Wednesday, June 11, 2014

डर की सोनोग्राफी और प्रेम का आई-टेस्ट


   

डर इतना मन में भरा हुआ होता है कि भारी मन से हल्के धंुधलके में भी रस्सी को सांप समझकर लोग सहम जाते हैं, हड़बड़ाकर भागने के कारण लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। घबराहट में धड़कनें तेज हो जाती हैं, आंतें सिकुड़ने लगती हैं, पैरों में खिंचाव होने लगता है, शरीर कांपने लगता है। रक्तचाप की जांच की जाये तो वह बढ़ा हुआ मिलेगा, अल्ट्रा साउंड में हार्ट बीट की फ्रिक्वेंसी हाई होगी। सोनोग्राफी आंतों की कराई जाये तो आंतों में भय चिपका हुआ मिलेगा। मुंह सूखेगा, त्वचा जलेगी, पसीना निकलेगा। जैसा कि युद्ध भूमि में अर्जुन के साथ हुआ था। पहले तो बहादुरी के साथ कृष्ण से बोला कि दोनों सेनाओं के बीच ले चलो। फिर सशस्त्र सेना में अपने ही भाई-बंधुओं को देखकर मोह-जनित पीड़ा और क्षोभ से डर गया। डर कर कृष्ण से कहने लगा-
‘‘सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।। 29/1
डर, घबराहट, आघात जैसी उपरोक्त परिस्थितियों में सामान्योपचार या घरेलू इलाज यह है कि बड़ा हो तो पीठ थपथपा दो, छोटा बच्चा हो तो उसे सीने से लगा लो। ज्ञानवान हो तो उसे ज्ञान की बातें बताकर जागृत कर लो। कृष्ण ने अर्जुन का तीसरे क्रम का उपचार किया। यह हुआ डर का मोटा चित्र।
प्रेम में इससे उल्टा होता है। डर में जहां रस्सी भी सांप दिखाई देती है, प्रेम में सांप भी रस्सी दिखाई देता है। तुलसी के साथ यही हुआ। उनको प्रेम में मुर्दा नाव दिखाई दिया और सांप उनको रस्सी दिखाई दी। मुर्दे को नाव बनाकर उफनती नदी पार कर ली और सांप को रस्सी बनाकर रत्नावली की अटारी पर चढ़ गए। प्रेम नामक घटना का असर दृष्टि पर पड़ता है। कुछ का कुछ दिखाई देने लगता है। होता कुछ है, दिखाई कुछ देता है। कुछ कुछ मामले इतने बिगड़ जाते हैं कि सबमें एक ही दिखाई देने लगता है। अध्यात्म की दुनिया में इसे बड़ी ऊंची स्थिति कहा जाता है किन्तु साधारण दुनिया के सामाजिक लोग इसे दृष्टिदोष समझते हैं। वे कहने लगते हैं कि अगले की दृष्टि यानी नज़र खराब है। तो प्रेम आंख का रोग है।
प्रश्न उठ सकता है कि डर से कूदकर मैं प्रेम की बात क्यों करने लगा? दोनों में कौन सा संबंध है? संबंध तुलसी ने बनाया है। तुलसी कहते हैं-भय बिन होंहि न प्रीति। यानी डरोगे तो प्रेम करोगे। दोनों में अन्योन्याश्रित संबंध है। प्रेम में डर सम्मिलित है। प्रेम में मन डरा डरा सा, कांपा कांपा सा रहता है। तुलसी ही के शब्दों में-‘घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रियाहीन मन डरपत मोरा।’ मन ऐसा हो जाता है कि जरा सी बात से डरता है और प्रेम की ओर भागता है। इसी प्रकार प्रेम में पड़े हुए को डराकर उसे प्रेम से दूर ले जाया जाता है। कांटे से कांटा निकालना इसे ही कहते हैं। हीरा हीरा को काटता है तो विष ही विष का उपचार करता है। डर नामक मनोरोग से प्रेम नामक मनोरोग की चिकित्सा की जाती है।
