बचपन में पढ़ाई जाती थी। उसी किताब से पता चला कि मेरी नई की नई तीनों रंगीन शर्टस जो अचानक गायब हो गई थीं वो तुमने चुराई थी और मुहल्ले के टेलर से उसकी कमीज और पतल्ून सिलवाई थी। यार ! तुम तब मुझे दुनिया के सबसे गंदे आदमी लगे थे। हां हां मुझे याद है , आदमी कहने से तुम्हें बुरा लगता है। मगर यार यहां आदमी तो किसी को भी कह दिया जाता है। अपराधी भी आदमी है और न्यायाधीश भी। नेता भी आदमी है और अभिनेता भी। सिर्फ सरदार को आदमी कहने से लोग हंसते हैं। दुनिया का चलन है। अपने मज़े के लिए लोग दूसरों को ऐसे ही टोपी पहनाते रहते हैं।
अरे हां , टोपी से याद आया। मेरी कमीजों को कुतर कर तुमने दर्जी से एक रंगीन टोपी सिलवाई थी। उस रंगीन टोपी को पहनकर तुम कितने इतराते फिरे थे। तुम बार बार मेरे सामने से गुजरते थे और मैं अपनी गुम हुई कमीजों को भूलकर तुम्हारी टोपी की तारीफें किए जा रहा था। तुम मज़े से हंस रहे थे। जैसा कि अमूमन हमारे देश में होता है कि जनता का पेट खंरोचकर लोगों के कुर्ते और टोपियों में कलफ का कड़कपन आता है और जनता अपना पेट का दर्द भूलकर उनकी बतकही का आनंद लेती रहती है। वो तो जब उनके कारनामे अखबारों में आते हैं तब जनता को समझ में आता है कि अरे ये तो उनकी ही खाल की खादी थी। खाल की खादी , एक बार फिर अच्छी तुक बन गई न ?
खैर छोड़ो। उस टोपी का क्या हुआ ? उसे किसे पहना दी प्यारे ? इधर टोपी पहनाने का बड़ा फैशन जैसा चल पड़ा है। राजनीतिक पाटियों की अलग अलग टोपियां हैं। लगता है ,राजनीति में टोपियां तुम्हारे ही इन्सपिरेशन से आई हैं।
धत् तेरे की!! चीचीं यार , इन्सपिरेशन से याद आया कि मैंने आज तुम्हंे इसी बात पर बधाई देने के लिए पत्र लिखना शुरू किया था और आदतन भटक गया।
कल अखबार में पढ़ा कि तुम पर एक नया प्रयोग होने वाला है। इधर कृत्रिम दिमाग बनाने का फितूर ,हमेशा कुछ न कुछ कृत्रिम बनानेवाले कृत्रिमता विशेषज्ञ वैज्ञानिकों के फितूरी दिमाग पर चढ़ बैठा है। अब वे पूरी तरह कृत्रिम हो चके आदमी के अंदर एक कृत्रिम बनाकर उसे पूरी तरह कृत्रिम बना देंगे। तुम तो जानते ही हो कि केवल आदमी ही वह प्राणी है जो अपने को बड़े फ़क्ऱ के साथ कृत्रिम कहलाना पसंद करता है। नही समझे ? क्यों वह अपने को कृत्रिम ईश्वर यानी ईश्वर का प्रतिनिधि और अवतार वगैरह नहीं कहता फिरता।
मुंहमैं फिर भटक गया। मैं बता रहा था कि कृत्रिम दिमाग बनेगा। आदमी का अब तक लगभग हर अंग कृत्रिम रूप से बनाया जा चुका है । नकली हाथ , पैर ,गुर्दा ,दिल। प्लास्टिक सर्जरी से नकली मंुह, नाक , कान। और भी दूसरे मनोरंजन प्रधान अंग। नकली बालों की विग। नकली आंख। ये सारी खुराफात जिस दिमाग की थी अब खुराफाती आदमी उस दिल को भी बनाएगा। आदमी मतलब वैज्ञानिक। वैज्ञानिक भी अभी तक आदमी होते हैं। केवल डाक्टर ही आदमी नहीं होते। वे बहुरूपिये हैं। कहीं कहीं भगवान होते हैं कहीं शैतान और कहीं कहीं तो साक्षात यमराज होते हैं।
तो बात वैज्ञानिकों की चल रही थी। वे अब दिमाग बनाएंगे। कृत्रिम दिमाग। इसका उपयोग चिकित्सा उद्योग में मानवीय उपचार के लिए किया जाएगा। इसमा मतलब यह है कि साइडइफेक्टवाली दवाओं से ऊबकर या घबराकर चिकित्सा माफिया अब मनोविज्ञानके के पांव पर गिर पड़ा है। इसके पहले वह स्रगीत चिकित्सा की शरण में गया जो कि एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा ही है। दुनिया में सभी प्रकार के धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में सदियों से मनोविज्ञान की इसी ब्रेनवाशिंग टेकनिक से सफलतापूर्वक काम चल रहा है। राजनीति और अपराध इंडस्ट्री मनोवज्ञिान के आधार पर चुनाव ,आतंक तथा लूटमार की दूकानदारी चला रहे हैं। सहायक उपकरणें में सहायता के नाम पर रुपये ,शराब,कम्बल , घड़ी आदि ऐन टाइम के लिए है। फुलटाइम और पार्टटाइम के लिए तो मनोविज्ञान ही काम करता है। पार्टी का मनोविज्ञान। पार्टी यानी मुर्गा। आदमी मतलब गुर्गा। इधर जो नवनिर्माण की बातें कर रहे हैं वे क्या कर रहे हैं ? वे क्या बनाने की बात कर रहे हैं। वे बना रहे हैं। अपने ही लोगों को बना रहे हैं।
