Wednesday, November 30, 2011

फिसलनेवाले फर्स में एक शाम

पोली मेगामार्ट की वह शाम अभी भी आंखों में बसी हुई है।
हम उस शाम मार्बल सिटी में थे और मेगामार्ट के बारे में उत्साह से जानकारी देनेवाली हमारी बच्ची ही थी जो मां को मल्टीपल किचन-वेयर उपलब्ध कराना चाहती थी।
ऊमस भरी दोपहरी थकी हुई नींद से जागकर अभी अभी शाम में ढली थी। शाम का सदुपयोग हमारे तीन लक्ष्यों पर आधारित था : पहला पोली मेगामार्ट की सैर और खरीददारी, दूसरा मॉल की तफ़रीह , तीसरा चैपाटी ,सोनाली या रूपाली में किसी एक के ‘सौजन्य’ पर भोजन।
पहला नाम चौपाटी, जग जाहिर है कि चैपाटी नाम के स्थान , बम्बई उर्फ मुम्बई की तर्ज पर बड़े बड़े शहरों में लगनेवाले चटोरी चाट के शौकीन इलाके हैं। बाकी के दो नाम ; सोनाली और रूपाली हाई-स्टेडर्ड के भोजनालय हैं।
हम पहले लक्ष्य की ओर बढ़े। लक्ष्य के लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ा। पास ही था। बच्चियों का फ्लेट पॉज़ इलाके में था जो केन्द्रीय बाजार के मध्य में ही था।
मेगा मार्ट में आज काफी चहल पहल थी। आज कुछ चीज़ों पर 40 प्रतिशत का डिस्काउंट ऑफर था और चांवल के पांच किलो के एक पैक के साथ एक पैक फ्री था। किसी भी मध्यम वर्गीय परिवार को यह लुभानेवाला खेल था। हम भी इससे आकर्षित हुए लेकिन बोझ ढोने की बजाय हम रिलेक्स रहने के मूड में थे, इसलिए खरीदा वही जो इज़ीली कैरी किया जा सकता था।
पहले हमने ग्राउंड फ्लोर की जमकर तलाशी ली और फिर ऊपर की तरफ़ चढ़े जहां गृहस्थी के सारे औजार मौजूद थे। बच्चो के खेलने के खिलौनों से लेकर ग्रहणियों के उपयोग में आनेवाले सभी तरह के आईटम। ओढने बिछाने से लेकर खानेपकाने तक के। किचन में सुविधा के लिए भी और डाइनिंग टेबल पर छा जाने के लिए भी।
एक ट्राली ले आई गई, जो खास तौर पर ऐसे मौके के लिए ही उपलब्ध होती है। ट्राली का एक और मैन्युफेक्चरिंग उपयोग भी है कि उसमें बनी हुई सीट पर नन्हें मुन्नों को घुमाया जा सकता है। मां और पिता के दोनों हाथ कम से कम बच्चे को टांगने से मुक्त और सामान देखने और ट्राली में डालने के लिए फ्री।
हमने देखा कि बच्चे ट्राली में मजे के साथ बैठकर मेगा मार्ट की रंगीनियों का सैर कर रहे हैं और माता पिता को उन्हें सम्हालने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा खर्चनी नहीं पड़ रही है। ज़ाहिर है यह ऊर्जा मैनेजमेंट के सोचे समझे प्लान के अनुसार चीजें चुनने में ज्यादा लग रही है।
‘‘ बच्चों के लिए ट्राली में सीट लगाना मैनेजमेंट फंडा है जनाब!’’ मैंने अपने को ज्ञानवान बनाने के मकसद से यह जुमला मन ही मन खुद से कहा और मेगा मार्ट के जादुई वातावरण में नज़रें घुमाने लगा।
कुछ बड़े बच्चे भी थे -दस से बारह तक के। कुछ जो ट्राली में आ सकते थे वे उसमें खड़े हो गए थे और उनके उनसे बड़े भाई बहन ट्राली को पुश करते हुए आनंद ले रहे थे। मां बाप ट्राली घुमाने से भी बरी। कुछ बच्चे खली पड़ी जगह में ट्राली को लुढ़काने का आनंद ले रहे थे। उनके पीछे ‘लिटिल मास्टर्स ’ की तर्ज पर जूतों पर ही कुछ बच्चे फर्स पर फिसल रहे थे।
चिकने फर्स का फायदा और मेगा मार्ट का पल्टीपल मनोरंजन बन गया था। बड़े भी बच्चों के अंदर के बचपन को उछलता देखकर रिलेक्स हो रहे थे। कुछ न भी खरीदो तो भी कुछ तो मिल ही रहा है।
बहुत कुछ साथ ले जाने लायक दिल के अंदर फिसलती हुई ट्रालियों में डाले जा रहे थे। कोई कीमत नहीं , कोई वेट नहीं, कोई डिस्काउंट आफर नहीं। परन्तु निर्लोभ आकर्षण की एक के साथ अनेक की उपलब्धि तो मिल ही रही थी।
‘‘जिनके घरों में ये चिकने फर्स होते हैं , वहां मनोरंजन भरपूर होता होगा।’’ मेरे दिल ने उत्साह में सोचा।
‘‘ हाथ पैर और कूल्हे भी बहुत टूटते हैं..खासकर बूढ़ों के ..’’ दिमाग ने सोच की किरकिरी कर दी और मैं सम्हल कर उस चिकने फर्स पर चलने लगा।

3 comments:

kshama said...

Sundar sansmaran....mazaa aa gaya padhke!

सागर said...

behtreen post...

mahendra verma said...

रोचक संस्मरण।