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"मित्रता दिवस" का गीत

मित्रता के हमें पर्व पर गर्व है, हम सुदामा हैं, कान्हा से मिल आएंगे। यह धरा उर्वरा है, उगाओ अगर, प्रेम के पुष्प, पतझर में खिल जाएंगे। त्रास के ग्रास पर दिन गुजारे, सही, इन अभावों से भावों का अर्जन किया। हम व्यथित थे, व्यवस्थित हुए दिन ब दिन, कष्ट के पृष्ठ पर सुख का सर्जन किया। हमने बंजर की छाती पे सावन लिखे, एक दिन इनमें आशा के फल आएंगे। यह धरा उर्वरा है, उगाओ अगर, प्रेम के फूल, पतझर में खिल जाएंगे। भर के भावों की कांवड़ चली आस्था, वेदना के मरुस्थल का दिल सींचने। सूखकर सारे सागर कुएं हो गए, उनके अंदर से विस्तार फिर खींचने। हैं विषमता के पर्वत खड़े मार्ग में, हम जो मिलकर चलेंगे, वो हिल जाएंगे। यह धरा उर्वरा है, उगाओ अगर, प्रेम के फूल, पतझर में खिल जाएंगे। भाइयों और बहनों! ज़रा सोचिए, आज भी व्याख्यानों का प्रारंभ तुम। श्रावणी पूर्णिमा का हो विश्वास तुम, हर सुरक्षा के ग्रंथों का आरम्भ तुम। तुमको छूकर बहारें महक जाएंगी, तुमसे टकराके दुर्दिन ही छिल जाएंगे। यह धरा उर्वरा है, उगाओ अगर, प्रेम के फूल, पतझर में खिल जाएंगे। आओ, सद्भावना पर किताबें लिखें, एक अक्षर न...

समाचार आजकल : समांतर सेनाएं

मैं समाचार देख, सुन और पढ़ रहा हूं। जो बात मेरी तुच्छ बुद्धि को समझ में आ रही है वो यह है कि इस्लामाबाद जिस देश की राजधानी है वहां की दो समांतर राजकीय सेनाएं हैं। पाक की #शासकीय_सेना राज करती है और उन देशों से लड़ती है जो आतंकवादियों को आतंक करने पर ठोंकती है। दूसरी राजकीय सेना है #मुहम्मदी_सेना जिसे उर्दू ( अरबी/ फ़ारसी) में #जैशेमुहम्मद ( जैश = सेना, मुहम्मद = इस्लामी पैगम्बर) कहते हैं। जिस तरह के समाचार आ रहे हैं और पाकिस्तान सरकार जिस तरह से जैशेमुहम्मद के सदरेखास की रक्षा में मुस्तैद है, उससे मेरी मंद-बुद्धि को ऐसा क्यों लगता है कि सदरेखासेजैशेमुहम्मद हजरत मसूद अज़हर ही वास्तव में पड़ोसी देश की #पाकीज़ा_सरकार हैं। #यह_दुनियाकी पहली अद्भुत समानांतर सेना है जो किसी देश की सैन्य खर्चे पर चर्चे में रहती है। अन्य शब्दों में इसे "खुजली_सेना" भी कह सकते हैं जो शक्तिशाली राष्ट्रों को खुजाकर अपने "वतन, पाक वतन" को संतुष्टि पहुंचाती है। यह खुजली सेना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रही है, इस दृष्टि से यह भी समानांतर सेना नहीं है भी यह "देशी-सेना" से ज्यादा विशाल ...