खैर । दिमाग बन रहा है और पहला प्रयोग चींचीं चूहे! तुम पर ही होगा। मगर मुण्े हंसी आ रही है। ये आदमीनुमा वैज्ञानिक तुम्हें क्या बनाएंगे। तुम तो स्वयं विद्यावाहन हो।(विद्याबालन नहीं)। विद्याधिपति विनायक के वाहन। तफमहारी सवारी गणेश हैं। जैसे शरीर की सवारी मस्तिष्क। जब आलरेडी गणेश तुम पर सवार हैं तो तो कृत्रिम दिमाग कहां बैठाएंगे ये लोग ? तुम्हें ये क्या दिमाग देंगे। तुमसे तो मनुष्य दिमाग लिया करते हैं। मुझे याद है कि तुमसे दिमाग लेने का उल्लेख महाभारत में आया है। लाचागृह प्रसंग में एक चूहे की प्रेरणा से ही सुरंग बनी थी और पांडुपम्नी सहित पांचों पांडव सकुशल बाहर भाग निकले थे।
टाम एण्ड जैरी नामक जो लोकप्रिय कार्टून सीरियल है और जिसे देखदेखकर हमारे बच्चे बड़े होते हैं और बड़े होकर चूहे हो जाते हैं , उसमें एक बात अच्छी है कि रेटसन जैरी चालाक बिल्ले टाम से हमेशा जीतता है। उसकी दोस्ती आदमी के वफादार कुत्ते से हुआ करती है। यह सीरियल मुझे भी अच्छा लगता है और प्रेरणा देता है। प्रेरणा यह है कि कितना भी एक दूसरे को नीचा दिखाएं , टाम और जैरी हमेशा एक दूसरे को मिस करते हैं तथा आखिर में हमेशा एक दूसरे के मित्र हो जाते हैं। जेसे मेरी रंगीन शर्टस का ेचिन्दी ब करनेवाले दुष्ट चींचीं चूहे ! मै ंतुम्हें हमेशा मिस करता हूं।
यार सच कहूं चींचीं! कृत्रिम मस्तिष्क बनाने और तुम पर प्रयोग किए जाने की खबर से मै थोड़ा डर गया हूं। हालांकि वैज्ञानिकों का उद्देश्य गलत नहीं है। अवसाद ,उन्माद ,प्रमाद ,कुण्ठा ,विक्षिप्तिी आदि के मामले में कृत्रिम मस्तिष्क की भूमिका बहुत ज़ोरदार है। जेसे पेसमेकर वैसे ब्रेन केअरटेकर । मगर मानलो , लादेन , बाल-उद्धव-राज जैसों के हाथ में उसका फार्मेट या फार्मूला आ गया तो या नयी ब्रेन इंडस्ट्री ही उन्होंने खरीद ली तो क्या होगा। जैसे तुमने एक टोपी बनायी थी वैसी टोपियांबनाबनाकर ये अपने अनुयायियों को पहनाएंगे। फिर महाराष्ट्र ही क्या सारा राष्ट्र लहूलुहान हो जाएगा। केवल अमेरिका में ही भारतीय एजेन्सियों के ट्विनटावर नहीं गिरेंगे , भारतीय राजभवन को भी कोई नहीं बचा पाएगा। राजनीति इसका कितना उपयोग करेगी यह राजनीति जाने। यही सोचकर डर रहा हूं।
लेकिन फिर सोचता हूं कि ऐसा भी हो सकता है कि अच्छे लोगों के हाथों में यह दिमागी कारखाना आ जाए। ऐसा हो गया ता ेराजठाकरे जैसे लोगों को सकारात्मक नवनिर्माण के लिए ब्रेन ट्रांस्फार्मिंग के जरिए ठीक किया जा सकेगा। सारे आतंकवादियों को कसाब की तरह पकड़ा जाएगा , उनकी ब्रैनटांस्फार्मिंग की जाएगी और आतंकवाद खत्म हो जाएगा। अमेरिका और पाकिस्तान के राष्ट्रपतियों को उपहारस्वरूप ब्रेनप्रड़ी पहनायी जाएगी और वे आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों का बारूदी ओर विनासकारी सौदा करने की बजाय अरबों का शंतिवादी सौदा करने लगेंगे।
प्रिय चींचीं चूहे! तुम मुझे चिढ़कर ‘आदमी कहीं का’ कहते थे। जैसे लड़कियां रुआंसी होकर लुच्चा कहीं का कहती हैं। आज मैं जब तुम्हें चूहा कह रहा हूं तो सम्मान से कह रहा हूं। यार अगर तुम न होते तो चिकित्सा के नाम पर होने वाले इन प्रयोगों का क्या होता।एक तरफ मैं आरूश्ंका से डश्र रहा हूं तो दूसरी तरफ यह भी सोच रहा हूं कि डरा ही क्यों जाए ? हमारे पास दिमाग है तो इसका उपयोग अवसाद से निपटने के लिए ओरिजनली क्यों न किया जाए। यानी प्रयोग होने दिया जाए। ज़रूरत पड़े तो मैं भी हाजिर हूं। हम शुभ की कल्पना करते रहें और अशुभ को घटने के लिए छोड़ दें। चूहे की मौत.....आई मीन आदमी की मौत मरने से बेहतर है शुभ संकल्पों के लिए अपने को उत्सर्ग कर दिया जाए। जो होगा अच्छा होगा।
तो मित्र चींचीं चूहे! मेरी शुभकामनाएं।

