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शिल्पा की शादी और खिसिआया हुआ मैं

सुबह रोज की तरह से ज्यादा खराब है। शाल लपेटकर मैं कुहरे में छीजती नुक्कडिया छाबड़ी में फुल चाय के लम्बे गहरे घूंट भर रहा हूं ताकि छाती सिंक जाए। समाने एक टेबल पर टीवी रखा है जो ग्राहको को लुभाने का काम कर रहा है। चााय के घूंट भरकर उसे मैं छाती में महसूस करता हूं और दूसरा घूंट भरने के पहले के अंतराल में टीवी देख लेता हूं। टीवी में शिल्पा की शादी का हो हल्ला है।मैं थोड़ी देर बर्दास्त करता हूं लेकिन जल्दी मेरी चाय कड़वी लगने लगती है। छाबड़ी में टूटी हुई बेंच और गंदा टेबल मुझे बेचैन करने लगते हैं। वे शिल्पा की भव्य शादी के साथ मैच नहीं कर रहे। मैं उठकर घर लौट आता हूं। शिल्पा की शादी मेरे जहन में छूटी हुई चाय की तरह चिपकी चली आती है।
ं मुझे समझ नहीं आता कि मौसम इस बुरी तरह खराब है और शिल्पा की शादी हो रही है ? शिल्पा की शादी होने से मौसम खराब है या मौसम खराब है इसलिए शिल्पा शादी कर रही है ,इस बात से मै पूरी तरह आश्वस्त नहीं हूं। शिल्पा की शादी से वैसे भी मेरा कोई लेना देना नहीं है। हां मौसम खराब होने से है। मौसम की खराबी ने मेरा बजट बिगाड़ दिया है। ठंड बुरी तरह बढ़ गई है और बर्फीली सर्दी में नहाने की औपचारिकता पूरी करने के लिए गरम पानी जरूरी है। गरम पानी के लिए मैंने यह फैसला लिया है कि जो लकड़ियां फर्नीचर की टूट फूट और बगीचे की टूटी झाड़ियों से निकली हैं ,उन्हें जला कर पानी गर्म किया जाए। इससे बजट पर बोझ नहीं पड़ेगा। दवा खाने से बेहतर है कि आवश्यकतानुसार गर्म पानी से नहा लेना चाहिए। यह हमारी बजटीय सावधानी है।
बहरहाल मौसम खराब है और पानी गर्म करने के लिए बगीचे में दो चार ईंटें जमाकर इकानामिक कच्चा चूल्हा बना लिया है। इसमें मैं अधगीली लकड़ियां जलाने की कोशिश कर रहा हूं। आधा ढक्कन मिट्टी तेल डालकर आग भड़काने की कोशिश मैंने की। पर व्यर्थ। शिल्पा की तरह आग की एक छरहरी लम्बी सी लपट दिल्ली और पटना हिलाकर गायब हो गई। सीली लकड़ियां धुंधिया रही हैं। मैं बदले मौसम को कोस रहा हूं । न मौसम बदलता न मुझे आग भड़काने की नाकाम कोशिशें करनी होती। मैंने सुना है , नये नये रूप धरकर अवाम को परेशान कारने वाला कोई फयान नामक अरबी तूफ़ान दक्षिण में आया है और उधर उत्तर वालों ने भी नकली बर्फबारी की है जिससे पूरा हिन्दोस्तान आतंकित हो गया है। पीड़ित और परेशान तो खैर हुआ ही। इसी परेशानी के दौरान मुझे आतंकवाद की नई परिभाषा मिली है। मेरा अपना विचार अब यह हो गया है कि आतंकवाद सिर्फ पश्चिम से भारत में नहीं आ रहा है। वह वाममार्ग से भी आ रहा है और दक्षिणवादी इलाकों से भी। कट्टरवाद और फट्टरवाद की फिलासफी मुझ अंगूठाधारी को नहीं आती। मैं यहां जानबूझकर अंगूठाछाप नहीं कह रहा हूं। मुझपर अंगूठा की छाप नहीं है। अंगूठा मेरे