जुलाहा

जुलाहा को याद करो तो कबीर याद आते हैं। विश्वभारती विश्वविद्यालय के संस्थापक कविगुरु रवींद्र, विश्वभारती के आचार्य क्षितिमोहन सेन और विश्वभारती के ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'कबीर' को याद करते हुए कितने ही मानदंड स्थापित किये। 'कबीर ' का अर्थ अद्भुत, आला और महान सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है। 'कबीर' ने उसे सार्थक भी किया है। आलोचना के शिखर-पुरुष नामवर सिंह के गुरु हजारी प्रसाद की कृति 'कबीर' पढ़ने से पता चलता है कि कबीर की व्युत्पत्ति के मूल में *कवि:* भी बैठा हुआ है। संस्कृतविद 'कवि:' से कबीर तक की यात्रा सरलता से कर सकेंगे। कुलमिलाकर, *कवि-समूह* को यह नवगीत सौंप रहा हूं, जुलाहा की जगह अपने को रखकर पढ़ें। और हां, यह सिर्फ *छूने भर की चेष्टा* है, *असल गहराई तक जाना* तो मैं ही निश्चित रूप से नहीं कर पाया। *जुलाहा* धागा-धागा बुने जुलाहा ताना, बाना, भरणी। रेशा-रेशा कुल कपास का आपस में मिलजुलकर। गाढ़ा गढ़े गूढ़ गुंथन में गठ-बंधन, शुभ, हितकर। परिमित कूलों के भीतर ही अगम अपरिमित धारा, अनगढ़ ऊबड़-खाबड़ गड्ढे ढांप रही सरि हंसकर। शोभनीय ...

मोहरे

जो लोग शतरंज के खिलाड़ी हैं उन्हें मोहरों की औकात पता है। मोहरा बेचारा ही अपनी कीमत नहीं जानता। अभी तीन दिन पहले मैं मोहरा बनाया गया और उस समय तक मेरे बड़े भाव थे जब तक मैं पिट नहीं गया। मुझे मोहरा बनाकर चलनेवाले चालबाज़ ने जानबूझकर मुझे दूसरी पार्टी के घर में धकेलकर ऐसे स्थान पर खड़ा किया था जहां मेरे पिट जाने में आसानी हो। नाइट के सामने पैदल कैसे टिकेगा? मुझे वजीर कहकर इस खिलंदड़े चालबाज़ ने उठाया था लेकिन जब मैं घोड़े से पिट गया तो मुझे अपनी चाल में लगानेवाला चालबाज़ खिलाड़ी हंसकर बोला, "गया पिद्दी मोहरा। मुझे पता था यह जाएगा इसीलिए इसे आगे बढ़ाया। पर चूंकि यह ज़िंदा इंसान है इसलिए इस पिद्दी (पैदल) को भाव देते हुए इसे मैंने झूठमूठ वजीर कह दिया ताकि यह खुशी खुशी मोहरा बन सके और मैं इसे चल सकूं।' मैं पिटा हुआ पैदल लुइस रुआंसा होकर उस चालबाज़ शतरंजिये का मुंह टुकुर टुकुर देख रहा था। एडिनबर्ग स्कॉटलैंड के तमाशाई देखते रहे कि झल्लाई हुई रानी विक्टोरिया किंग लुइस मार्टिन को नहीं, वार्डर लुइस चैस को पीटने लगी। किंग मार्टिन हंसने लगा। क्वीन विक्टोरिया रॉयल-गेम छोड़कर गली-छाप लड़ाई पर उतर आ...