यह कहने का आधार है। प्रेम कहीं आंख का रेग हैं तो किसी किसी समाज में इसे मानसिक-रोग समझा जाता है,े मानसिक खलल या दिमाग की खराबी समझा जाता है। देखा गया है कि प्रेम के रोगी को आंख के डाॅक्टर के पास ले जाओ तो वह अक्षर पढ़ने के लिये देता है। अगला ‘ए’ को ‘एल’ पढ़ता है। सेब उसे चुनरी दिखाई देती है और तरबूज को वह कुर्ती कहता है। आंख का डाॅक्टर कहता है-‘यह मामला आंख का नहीं है। किसी अच्छे साइकियाट्रिक्स को दिखाओ।’
मनोचिकित्सक के पास ले जाओ तो वह रिपोर्ट पाजीटिव देता है। मरीज में मनोरोग के सारे लक्षण दिखाई देते हैं। बिहारी ने इस अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है-
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु हीं सब बात।।
आपको कैसा लगेगा जब आप अपने आप ही, बिना मुंह हिलाए, आंखों से किसी से कुछ कह रहे हों,   किसी बात से इंकार कर रहे हों जैसे कोई प्रत्यक्ष में छुपा हुआ है लेकिन आपके हाव भाव से लग रहा है कि वह कहीं आस पास है और आप उस पर रीझ रहे हों। फिर दूसरे ही क्षण आपके चेहरे और आंख के हाव भाव से लग रहा है कि आप किसी बात से चिढ़ रहे हो, फिर आपके चेहरे पर ऐसे भाव आये कि किसी से आप मिल रहे हांे और आप बड़े खुश हो रहे हों। फिर इस मिलने में ऐसा कुछ हो रहा है कि आप लजा रहे हो। यानी ऐसा भी हो रहा है कि भरे हुए भवन में आप अजीब अजीब सी हरकतें कर रहें हैं, आंखों आंखों में किसी से बात कर रहे हैं। लोग किसी और काम में पूरे होशेहवास से लगे हैं और आप अपनी ही दुनिया में डूबे हैं। आप ही बताइये किस बात के लक्षण हैं ये? ऐसे लक्षण को दीवानापन नहीं तो और क्या कहा जायेगा?
मीरां इस मामले में बहुत दो टूक बात करती हैं। वे कहती हैं- ‘ऐरी मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दर्द न जाने कोय।’ इस तरह के मामले की वे पहली है जिन्होंने पूरे होश में अपने को दीवानी कहा। उनकी भी खूब तरह-तरह की चिकित्सा की गई होगी। मिर्ची का धुआं दिया गया होगा, कड़वा काढ़ा पिलाया गया होगा। तभी तो परेशान होकर वे कहती हैं-‘मेरा दर्द न जाने कोय।’ पर मीरां बड़ी अदभुत थी। वे स्वयं उपचार भी बताती थीं। वे किसी घायल व्यक्ति से इसका उपचार करवाना चाहती थीं। क्यों? क्योंकि ऐसे मामले में बहुत से कबीलों में पत्थर से मार मार कर दीवाने को घायल करने की परम्परा रही है। भारत के ब्रज क्षेत्र में पूरा समाज प्रेम से लट्ठ खाने के लिए निकल पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि घायल हुए तो सारे कष्ट साफ।
             मीरां को पता था यह। तभी कहती हैं कि ‘घायल की गति घायल जाने और न जाने कोय।’ कितने साफ तौर पर कह रही हैं कि केवल कोई घायल ही इस मामले को समझ सकता है, अन्य कोई मेरे दर्द को नहीं जान सकता। फिर वे संकेत देती हैं-‘मीरां री तब पीर मिटे जब वेद सांवलिया होय।’ वे सांवले रंग के किसी वेद की तरफ़ इशारा करती हैं और जैसे कहना चाहती है कि बेकार के उपचार में मत उलझो, उस सांवले रंग के वैद्य को ढूंढकर ले आओ। मैं ठीक हो जाउंगी।’    
लेकिन दीवानों की बात कौन सुनता है? मीरां की भी किसी ने नहीं सुनी। उनके परिवार वालों को किसी ने बताया होगा कि अनेक रोगों की चिकित्सा विष से की जाती है। इतना इलाज किया है मीरां का, यह भी कर देखो।