तुम्हारा-
‘आदमी कहीं का ’
दिनांक: 5-6.03.10

Comments

Babli said…
वाह बहुत बढ़िया लिखा है आपने! काफी मज़ेदार और शानदार! बेहतरीन प्रस्तुती!
आदमी की मौत मरने से बेहतर है शुभ संकल्पों के लिए अपने को उत्सर्ग कर दिया जाए। कटाक्ष बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद।
सर बहुत बेहतरीन पोस्ट है हमेशा की तरह. आपकी अपने विषय पर बहुत मजबूत पकड है इतनी रोचक पोस्ट और साथ में कितनी सफाई से अंत में क्या कुछ कह दिया.लाजवाव बधाई स्वीकारें
kshama said…
Kya karara vyang hai...maza aa gaya!
आपकी विशिष्ट शैली में हास्य-व्यंग्य.
हमेशा की तरह, बहुत खूब.
उत्कृष्ट लेखन को नमन !
sangeeta swarup said…
आज आपको पहली बार पढ़ा....आपकी व्यंगात्मक शैली में लिखी रचना बहुत सटीक है....तीक्ष्ण कटाक्ष...बढ़िया
Amitraghat said…
ज़ोरदार व्यंग........"
प्रनव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com
Dr.R.Ramkumar said…
समस्त लेखक साथियों का हृदय से आभार