संवादों के फूल

पितृ दिवस के अवसर पर एक पैतृक गीत : *** अनबोली दुनिया में खुशबू भरने को, संवादों के फूल खिलाने आया हूं। मैं, मेरे, अपने, परिजन खुश रहें, खिलें, सुमन सुमन भावी भावन भर लाया हूं। बनावटों की बाट-बाट बगवानी थी। स्वार्थ सनी हर ललक, खुशी,अगवानी थी। नहीं सिकोड़ी नाक न माथे सिकन पड़ी, मेरे लिए खेल उनकी नादानी थी। संबंधों की मुझे लगन, उनको क्रीड़ा। तोड़ी नहीं, सदा जोड़ी है मन-वीणा। खिंचे तार पर कटी किन्तु उंगली फेरी, झंकारों पर झूमा, नाचा, गाया हूं। बदल नहीं सकते जब दुनियावालों को। दिखा नहीं सकते अंदरूनी छालों को। मगरमच्छ हैं जहां, हमे भी रहना है, छोड़ नहीं सकते हम चलचर, तालों को। पीकर विष, हंसकर अस्तित्व बचाना है। जान बूझकर चोट-चोट मुस्काना है। 'तुम तुम हो, मैं मैं हूं' ऐसा सोच सदा, इस कांटों से भरे सफर में आया हूँ। नीड़ है मेरा, चूजे मेरे, मैं उनका। उनकी खातिर जोड़ा है तिनका-तिनका। बाजों से, गिद्धों से बचा-बचा लाया, कभी न अंतर किया रात का या दिन का। उनको इस जंगल में जीना सिखलाऊं। कैसे लड़ें भेड़ियों से गुर बतलाऊं। सिर, पर, पैर मिले हैं मुझको इसीलिए, धरती नापी ह...

हर मन भूखा

हरमन भूखा रह जाता है, खाता नहीं दलाली। जनसंख्या का गणित संगठित लूट-मार में भागी। एक दूसरे के पहुंचे से, पहुंचे घर-घर दागी। बिना-मोल बिक गयी जवानी बिना तुले निष्ठाएं, द्वेष, झूठ, मद, घृणा पागती राजनीति बड़भागी। सुप्त-कोश बन गए युवाओं ने शक्तियां उछाली। (किन्तु ....) हरमन भूखा रह जाता है, खाता नहीं दलाली। सारे न्यायशास्त्र के मानक पिछलग्गू हैं उनके। कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं, तन गेंहू, मन घुन के। उनका 'कृत्रिम' भी 'सच्चा' है उनका 'छल' भी 'सद' है, 'सरल-सत्य शुभ' के पीछे रखते वे गुहचर चुनके। बाट-बाट बटमार उन्हीं के, कदम कदम कुतवाली (किन्तु ....) हरमन भूखा रह जाता है, खाता नहीं दलाली। यह उनका विज्ञान, एक को दाबें, सौ दब जाएं। उनका मंत्र, 'प्रणाम लाख के, मात्र एक को जाएं।' उनकी रेखा वक्र रहे, पर सुगम-सरल कहलाये, प्रकृति उनके साथ है, उनके पत्थर भी तिर जाएं। उनको अमृत-सिंधु मिला है, यद्यपि रेत खंगाली! (किन्तु ....) हरमन भूखा रह जाता है, खाता नहीं दलाली। हरमन अब भी भूखी-बस्ती में मुरझाया रहता। म...

आओ मित्रों! घर-घर खेलें

पका रहा है खिचड़ी क्या क्या, मन मस्ताना, बन बावरची। यतन-यतन की रतन रसोई, सपनों के अपने चटखारे। मंत्र मुग्ध मन दुख-सुख धोकर, ताज़ा मक्खन मार बघारे। धीरे-धीरे मिलें मसाले, यादें प्याजी, मां के घर की। जहां-जहां से बाड़ी दरके, फिर-फिर जोड़े भोला धुनकी। धनिया-पोदीने में खटपट, मिर्च-भटे से तुरई तुनकी। चटनी से उलझा सिलबट्टा, चैन नहीं उसको पल भर की। फूले कल्ले खौफ़ चबाकर, पान उठ गए, बंटी सुपारी। टेढ़ी मुस्कानों में झलके, घृणा-द्वेष की धुन हत्यारी। बन्धुत्वों के बंधन बिखरे, सींग मारती है मन-मरज़ी। आओ मित्रों घर-घर खेलें, छाओ आम-जमुन के पत्ते। चौपालों में पीपल-बरगद, आँगन में चम्पे के छत्ते। हाट-हाट से हंसी जुटाओ, खट्टी मीठी, खारी चरपी। ** डॉ. रा. रामकुमार, १४.५.१९, (६ बजे, १ बजे)