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फिर बसंत आया

इस बार बसंत जल्दी आ गया।
जल्दी आनेवाले को बेमौसम कहते हैं। देर से आनेवाले को भी बेमौसम कहते हैं। इसका मतलब है कि सबका अपना एक समय होता है ,जिसे मौसम कहते हैं। आम का मौसम ,जाम का मौसम, शाम का मौसम , फिर एक और जाम का मौसम , काम का मौसम , अंततः राम का मौसम।
पतझर का भी मौसम होता है। वह बसंत के पहले भी आता है और बाद में भी आता है। पहले आकर वह जासूसी करके चला जाता है कि रास्ता साफ है, अब बसंत आ सकता है। यानी बसंत उस खूसट और खुर्राट आब्जर्वर की तरह होता जो पहले क्षेत्र का मुआयना करने आता है तथा जिसे कार्यकत्र्ता घास तक नहीं डालते। कार्यकत्र्ता हरे हरे पत्ते लेकर आनेवाले बसंतनुमा उम्मीदवार को हरी हरी घास डालते हैं।सौदा इस हाथ दे ,उस हाथ ले का होना चाहिए। वोट चाहिए तो नोट बांटने की व्यवस्था करो। व्यवस्था करनी हो तो नोट बांटो।
कहा जा सकता है कि गड़बड़ी की आशंका से बसंत हड़बड़ी में जल्दी आ गया है। लोग समझ ही नहीं पाए और वह आ गया। न खांसा ,न खकारा। लोगों की हालत गफ़लत में सोये हुए उस जोड़े की तरह हो गई जो यह समझ रहा था कि बच्चे स्कूल में हैं। बुढ़उ बाजार गए हैं। पड़े रहो आराम से। क्या पता था कि स्कूल में आज जल्दी छुटटी हो जाएगी और बाजार बंद हो जाएगा। दोनों का कारण एक ही था -नगर बंद। नगर के एक इज्जतदार आदमी को पुलिस ने गलत काम करते रंगों हाथ पकड़ लिया था और अपनी शक्ति दिखाने के लिए इज्जतदार आदमी ने अपने कार्यकत्ताओं से कह दिया ‘कर दो नगर बंद।’ इज्जत चली जाए, परवाह नहीं, ताकत दिखनी चाहिए। इज्जत का क्या है , ताकत के बल पर उसे जब चाहे तब महफिल में नचवाया जा सकता है। ताकत चली गई तो समेटने में वक्त लगेगा। अतः बाजार बंद हो गए, दूकानें बंद हो गई। विशेष रूप से स्कूल बंद हो गए। नगर बंद सफल हो गया।
लोग हड़बड़ा गए कि अरे बसंतलाल ! ...अचानक ?....कैसे ? फिर लोग आसपास देखने लगे। आम तो बौरा गए हैं। कोयलियां कूक रही हैं। कैलेण्डर के छपने में भूल हो गई थी इसलिए तिथियां पहले की लग रही हैं। वर्ना एक ही पार्टी के तीन ताकतवर लोग यानी आम की बौर ,कोयल की कूक और नाचते गाते लड़के लड़कियों की सरस्वती पूजा जब एक साथ मंच पर आ गए हैं तो समझो बसंत आ गया है।
नये लड़के बसंत को नहीं पहचानते। उन्हें सारी ऋतुएं बसंत लगती हैं। उनसे कहो, ‘बसंत में फूल खिलते हैं। मन में अजीब सा कुछ होता है। सुन्दर चीजें सिर्फ अच्छी ही नहीं लगती ,कुछ और लगने लगती हैं।’ तो वे कहते हैं-‘ ऐसा तो हमेशा होता है। इसका मतलब हमेशा बसंत रहता हैं।’ नये लड़के परिभाषाओं में नहीं बंधते ,न टाइम का उन पर कोई बंधन होता है।
प्रौढ़ लोगों के सर पर इतनी जिम्मेदारियां और इतने टेन्शन हंै कि गप-सड़ाका ,धींगा -मुश्ती और ऐश अय्यासियों के लिए उनके पास वक्त नहीं है। बसंत उनको चाबता है और टाइम वेस्ट करता है। बूढ़े इतने बसंत देख चुके हैं कि अब बसंत के नाम से उनको जुर चढ़ने लगता है। ‘‘अब हो गया बहुत। अब तो राम नाम जपने की उम्र हो गई है। क्या रखा है बसंत फसंत में?’’ बसंत के बारे में पूछो तो उनका यही जवाब होता है।
फिर भी बसंत आया है। जब लोग ध्यान देना छोड़ दें तो लोगों के आने जाने का समय आगे पीछे हो जाता हैै। बाई चार बजे आए या पांच बजे, घरवालियां सोती रहें और बर्तन मांजने के लिए रख दें तो क्े अपनी सुविधा से आती जाती हैं। बसंत अपनी सुविधा से आया हैै। पोस्टमैंन चिट्ठी डाल जाता है। तुम पढ़ो या न पढ़ो। टेलीफोन का बिल ,बिजली का बिल को तुम्हारे हाथ से मतलब नहीं है। जहां जगह मिलती है वहां उन्हें डाल दिया जाता है। तुम उठाओ या न उठाओ ,तुम्हारा सिर दर्द। अखबारवाला पोंगली बनाकर आंगन में या बालकनी में फेंक जाता है । उठाओ न उठाओ ,पढ़ो न पढ़ो तुम्हारी मर्जी।
बसंत ऐसे ही आया है। देखो न देखो तुम्हारी मर्जी। सरस्वती पूजा , बसंत पंचमी न होती तो भाई लोगों को पता कहां चलता कि वह आया है। समय ऐसा घालमेल कर रहा है कि कुछ पता ही नहीं चलता।
बसंत से कुछ लोग कतराने भी लगे हैं। लोग समझते हैं चंदा मांगनेवाले चले आये हैं। गणेश का चंदा , दुर्गा का चंदा। डांस प्रोग्राम का चंदा। सरस्वती पूजा का चंदा। होली का चंदा। मंहगाई है कि रोज नए इंजीनियरिंग और कम्प्यूटर के पाठ्यक्रमों की तरह बढ़ती जा रही है। इसलिए चंदा देने और भीख देने में लोगों की रुचि कम हो गई है। जिनके पास ऊपर का आ रहा है ,लोग उन पर घुटने रखते है। बाकी लोगों के पास प्रायः नहीं जाते। तो जिनके पास नही जाते उनको पता ही नहीं चलता कि कोई महोत्सव आ गया है। बसंत का भी यही हाल है।
आजकल एम बी ए का क्रेज़ है। कुछ लड़के बैग में कुछ सड़क छाप प्रडक्ट, साड़ी सूट आदि लेकर आते हैं और प्रायः बंगाल से आते हैं। उन्हें हिन्दी नहीं आती। जो अंग्रेजी उन्हें आती है उससे अच्छी अंगे्रजी मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के लड़के बोल लेते हैं। वे बताते हैं कि एमबीए के छात्र हैं और कम्पनी के विज्ञापन के लिए तथा अपने प्रोजेक्ट के लिए वे निकले हैं। उन्हें देखकर गुस्सा आता है। वे पुरुषों की बजाय स्त्रियों के सामने अपना प्रेजेन्टेशन करते हैं। महिलाएं मोल तोल करके प्रायः उनके प्रडक्ट खरीद लेती हैं। पुरुष धुतकार देते हैं।

