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प्रेम के माइम और दुख की मिमिक्री

दो धाराएं हैं जिनमें समाज बह रहा है। एक प्रेम है और दूसरा दुख। दुख होता है तो दिखाई देता है। प्रेम भी छुपता नहीं।
दुख दिखाई देता है तो पर्याप्त समय-प्राप्त लोगों को सहानुभूति होती है । करुणा और सान्त्वना आदि प्रदर्शित करने के प्रयासों की घटनाएं भी हो सकती हैं। दुख बहुत गंभीर हुआ तो भीड़ करुणा में इकट्ठी हो सकती है।
प्रेम दिखाई देता है तो चर्चा होती है। घृणात्मक आक्रोश होता है। हंगामा भी हो सकता है। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो सकती है। तमाशा देखने या आलोचना के पत्थर फेंकने। मजे लेने या थू थू करने....थू थू यानी अपने अंदर की गंदगी को बाहर उलीचने।
दोनों स्थितियों में भीड़ इकट्ठी हो रही है। भीड़वादी लोग इसका लाभ उठाने का वर्षोें से प्रयास करते रहे हैं। दुख के कारण और प्रेम के कारण गौण हो सकते हैं किन्तु भीड़ का लक्ष्य ऐसे लोगों के लिए गौण नही होता। यहां से प्रेम और दुख की अभिनय-यात्रा शुरू होती है। प्रेम और दुख के अभिनय देखकर लोग प्रभावित होते हैं और उसका जन-संचार करते हैं। दुबारा उसे देखने की कोशिश भी करते हैं। प्रेम और दुख के व्यावसायिक संगठन और संस्थान विभिन्न नामों से कार्यरत हैं। राजनैतिक, वाणिज्यिक, सामाजिक, धार्मिक ,गैर शासकीय ,आदि तरीको से प्रेम और दुख का अपेक्षित दोहन किया जा रहा है। दुख और प्रेम के दोहन की अपनी अपनी शैलियां और विधाएं हुआ करती हैं। अभिनय की परम्परागत शैलियों के अलावे एकाभिनय की दो विभिन्न शैलियां भी प्रचलित हैं। मूकाभिनय और एकल प्रदर्शन। अंग्रेजी में इन्हें हम माइम और मिमिक्री के नाम से जानते हैं।
माइम के माध्यम से अभिनेता या प्रस्तुतकत्र्ता लोगों की करुणा और वाहवाही लूटने की चेष्टा करता है। वह गंभीर उद्देश्यों की व्यंजनामूलक अभिव्यक्ति की कला है। मूकाभिनय के माध्यम से दर्शकों के दिमाग के जागे रहने की मांग इस कला में छुपी होती है। इसमें अनजाने और अछूते विषयों को छूने की कोशिश की जाती है।
मिमिक्री पूरी तरह प्रसिद्धों की विद्रूपताओ का माखौल या नकल होती है। इसमें ध्वनि और संवादों का पूरा प्रयोग होता है। दर्शक जिसमें हास्यानुभूति जीवित होती है वह दिमाग को एक तरफ सरकाकर मजे के स्वीविंग पूल में छलांग लगा देता और जोर जोर से हाथ पर हाथ और जमीन पर पैर पटक पअटक कर हंसता है। दिमाग ऐसे समय पूरी तरह आकसिमक अवकाश पर होता है और तरोताजा होकर फिर अपने दुख के भवसागर में माइम करने चला आता है।
कहते हैं वह सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार होता है जो सर्वाधिक दुखी होता है। अब तक भारत में हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई माने जा रहे हैं। उनहोंने अपने व्यंग्य से हंसाया भी है और खुद हंसे भी है। उन्होंने सवाल उठाया -‘‘ व्यंग्य क्या है ?’’ आगे उत्तर दिया -‘‘ चेखव ने कहा है ,‘ जो दुखाी होता है ,वह हास्य व्यंग्य लिखता है। जो सुखी होता है वह दुख का साहित्य लिखता है।’’’