पास है और लाइसेंस बनवाने के लिए दाएं और बाएं हाथ के अंगूठे की छाप इलेक्ट्रानिक-अंगूठा-मशीन पर लगाकर मुझे अंगूठाधारी होने का गर्व प्राप्त होता है। ऐसे छोटे-मोटे गर्व हम कभी भी और कहीं भी प्राप्त कर लेते है। जैसे शिल्पा की शादी हो रही है और देश गर्व कर रहा है कि इतनी महंगी शादी हमारे यहां भी हो सकती है। मेरा भारत महान। अभिषेक की शादी भी बहुत ऐश्वर्यशाली शादी थी। वे हीरे जवाहरात से शादी करते हैं। मैं अब तक एक अदद लड़की से शादी को ही शादी समझे हुए था।
खैर जब जागे तभी सवेरा। मुझे भी गर्व है कि शरीर का मांस सूख गया हैं ,कंकाल पर केवल चमड़ी चिपकी हुई है , लेकिन करोड़ों कमाकर लौटी शिल्पा पर करोड़ों कमाने वाला एक उद्योगपति मोहित हुआ है। मैं यह देखकर सोच रहा हूं कि यह शरीर का नहीं आत्मा का विवाह है। हीरे-जवाहरात और बैंक-बैलेंस का विवाह है। पुअर इंडियनंस के आरोपों के खिलाफ़ राजसी विवाह है। चालीस के बाद का यह आध्यात्मिक और व्यावसायिक व्यावहारिक विवाह है। विवाह जैसी पवित्र संस्था के सम्मान की रक्षा के लिए किया जानेवाला सामाजिक समझौता वाला विवाह है। किसी विद्वान ने विवाह को सामाजिक समझौता कहा है। सच कहा है। विवाह के पूर्वान्ह में कोटे की शक्कर की तरह प्रेम और अपरान्ह में रोज-रोज नल की कतार में जैसे-तैसे पानी भरने जैसा समझौता ही विवाह होता है, मैं हजारों मामलों में देख चुका हूं।
लो ,मैं कहां भटक गया। आंख में धुआं न लगे इस लिए मुंह इधर फिराया तो क्या क्या दिमाग में घुंस गया। बात इतनी सी है कि मेरा चूल्हा नहीं जल रहा है। लकड़ियां बेमौसम की बारिस से गीली हो गई और मैं जैसे तैसे मिट्टी तेल डालकर उन्हें सुलगाने की कोशिश कर रहा हूं। धुआं इतनी मात्रा में है कि वह आग को उठने नहीं दे रहा है। बाहुबलियों का जरूरी चीजों पर कब्जा करना और उन्हें दबाए रखना शायद इसी को कहते हैं। अचानक नाक ,आंख और हवा फूंकने के लिए खोले गए मुंह में ढेर सा धुआं घुस जाने से अकबकाकर मैं उठ जाता हूं। सोचता हूं पानी डालकर चूल्हे को पूरा ठंडा कर दूं। एक दिन नहीं नहाए तो कौन सा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मगर फिर सोचता हूं आखिरी कोशिश कर देखूं। कार्यालय से चलते वक्त जो अखबार दबा लाया हूं उन्हें ही जलाता हूं। एक कोने में पड़े अखबार मैं उठा लेता हूं और इस आशा से कच्चे चूल्हे की तरफ बढ़ता हूं कि अब फतह मेरी है।
मैंने जो अखबार हाथ में लिया है वह रंगीन चित्रों से भरा है। लालच मेरा हाथ पकड़ लेता है। मूर्ख! रंगीन चित्रोंवाले अखबार को जला देगा तो खाली समय में क्या देखकर खुश होगा। मैं एक बार फिर पूरे अखबार को ललचाई नजरों से देखता हूं। अखबार मंे सजी धजी ,कीमती जेवरातों से लदी-फदी शिल्पा की तस्वीरें हैं। कमाल है , चूल्हा तो जल नहीं रहा है और मैं सुलग उठा हूं। ये अखबारवाले भी सरकार की तरह हमें जलाने पर तुले हुए हैं। तुलें भी क्यों नहीं । राज्य नामक बिल्डिंग के वे चैथे स्तंभ यानी खंभा जो हैं। सरकार नये ये ख्वाब दिखाकर जलाती है और यह चैथा ख्ंाभा रंगीन चित्र दिखाकर जलाता है। मुझे लगता है शिल्पा के चित्र देखूंगा तो और जलूंगा।