और सबको पता है कि परिवारवालों ने मीरां को विष देकर भी ठीक करना चाहा। पर वे सफल नहीं हुए। फिर सुना है, सचमुच किसी सांवले रंग के वैद्य ने ही मीरां का उपचार किया और मीरां अपने बाहरी वस्त्र छोड़कर केवल आंतरिक दर्द से ही नहीं, इस दुनिया से भी मुक्त हो गई। हालांकि किसी को वह वैद्य दिखा नहीं, केवल मीरां ने उसे देखा।
आधुनिक युग में कोई कोई डाॅक्टर इस प्रकार के प्रकरण में इलेक्ट्रिक शाॅक देने की बात करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस पद्धति से कई दीवानों के दिमाग ठिकाने आ गए है। पर लड़की या लड़के के पुराने विचारों के बाप के दिमाग में दूसरा ही इलाज चल रहा होता है। वे चिल्ला चिल्लाकर कहते हैं-‘चार जूते मारो सालों को, सारी अक्ल ठिकाने आ जायेगी, सब कुछ साफ साफ दिखने लगेगा।’’
पुराने जमाने की बात ही निराली है। जो लोग अपने पितरों का सम्मान करते हैं वे आज भी उनकी पद्धतियों को जीवित रखे हुए हैं। उसे मीडिया ने नया नाम दे रखा है-‘आनर किलिंग’। कहीं कोई जल रहा है तो कोई विष पी रहा है। किसी को पेड़ में लटकाकर फांसी दी जा रही है तो कोई जिन्दा दफनाया जा रहा है। सल्फास भी अच्छा और अधिक लोकप्रिय विकल्प के रूप में अपना लिया गया है।
एक और सस्ता और सामाजिक इलाज इस मनोरोग का किया जाता रहा है। आज भी किया जाता है। जैसे बहुत से रोगों में शरीर पर मिट्टी लपेटकर प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है, वैसे ही इस रोग में हल्दी का लेप लगाकर प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है। इस उपचार को पता नहीं क्यों हाथ पीले करना कहा जाता है, जबकि हल्दी पूरे शरीर पर लिपेटी जाती है। कुछ माामलों में यह इलाज कारगर सिद्ध हुआ है। बल्कि यही इलाज ज्यादातर मामलों में अपनाया जा रहा है। अन्तर सिर्फ इतना हुआ है कि पहले लड़के लड़की जिसका नाम सोते जागते लेते थे उसके साथ उन्हें नहीं रखा जाता था। इससे कई केस बिगड़े। अब लड़के लड़की जिसका नाम लेते हैं, उसी को साथ रखकर यह उपचार किया जाता है। अब मामले नहीं के बराबर बिगड़ते हैं।
मतलब क्या हुआ कि प्रेम का इलाज प्रेम से किया जाने लगा है। कोबरा ने काटा है तो काबरे के विष का डोज दो। संस्कृत में इसे ही 'विषस्य विषमौषधि' कहा है तो 'समं समे समाचरेत' भी कहा है। डर का भी यही हे इलाज। डा. छींक आने पर हार्ट डिसीज और टीबी होने का डर दिखाकर रोगी को भर्ती कर लेते हैं। कुछ रोगी तो बड़ी बीमारी का नाम सुनकर, यह सोचते हुए कि मरेंगे ही न? तो मरना तो है ही एक दिन, इलाज की क्या गारंटी। इलाज कराकर मरने से अच्छा है भगवान की दी हुई बीमारी से मर जाओ।
इसके आश्चर्यजनक परिणाम आए हैं। मृत्यु को समर्पित रोगी कुछ दिनों में पूरे आत्मविश्वास से घूमते नजर आने लगे। लोगों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है तो डाक्टर अधिक से अधिक शुगर पीड़ित होकर इंशुलिन की मात्रा बढ़ाकर ले रहे हैं। इसलिए कहते हैं ‘दूसरों को डराओ मत, उनका आत्मविश्वास विकसित करो, उनसे प्रेम करो। खुद भी जिओ औरों को भी जीने दो।    10/12.06.14


1 comment:

Amrita Tanmay said...

काश! आपकी इन बातों को सभी प्रबुद्ध जन अमल में लाते तो आज की हालात ही सुधर जाती. बहुत अच्छा लगा ये आलेख..