Wednesday, September 21, 2011

स्टेचू: अब कुछ नहीं बदलेगा

बच्चा है एक। इसी देश का है। इस देश में करोड़ों बच्चे हैं। ये करोड़ों बच्चे टीवी देखते हैं। टीवी में इन करोड़ों को हम क्या सिखा रहे हैं - स्टेचू ? स्टेचू बच्चों और बचकाने नवयुवकों का एक खेल है।
पिछली पीढ़ियों के सैकड़ों बच्चे यही खेल खेलकर बड़े हुए है। खेल बुरा नहीं हैं। इस खेल का आविष्कार सैनिक शिविरों में हुआ होगा। आर्डर हुआ - ‘स्टेचू’ ..तो चलता हुआ सैनिक प्रतिमा की तरह स्थिर हो गया। आर्डर हुआ ‘गो’ तो वह फिर हलचल में आ गया। इससे हमें अपने ऊपर नियंत्रण रखने का अभ्यास कराया जाता है। ओबेडियेन्स या हुक्मउदूली अथवा आज्ञाकारिता सिखायी जाती है। हम सीखने के लिए ही पैदा हुए हैं और बड़ी जल्दी आज्ञाकारिता या हुक्मउदूली अथवा ओबेडियेन्स को हम सीख जाते हैं। अपने अपने दलों में, वर्गों में ,जाति और संप्रदायों में , प्रार्थना समूहों में ,अपनी अपनी संस्कृति की भाषा मे , बस एक ही खेल खेला जा रहा है-अटेन्शन और रिलेक्स...सावधान और विश्राम, दक्षः और आरंभः ...
स्टेचू का यह खेल उस दिन मैंने किसी कार्यक्रम के बीच विज्ञापन सेशन में देखा...एक बच्चा अपनी हर मनपसंद चीज़ को स्टेचू करता आ रहा है। मुझे याद तो नहीं हैं किन किन चीजों को उसने स्टेचू किया पर वे सभी ऐसी चीजें रहीं होंगी जिन्हें आम तौर पर बच्चे पसंद करते हैं..चाइल्ड साइकोलाजी का दोहन विज्ञापन बनानेवाले न करें ऐसा हो नहीं सकता। बच्चा पसंदीदा चीजों को स्टेचू कर रहा है कि बाप की नजर उस पर पड़ती है। उसे हैरानी होती है कि केवल आदमियों को स्टेचू किया जाता है..यह चीजों को, वातावरण को स्टेचू क्यों कर रहा है? पूछता है बाप -‘ये क्या कर रहे हो ?’ बच्चा कहता है- ‘अब कुछ नहीं बदलेगा’’।
बच्चे हैं ऐसा सोच सकते हैं कि अब कुछ नहीं बदलेगा। कोई नहीं चाहता कि कुछ भी बदले। पर बदलना हकीकत है। तो क्या किया जाए कि कुछ न बदले? लाइफ इंश्यूरेन्श की पालिशियां ली जाएं। ताकि बदले हुए वक्त के हिसाब से हम अपने को एडजस्ट कर सके। बीस साल बाद जो वक्त आएगा वह एल आई सी से पूछकर आएगा। एलआईसी रिस्क लेता है कि बीच में मर जाओगे तो हम आकर्षक राशि देने का वादा करते हैं। हर साल तुम अपना वर्तमान काटकर भविष्य के घोड़े पर बेट लगाओ। लंगड़ा होने के बावजूद घोड़ा तुम्हें लक्ष्य तक पहुंचाएगा। हार भी गया तो तुम्हें तुम्हारी रकम वापस मिलेगी।
देखने में यह खेल बच्चे से शुरू हुआ है पर है यह बड़ों के लिए। बड़े सोच में पड़ जाते हैं कि कितने की लें। एक सीमा के बाद इंकम टैक्स के हिसाब से एलआईसी नकारा सिद्ध हो जाती है किन्तु भविष्य के भूत के लिए वह एक तुरुप का पत्ता तो है ही। यह पत्ता आरबीआई के हाथ में है।
इस विज्ञापन को देखकर मैं टेंशन में आ जाता हूं। अटेन्शन मेरा लाइफ के प्रति है पर लाइफ है कि उंगली उठाकर कह रही है ‘स्टेचू...मुझसे कुछ उम्मीद न करो।’ लाइफ सबकी उम्मीद तो होती है पर लाइफ से उम्मीद नहीं की जा सकती। लाइफ के लिए बस रातदिन दौड़ा जा सकता है, अपने को घैंका जा सकता है समस्याओं के भाड़ में..समस्याओं की आग से जब तुम संकटों की ज्वालाओं में घिर जाओंगे और जिन्दगी की तरफ दौड़ लगाना चाहोगे तो जिन्दगी कहेगी -‘‘स्टेचू....माफ करना मुझे केवल चक्रव्यूह बुनना आता है , निकलने के उपाय तो मैं भी नहीं बता सकती। बच्चे पूछते होंगे अपने अपने बाप अभिमन्युओं से कि डेड! क्या सचमुच एलआईसी ले लेंगे तो कुछ नहीं बदलेगा। बाप गहरी सांस खीचते होंगे और बच्चे की आंखों में देखकर चुप हो जाते होंगे। जो भविष्य बच्चे बुन रहे हैं ,उसका कोई सिरा किसी भी बाप के हाथ नहीं आ रहा है। एक जमाना था जब बीवियां स्वेटर बुनती थी और ऊन उलझ जाता था तो वे पतियों को चिल्लाती थीं...‘‘दुनिया भर की समस्याएं सुलझाते फिरते हो...ऊन सलझाओ तो जानूं।’’ मेरे जैसे समझदार पति आधा घंटा का समय मांगते थे और उलझे हुए ऊन को स्कूटर की डिक्की में डालकर आधा घंटे में उसे सुलझा देते थे। उसी तरह का दूसरा गोला बाजार से खरीदकर पत्नी की फटी हुई आंख के सामने रख देते थे। क्या होगा ,फिजूलखर्ची के विरोध में पत्नी के कुछ बेलनछाप भाषण होंगे पर वह कुछ देर की फजीहत ऊन सुलझाते बैठने के घंटों से ज्यादा झेलनीय है। पर बच्चों का क्या करें जो पूछ रहे हैं कि क्या अब कुछ नहीं बदलेगा। बदलने की शर्त एलआईसी है। किन्तु एलआईसी ऊन का दूसरा गोला नहीं है। दूसरा गोला अन्ना हजारे और बाबा रामदेव भी नहीं है। वे भी बस एलआईसी की तर्ज पर ‘योग क्षेम वहाम्यहम्’ हैं।
