Thursday, October 1, 2009

उम्मीद के चेहरे

सारे शहर में उसने तबाही सी बाल दी
अपना पियाला भरके सुराही उछाल दी

हमने उड़ाए इंतजार के हवा में पल
वो देर से आए ओ कहा जां निकाल दी

मां को पता था भूख में बेहाल हैं बच्चे
दिल की दबाई आग में ममता उबाल दी

जिस आंख में उम्मीद के चेहरे जवां हुए
बाज़ार की मंदी ने वो आंखें निकाल दी

नंगी हुई हैं चाहतें ,राहत हैं दोगली
‘ज़ाहिद’ किसी ने अंधों को जलती मशाल दी
021009/शुक्रवार

3 comments:

रचना गौड़ ’भारती’ said...

बहुत सुन्दर गजल है। लेखन के लिये बधाई। समझ नहीं आया कि किसी की नजर कैसे नहीं पडी।

Dr.R.Ramkumar said...

नज़रेकरम का शुक्रिया रचना जी

संजय भास्कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com