Thursday, August 13, 2009

अथ सुअर-वार्ता


अथ सुअर-वार्ता उर्फ ‘स्वाइन-फ्लू’

तमस का आरंभ भीष्म साहनी ने सुअर के दड़बे में सुअर-युद्ध से किया है। सुअर अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है और उपन्यास का पात्र कुछ राजनैतिक व्यक्तियों की दुरभिसंधि के लिए सुअर को लाश बनाने के लिए अपनी जान का दांव खेल रहा है। अस्तित्व का संकट दोनों के सामने है। आदमी के हाथ में हथियार है और सुअर के पास केवल नैसर्गिक जिजीविषा है। सुबह अभी हुई नहीं है। अंधकार दोनों के लिए एकसा है। दोनों आहटों की लड़ाई लड़ रहे हैं। एक आहट पर वार कर रहा है ,दूसरा आहट के साथ होनेवाले वार से खुद को बचाता हुआ सापेक्षिक प्रहार कर रहा है। बचाव की रणनीति सुअर की है। अंत में दुष्ट-प्रयास जीत जाता है और निरीह सुअर मारा जाता है।
भारत में धर्मान्धता को भड़काकर हिन्दू- मुस्लिम दंगे कराने के लिए मरे हुए सुअर को हथकण्डे के रूप में रातनीतिक लोग प्रयुक्त करते हैं। यही बात भीष्म साहनी ने इस उपन्यास में बुनी है। सुअर को आधार बनाकर सांप्रदायिक दंगे की व्यूह रचना मानवीय विकास हो सकता है लेकिन मनोवैज्ञानिक उसे उन्माद कहते हैं। धार्मिक-उन्माद। वह भी एक प्रकार का फ्लू है -रिलीजन फ्लू।
भारत के लिए ‘सुअर-रोग’ यानी ‘स्वाइन-फ्लू’ नया है। किन्तु जिस सुअर को हम घृणा की दृष्टि से देखते हैं वही सुअर भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर के रूप में पुराणकाल से उपस्थित है। तैंतीस करोड़ आर्य देवताओं में वराह देवता भी हैं। विष्णु के वराह रूप में अवतार लेने से ही दशावतार पूर्ण होते हैं। वराह यानी यही आज का लोकप्रिय सुअर। आज जिस सुअर ने पूरे विश्व को
मृत्यु के आसन्न संकट में डाल दिया है ,उसी सुअर ने एक दिन रसातल में डूबी हुई पृथ्वी को अपने खीस में उठाकर उसे जीवनदान दिया था। उस मुक्तिदाता को जंल मिला। वह जंगली सुअर कहलाया जिसे खीस होते हैं ,हाथी की तरह थूथन से निकले हुए। हाथी और सुअर के अंतर्संबंध की बात जीवविज्ञानी जाने किन्तु देखने में दोनों में विकासात्मक अंतर दिखाई देता है। हाथी अवतार नहीं है ,वराह अवतार है।
अंग्रेजी में स्वाइन या पिग कहे जानेवाले खीसविहीन पालतू प्राणी को हिन्दी में सुअर ,शूकर और वराह कहते हैं। कभी कभी प्यार से इसे सुंगरा या सूंगर भी लोग कहते हैं। मेरे पड़ोस में एक संभ्रांत महिला है जो अपने बच्चों की एकांतप्रियता को कोसती हुई ब्याजनिंदा में प्यार से कहती है, ‘हमारे बच्चे सूंगर है साले, कहीं आते जाते नहीं ,किसीसे मिलतेजुलते नहीं।’ जब मां कहती है तो हर गाली आंचल की तरह लिपट जाती है। फिर चाहे वह सुअर ही हो।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सुअर के देवावतरण के कारण हिन्दू इसे प्यार करने लगे हों , इसकी पूजा करने लगे हों। भारत मे इतनी धर्मान्धता नहीं है। भारतीय जनता अपनी सुविधा और लाभ की दृष्टि से किसी की पूजा करती है और नुकसान या भय के कारण उससे घृणा करती है। मनोरंजन और आत्मश्लाघा के लिए भी वह घृणा के सूत्र बंटती है। सुअर पौराणिक होने के बावजूद किसी के सम्मान के लिए उपयोग नहीं आता। सुअर , बौना , कुत्ता ,कछुआ, मछली आदि भले ही भारतीय धर्म की अवतारात्मक अभिव्यक्तियां है किन्तु किसी को कोई इस तरह अभिनंदित नहीं करता कि आप हमें सुअर ,बौने ,कुत्ते ,मछली या कछुए की तरह पूज्य लगते हैं। व्यावहारिक दृष्टि से धर्म उनके व्यक्तिगत उपयोगके लिए नहीं है जिन्होंने उसकी रचना अपने लाभ के लिए की है और बाकी लोगों पर लागू करने के लिए की है। इसीलिए दशावतारों में से एक होने के बाद भी भारत में सुअर अस्पश्र्य है, निकृष्ट है ,उपेक्षणीय है।