डिसीजन मेकिंग में अब मैं देरी नहीं करता और फर्र्र से अखबार के टुकड़े करता हूं। मुझे संतोष होता है कि एक झटके में मैंने भव्यता के तिलिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं। अब मैं माचिस की एक और तीली जलाता हूं और अखबार के टुकड़े को जलाकर चूल्हें में डाल देता हूं। क्या देखता हूं कि सजी-धजी खिलखिलाती ,कीमती जेवरातों से सजी हुई शिल्पा भरभराकर जल रही है। यह मैं देख नहीं पाता। हाथ बढ़ाकर जलती हुई शिल्पा को चूल्हे से निकाल लेना चाहता हूं। मगर बहुत देर हो चुकी है। जैसे अब लड़की वाले मुझे देखकर कहने लगे हैं कि बस अब बहुत देर हो चुकी है। अब हो गया ,इतनी कट गई तो आगे भी काट ले। शादी क्यों करता है? बेकार किसी अच्छी भली लड़की की जिन्दगी बरबाद करने से क्या मिलेगा ?
मैं थूक निगलता हूं। अखबार का टुकड़ा राख हो गया है। सीली लकड़ियां है कि सिर्फ धुंधियाये जा रही हैं। मैं फिर अखबार फाड़ता हूं। इसमें उन लोगों की तस्वीरें दिखाई देती हैं जो मेहमानों के रूप में शाही-शादी में मौजूद थे। मैं अखबार के उस टुकडे को मरोड़कर गुच्छा बना देता हूं। इस गुच्छे में सारे लोग मुड़ तुड़ गए हैं। मरो। क्या जरूरत थी शादी में जाने की। तुम्हारे घर में खाने को नहीं था क्या? क्या कमी थी तुम्हें? अब भुगतो। सुना है शादी में शामिल आमंत्रित और अनामंत्रितों को कीमती उपहार दिए जाने लगे हैं। लो उपहार। जल गए न मेरे चूल्हे में ?
मगर यह टुकड़ा भी राख हो गया। गीली लकड़ियां और ज्यादा धुंधियाती रहीं। मैं खिसियाकर बाकी अखबार को भी नोंच-नोंच कर चिन्दी-चिन्दी कर देता हूं और चूल्हे में झौंक देता हूं। एक प्लास्टिक की बोतल में जो छटाक भर मिट्टी तेल बच गया था उसे भी उड़ेल देता हूं। बड़ी मुश्किल से यह तेल मैंने जुटाया था। राशन कार्ड में दो लीटर मिट्टी तेल कभी कभी मिल जाता है। वर्ना सारा मिट्टी तेल तो पैट्रोल पंपों में समा जाता है। जनता राशन की दूकानों के सामने कतार बना-बनाकर बुढ़ाती रहती है। दुकान खुलती है और राशन दूकानवाला पहले से लिखा हुआ बोर्ड टां्रग देता है। ‘‘शक्कर नहीं है। मिट्टी तेल नहीं है।’’ रहे भी कैसे ? गोदामों से तेल और शक्कर बाजारों में सीधे पहुंच जाती है। हमारे प्रजातंत्र की जनता अब बुढ़िया गई है ,सठिया गयी है। जब जनता जवान थी तब भी लुटी और अब भी बुढ़ापा बर्बाद कर रही है।
मैंने देखा कि आग थोड़ी सी लकड़ी पर चिपकी सी दिख रही है। अब इस थोड़ी सी आग पर ही भरोसा है। मैं उठकर , हथेलियां रगड़ते हुए , मुफ्त में पसरी हुई धूप में चला जाता हूं। धूप ठंडी है मगर मैं हूं कि ताप रहा हूं।
24.11.09