व्यंग्य और हास्य में अंतर होता है। दुख की मिमिक्री करने से हंसी आती है। कुछ कलाकारों ने हंसते हुए रुलाया भी है। वे हास्य की भूमिका रचते हैं और लोग करुणा से भरने लगते हैं। मेहमूद यहां जीत गए। हंसाते हंसाते रुलाने में वे सिद्धहस्त कहलाए। उनके हास्य में तीखा व्यंग्य और आक्रोश भी दिखाई देता है। राजकपूर ने हमेशा नायक बनने का प्रयास किया । वे करुण पात्रों की हास्यास्प्रद परिस्थियों में करुणा की तलाश करते हुए नायक बनते थे। जोकर के अति कारुणिक परिस्थिति में हास्यास्प्रद होकर और रोकर वे न रुला सके न हंसा सके। उनकी उस कल्पना को भारतीय दुखवादी
दर्शकदीर्घा ने अस्वीकार कर दिया। यही भूल आलातरीन गायक मोहम्मद रफी ने की। ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ में जहां उन्होंने लयात्मक सिसकारी भरी है ,वह प्रभावहीन हो गई और मोहम्मद रफी फिसलकर नेपथ्य में चले गए। पर उनके अमर गीत आज भी अपनी जगह हैं। फिसलता इंसान है ; रचनाएं अपनी जगह खड़ी रहती हैं।
इन दिनों मिमिक्री को हास्य में तब्दील करके दर्शकदीर्घा में टी आर पी का जाल फेंका जा रहा है। मगर वह फूहड़ क्षणजीविता का हुनर है। दुख पर हंसना हम चाहते हैं क्योंकि दुख की घुटनभरी कोठरी से बाहर आना चाहते हैं। प्रेम हमारे लिए माइम ही बना हुआ है। प्रेम की बात चलते ही हम मूक हो जाते हैं। प्रेम में ‘हंसे तो फंसे’ का जुमला द्वि-अर्थी है।फंसने का अर्थ जीवन भर की मुसीबत मोल लेना भी हां सकता है। प्रेम की बात चलते ही हंसे तो अविश्वसनीयता के घेरे में आ जाओगे। वह मादक हंसी दूसरी है जो रक्त में तूफान पैदा करती है और हंसी को चुप्पी की मोहनी जकड़ लेती है।
राजनीति दोनों का सौदा करती है। एक ही व्यक्ति गंभीर राजनेता भी है और उद्देश्यपूर्वक हंसोड़ वक्तव्य देता है।लोग हंसते हैं तो वह अपनी सफलता पर खुश होता है और हंसता है। इसी हंसोड़ घोषणापत्र को लेकर वह देश के सर्वोच्च पद की चाहत भी रखता है। मगर वह सिर्फ प्रसाद नहीं है , लाल भी है और सिंह भी। शराब सबके असली चेहरे और नकली गंभीरता को उंडेल कर बाहर उलीच देती है। हंसाते हुए भी तुम कूटनीतिज्ञ हो और गंभीर होकर भी तुम मज़ाक कर रहे हो। जनता जानती है कि कौन कब जनता का नहीं है। राजनीति जनता को नहीं स्वयं को धोक़ा देने से शुरू होती है और स्वयं को छलती हुई खत्म हो जाती है। जयशंकर प्रसाद ने ठीक कहा था कि जब वीरता भागती है तो उसके पैरों से राजनीति के छल छंदों की धूल उड़ती है। 021009

Comments

Anonymous said…
बहुत ही बेहतरीन विवेचना करता उम्दा आलेख...
माईम के जरिए पूरा दुखःशास्त्र बांच दिया है आपने...
Dr.R.Ramkumar said…
धन्यवाद भाई सा आप की टिप्पणियां ऊर्जा देती हैं।
दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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