दूसरी तरफ शेष विश्व है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुअर का बच्चा यानी पिल्ला बचत का फण्डा है। पिगी-बैंक के नाम से वहां बच्चों को बचत सिखाने के लिए चीनी मिट्टी का पिगी उपलब्ध है। इजराइल के प्रसिद्ध युवा लेखक एतगार केरेत ने हिब्रू में एक बहुत ही मार्मिक कहानी लिखी है। यह कहानी एक पिता द्वारा अपने बच्चे को बचत सिखाने की भावना से रची गई है। इसलिए हिन्दी में प्रस्तुत करते समय अनुवादक ने इसका नाम ‘सीख ’ रखा है। कहानी का सारांश यह है कि बच्चा किसी महंगे खिलौने की मांग करता है और पिता उसमें फिजूलखर्ची के खिलाफ बचत के संस्कार डालने के लिए एक पिगी-बैंक खरीद कर देता है और कहता है कि जब पिगी के पेट में इतने सिक्के हो जाएंगे कि उसका बजना बंद हो जाए तो वह खिलौना उसे उन्हीं पैसों से खरीदकर दे दिया जाएगा। पिगीबैंक यानी सुअर के पिल्लेनुमा गुल्लक के पेट में सिक्का डालते डालते बच्चे को साहचर्य के कारण उससे लगाव हो जाता है। वह उस पिगी के साथ खेलता है बातें करता है ,उसे पोंछता है, नहलाता है और उससे अलग नहीं हो सकता। एक दिन वह भी आता है कि पिगी का पेट बजना बंद हो जाता है। यही उसका अंतिम दिन है। पिता पिगी को बजाकर देखते हैं और बच्चे को हथौड़ी थमाकर कहते हैं कि तोड़ो पिगी का पेट और निकालो पैसे। कल तुम्हारा खिलौना तुम्हें मिल जाएगा। आंख में आंसू लिए बच्चा उस रात की मोहलत मांग लेता है और एकांत मिलते ही उस पिगी को बचाने के लिए एक झाड़ी में छुपा देता है। बचत सीखते-सीखते बच्चे मानवीय रिश्तों को नर्मी सीख जाते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक ने शायद इसी कहानी से प्रेरणा लेकर एक योजना शुरू की है। प्राथमिक तथा मिडिल स्तर के बच्चों को बचत की बेंकिंग सिखाने के लिए ‘राजू और आसमान की सीढ़ी; तथा ‘राजू और पैसों का पेड़ ’ नामक दो किताबें स्कूलों को प्रेषित की है। इस समाचार के साथ एक पिगी-गुल्लक के छेद में सिक्का गिरते हुए दिखाया गया है। सुअर फायदे का प्रतीक है। एक साथ सुअर बारह बच्चे देती है। इतनी किफायती जन्मदर शायद ही किसी दूसरे प्राणी की हो। विदेशों में सुअर व्यापारिक दृष्टि से लाभ का धंधा है। विदेशों में पिग-फार्मिंग यानी सुअर की खेती की जाती है। जैसे भारत में कुक्कुट या मुर्गी पालन ,भेड़ पालन ,बकरी पालन ,मछली पालन किया जाता है। अच्छी तरह पालपोसकर उपयुक्त समय पर उसे काट डाला जाता है। जैसे कृषि आदि उत्पादन में किया जाता है। बाकायदा बीजारोपण के बाद तमाम तरह की देखभाल की जाती है। देखा जाता है कि उन्हें कैसे पुष्ठ किया जाए कि उसका बाजार भाव ऊपर उठ जाए। भारत में सरकार आजकल पिगरी , पोल्ट्री , फिशरीज को बढ़ावा देने के लिए अनुदान और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। पिगरीज या शूकर-कृषि में बर्ड-फ्लू की तरह का खतरा भी नहीं है। बर्ड फ्लू मुर्गियों को होता है जबकि ‘स्वाइन-फ्लू’ यानी ‘पिग-इन्फ्लूएंजा’ आदमियों को रहा है। मेरी पत्नी ने पूछा है कि सुअरों को होनेवाला स्वाइन-फ्लू आदमियों को क्यों हो रहा है ? क्या हो सकता है संभावित उत्तर ? वह उत्तर जो श्रीमतीजी के कुकर में पक रहा है ? शायद यह कि आदमी ही सुअर हो गया है इसलिए !
बहरहाल सुअर आज बहुत लोकप्रिय हो रहा है। घर घर उसकी चर्चा है। देशी सुअरों की तरफ हम देखना भी पाप समझते रहे हैं। स्वाइन-फ्लू के चलते अब उसे लोग देख रहे हैं कि यही है आज जो टीवी और अखबारों में छाया हुआ है। एक अवसर होता है छाने का और सुअर भी छा जाता है। लोगों को ऐड़ियां घिसते सालों बीत जाते हैं और वह लोकप्रियता की एक पायदान नहीं चढ़ पाते।
इति सुअर-वार्ता ।
दि. 110809

1 comment:

ravikumarswarnkar said...

बहुत ही बेहतर व्यंग्य...
स्वाईन फ़्लू के बहाने आप कई गंभीर इशारे कर गये हैं...
इति सुअर-टिप्पणम