Popular posts from this blog

‘मंत्र’: आदमी और सांप के किरदार

प्रेमचंद जयंती(31 जुलाई) पर विशेष -
 मुंशी  प्रेमचंद की कहानी ‘मंत्र’ की आख्या:

-डाॅ. रा. रामकुमार,

प्रेमचंद की ‘मंत्र’ कहानी दो वर्गों की कहानी है। ये दो वर्ग हैं ऊंच नीच, अमीर गरीब, दीन सबल, सभ्य और असभ्य। ‘मंत्र’ दोनों के चरित्र और चिन्तन, विचार और सुविधा, कठोरता और तरलता के द्वंद्वात्मकता का चरित्र-चित्रण है। मोटे तौर पर देखने पर यह कहानी ‘मनुष्य और सांप’ के दो वर्ग की भी कहानी है। अजीब बात हैं कि मनुष्य अपनों में सांप बहुतायत से देख लेता है किन्तु सांपों को मनुष्य दिखाई नहीं देते।
यद्यपि प्रेमचंद अपनी कथाओं में समाज का यथार्थ चित्रण करते थे किन्तु उनका उद्देश्य आदर्शमूलक था। उनकी सभी कहानियां समाज के द्वंद्वात्मक वर्गों का व्यापक चित्र प्रस्तुत करती हैं। अच्छे और बुरे, अमीर और गरीब, ऊंच और नीच, पढे-लिखें और अनपढ़, ग्रामीण और शहरी, उद्योगपति और मजदूर। स्थूल रूप से भारत का समाज ऐसे जितने भी वर्गों में विभाजित है और उसमें जितनी भी विद्रूपताएं हैं, उनका वर्णन संपूर्ण व्याप्ति और पूर्णता के साथ प्रेमचंद की कथाओं में मिलता है।
भारत वर्गों का नही जातियों का देश है। यहां वर्गों का विभाजन अकल…

चुहिया बनाम छछूंदर

डायरी 24.7.10

कल रात एक मोटे चूहे का एनकाउंटर किया। मारा नहीं ,बदहवास करके बाहर का रास्ता खोल दिया ताकि वह सुरक्षित जा सके।
हमारी यही परम्परा है। हम मानवीयता की दृष्टि से दुश्मनों को या अपराधियों को लानत मलामत करके बाहर जाने का सुरक्षित रास्ता दिखा देते हैं। बहुत ही शातिर हुआ तो देश निकाला दे देते हैं। आतंकवादियों तक को हम कहते हैं कि जाओ , अब दुबारा मत आना। इस तरह की शैली को आजकल ‘समझौता एक्सप्रेस’ कहा जाता है। मैंने चूहे को इसी एक्सप्रेस में बाहर भेज दिया और कहा कि नापाक ! अब दुबारा मेरे घर में मत घुसना। क्या करें , इतनी कठोरता भी हम नहीं बरतते यानी उसे घर से नहीं निकालते अगर वह केवल मटर गस्ती करता और हमारा मनोरंजन करता रहता। अगर वह सब्जियों के उतारे हुए छिलके कुतरता या उसके लिए डाले गए रोटी के टुकड़े खाकर संतुष्ट हो जाता। मगर वह तो कपड़े तक कुतरने लगा था जिसमें कोई स्वाद नहीं होता ना ही कोई विटामिन या प्रोटीन ही होता। अब ये तो कोई शराफत नहीं थी! जिस घर में रह रहे हो उसी में छेद कर रहे हो!? आखि़र तुम चूहे हो ,कोई आदमी थोड़े ही हो। चूहे को ऐसा करना शोभा नहीं देता।
हालांकि शुरू शुरू में…

काग के भाग बड़े सजनी

पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’
कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’
सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’
कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’
खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।
दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया। मैंने द…