बसंत इस बार कम्पीटिशन बढ़ जाने से अपना प्रडक्ट लेकर पहले ही रिटेल मार्केटिंग करने आ गया है। बजट भी इन्हीं दिनों आता है। बजट और बसंत इस मामले में मौसेरे भाई हैं। दोनों की कोशिश महिलाओं को रिझाना है। पुरुषों को न बजट प्रभावित कर रहा है न बसंत। दोनों से मुंह फेरकर पुरुषवर्ग काम के समय में भजिये खाने और चाय पीने कैन्टिन की तरफ निकल गया हैं। तनखाह में रुपयों की जगह जब मंहगाई और इन्कम टैक्स मिल रहा हो तो आदमी काम की जगह कामचोरी करने लगा है। स्कूलों के शिक्षक जनगणना और चुनाव करवा रहे हैं और जनगणमन गाते हुए स्कूल के समये ही ढाबे की रौनक बढ़ा रहे हैं। राजनीति सीखनेवाले बच्चों को पढ़ाने का मन ही नहीं हो रहा है। लड़के भी पढ़ना नहीं चाह रहे हैं।
फिर भी बसंत बैग टांगकर घूम रहा है। लोग उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं तो वह गार्डन में बैठकर घर से लाया हुआ टिफिन खा रहा है और बोतल में लाए पानी को पी रहा है। इस नगर का शेडयूल पूरा करके वह दूसरे नगर में चला जाएगा। इस उम्मीद में कि किसी को तो उसकी जरूरत होगी। कोई तो उसका प्रडक्ट खरीदेगा।

(रचना का समय और तारीख : बसंत पंचमी से रंगपंचमी तक,
पढ़ने का समय: कहीं भी और कभी भी) -02.03.10