‘योग क्षेम वहाम्यहम्’ जीवनबीमा का अंबेसेडर-वाक्य है। यह अद्धाली गीता से उठायी गई है। जीवन की समस्याओं को गीता में एलोपैथिक टेक्नीक से सुलझाया गया है। गीता पढ़ने से समस्याओं के फलस्वरूप उत्पन्न रोगों के लक्षण दब जाते हैं। फलस्वरूप शब्द से याद आता है कि गीता कहती है.-‘मा फलेषु कदाचनः ’ फल का ख्याल मत कर। पर फल चाहिए सबको। सोना पहनना है पर सोना कै़द है बड़ी तिजौरियों में तो आम जनता क्या करती है कि ‘सोनास्वरूप’ ज़ेवर बाजार से खरीद लाती है। ऐसे जे़वर बाजार में बहुताअत से हैं। बिल्कुल सोने की तरह चलते फिरते उठते बैठते हैं। यानी चमक फीकी पड़ जाये या नया लेना हो तो बाजार में ले जाओ कुछ परसेन्ट काटकर नये दाम में नयी चीज आपकी। इस ‘सोनास्वरूप’ शब्द की तरह ही फलस्वरूप शब्द की रचना हुई है। आराम फल है पर लक्षणों का दब जाना भी आरामस्वरूप है। आराम नहीं है। गीता के वाक्य फल नहीं देते कर्म देते है। निरन्तर कर्म की प्रेरणा देते है। गीता आराम से पढ़ने का सद्ग्रंथ है। इसलिए एलआईसी ने इसे अपना लिया। श्रीकृष्ण की तरह वह कहती है ‘कर्म करो ..पालिसीज़ लो... फल की चिन्ता मत करो..वह हमारे पास सुरक्षित है।’
योग का अर्थ बीमा कंपनी के अनुसार ‘जोड़ना’ है- जोड़ने में ही कुशलता है। आम जनता योग- संयोग के अर्थ बुन लेती है..जब संयोग होगा, जब योग बनेंगे तब अपने भी दिन फिरेंगे..उनके लिए योग का अर्थ भाग्य है...उसका विश्वास है कि एक दिन घूरे के दिन भी फिरते हैं। किन्तु अभावों के ऋणों को जोड़कर धन नहीं किया जा सकता। ऋणों का अंबार धनात्मक नहीं हो सकता। यह गणित का सिद्धांत है। भारत को गणित में शून्य के आविष्कार का श्रेय प्राप्त है। जेल की कोठरी में गीता का अघ्ययन और गीता रहस्य लिखकर गांधी जी इसी नतीजे पर पहुंचे की शून्य ही सत्य है। उन्होंने उद्घोषणा की ‘ मैंने अपने को शून्य कर लिया है।’ आई रिड्यूस्ड माई सेल्फ टू ज़ीरो....उनके नाम पर शासन करनेवाले लोग इसी शून्य को बढ़ाते जा रहे हैं...महंगाई के एक ओंकार सतनाम के आगे शून्यों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं...विधायकों और सांसदों के वेतन के आगे और शून्य हर दूसरे तीसरे साल लग जाते हैं...जनता के शून्य का विस्तार हो रहा है। गणित के इसी शून्य-सिद्धांत के कारण अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब और अधिक शून्य होते जा रहे हैं। आपको आश्चर्य होना तो चाहिए कि गीता दोनों पढ़ रहे हैं...गरीब इस उम्मीद में कि आएगा आनेवाला...कहा है उसने कि आउंगा..और दुखों से ,समस्याओं से मुक्ति दिलाउंगा... गरीब समस्याओं से मुक्ति की उम्मीद में गीता पढ़ रहे हैं ओर राजनेता ओर अमीर कोई मुसीबत न आ जाए इस उम्मीद में गीता पढ़ रहे हैं।
अब क्या निष्कर्ष निकाला जाए ? क्या होगा ? क्या कुछ भी नहीं बदलनेवाला ? किसे स्टेचू किया जा रहा है..? समस्याओं को ? मंहगाई को ? सत्ता के छलावों को ? खुशहाली को तो किया नहीं जा सकता। कहां है वह खुशाहाली जिसे स्टेचू किया जा सके। ‘योगक्षेम वहाम्यहम्’ के छूछ में रस मीठा होगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। छूछों के बीच आकर भी ‘योगक्षेम वहाम्यहम्’ के प्रबंधक कहते हैं कि जोड़ों ताकि कल अभाव न हो। पर जोड़ो क्या ? मैंने सड़कों के किनारे गन्ने का रस निकालनेवाले देखे हैं। वे गन्ने के छूछ को तब तक पेरते रहते हैं जब तक कि छूछ के रेशे टूटकर न बिखरने लगें। कुछ लोग तो घानी यानी पेरनेवाली चरखियों के ऊपर बर्फ के ढेले रख देते हैं ताकि उससे पिघलकर बहनेवाले पानी में घुलकर रेशों में छुपी हुई मिठास निकल आए। शोषण का सिद्धांत किस मुस्तैदी के साथ इन चरखियों में चल रहा है। परन्तु छूछ में रखे-रखे रस नहीं आता। रसदार गन्ने तो पेरे जा चुके हैं या खांडसारी में जा चुके हैं। चतुर व्यापारी छलावे का , भ्रम का, भ्रांति का खेल खेल रहे हैं..अब तो बस पूर्णाहुति का मंत्र शेष है.
अस्तु ओम भ्रांति।


