Friday, December 18, 2009

दो पहियों का फ़र्क़

जीवन में दो का बहुत महत्त्व है। दो आंखें , दो कान , दो हाथ , दो पैर , दो फैफड़े, दो किडनियां आदि और इत्यादि। जिन्हें ज्ञान की कमी नहीं हैं किन्तु समय की कमी है ,जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें जीवन के सूत्र नहीं मालूम, ऐसे लोगों को टीवी देखकर सीखना चाहिए। उसमें सीरियल से विज्ञापन आते हैं जो टीवी को जीवन दान देते हैं। और अधिक गंभीरता से सोचें तो बीवी को भी जीवन प्रदान करते हैं। बहुत ज्यादा गंभीरता से सोचा जा सके तो यहां भी देखिए कि दो का ही महत्त्व है। टीवी और बीवी। गृहस्थी को वास्तविक गृहस्थी का स्वरूप देने में इन दो का ही योगदान है। दोनों के बिना गृहस्थी एकाकी है। एकाकी का अर्थ ही है कि जो दो नहीं हैं।
बात को आगे बढ़ाने पर हम देखते हैं कि दो और दो चार होते है। चार का भी बहुत महत्त्व है क्योंकि वह दो का दूना है। किन्तु हे भारतीय दर्शक! आज जो दो है , वह सबसे पहले चार था। मनुष्य जिसका अंश है , वह विष्णु या नारायण चार हाथोंवाला दिखाई देता है। ब्रह्मा के चार मुंह थे। जिसके लिए हम मारामारी करते हैं, वह लक्ष्मी चार हाथोंवाली है। वैज्ञानिक बताते हैं कि आदमी भी पहले चार पैरोंवाला था। पूर्वजों के रूप में बंदर को बाप माना जाता है। देखा जाता है कि बंदर के ही गुण हममें ज्यादा हैं। बात बात पर खी खी करना, इस डाल से उस डाल पर बिना मतलब के या किसी खास मतलब के उछलकूद करना ,गुलाटी मारना , चाहे बूढ़े ही क्यों न हो जाएं। बूढे़ शब्द से याद आता है कि दरअसल बात मुझे बूढ़े से ही शुरू करनी थी। परन्तु हे कांच-प्रेमियों! मैं क्या करूं ? वहां भी झगड़ा दो और चार का ही है। उर्दू में चूंकि एक मुहावरा है ‘दो चार होना’ और ‘आंखें चार करना’। मैं दावत देता हूं कि आइये ज़रा उस बूढ़े से हम दो-चार हो लें। आंखें चार करने को कौन कहता है ?
मित्रों! आपने चाहे जिस उम्मीद या मजबूरी में टीवी देखी हो , आपने देखा होगा कि एक कार लाल लाइट जलने से सिगनल के इस पार खड़ी है। सिगनल भी मूलतः दो रंग के होते हैं - लाल और हरा। लाल रंग इस समय है और उसके कारण बहती हुई भीड़ खड़ी हो गई। कार उसी भीड़ का हिस्सा है। उसके बग़ल में आकर एक साइकिल खड़ी हो जाती है। साइकिल पर एक बच्चा है। यह आंकड़ा भी दो का बन गया। दो यानी द्वंद्व। बूढ़ा जिस कार में बैठा है उसके चके हैं चार। बूढे ने चार चीजें ऊपरी तौर पर पहन रखी हैं। सूट , बूट , कमीज और टाई। जो लड़का साइकिल पर है उसके पास दो का आंकड़ा है। साईकिल के दो पहिए , पेंट और शर्ट , जूते और मौजे , दो बांह वाली कमीज की दो बाहें। दोनों वाहें आधी मुड़ी हुई है। एक झलक में इतना ही दिखाई देता है। बूढे की नजर कार के बगल में आकर खड़े लड़के पर पड़ती है तो वह लाल पीला हो जाता है। हिकारत से कहता है-‘‘ आ जाते हैं कहां कहां से।’’ यह हिकारत का सिगनल है जिसमें बुजुर्गों ने दो रंग देखे लाल और पीला।कहते हैं , लाल और हरे को ढंग से मिलाने पर जो रंग बनता है वह पीला होता है। बच्चा उन दोनों रंगों से लाल रंग चुराकर उसे आत्मविश्वास से हरा कर लेता है। वह क्या करता है कि दानों चढ़ी हुई बांहों को तो पहले नीचे करता है। बाहों को चढ़ाना आपने सुना होगा ,यह उसका विलोम है। फिर वह जेब से मोड़कर रखी हुई टाई निकालता है। उसे कमीज़ की गरदन पर टाइट करता है और ठाठ से कहता है:‘‘ सिर्फ दो पहियों का फर्क़ है अंकल ! आ जाइन्गे।’’ इसके साथ ही हरी लाइट जलती है और पैडिल पर पैर मारकर बच्चाशान से चला जाता है। अच्छा लगता है। बांहें उतारकर लोगों को
अपनी शान बघारते तो सैकड़ों बार देखा है, बांह उतारकर शान जताते देखना पहली बार हुआ है। वव्वाह! अरे कांच के पर्दे! कभी कभी ही करते हो मगर तुम कमाल जैसा कुछ करते हो।
मगर दो सवाल हैं , जो खड़े हो गए हैं। जिसके जवाब में तुम ‘सवाल ही नहीं उठता’ नहीं कह सकते। क्योंकि ये तो खड़े हो ही गये। पहला , दो चक्के आएंगे कहां से ? दूसरा , आ ही गये तो उन्हें साईकिल में कैसे लगाया जाएगा ? जोश-जोश में क्या तुमने कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास नहीं फेंक दिया ?
मेरे अनुभव में सीधे रास्ते और केवल आत्मविश्वास के बल पर ऐसा तो आज तक घटित नहीं हुआ। जिस चीज़ का यह विज्ञापन है वह सफाई से ताल्लुक रखनेवाला प्रडक्ट है। इसीलिए इतनी सफाई से दो को वह चार बना गया। फिर तो उसे पांच भी कर देना था। मैंने यह गणित भी कांच के रंगीन पर्दे पर घटित होते देखा है। दो और दो पांच। इस नाम से बनी फिल्म में दो हीरो दो हीरोइन थे। पांचवा एक बच्चा था जिसके आसपास कहानी हास्य बुनती रहती है।
यह बच्चा भी हास्य कर रहा है। आजकल हास्य प्रधान विज्ञापन बनाकर दर्शकों का खूब मनोरंजन किया जा रहा है। कीड़े मारने की दवा में दो-चार कीड़े जरूर छोड़ दिए जाते हैं। टेन परसेन्ट का बिजनेस है। अगर जनता को हण्ड्रेड परसेन्ट फायदा हो जाए तो बिजनेस ढप्प हो जाए। बीपी की दवा रोज लेनी पड़ती है। अस्थमा का मरीज रोज इन्हेलर लेता है।
तो मान लेते हैं कि डिटरर्जेन्ट वाले जल्दी दो से चार चके बना लेंगे। डी कंपनी के नाम से जो मशहूर है वह शायद यही डिटर्जेन्ट कंपनी का शार्ट फार्म होगा, जिसमें हाथ हिलाते ही पैसा बरसने लगता है। डिटर्जेन्ट का उपयोग करने वाले तो मलते रहते हैं ..डिटर्जैन्ट मिलाते रहतें हैं, हाथ मलते रहते हैं। धन्धा होता ही ऐसा है। दो के चार न किए तो फायदा ही क्या। वह बच्चा डिटरजेन्ट कम्पनी का होगा। आज अभी धन्धा शुरू किया है। बस कार आने में कितना समय लगता है। इधर जनता बैठी है तैयार कि तुमने विज्ञापन दिखाया और उसने प्रडक्ट खरीदा। हो गए मालामाल। बढ़िया है , अरे कांच के पर्दे ! बढ़िया है।