Comments

सर आपकी पोस्ट हमेशा ही बेहतरीन होती है.उस में उठाया गया मुद्दा विचारणीय होता है सच अब जीवन में कब क्या और कैसा वसंत वाली ही स्थिति है शायद सभी के जीवन में. पर नहीं कुछ जातियां (जाति विशेष) भी हैं जिनके जीवन में सिर्फ वसंत ही होता है वो है नेता की जाति.
सर आपकी तरह की टिप्पणी नहीं लिख सकती क्योंकि भाषा पर इतनी पकड नहीं हैं पर आशा करती हूँ की अगर आपको आइए ही पढ़ती रही तो कुछ सीख जाउंगी
आभार
गड़बड़ी की आशंका से बसंत हड़बड़ी में जल्दी आ गया है। लोग समझ ही नहीं पाए और वह आ गया। न खांसा ,न खकारा। लोगों की हालत गफ़लत में सोये हुए उस जोड़े की तरह हो गई जो यह समझ रहा था कि बच्चे स्कूल में हैं। बुढ़उ बाजार गए हैं। पड़े रहो आराम से। क्या पता था कि स्कूल में आज जल्दी छुटटी हो जाएगी और बाजार बंद हो जाएगा।

सर क्या आब्जर्वेषन है और क्या तादात्म्य स्थापित किया है आपने।
यों पूरे लेख में जो जो पिंच और पंच है उनके उठाने रखने या घुमाकर फेंकने की आपकी अदा निराली है।
सर आपने लताड़ा है मैं जरा पुचकार लूं बसंत को ...यानी सर बंसत की , बसंतोत्सव की , होली की आपको शुभकामनाएं
श्रृंखला सारस्वत
Kumar Koutuhal said…
सबका अपना एक समय होता है ,जिसे मौसम कहते हैं। आम का मौसम ,जाम का मौसम, शाम का मौसम , फिर एक और जाम का मौसम , काम का मौसम , अंततः राम का मौसम।

साहब जितनी मासूमियत से आपने इन तमाम शब्दों का प्रयोग किया है, बिना कोष्ठक और अंडरलाइन किए आपने बबंडर तो पैदा ही कर दिया।

अगर ‘शाम’ को कोई ‘काम’ न हो तो होली की बधाई स्वीकार करें।
पता दें तो घर पहुंचूं।
या आराम करें।
राम राम करें।

http://timestelblog.blogspot.com
अपकी रचनायें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि विषय की गहराई नापनी मुश्किल हो जाती है। हमे तो बसंत का पता ब्लाग्ज़ पर ही चला अब मौसम भी वो नही रहे और लोग भी। सब बीते दिनो जैसा लगता है। कटा़क्ष मे आलेख कहूँ या आलेख मे कटाक्ष या मगर लिखा कमाल है। मै भी आपकी कल्म पर कुछ लिखते हुये बहुत सोचती हूँ क्यों की मेरे पास भी आप जितने न शब्द हैं न गहन विषय। इस लिये भी कई बार टिप्पणी देने मे संकोच होता है। आप मेरे ब्लाग पर आये बहुत बहुत धन्यवाद। आप जब भी पोस्ट लिखें मुझे मेल से जरूर सूचित करें । उम्र का तकाज़ा है कि भूल जाती हूँ अपका ब्लाग अपनी लिस्ट मे शामिल कर रही हूँ। शुभकामनायें
Babli said…
बहुत बहुत शुक्रिया डॉक्टर साहब मेरी शायरी की पंक्तियों को सुधारने के लिए! अभी बिल्कुल सही लग रहा है और शब्दों का ताल मेल सही बन पड़ा है! आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! आपकी लेखनी को सलाम! बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर!
डा. आर रामकुमार जी, आदाब
सुन्दर सटीक व्यंग्य.
बधाई.
kumar zahid said…
बसंत इस बार कम्पीटिशन बढ़ जाने से अपना प्रडक्ट लेकर पहले ही रिटेल मार्केटिंग करने आ गया है। बजट भी इन्हीं दिनों आता है। बजट और बसंत इस मामले में मौसेरे भाई हैं। दोनों की कोशिश महिलाओं को रिझाना है। पुरुषों को न बजट प्रभावित कर रहा है न बसंत। दोनों से मुंह फेरकर पुरुषवर्ग काम के समय में भजिये खाने और चाय पीने कैन्टिन की तरफ निकल गया हैं। तनखाह में रुपयों की जगह जब मंहगाई और इन्कम टैक्स मिल रहा हो तो आदमी काम की जगह कामचोरी करने लगा है। स्कूलों के शिक्षक जनगणना और चुनाव करवा रहे हैं और जनगणमन गाते हुए स्कूल के समये ही ढाबे की रौनक बढ़ा रहे हैं। राजनीति सीखनेवाले बच्चों को पढ़ाने का मन ही नहीं हो रहा है। लड़के भी पढ़ना नहीं चाह रहे हैं।

आपके अंदाज़ में जो रवानगी और समस्याओं का चित्रणात्मक विष्लेशण है वह असरदार है ..अनुभव और प्रभाव की गिरफ्त से निकलना मुष्किल है ..सर सलाम..बस सलाम

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