Comments

वाह जी आप तो शिल्पा की शादी से कुछ ज्यादा ही जल गए। बहुत ही अच्छा कटाक्ष है पर समझने वाले समझें तो है
R. Venukumar said…
आपकी टिप्पणी हल्की धूप की तरह गुनगुनी और मीठी है। समझ के चूल्हें में भुनते आलू की तरह सौंधी खुश्बू से सराबोर....हर बार प्रतीक्षा रहेगी..धन्यवाद रचनाशीलता का..
Dr.R.Ramkumar said…
रचना जी, आपने व्यंग्य के मूल स्वर को पकड़कर जो टिप्पणी की है उसने शाही शादी की विसंगतियों को सुलझाने में विरेचक का काम किया है। दरअसल मैं डर रहा था कि व्यंग्य की मूलदिशा में और विद्रूपताओं की गहराई में न जाकर कहीं इसे हल्के से न लिया जाए। आपने मेरे धड़कते दिल को आराम दिया धन्यवाद। मैं आप जेसे गुणियों की टिप्पणियों की बच्चों की तरह प्रतीक्षा करता हूं।
वेणुकुमार जी मैं आपके विचारप्रधान गीतों के बहाव से होकर गुजर रहा हूं , आपकी टिप्पणी में भी जैसे गीतात्मकता है। धन्यवाद।
समझने वाले समझ गए हैं ना समझे वो अनाड़ी है.
Anonymous said…
आपका बीच-बीच में आया हुआ तड़के का स्वाद...
काफ़ी मारक होता है....

आभार!!
Kumar Koutuhal said…
मैंने देखा कि आग थोड़ी सी लकड़ी पर चिपकी सी दिख रही है। अब इस थोड़ी सी आग पर ही भरोसा है। मैं उठकर , हथेलियां रगड़ते हुए , मुफ्त में पसरी हुई धूप में चला जाता हूं। धूप ठंडी है मगर मैं हूं कि ताप रहा हूं।

बहुत सुन्दर , बहुत सघन बुनावट के साथ आडम्बर-प्रियता पर घमासान वार प्रहार ... डाॅ साहब ! आपकी शल्य-क्रिया पीड़ा-दायक भी है और मज़ेदार भी....उपचार-मूलक तो है ही.
kumar zahid said…
रविभाई,प्रदीप भाई ,कौतुहलजी ,
आपकी टिप्पणियां सूक्ष्म और गंभीर विश्लेषण युक्त हैं। रचनाशीलता के लिए विचारों का आदानप्रदान खाद या पोषण होता है।धन्यवाद!
kumar zahid said…
अब लड़की वाले मुझे देखकर कहने लगे हैं कि बस अब बहुत देर हो चुकी है। अब हो गया ,इतनी कट गई तो आगे भी काट ले। शादी क्यों करता है? बेकार किसी अच्छी भली लड़की की जिन्दगी बरबाद करने से क्या मिलेगा ?
मैं थूक निगलता हूं। अखबार का टुकड़ा राख हो गया है। सीली लकड़ियां है कि सिर्फ धुंधियाये जा रही हैं। मैं फिर अखबार फाड़ता हूं। इसमें उन लोगों की तस्वीरें दिखाई देती हैं जो मेहमानों के रूप में शाही-शादी में मौजूद थे। मैं अखबार के उस टुकडे को मरोड़कर गुच्छा बना देता हूं। इस गुच्छे में सारे लोग मुड़ तुड़ गए हैं। मरो। क्या जरूरत थी शादी में जाने की। तुम्हारे घर में खाने को नहीं था क्या? क्या कमी थी तुम्हें? अब भुगतो। सुना है शादी में शामिल आमंत्रित और अनामंत्रितों को कीमती उपहार दिए जाने लगे हैं। लो उपहार। जल गए न मेरे चूल्हे में ?

आपके अंदाजेबयां का जवाब नहीं तभी तो भाई लोगों की कलम मचल उठती है।
wah...वाह.. अच्छी रचना... साधुवाद..
श्रद्देय डा. साहब,
'शिल्पा जी की शादी' का इस रूप में वर्णन
और,
''मुझे संतोष होता है
कि एक झटके में
मैंने भव्यता के
तिलिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं।''

जैसे जादुई शब्दों का उपहार
गहनता से पढ़ने वाले
आपकी कलम के कायल हो ही जायेंगे..

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
shama said…
Aankhonke aage ek tasveer khinch gayee!
मुझे संतोष होता है
कि एक झटके में
मैंने भव्यता के
तिलिस्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं।''
एक गरीब आदमी के मन के भाव और अमीर आदमी का विलास कितने गहरे मी उतर कर दोनो मे अन्तर को कटा़ क्ष का शिलप दिया है। सच मे गरीब तो अमीरों की भव्यताओं के चुल्हे मे ही जल जाता है। हैरान हूँ कि इतना गहरे मे जाने के लिये कितनी संवेदनाओं को छूआ होगा । लाजवाब शुभकामनायें

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