5 comments:

रचना दीक्षित said...

आपका लेख हमेशा ही बहुत सार्थक होता है .बधाई
बहुत पैनी नज़र है आपकी चाहें कांच का पर्दा हो या फिर ब्लॉग पर पोस्ट .हर चीज का बारीक अध्ययन करके बेमिसाल टिप्पणी लिख कर पोस्ट की सार्थकता पर आखिरी मुहर लगा देते हैं
मार्मिक पोस्ट पर उससे भी ज्यादा मार्मिक टिप्पणी लिख कर दुखती रग हर बार छेड़ देते हैं
आभार

Dr.R.Ramkumar said...

रचना जी ! रचना को वास्तव में सार्थक टिप्पणी ही सार्थक बनाती है। आपकी टिप्पणी हमेशा जिम्मेदार टिप्पणी होती है जो मुझे अभिभूत करती है।
और भी मित्र हैं जो आपकी तरह मेरी पोस्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं और सार्थक टिप्पणी करते हैं।

आपका और सभी मित्रों का हार्दिक आभार।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अच्छा लिखा है आपने ..आज कल की दुनिया है यह कांच के परदे सी शुक्रिया

रवि कुमार, रावतभाटा said...

कांच के पर्दे के बहाने काफ़ी कुछ कह गये हैं आप...
हमेशा की तरह बेहतर...

Dr.R.Ramkumar said...

रंजनाजी पहली बार आप मेरे ब्लाग पर आई हैं आपका स्वागत । और टिप्पणी के लिए आभार।
रवि भाई! ब्लाग में आने का सुख आपकी टिप्पणी से बढ़ जाता है। आते रहना याद रखें।