18.09.11

5 comments:

रचना दीक्षित said...

बाद अच्छा विषय उठाया है आपने. मार्केटिंग कड़वी से कड़वी चीज को मिठाई बता कर बेंच सकती है. आज भूखे रह कर कल को जरूर सुरक्षित करो.

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर...भाई सा...
आप खूब पकड़ते हैं...

shashi said...

हाँ हम ही आपके पास आ गए गुनगुनाने के लिए |

आपके ब्लॉग पर पहली बार आया | कैसे आया पता नहीं | पर आ पहुंचा | अच्छा लगा |

अब आपका लेख स्टेचू "अब कुछ नहीं बदलेगा " पढ़ा बहुत ही अच्छा लगा |
वैसे जिनका वर्तमान अच्छा होता है , उनका भविष्य भी अच्छा ही होगा | इसलिए वर्तमान को संकट में डालकर भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता है |

Rakesh said...

या हम को बुला लीजिए या आप आइये
सन्नाटा चारों ओर है कुछ गुनगुनाइये।

आइये सन्नाटा तोड़ें


Just be where you are
Remember the Sabd
Break the Illusion.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सटीक मुद्दा लिया है ..आज कहाँ खुशियाँ जिन्हें स्टैचू कहा जा सके ...


मैंने आपको एस ऍम एस किया था पर अभी तक वेटिंग में है ..इसलिए जवाब यहाँ भी दे रही हूँ ...

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